ज़मीर को हर शै से ऊपर रखने वाले मंटो

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अखिलेश प्रताप सिंह.

खुदा ज्यादा महान हो सकता है लेकिन मंटो ज्यादा सच्चे दिखते हैं और उससे भी ज्यादा मनुष्य, क्योंकि मंटो को सब कुछ इस कदर महसूस होता है कि शराब भी उनकी ज़ेहन की आवाज को दबा नहीं पाती है.

यह फ़िल्म अगर नंदिता दास ने लिखी है और निर्देशित की है और चूँकि यह फ़िल्म मंटो जैसे हिपटुल्ला? व्यक्ति का जीवन चरित है, तो इसे देखना मनोरंजन की चहारदीवारी से आगे की चीज है. दुनिया की सभी सुंदर सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की तरह यह फिल्म दर्शक को अपने आप में ‘इन्वॉल्व’ कर कर लेती है.
इस फिल्म से ज्यादा एक अहम सवाल यह है कि इस फ़िल्म का उद्देश्य क्या था? आखिर क्या कहने के लिए यह फ़िल्म बनाई गयी होगी. और इस सवाल का जवाब भी मंटो के इतने चर्चित लेखक हो जाने में ही निहित है. इस फ़िल्म के नायक मंटो एक कहानीकार हैं. मंटो की कहानियाँ भारत विभाजन के दौर की हैं. और उसी दौर की एक और कहानीकार रही हैं, इस्मत चुगताई. इस्मत भी इस फ़िल्म में मौजूद हैं, मंटों की अदबी ज़िंदगी में मौजूद होने की तरह. राजश्री ने इस्मत का रोल बखूबी निभाया है.

जमीन के अलग हिस्सों में रहने को बाध्य कर दिए गए लोग कैसे हिंसक हो जाते हैं और जैसे ही यह हिंसा समाप्त होती है तो वे कोई पछतावा महसूस करने के बजाय थोड़ा और कम मनुष्य हो जाने को तरजीह देते हैं. हमारी पुश्तैनी बसावट हमें आश्वासन देती है और नदी के द्वीप की तरह होकर भी हम खुद को धारा के बीच ही पाते हैं. यह फ़िल्म इन अर्थों में महत्वपूर्ण है.

फ़िल्म की शुरुआत ही मंटो और उनके अदबी दोस्तों के बीच होने वाली बैठक से होती है, जिसमें मंटो और इस्मत पर अदालती कार्रवाईयों का मखौल चलता है. और वहीं इस फ़िल्म की समकालिकता भी शुरू हो जाती है. जहाँ मंटों किसी “प्रगतिशील लेखक संगठन का होने” पर व्यंग्य कसते हैं. साम्प्रदायिकता, बात-बात पाकिस्तान भेजने के नारे, पहचानों के प्रति दुराग्रह, लकीरें खींचकर खुद को बाँधती हुई मानवता, इन सबके साथ यह पूरी फ़िल्म या यूँ कहें कि मंटो की ज़िन्दगी का संघर्ष ही बेहद समकालीन है.
मंटो घर के बाहर के लेखक नहीं हैं, मंटो जो हैं वह अपनी पत्नी के आँचल में भी हैं. यह बात इस फ़िल्म में साफ़ तौर पर आती है. क्या मंटो औरतों के जीवन की सच्चाई लिखते हैं ? नहीं, मंटो सभी औरतों के जीवन की सच्चाई नहीं लिखते हैं. मंटो उनके जीवन के बारे में लिखते हैं जो पता नहीं कैसे धीरे-धीरे खुद का सौदा करने पर मजबूर हो जाती हैं, उनकी, जो रोज शीशे के सामने खड़ी होकर जीवन में, दिनों-दिन आते बुढ़ापे को देखकर अपने बेसहारा भविष्य पर चिंतित होती हैं.

मंटो पाकिस्तान चले जाते हैं, वे पाकिस्तान नहीं जाना चाहते हैं. उन्हें मुम्बई में बने रहने के लिए पर्याप्त सहूलियत है. लेकिन मंटो, अपने जिगरी दोस्त श्याम में जो बात देखते हैं, उसका बयान अरसे बाद अपनी पत्नी सफ़िया से करते हैं. बकौल मंटो, “हम सबमें बहुत अंतर नहीं है, मैं भी श्याम की तरह सोच सकता हूँ”. पाकिस्तान जाने के लिए मंटो अपने दोस्त श्याम से कहते हैं, “इतना भर तो मुसलमान हूँ, कि मारा जा सकूँ”.
आज भी जातीय पहचानों पर सर्टिफिकेट पकड़ा देने की ठेकेदारी चल ही रही है.

मंटो समाज में रोज ब रोज मची उस चीख पुकार को देखते हैं, महसूस करते हैं और खुद को लेकर भी सशंकित होते हैं. ठीक उसी समय भारत में गांधी मारे जाते हैं. गांधी की विह्वलता और मंटो की कहानियों में, लेखक मंटो की विह्वलता का साम्य इस फ़िल्म के मंटो में साफ़ दिखायी देता है.
फिल्म के आधी खत्म हो जाने के बाद, यह फ़िल्म काँपती रहती है. किसी तितली के पंख की तरह नहीं, भुतही कहानियों की सरसराहट की तरह. फ़िल्म का मुख्य किरदार मंटो अस्त-व्यस्त सा घूमता रहता है. खण्डहर बस्ती के टूटे घरौंदों की दीवालों-छतों से रगड़ खाती हवाओं की तरह. वह खण्डहर में चिपकी चमगादड़ों को देखकर शराबी हाथों की तरह ही काँप उठता है. और यह सब इस फ़िल्म में शानदार तरीके से निर्देशित हुआ है.

फ़िल्म में दोस्तों का ख़त न पढ़ने वाले, लाहौर में चलती-फिरती बंबई की तरह रहने वाले, ज़मीर को हर शै से ऊपर रखने वाले, और ईशर सिंह जैसे पात्र में, क्षर चुकी मानवता के कगार पर भी कुछ उम्मीदें ढूंढ निकालने वाले मंटो हैं. जिन्हें नंदिता ने बहुत ही महीनी से अभिव्यक्त किया है.

मंटो अदालत जाते हैं, बार-बार जाते हैं. उन पर अश्लीलता का मुकदमा चलता है और मंटो बेचैन हैं उस समय दो मुल्कों में चीखती हुई अश्लीलता पर.

वे कहते हैं कि अदब क्या है इसे जानने के लिए उसका मौजू समझना जरुरी होता है. वे, जो जैसा है वैसा लिखने के पैरोकार हैं.
एक पाठक के सवाल पर मंटों कहते हैं कि तुम जो खुद महसूस करते हो, उसे कहो, दूसरे क्या महसूस करते हैं, वह तुम बिल्कुल नहीं जान सकते. यह बात अज्ञेय के ‘अपना सच लिखने’ से साम्य रखती है और साथ ही अपने किन्हीं निहितार्थों को समाज का निहितार्थ बताने वाले ठेकेदारों को सबक भी देती है.

किसी भी लेखक की तरह स्वाभाविक तौर पर, मंटो को यह दुःख होता है कि फैज़ उनके लिखे को अदब नहीं मानते हैं. अदब न माने जाने से अश्लील माना जाना उन्हें बेहतर लगता है.

लेखन पर सेंसरशिप, लेखकों की हत्या जैसी बिडंबनाएं आज भी हैं.
दृश्य दर दृश्य, यह फ़िल्म मंटो की ज़िन्दगी और उनकी नामचीन कहानियों पर बढ़ती जाती है. ‘काली सलवार’ ‘खोल दो’, ‘ठंडा गोश्त’ से गुजरते हुए यह फ़िल्म ‘टोबा टेक सिंह’ पर आकर खत्म हो जाती है.

और आखिर में सूचना मिलती है कि मंटो 42 साल की उम्र में अलविदा कह गये. फैज़ की नज़्म बजती है–“बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे….

नंदिता की इस फ़िल्म की सिनोमेटोग्राफी बहुत ही मैचिंग है, पटकथा के दौर के हिसाब से फिट. फ़िल्म के अंत में प्रकाशन ऑफिस की सीढ़ियों पर बैठे मंटो हों या फिर पाक टी हाउस की सीढ़ियों पर दारु पीते मंटो. ब्लैक एंड वाइट की सफ़ेद कुर्ते-पजामे में मंटो की मिली हुई तस्वीरों को जिन्होंने देखा है वे इस फ़िल्म के एक्टर नवाज को उससे जुदा नहीं कर पायेंगे. नवाज उस मोटे गोल फ्रेम के चश्में व सुफेद कुर्ते पजामे में आज 60-70 साल बाद के मंटो दीखते हैं, यही सिनेमा की ताकत भी है कि पुराने मंटों की तस्वीरें नहीं बल्कि मंटो का नाम लेने इस फ़िल्म के मंटो यानी नवाज उभर आते हैं. नवाज का अभिनय इसमें पूरी तरह समोया हुआ है. उनकी आवाज़, उनके हाव भाव सभी कुछ.

रसिका दुगल को सफ़िया के रोल में जितना ज़हीन होना था, और मंटो के रोल में नवाज को उनसे जितना मुख़ातिब, वह उतना ही हुआ. मंटो का सफ़िया के साथ एक सहज-सुंदर दृश्य आता है, जहाँ वे एकसाथ अफ़साना बुन रहे होते हैं. फ़िल्म वे छोटे-छोटे दृश्य बेहद अर्थपूर्ण हैं जिनसे मंटो नामक फ़िल्म की जरूरत हुई होगी. और उन दृश्यों के लिए छोटी भूमिका में ही ऋषि कपूर, परेश रावल, तिलोत्तमा, दिव्या दत्ता जैसे कलाकारों ने अमिट छाप छोड़ी है. श्याम के किरदार में ताहिर भसीन का अनमनापन का रोल. उनकी कंपती हुई आवाज़ बहुत ही फिट बन पड़ी है.
अंत में, शशांक की अदाकारी किसी से छिपी नहीं है और मंटो के शराबी शागिर्द के तौर पर उन्होंने इसे बखूबी जिया है.

मंटो के पाठक, यह जरूर कह सकते हैं कि फ़िल्म में यह छूटा, वह छूटा. क्योंकि इस फ़िल्म के पहले भी, कुछ भी ऐसा नहीं है जो मंटो के गंभीर पाठक न जानते रहे हों. लेकिन फ़िल्म की प्रस्तुति,कलाकारों का अभिनय, और दृश्यों की पकड़ जरूर ऐसी बन पड़ी है कि, फ़िल्म जरुरी हो गयी है.

फ़िल्म में टोबा टेक सिंह मर जाता है, भारत पाक सीमा के बीच. मंटो के मरने की सूचना मिलती है, फ़िल्म के आखिर में. और फ़िल्म के बीच में ही लाहौर में खबर पहुँचती है, कि ‘गांधी को मार दिया’ . किसने ? किसी हिन्दू ने. फैज़ कह उठते हैं..”यह वो सहर तो नहीं….

(और आखिर में वही ध्यान आता है, हिन्दू टोपियाँ.. मुस्लिम टोपियाँ..उछली हुईं. क्योंकि मज़हब सर चढ़कर बोल रहा है)

(अखिलेश ने इलाहाबाद विश्विद्यालय से पढ़ाई की है. प्रगतिशील छात्र राजनीति से जुड़ाव रहा है. राजनीति, सिनेमा व साहित्य में रूचि होने के साथ ही पार्ट-टाइम कविताई से भी जुड़ाव है.)

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