मजदूरों को निचोड़ने और फेंकने का काल है यह

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लखनऊ. शीरोज बतकही की तेरहवीं कड़ी में रविवार को  मजदूर हितों की अनदेखी और अमानवीय प्रवृत्ति पर बातचीत हुई. श्रम कानूनों को भोथरा बना दिये गये समय और उससे पिसते मजदूरों की दशा-दुर्दशा पर बतकही केन्द्रित रही.

बतकही को प्रारम्भ करते हुए संचालक सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने श्रमशीलों के हितों के हिफाजत में बने अब तक के कुल 128 कानूनों को बेदम बना दिये जाने का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय श्रम आयोग को आर्थिक उदारीकरण के साथ ही निरर्थक बना दिया गया । इंडस्ट्रियल एक्ट, 1946, 1947 और ट्रेड यूनियन एक्ट 1926 में बदलाव किया गया है।

बतकही के मुख्य वक्ता अजय कुमार शर्मा ने मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा, कर्मचारी भविष्य निधि और कर्मचारी राज्य बीमा निगमों की निरर्थकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज संगठित और असंगठित, दोनों क्षेत्रों में मजदूरों की दशा, अमानवीयता का सामना कर रही है। अपने देश में ज्यादातर मजदूर असंगठित क्षेत्रों में काम करते हैं और लचर श्रम कानून की सीमा से परे होते हैं । केवल 8-9 प्रतिशत मजदूर ही श्रम कानून के अंतर्गत आते हैं । फिर भी नीति नियंताओं की आंखों का पानी मर चुका है। विशेष दुर्दशा असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की है जिनकी संख्या कुल मजदूरों का लगभग 92 प्रतिशत हैं । संगठित क्षेत्रों में महज 5 प्रतिशत मजदूर हैं। जिस शिकागो सम्मेलन के द्वारा काम के आठ घंटे निर्धारित करने की लम्बी लड़ाई मजदूरों ने लड़ी थी और जिसे आज भी मजदूर दिवस के रूप में पूरी दुनिया में मनाया जाता है, वह बेमानी हो चुका है । आज श्रमिकों से अठारह-अठारह घंटे काम लिया जा रहा है। बदले में किसी प्रकार की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए समय नहीं दिया जा रहा ।

उन्होंने कहा कि पिछली सरकारों ने तो संगठित क्षेत्रों के मजदूरों और कर्मचारियों के पेंशन बंद कर दिये जबकि एक दिन के लिए जनप्रतिनिधि बनने वालों को पेंशन की पूरी गारंटी दे दी गई। बीमा जैसी सामाजिक सुरक्षा को व्यापार बनाते हुए निजी क्षेत्र में दे दिया गया। श्रम मंत्रालयों की निरर्थकता किसी से छिपी नहीं है । जहां 10 लाख या उससे अधिक के भवन निर्माण लागत का एक प्रतिशत श्रमिकों के सामाजिक सुरक्षा पर खर्च करने का प्राविधान है, वहीं इसे लागू नहीं किया गया है। कैसी बिडंबना है कि घरों में काम करने वाली महिलाओं को उन्हीं घरों के शौचालयों के उपयोग की सुविधा नहीं दी जाती।

अजय कुमार शर्मा ने एक दूसरी बिडंबना की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया। उन्होंने कहा कि 2008 में असंगठित मजदूरों के लिए जो कानून आया, उसे आज तक लागू नहीं किया गया। अब सरकारों के सामने मजदूरों की सुरक्षा और सामाजिक कल्याण जैसी कोई जिम्मेदारी नहीं दिखती।

संचालक सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने इसी संदर्भ में अपनी बात जोड़ते हुए कहा कि सीवरों में मर रहे मजदूरों की घटनाएं चिंतित करती हैं। अभी तक सीवरों की सफाई का काम मशीनों से प्रारम्भ नहीं किया गया है। अजय शर्मा ने इस संदर्भ को विस्तार देते हुए बताया कि सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट निर्देश दिया था कि सीवरों की हाथ से सफाई बंद की जाये और इस कार्य को मशीनों से कराया जाये। अगर कहीं किसी मजदूर की मृत्यु सीवर साफ करते हुए होती है तो उसके परिवार को तत्काल 10 लाख की आर्थिक सहायता दी जाये । इस निर्देश को भी अभी तक लागू नहीं किया गया और विगत चार सालों से तो इस मद में किसी धनराशि की व्यवस्था ही नहीं की गई। 2015 में सीवर सफाई में डेढ़ हजार मजदूर मारे गये जिनका पोस्टमार्टम हुआ मगर कोई आर्थिक मदद आज तक न मिली।

गांवों से हो रहे पलायन का जिक्र करते हुए श्री शर्मा ने कहा कि आज भी यह रहस्य अनसुलझा है कि बुन्देलखण्ड से हो रहे नब्बे प्रतिशत पलायन कहां जा रहा है? गावं से शहरों की ओर आ रहे मजदूरों की अपनी कोई पहचान नहीं रखी जा रही । गावों में जहां उनका राशनकार्ड, पता आदि होता है, वह शहर में आकर फुटपाथ पर समाप्त हो जाता है। शहर में वे अपने पहचान से वंचित हो जाते हैं। ईंट भट्ठे मजदूरों पर तो श्रम कानून लागू ही नहीं होता। वहां स्थानीय मजदूर नहीं रखे जाते। सारे मजदूर अन्य राज्यों के होते हैं जो बंधुआ मजदूर के रूप में काम करने को अभिशप्त होते हैं। न्यूनतम मजदूरी के प्राविधान का आलम यह है कि श्रम विभाग प्रति 6 माह पर न्यूनतम मजदूरी की दर जारी करता है लेकिन आज स्थिति यह है कि वह जो न्यूनतम मजदूरी तय करता है, उससे अधिक मजदूरों को स्वतः मिल रहा होता है। ऐसे में श्रम मंत्रालय की कोई सार्थकता नहीं रह जाती।

उन्होंने कहा कि मनरेगा जैसी योजनाओं को न्यूनतम मजदूरी कानून से बाहर रखा गया है । आज वहां प्रतिदिन रु. 175 मजदूरी मिलती है जो विगत एक साल से अधिक समय से बकाया है। अजब विडंबना है कि आज असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा से बाहर कर दिया गया है। हम अपने ही देश में अपने लोगों के प्रति अमानवीय हो चले हैं। केवल तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है जो सामाजिक सुरक्षा के प्रति कुछ बेहतर कर रहा है । उन्होंने बताया कि वर्तमान में कार्पोरेट के दबाव में जो कानून लाया जा रहा है उससे अब ट्रेड यूनियन बनाना असंभव हो जायेगा। अब कोई कर्मचारी प्रतिरोध नहीं कर पायेगा। ओवरटाइम काम लेने की तय सीमा महीने में 50 घंटेे को बढ़ा कर 100 घंटे, ठेका कानून में 20 या 20 से अधिक मजदूरों की आवश्यकता की जगह 40 या 40 से अधिक मजदूर की अनिवार्यता, कुल कर्मचारियों का 10 प्रतिशत या न्यूनतम 10 कर्मचारियों द्वारा ही ट्रेड यूनियन बनाने की अनिवार्यता, मजदूरों के आवाज को खत्म करने का एक सुनियोजित प्र्रयास है। पहले जहां मजदूर, उपभोक्ता या लेबर कोर्ट जा सकता था अब वहीं मैनेजमेंट की सहमति के बिना नहीं कर पायेगा। यह और बात है कि श्रम कानून के प्राविधान आई.ए.एस. जैसे उच्च सेवा वर्ग के अधिकारियों पर लागू नहीं होते।

आज गांवों के किसान मजदूर बनने को मजबूर हुए हैं और गांवों से शहरों की ओर उनका पलायन तेज हुआ है। शहरों में असंगठित क्षेत्र के मजदूर जिस अड्डे पर जमा होते हैं, वहां शौचालय, पीने का पानी या सोने की कोई व्यवस्था नहीं है । सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्देश की प्रति एक लाख की शहरी आबादी पर एक आश्रयगृह का निमार्ण किया जाये, को आज या तो लागू नहीं किया गया है या जहां किया गया है वहां उसे असामाजिक तत्वों ने कब्जा कर रखा है। वह असंगठित शहरी मजदूरों के उपयोग में नहीं है। वे फुटपाथ पर सोने को अभिशप्त हैं। बरसात में खाना बनाने से लेकर शौच जाने तक मुसीबत झेलते हैं। कभी कोई योजना बनी भी तो हमारी अदूरदर्शिता की वजह से बेकार हो गई । जैसे कि मान्यवर कांशीराम आवास योजना, असंगठित मजदूरों के लिए बनी थी मगर वह शहरों से इतनी दूर बनी कि किसी मजदूर के काम न आई। शहर में झाड़ू-पोछा करने वाली महिला, दस से बीस कीलोमीटर से आकर काम करने से रही । उसे तो किसी के गैराज या खाली जमीन पर झोपड़ी डालने को अभिशप्त होना पड़ेगा। पहले असंगठित मजदूर पुलों के नीचे गुजारा कर लेते थे मगर अब फ्लाई ओवर की डिजाइन इस तरह बनाई जा रही है कि सड़क पार करने के अलावा कोई अन्य जगह छोड़ी ही नहीं जाती। जिस असंगठित मजदूरों के श्रम से शहर बस रहे हैं, जो बड़े-बड़े भवन बना रहे हैं, उन्हीं मजदूरों के लिए शहरों में कोई मानवीय सुविधा उपलब्ध नहीं है। ऐसे में उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का तो सवाल ही नहीं उठता। शहरों में बनते फ्लाई ओवर का एक दुष्परिणाम यह भी रहा कि तांगा और इक्का जैसे वाहन अपने आप हट गये। लोग बेरोजगार हो गये।

आशा कुशवाहा ने खाड़ी देशों में भेजे जा रहे मजदूरों के साथ की जा रही अमानवीय व्यवहार का जिक्र किया जहां मजदूरों से पैसा लेकर, उनके पासपोर्ट जब्त कर ठेकेदारों या कुछ गंुडों द्वारा उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जा रहा है।

प्रभात त्रिपाठी का कहना था कि संगठित और असंगठित, दोनों प्रकार के मजदूरों की कार्यदशा खराब हुई है। विगत बीस सालों में मजदूरों के साथ अमानवीय व्यवहार बढ़ा है। उनका मानना था कि कार्यदशा से हमारे आर्थिक मूल्य तय होते हैं। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के आर्थिक मूल्य अत्यंत खराब हुए हैं। आने वाले दिनों में इसे और खराब किया जाना है। लेबर बिल 2017 हमारे सामने है जो अब घंटों के हिसाब से कार्य करने का प्राविधान करने जा रहा है। उनका मानना था कि यांत्रीकरण और कृत्रिम योग्यता , आर्थिक मूल्यों को और गिरायेंगे। आज 29 प्रतिशत कार्य मशीनों से और 71 प्रतिशत कार्य हाथ से किए जा रहे हैं। 2022 तक यह स्थिति 52 प्रतिशत और 48 प्रतिशत रह जायेगी। हमारे यहां बेरोजगारी और बढेगी।

प्रतिवाद करते हुए आशा कुशवाहा और अजय शर्मा ने बेरोजगारी का मशीनीकरण से किसी प्रकार के संबंध को नकारा । उनका कहना था कि बेरोजगारी का सीधा संबंध हमारी नीतियों से है। हमारी खराब नीतियां ही बेरोजगारी को बढ़ाती हैं। जिन देशों में अपने यहां से अधिक काम मशीनों से होता है वहां बेरोजगारी न्यूनतम है।

कुल मिलाकर वक्ताओं का यह विचार था कि हम मजदूरों को निचोड़ने और कार्पोरेट को समृद्ध करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। सारे के सारे मजदूर विरोधी फैसले कार्पोरेट के हितों को ध्यान में रखकर तैयार किए जा रहे हैं। ऐसी नीतियां एक अमानवीय समाज का निर्माण करेंगी जहां मनुष्य, मनुष्य का रक्त चूसेगा। तब देश की गरिमा बढ़ने के बजाये और गिरेगी ही।

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