फासीवाद के खिलाफ संघर्ष में मार्क्स के विचार से बेहतर विचार नहीं- दीपंकर भट्टाचार्य

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‘ मार्क्स और हमारा समय ’ पर लखनऊ में संवाद परिसंवाद

अपने समय को समझने और बदलने के लिए माक्र्स जरूरी – रामजी राय

लखनऊ. ‘ मार्क्स और हमारा समय’ यही विषय था जिस पर लखनऊ के कैफी आजमी एकेडमी के सभागार में 21 जुलाई को जन संस्कृति मंच की ओर से परिसंवाद का आयोजन किया गया. इसके मुख्य वक्ता थे भाकपा माले के महासचिव कामरेड दीपंकर भट्टाचार्या. उनका कहना था कि कार्ल मार्क्स  के जन्म की द्विशताब्दी का यह साल एक अवसर है उनके विचारों को जानने-समझने का. कहा जा रहा है कि मार्क्स पुराने हैं. पर यह आधा सच है. सच तो यह है कि उनका समय शुरू ही नहीं हुआ. कम्युनिस्ट मेनिफोस्टो पढ़िए लगता है कि हमारे समय में लिखी गई है. इसमें जो वर्णन है वह आज की दुनिया का है.

उन्होंने कहा कि मार्क्स  का दर्शन भविष्य का दर्शन है, उस समाज के लिए जो अभी बना नहीं है. उस समाज तक हमें पहुंचना है, उसका सपना पुराना कैसे हो सकता है. और जो लोग मार्क्स को लेकर पुराने की बात करते है, वे गणेश की प्लास्टिक सर्जरी, सीता टेस्ट ट्यूब जैसी काल्पनिक बातें करते हैं। यह भी कहा जाता है कि मार्क्स विदेशी है. यह भी आधा सच है. जिन देशों में इन्कलाब हुआ है, उन सभी देशों के लिए वे विदेशी थे.

दीपंकर भट्टाचार्य ने इस धारणा को भी गलत बताया कि मार्क्स ने भारत को नहीं जाना समझा। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों द्वारा रेलवे लाइन में लगाई जा रही पूंजी के संबंध में मार्क्स का कहना था कि इसका लाभ भारत के लोग तभी ले सकते हैं जब या तो वे अपने ऊपर से गुलामी की जंजीर उतार फेंके या स्वयं इंग्लैंड में सर्वहारा की क्रांति संपन्न हो जाए। यह बात उन्होंने 1853 में कही और स्वराज की पहली अवधारणा एक तरह से देखा जाए तो सबसे पहले भारत के संदर्भ में मार्क्स  ने ही प्रस्तावित की और 1857 के संघर्ष को उन्होंने प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष कहा था.

मार्क्स ने पूंजीवादी विकास के द्वारा मानव विनाश की जो वास्तविकता है उसे सामने लाने का काम किया. उन्होंने दर्शन को निर्मम और सतत आलोचना के रूप में विकसित किया. यह समाजवादी राज्य के निर्माण के साथ रुक नहीं जाता. सोवियत पतन या चीन के बदलने को भी उससे समझा जा सकता है. व्याख्या और बदलना, व्यवहार और बदलाव के संबंध को रेखांकित करते हुए उनकी समझ थी कि उपलब्ध परिस्थितियों में ही बदलाव संभव है. उसको आरोपित या आयातित नहीं किया जा सकता.

कामरेड दीपंकर ने कहा कि मार्क्स का कहना था कि समाज में जो वर्ग शासक की हैसियत रखते हैं, वे केवल संसाधनों और भौतिक उत्पादन पर अपने नियंत्रण के कारण ही शासन नहीं करते बल्कि वे राज्य और उसके कानूनों एवं दमनकारी मशीनरी पर भी नियंत्रण रखने तथा मानसिक उत्पादन अथवा विचारों के उत्पादन और नियमन के जगत पर भी नियंत्रण के द्वारा भी शासन करते हैं. भारत में देखें तो आज शासक विचार क्या हैं ? ब्राहम्णवाद, मनुवाद शासक विचार ही तो है. पूंजी जरूरी है लेकिन पूंजी के लिए अम्बानी-अडानी क्यों जरूरी हैं. ये तो उत्पादक शक्तियों के विकास में बाधक हैं. इनके लिए तो सिर्फ मुनाफा कमाना है. उसी के लिए सब कुछ नियंत्रित करना है, सत्ता से लेकर विचार तक.

उन्होंने कहा कि क्रोनी पूंजीवाद, सांप्रदायिक विभाजन और मनुवादी के बीच गठजोड़ है. लिचिंग स्थाई परिघटना बना दी गई है. लिचिंग करने वालों को पता है कि उन्हें सत्ता का संरक्षण मिला है. यह फासीवाद राज्य नही तो क्या है. ऐसे राज्य या तानाशाही के खिलाफ संघर्ष में मार्क्स के विचार से बेहतर विचार नहीं. आज तो फासीवाद से संघर्ष करना, उसे पाराजित करना हमारा मुख्य कार्यभार है. इसके बिना जनता के भारत बनाने की दिशा में नहीं बढ़ा जा सकता. इसे लेकर लोग गोलबन्द हो रहे हैं. संसद में भले ही सरकार ने विश्वास मत प्राप्त कर लिया है लेकिन सड़क पर जनता इस सरकार में लगातार अपना अविश्वास व्यक्त कर रही है.

इस मौके पर सवाल-जवाब का भी एक सत्र था. नरेश सक्सेना, राजीव, प्रतुल जोशी, नरेश कुमार, उदयवीर सिंह, अरुण खोटे आदि ने अपने प्रश्नों से परिसंवाद को जीवन्त बनाया. इस परिसंवाद का आरम्भ ‘समकालीन जनमत’ के प्रधान संपादक रामजी राय के वक्तव्य से हुई. उन्होंने कहा कि मार्क्स के बिना अपने समय को समझना, उसे बदलना और नए समाज की परिकल्पना संभव नहीं. अब तो उदारवादी पूंजीवादी विचारक भी कहने लगे हैं कि यह विकास ‘अनंत सृजनात्मक विनाश है। मार्क्स  ने यह बात बहुत पहले कह दी थी कि पूंजीवाद अंतहीन संकटों से गुजरने वाली, बड़े-बड़े संकटो को जन्म देने वाली व्यवस्था है. इसका अंत ही इसका समाधान है.

अध्यक्षता समाज विज्ञानी प्रो हिरण्मय धर ने की और अपने संबोधन में कहा कि यह चर्चा आगे भी जारी रहनी चाहिए. कार्यक्रम का संचालन जसम की प्रदेश इकाई के कार्यकारी अध्यक्ष कौशल किशोर ने किया. कामरेड दीपंकर भट्टाचार्य को फूलों का गुलदस्ता भेंट कर प्रसिद्ध कथाकार और जसम के प्रदेश अध्यक्ष शिवमूर्ति ने स्वागत किया. मंच की लखनऊ इकाई के संयोजक श्याम अंकुरम ने सभी का धन्यवाद ज्ञापन किया.

इस मौके पर शकील सिद्दीकी, ताहिरा हसन, सुभाष राय, नाइश हसन, चन्द्रेश्वर, राजेश कुमार, लाल बहादुर सिंह, सुधाकर यादव, भगवान स्वरूप कटियार, नवीन जोशी, ओपी सिन्हा , कांति मिश्रा, रामकिशोर, विमल किशोर, मन्दाकिनी राय, रमेश सिंह सेंगर, तेजनारायण गुप्ता, मीना सिंह, के के शुक्ला, आदियोग, सी एम शुक्ला, राजीव यादव, राजीव गुप्ता, आर के सिन्हा सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे.


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