मंजू वर्मा का इस्तीफा जनांदोलनों की जीत, नीतीश व सुशील मोदी भी कटघरे में

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कुमार परवेज

आखिरकार बिहार की समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा को अपना इस्तीफा देना पड़ा है. मुजफ्फरपुर सहित अन्य बालिका गृहों में संगठित यौन उत्पीड़न व अत्याचार के मामले में मंजू वर्मा पहले दिन से निशाने पर थीं. एक महीना से उनके इस्तीफे और उनके पति की गिरफ्तारी की मांग पर पूरे राज्य में आंदोलन चल रहे थे लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने अंत तक उन्हें बचाने का प्रयास किया. एक दिन पहले ही बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने बयान दिया था कि मंजू वर्मा को हटाने का कोई सवाल ही नहीं उठता है.

निसन्देह यह बिहार के महिला आंदोलन की जीत है. ऐपवा के नेतृत्व में बिहार की महिलाएं विगत 8 जून से ही संघर्षरत हैं. गर्मी हो या बरसात मुजफ्फरपुर से लेकर पटना की सड़कों पर वे लगातार लड़ती रहीं. उन्हीं के संघर्षों का नतीजा है कि शेल्टर गृहों में हो रहे संगठित यौन उत्पीड़न व आर्थिक भ्रष्टाचार को एक मुद्दे के बतौर सामने लाया जा सका. सत्ता की ताकतों के इशारे पर तो मीडिया ने इस मुद्दे को गायब ही कर दिया था लेकिन संघर्षरत महिलाओं ने हार नहीं मानी. उसके बाद विधानसभा के अंदर भाकपा-माले के विधायकों ने पहलकदमी ली. सदन के अंदर उसने विपक्षी पार्टियों की एकता कायम की और इस विषय पर कार्यस्थगन प्रस्ताव लाया. विधानसभा में इस विषय पर काफी हंगामा हुआ, तब मीडिया भी इसे छापने के लिए मजबूर हुई.

आंदोलनों को आगे बढ़ाते हुए 30 जुलाई को वाम व प्रगतिशील संगठनों के आह्वान पर देश के तरकीबन 50 केंद्रों पर प्रदर्शन हुए. वाम दलों ने 2 अगस्त को बिहार बंद का आह्वान किया. बिहार बंद ऐतिहासिक था जिसे न केवल राजद व अन्य विपक्षी पार्टियों का समर्थन हासिल हुआ बल्कि समाज के विभिन्न तबके नेे सत्ता संरक्षित व पोषित बालिका-अल्पावास-स्वाधार आदि गृहों में जारी यौन उत्पीड़न के खिलाफ अपने गुस्से का इजहार किया.

बिहार बंद के बाद तो जैसे आंदोलनों की बाढ़ सी आ गई. मुजफ्फरपुर में बड़ी संख्या में नागरिक समाज प्रतिवाद में उतरे, इसमें काॅलेज के शिक्षक से लेकर पत्रकार व छात्र शामिल थे. कटिहार में छात्राओं ने प्रदर्शन किया. पटना शहर में पटना वीमेंस काॅलेज की छात्राओं ने सैकड़ों की तादाद में हाथ में तख्तियां लेकर दोषियों पर कार्रवाई की मांग की. इन चल रहे आंदोलनों और इस बीच केंद्र सरकार की कड़ी टिप्पणी के बाद निर्लज्जता से पेश आ रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को आखिरकार झुकना पड़ा. उन्होंने अंततः मंजू वर्मा को हटाने का निर्णय किया.

निसंदेह, मंजू वर्मा का इस्तीफा इस आंदोलन की एक बड़ी जीत कही जाएगी, लेकिन मामला अब कहीं आगे निकल चुका है. इस बर्बर व अमानवीय सत्ता संरक्षित यौन उत्पीडन के तार सत्ता के शीर्ष नेताओं तक पहुंच रहे हैं. खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी कटघरे में खड़े हैं. जब से नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने हैं जन संपर्क विभाग उन्हीं के पास है. जाहिर है कि उन्हीं की अनुमति से उन एनजीओ को टेंडर मिलते रहे हैं, जिसे ब्रजेश ठाकुर जैसे लेाग चलाते रहे हैं. ब्रजेश ठाकुर को तो मुख्यमंत्री भिक्षावृत्ति का एक टेंडर तब मिला जब उसपर एफआईआर हो चुका था. जाहिर है इस मामले में नीतीश कुमार को भी इस्तीफा देना चाहिए.

मुजफ्फरपुर व अन्य बालिका गृह कांड के लिए नीतीश सरकार को कभी माफ नहीं किया जा सकता है लेकिन इस पूरे मामले में भाजपा गेम खेल रही है. जिस मुजफ्फरपुर में बर्बर बालिका गृह उत्पीड़न कांड घटित हुआ, उसी शहर के स्वाधार गृह में भी ठीक ऐसा ही मामला प्रकाश में आया है, जो बालिका गृह से महज 200 मीटर की दूरी पर स्थित है. स्वाधार की योजना पूरी तरह भारत सरकार के महिला व बाल विकास मंत्रालय के अधीन चलता है. वहां रहने वाली 11 महिलाएं लापता हैं. उनका क्या हुआ किसी को पता नहीं.

2015 में मोदी सरकार ने स्वाधार गृह का टेंडर ब्रजेश ठाकुर को ही दिया था जो बालिका गृह का भी संचालक था. मुजफ्फरपुर स्वाधार गृह में 20 मार्च को स्टेट सोशल वेलफेयर की जांच रिपोर्ट ने पाया था कि वहां 11 महिलाएं रहती हैं, लेकिन 9 जून को जब वह टीम दुबारा पहुंची तब मुजफ्फरपुर स्वाधार गृह में ताला लटका पाया गया और वहां कोई भी महिला नहीं थी. 9 जून को महिलाओं के गायब होने की सूचना के बाद भी 29 जुलाई तक इस मामले में कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुआ. ऐसे में स्वभाविक सवाल उठता है कि आखिर 2 महीने तक केंद्र सरकार कौन सी माॅनिटरिंग कर रही थी कि उसे महिलाओं के गायब होने की खबर तक नहीं मिली.

महिलाओं के ‘सम्मानजनक जीवन’ के नाम पर चलाई गई यह योजना भी महिलाओं पर दमन-अत्याचार का जरिया बन गया है. दरअसल, केंद्र व राज्य सरकार के संरक्षण में आज सभी बालिका गृहों, अल्पावास गृहों, स्वाधार गृहों आदि को बलात्कार व यौन उत्पीड़न का केंद्र स्थल बना दिया गया है. अतः मंजू देवी के इस्तीफे के बाद नीतीश कुमार-सुशील मोदी का इस्तीफा बहुत ही जायज मांग बनता है.

 

[author] [author_image timthumb=’on’][/author_image] [author_info]कुमार परवेज भाकपा माले के युवा नेता हैं और पटना में रहते हैं[/author_info] [/author]

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