पत्थलगड़ी और प्रवेश निषेध

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[author] [author_image timthumb=’on’]http://samkaleenjanmat.in/wp-content/uploads/2018/05/gladson-dungdung.jpg[/author_image] [author_info]ग्लैडसन डुंगडुंग[/author_info] [/author]

25 मार्च 2018 को रामनवमी के अवसर पर लगभग 300 बाईक और लाउडस्पीकर लगे दो चारपहिया वाहन के साथ हाथों में तलवार और लाठी लिये सैकड़ों की तदाद में तथाकथित रामभक्त जुलूस लेकर नारा लगाते हुए झारखंड के खूंटी जिलान्तर्गत अड़की थाना के सोनपुर गांव में प्रवेश करने लगे, जिन्हें ग्रामसभा ने रोक दिया। फलस्वरूप, दोनो पक्षों के बीच बहसा-बहसी हुआ जो मारपीट में बदल गया। गांव में अफरातफरी मच गई। रामभक्तों के हाथों में खतरनाक हथियार देखकर सोनपुर गांव के महिला और पुरूष भी तीर-धनुष और फरसा लेकर निकले, जिसे देखकर अधिकतर रामभक्त भाग खड़े हुए।

ग्रामसभा के सदस्यों ने अड़की प्रखंड बीस सूत्री समिति के अध्यक्ष संजय मुंडा, संतोष कुमार, जयकिशन मुंडा सहित 20-25 लोगों को बंधक बना लिया। ग्रामसभा के सदस्यों ने इन रामभक्तों से सवाल किया कि ग्रामसभा से अनुमति लिये बगैर गांव में जुलूस क्यों प्रवेश किया ? रामभक्तों को बंधक बनाने का मसला ने तुल पकड़ लिया और लगभग 500 की संख्या में रामभक्तों ने मुख्य सड़क को जाम कर दिया। इसी बीच प्रशासन के पास खबर पहुंची। रनिया थाना की पुलिस और बीडीओ रंजीता टोप्पो भी अपने दल-बल के साथ गांव पहुंचे। अंततः बीडीओ और पुलिस की उपस्थिति में दोनों पक्षों के बीच सुलाह किया गया।

इस गांव में कुछ ही दिन पहले ग्रामसभा के द्वारा पत्थलगड़ी किया गया था इसलिए खूंटी पुलिस ने इस घटना के लिए सारा ठीकरा ग्रामसभा के माथे फोड़ दिया। खूंटी के पुलिस अधीक्षक अश्विन कुमार सिन्हा ने कहा कि कुछ लोग रामनवमी की शोभायात्रा लेकर निकले थे इसी दौरान उनका विवाद किसी बात को लेकर दूसरे लोगों से हो गयी, जिसके बाद शोभायात्रा में शामिल लोगों के साथ दूसरे पक्ष के लोगों ने मारपीट की। मारपीट करने वाले लोग पत्थलगड़ी से जुडे़ हुए हैं।

इसी तरह खूंटी क्षेत्र के कई ग्रामसभाओं ने सीआरपीएफ जवान, जिला प्रशासन एवं पुलिस अधिकारियों को गांवों में बिना इजाजत प्रवेश करने से मना कर दिया था और जबरदस्ती घुसने पर उन्हें बंधक बना लिया था। लेकिन इस घटना के बाद पत्थलगड़ी और ग्रामसभा के द्वारा गांवों में ‘प्रवेश निषेध’ को लेकर सरकार, राजनीतिक पार्टी, मीडिया, पारंपरिक अगुआ और आम लोगों के बीच एक बार फिर से गंभीर चर्चा होती रही। यह कहा गया कि जब भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) के द्वारा सभी लोगों को सम्पूर्ण भारत में स्वतंत्र पूर्वक घुमने का मौलिक अधिकार प्रदान किया गया है तो ग्रामसभा लोगों का गांव में ‘प्रवेश निषेध’ कैसे कर सकता है ?

यहां प्रश्न उठता है कि क्या पत्थलगड़ी की आड़ में ग्रामसभा अपने शक्ति और अधिकारों के दायरे से बाहर काम कर रहा है ? क्या जो लोग ग्रामसभा और पत्थलगड़ी पर सवाल उठाते हैं उन्हें ग्रामसभा की शक्ति एवं अधिकारों के बारे में जानकारी है ? क्या लोग सिर्फ अपना पक्ष और हितों को ध्यान में रखकर बातें करते हैं ? आदिवासियों के संवैधानिक, कानूनी एवं पारंपरिक अधिकारों को लेकर चर्चा क्यों नहीं होती है ? आदिवासियों के हित हमेशा गैर-कानूनी, असंवैधानिक एवं देशद्रोही के तराजू पर क्यों तौला जाता है ?

यहां मौलिक प्रश्न यह है कि क्या किसी क्षेत्र में ‘प्रवेश निषेध’ का प्रयोग करना असंवैधानिक एवं गैर-कानूनी है या सिर्फ आदिवासी इलाकों में ग्रामसभाओं के द्वारा ‘प्रवेश निषेध’ का उपयोग करना असंवैधानिक एवं गैर-कानूनी है ? यहां हमें यह भी चर्चा करनी चाहिए कि अनुसूचित क्षेत्रों के ग्रामसभाओं ने ऐसा कदम क्यों उठाया है ? क्या पारंपरिक ग्रामसभाओं ने भारतीय संविधान एवं कानूनों का उल्लंघन किया है ?

अनुसूचित क्षेत्रों के ग्रामसभाओं का कदम असंवैधानिक एवं गैर-कानूनी इसलिए दिखाई देता है क्योंकि इन क्षेत्रों में रहने वाले गैर-आदिवासी लोग आदिवासियों के संवैधानिक, कानूनी एवं पारंपरिक अधिकारों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। वे सिर्फ अपने हितों को साधने में लगे हुए हैं। वे अनुसूचित क्षेत्रों के बारे में चर्चा करते समय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 19 (1) (ए) (डी) (ई) (जी) का संदर्भ तो देते हैं लेकिन अनुच्छेद 19 (5) एवं (6) को चुपचाप निगल जाते हैं।

इन्हें यह मालूम होना चाहिए कि अनुसूचित क्षेत्र का अर्थ है आदिवासी इलाका, जहां आदिवासियों को संवैधानिक रूप से विशेष अधिकार प्रदान किया गया है, जहां संसद एवं विधानमंडल के द्वारा पारित किये गये सामान्य कानूनों को लागू नहीं किया जा सकता है। इस क्षेत्र का प्रशासन एवं नियंत्रण राज्यपाल के हाथों में होता है। राज्यपाल को यह अधिकार दिया गया है कि आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए वह कोई भी कानून का संशोधन या निरस्त कर सकता है तथा कानून भी बना सकता है।

इसी तरह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (5) एवं (6) के द्वारा राज्य (स्टेट) को यह अधिकार दिया गया है कि यदि आदिवासियों के हित प्रभावित हो रहे हैं तो सरकार उक्त क्षेत्र में बाहरी लोगों के प्रवेश, विचरण, नौकरी, व्यापार एवं निवास पर प्रतिबंध लगा सकता है। इस संदर्भ में आदिवासी इलाकों को देखने से यह पता चलता है कि अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों के लिए भूमि रक्षा काूनन, पेसा कानून, वन अधिकार कानून, सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट एवं संवैधानिक प्रावधान हैं। लेकिन इसके बावजूद आज बड़े पैमाने पर आदिवासियों की जमीन गैर-कानूनी तरीके से गैर-आदिवासियों के हाथों में चली गई है। इन इलाकों में गैर-आदिवासी बस चुके हैं। यही गैर-आदिवासी लोग आदिवासी इलाकों के प्राकृतिक संसाधनों (जंगल, पानी और खनिज) का बेहिसाब दोहन कर रहे हैं। इससे आदिवासियों के हितों को बड़े पैमाने पर नुकसान हो रहा है और उनका अस्तित्व दांव पर लगा हुआ है।

ऐसी स्थिति में राज्यपाल भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची के पैरा – 5 में प्रदत्त अपनी शक्ति का उपयोग करते हुए आदिवासियों के हितों की रक्षा कर सकते हैं लेकिन वे ऐसा नहीं कर रहे हैं। इसी तरह सरकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (5) एवं (6) का उपयोग करते हुए आदिवासियों के अधिकार एवं हितों की रक्षा के लिए कानून बना सकती है। लेकिन न राज्यपाल और न ही सरकार को आदिवासियों के अधिकार एवं हितों की चिंता है। वे सिर्फ काॅरपोरेट जगत एवं प्रवासी गैर-आदिवासियों के हितों को साधने में लगे हुए हैं।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 46 में स्पष्ट कहा गया है कि स्टेट आदिवासियों को सभी तरह के शोषणों से सुरक्षा प्रदान करेगा। लेकिन आज आदिवासियों पर हो रहे शोषण, दमन, जुल्म, अत्याचार और उनके आजीविकास के संसाधनों की लूट किसी से छुपी है क्या ?

जब संविधान, कानून एवं सरकार के होते हुए आदिवासी लूटे जा रहे हैं तब क्या वे चुपचाप अन्याय सहते रहेंगे ? इसीलिए वे अपने पारंपरिक अधिकारों का उपयोग करते हुए अपनी रक्षा कर रहे हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 (3) के तहत रूढ़ि एवं प्रथा को विधि का बल प्राप्त है इसलिए अनुसूचित क्षेत्रों के लिए आदिवासियों की रूढ़ि एवं प्रथा ही विधि का बल है। इसके अलावा पेसा कानून 1996, वन अधिकार कानून 2006 एवं नियमगिरि के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला ग्रामसभा को गांव की संस्कृति, परंपरा, रूढ़ि, विश्वास, प्राकृतिक संसाधन, इत्यादि को सुरक्षा करने का सम्पूर्ण अधिकार देता है। इसका अर्थ यह है कि यदि ग्रामसभा को लगता है कि गांव में बाहरी लोगों के प्रवेश से वहां की संस्कृति, परंपरा, रूढ़ि, विश्वास, प्राकृतिक संसाधन, इत्यादि को क्षति पहुंच रही है तो वह विधि सम्मत कार्रवाई कर सकता है। इसलिए गांव में बगैर-अनुमति के ‘प्रवेश निषेध’ विधि सम्मत कार्रवाई है।

अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभाओं के द्वारा लगाया गया ‘ प्रवेश निषेध ’ को ऐसा दर्शाया जा रहा है जैसे कोई बहुत बड़ा तुफान आ गया है जबकि यह आज के संदर्भ में बहुत ही जरूरी कदम है। इन इलाकों में आदिवासी लड़कियों का बड़े पैमाने पर ट्रैफिकिंग हो रहा है, प्राकृतिक संसाधनों का बेहिसाब दोहन हो रहा है और वनोपज का उचित मूल्य नहीं दिया जा रहा है। इन असंवैधानिक एवं गैर-कानूनी कार्यों में बाहरी लोग लिप्त हैं, जो आदिवासी गांवों में बड़े पैमाने पर घुसपैठ करते हैं। इन दलालों का पुलिस-प्रशासन के साथ सांठगांठ है। ऐसी स्थिति में अनुसूचित क्षेत्रों के गांवों की सुरक्षा करना ग्रामसभाओं की जिम्मेवारी है।

हमें यह भी सोचना चाहिए कि शहरों में जगह-जगह पर लगायो गये ‘प्रवेश निषेध’ पर हम सवाल क्यों नहीं उठाते हैं ? यदि शहरों में ‘ प्रवेश निषेध ’ लगाना संवैधानिक एवं कानूनी है तो गांवों में यह असंवैधानिक एवं गैर-कानूनी कैसे हो गया ? झारखंड के रांची, जमशेदपुर, बोकारो जैसे शहरों में आदिवासियों की जमीन को गैर-कानूनी तरीके से हड़पकर वहां काॅआॅपरेटिव काॅलोनी बसाया गया है, जहां बाहरी लोगों का ‘ प्रवेश निषेध ’ है। इन काॅलोनियों में कोई भी जायेगा तो उसे गार्ड से आदेश लेना पड़ता। लेकिन क्या कोई इसपर सवाल उठाता है ? लोग कहेंगे कि यह इनके सुरक्षा के लिए जरूरी है। यहां सवाल उठता है कि क्या सिर्फ शहर में रहने वालों को सुरक्षा चाहिए ? जब गांव के लोग इन काॅलोनियों में बिना इजाजत के प्रवेश नहीं कर सकते हैं तो बाहरी लोग गांव में इजाजत के बिना क्यों प्रवेश करेंगे ? क्या यह ग्रामसभा और पत्थलगड़ी के सवाल पर शोर मचाने वालों का दोहरा मापदंड नहीं है ?

हमें यह भी समझना चाहिए कि क्या बिना पूछे किसी के गांव-घर में प्रवेश करना उचित है ? यहां सवाल यह भी है कि किसी के गांव में आप क्यों जायेंगे ? जो लोग पत्थलगड़ी और ग्रामसभा की भूमिका को लेकर सवाल उठा रहे हैं उनकी मंशा क्या है ? ग्रामसभाओं ने यह तो नहीं कहा है कि बाहरी लोगों का प्रवेश पूर्णतः वार्जित है बल्कि उनका आदेश है कि प्रवेश करने से पहले ग्रामसभा से इजाजत लिया जाये। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एक रैली और सभा करने के लिए भी प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ती है जबकि यह हमारा मौलिक अधिकार है। जब हमलोग सचिवालय, पुलिस मुख्यालय या अन्य सरकारी दफ्तरों में आदेश लेकर प्रवेश करते हैं तो ग्रामसभा का आदेश लेने में हमें क्यों तकलीफ होनी चाहिए ? ग्रामसभा एक संवैधानिक संस्थान है इसलिए यदि हम भारत के संविधान को मानते हैं तो ‘पत्थलगड़ी’ पर हाय-तौबा करने के बजाये हमें ग्रामसभाओं के आदेशों का आदर, सम्मान एवं पालन करना चाहिए।

[author] [author_image timthumb=’on’][/author_image] [author_info]ग्लैडसन डुंगडुंग आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता, शोधकर्ता एवं प्रखर वक्ता हैं. वे कई जनांदोलनों से जुड़े हुए हैं. उन्होंने आदिवासियों के मुद्दों पर हिन्दी एवं अंग्रेजी में कई पुस्तके लिखी हैं. [/author_info] [/author]

 

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