रंगों और कूचियों के अनोखे उस्ताद उर्फ़ अशोक दा !

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वैसे तो आज का दिन हम कथा सम्राट प्रेमचंद के लिए याद करते हैं लेकिन हमारी ही हिंदी पट्टी से एक और महत्वपूर्ण कलाकार और सृजक देव नारायण भौमिक का भी जन्म आज ही हुआ था. देव नारायण उनका सरकारी खाते में दर्ज हुआ मां –पिता का दिया हुआ नाम है जबकि हमारे बीच जो नाम लोकप्रिय है वो है अशोक भौमिक.

अशोक भौमिक या अशोक दा का जन्म जरुर नागपुर में हुआ लेकिन पूरी शिक्षा कानपुर में संपन्न हुई और वहीं मार्क्सवाद के प्रति रुझान भी बना. वे बहुत युवावस्था से ही नौकरी के कारण उत्तर प्रदेश ले पूर्वी शहरों में भटकने लगे. काम था ईस्ट इंडिया फर्म्युसिटिकल कंपनी के लिए दवायें बेचना. ये काम करते हुए उनकी मुलाक़ात आज़मगढ़ में रह रहे कवि श्रीराम वर्मा से हुई और चित्र बनाने के साथ–साथ हिंदी में लिखने -पढ़ने के संस्कार भी उन्हें श्रीराम वर्मा से मिले.

अशोक दा की असली अपरेंटशिप इलाहाबाद में हुई जब वे 1983 में नौकरी में हुए तबादले के कारण पत्थर गिरिजा के शहर में आये.

जिन युवाओं ने सन 83 के आसपास इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में कुछ साल बिताये हैं उनकी स्मृति में पीएसओ यानि प्रगतिशील छात्र संगठन (अब आइसा) के कविता पोस्टर जरुर टंगे होंगे जिसमे अक्षर अरघनी पर सूख रहे कपड़ों की तरह टंगे रहते. पीएससो को महत्वपूर्ण संगठन बनाने में जितना योगदान इसके पूरावक्ती राजनीतिक कार्यकर्ताओं का है उतना ही अशोक भौमिक जैसे कलाकारों का भी जिनकी पोस्टर कला से प्रभावित होकर मेरे जैसे तमाम युवा इस राजनीतिक धारा की तरफ आकर्षित हुए.

अशोक दा की अपरेंटशिप यूं तो छात्र आन्दोलन के साथ रहते हर रोज हो रही थी लेकिन असल सांस्कृतिक ट्रेनिंग का केंद्र बना सिविल लाइंस में स्थित नीलाभ प्रकाशन जिसकी दुछत्ती में वे हर शाम नीलाभ और पीएसओ के उभरते हुए युवा कलाकारों के साथ बिताते थे. इसी के बगल में इलाहाबाद का एक और आकर्षक अड्डा यानि कॉफ़ी हॉउस था जहां आने वाले बहुतेरे साहित्यिकों का अशोक जी को साथ मिला.

थोड़े ही समय में वे इलाहाबाद की एक अनिवार्य सांस्कृतिक जरुरत बन गए. चाहे लोकभारती की अभिनव ग्रंथमाला के पांच किताबों के सेट के कवर बनने हों या वीरेन डंगवाल के पहले कविता संग्रह ‘इसी दुनिया में’ का कवर बनना हो या ‘पहल’ का आवरण फाइनल होना हो या फिर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ चुनाव के लिए प्रचार के लिए 5 वर्ग इंच वाले 16 कविता पोस्टर डिजाईन होने हों या फिर जसम उत्तर प्रदेश के पहले राज्य सम्मेलन के विज्ञापन जुटाने के लिए कविताओं से सजी स्मारिका बनानी हो हर योजना में अशोक भौमिक की अनिवार्य उपस्थिति रही है.

आज यह तथ्य दर्ज किये जाने योग्य है कि जिस व्यक्ति ने हिंदी पट्टी को सवारने में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया वह अशोक भौमिक ही है. 83 से 91 तक इलाहाबाद में बिताये 9 साल उनकी आगे की यात्रा में महत्वपूर्ण साबित हुए.

93 के बाद कोलकाता प्रवास उनकी कला के संवर्धन के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ. हालाँकि इस शहर में भी एक और चित्रकार के अशोक भौमिक नाम होने के कारण उन्होंने अलगाने के लिए चित्र में अपने नाम के आगे कोष्ठक में इलाहाबाद लिखना शुरू किया और इस तरह पूरे इलाहाबादी हुए.

बिना किसी कला स्कूल से शिक्षित हुए बिना किसी बड़े गुरु के शिष्य हुए अपनी कला भाषा की खोज करना और उसमे एक बड़ा मुकाम हासिल करना अशोक दा की बड़ी उपलब्धि है. यह भाषा उन्होंने वर्षों काले रंग से बहुत मेहनत से कैनवास पर इचिंग करते हुए हासिल की जिसकी वजह से आज हम उनके चित्र देखते ही अनायास कह उठते हैं कि ‘अरे यह तो अशोक भौमिक का चित्र है.’ चित्रकार बनते हुए अशोक भौमिक ने अपने आसपास की कहानियों को गद्य में भी उकेरा और इस क्रम में सृजित हुआ उनका उपन्यास ‘मोनालिसा हंस रही थी’ हिंदी कथा साहित्य न सिर्फ महत्वपूर्ण उपलब्धि है बल्कि कला जगत पर लिखी अबतक की अकेली रचना भी.

इस 31 जुलाई को अशोक जी 65 साल के हो जायेंगे. 65 वर्षों के इतने सक्रिय जीवन में उनके कई महत्वपूर्ण योगदानों में चित्तप्रसाद, सोमनाथ होड़, कमरुल हसन, ज़ैनुल आबेदीन और सादेकैन जैसे जन चित्रकारों की खोज और उनके मूल्यों की शिद्दत के साथ स्थापना शायद सबसे बड़ा योगदान है. उनके इसी अवदान के चलते भारतीय प्रगतिशील चित्रकला का असल चेहरा हम तक पहुँच सका है .

अपने इस बड़े हस्तक्षेप को प्रभावी बनाने के लिए उन्होंने कई स्तरों पर काम किया. उन्होने इस धारा को परिचित कराने के लिए बहुत श्रम और शोध के साथ तैयार की गयी ऑडियो –विज़ुअल प्रस्तुतियों को छोटे –बड़े शहरों में आम लोगों के बीच रखा, लम्बे लेख लिखे और इस धारा के कलाकारों की जन्मशतियाँ आयोजित करने में निजी रूचि लेकर कला के क्षेत्र में फैले भ्रम को दूर करने का महती योगदान दिया.

 

आज उन्हें 65 वें जन्मदिन की मुबारकबाद देने के साथ यही कामना है कि वे खूब स्वस्थ रहें और अपनी ऊर्जा और प्रतिभा से जन कलाकारों की युवा पीढ़ी का साथ देने के साथ –साथ दिशा भी देते रहें .

 

आज के ही दिन वीरेन डंगवाल की उनपर लिखी कविता  ‘ 61, अशोक ’ को पढ़ना भी शायद जरुरी लगे :

61, अशोक भौमिक

तो हज़रत !

इस जवान जोश के बावजूद

आप भी हो चले 61 के

और कल ही तो नीलाभ प्रकाशन की उस दुछत्ती पर

आपके साथ हम भी रचते थे कभी-कभी अपनी वो विचित्र नृत्य नाटिकायें

जैसे एक विलक्षण नशे में डूबे हुए

या आपका वो एक जुनून में डूबकर कविता पोस्टर बनाना सस्ते रंगों और कागज़ से

खाते हुए बगल के कॉफी हॉउस से मंगाये बड़ा-सांभर

नीबू की चाय के साथ अभी तक बसी हुई हैं नाक और आत्मा में वे सुगंधों प्रेम और परिवर्तन की चाहत से लबालब और गर्मजोश।

हिन्दी प्रांतर में तो वह एक नयी सांस्कृतिक शुरुआत हो रही थी तब।

क्या उम्दा इत्तेफाक है

कि इकत्तीस जुलाई प्रेमचंद का भी जन्मदिन है

आपसे बार-बार कहा भी गया होगा

आप भी तो रचते हैं

अपने चित्रों और लेखों में

भारतीय जीवन की वे दारुण कथायें

जो पिछले कुछ दशको में गोया और भी अभिशाप ग्रस्त हो गई है

बीते इन तीसेक बरसों में बहुत कुछ बदला है

देश-दुनिया में

हमारे इर्द-गिर्द और आप-हम में भी।

वे तिलस्मी जिन्नात-यतिधान-जादूगर और खतरनाक बौने आपके चित्रों के

स्याह ज्यामितीय रेखाओं और और कस्बों की तंग गलियों से निकलकर

महानगरों-राजधानियों तक निर्बाध आवाजाही कर रहे हैं

अपने मनहूस रंगों को फडफ़ड़ाते हुए

अब हम खुद बाल बच्चेदार हो रहे हैं

हमारे बेटे- बेटियाँ जो तब बस खड़े होना सीखे ही थे,

और आप भी तो अपने टाई-सूट और

बैग को छोड़ कर

पूरी तरह कुर्ता-पाजामा की

कलाकार पोशाक पर आ गये हैं।

हाँ, कुछ अब भी नहीं बदला है

मसलन शब्दों और भाषा के लिये

आपका पैशन, लोहे के कवच पहना आपका नाज़ुक भावजगत गुस्सा

जो किसी मक्खी की तरह आपकी नाक पर कभी भी आ बैठता है

और थोड़ा सा खब्तीपन भी जनाब

आपकी अन्यथा मोहब्बत से चमकती आँखों और हंसी में.

मगर वह सब काफी उम्दा है, कभी-कभी ज़रूरी भी

और इन दिनों हथौड़ा-छेनी लेकर कैनवास पर आप

गढ़ रहे हैं एक पथराई दुनिया की तस्वीरें

जिन्हें देख कर मन एक साथ

शोक-क्रोध-आशा और प्रतीक्षा से भर उठता है।

ये कैसी अजीब दुनिया है

पत्थर के बच्चे पत्थर की पतली डोर से

पत्थर की पतंगें उड़ा रहे हैं

गली मोहल्लों की अपनी छतों पर

जो जाहिर है सबकी सब पत्थरों से बनी हैं।

या वे परिन्दे

जो पथराई हुई आँखों से देखते हैं

पथरीले बादलों से भरे आकाश जैसा कुछ

अपने पत्थर के डैनों को बमुश्किल फडफ़ड़ाते

मगर आमादा फिर भी

परवाज़ के लिए।

हमें आपकी छेनी के लिये खुशी है अशोक,

हमें खुशी है कि आप महान चित्रकार नहीं हैं

हालांकि बाज़ार आपकी अवहेलना भी नहीं कर सकता

अपने भरपूर और अनोखे और सुविचारित कृतित्व से

खुद के लिए वह जगह बनाई है आपने और अपनी मेहनत से

हमें खुशी है कि हमारे समय में आप हैं

हमारे साथ और सम्मुख।

जन्मदिन मुबारक हो !

 

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