‘पूछूंगी अम्मी से/या फिर अल्ला से/कैसे होता है बचके रहना….!’

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आसिफा पर केन्द्रित दो कविता संग्रह का लोकार्पण

लखनऊ. निर्भया हो या आसिफा, कठुआ हो या उन्नाव, मुजफ्फरपुर हो या देवरिया – ये स्त्रियों पर होने वाली हिंसा, यौन उत्पीड़न और बर्बरता के प्रतीक हैं। इन घटनाओं ने समाज को उद्विग्न किया है, उद्वेलित किया है। प्रतिरोध के स्वर फूटे हैं। रचनाकारों ने इसे अपने सृजन का विषय बनाया है। कवियों ने कविताएं लिखी हैं। ऐसी ही कविताओं का संग्रह है ‘आसिफाओं के नाम’ और ‘मुझे कविता पर भरोसा है’ जिसका लोकार्पण यहां लखनऊ के राष्ट्रीय पुस्तक मेले के मंच पर 13 सितम्बर 2018 को किया गया।

इन संग्रहों में हिन्दी व उर्दू के अलावा अंग्रेजी, नेपाली, मराठी, तेलुगु, बंगला कवियों की कविताओं के हिन्दू अनुवाद भीं संकलित हैं। कार्यक्रम का आयोजन जन संस्कृति मंच ने किया था।

संग्रह की कविताओं पर बोलते हुए कवि और जसम उत्तर प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष कौशल किशोर ने कहा कि इन कविता पुस्तकों का प्रकाशन सांस्कृतिक अभियान का हिस्सा है। कविता ऐसी विधा है जो समाज में घट रही घटनाओं को पहले पकड़ती है। आसिफा के साथ जो हुआ वह क्रूरतम घटना है। हम लगातार ऐसी घटनाओं को देख रहे हैं। बलात्कारियों को सत्ता का संरक्षण मिल रहा है। उनके समर्थन में तिरंगा यात्राएं निकाली जा रही हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू है कि इसे लेकर समाज में बेचैनी है, गुस्सा है। लोग सड़कों पर आये हैं। महिलाएं लगातार विरोध में हैं। वे मनुवाद से, पितृसत्तात्मक वयवस्था से आजादी की मांग कर रही हैं। बड़े पैमाने पर कविताएं लिखी गयीं। हमें इस अभियान को आगे ले जाना है।


इस मौके पर लोकार्पण के साथ कवि गोष्ठी भी हुई। अध्यक्षता प्रसिद्ध उपन्यासकार शीला रोहेकर ने की. इधर के दिनों उन्होंने कविताएं भी लिखी हैं। संग्रह में उनकी कविता ‘बच के रहना’ भी संकलित है। इस कविता का उन्होंने पाठ किया। अपनी कविता में वे कहती हैं कि बच के रहने की हिदायत दी जाती है लेकिन जब हमारे इर्द गिर्द स्त्रीखोर, आदमखोर भरे हो तो कैस बचा जा सकता है। ईश्वर भी यह सब देख रहा है और पत्थर बना है। वे कहती हैं ‘खंदक में उतरना मत कहती हैं अम्मी/जानवर जंगल के मारते हैं झपट्टा चुपके से/बच के रहियो! बचके रहा जाता है कैसे/पूछूंगी अम्मी से/या फिर अल्ला से/कैसे होता है बचके रहना….!’ इसके अलावा उन्होंने तीन अन्य कविताओं का पाठ भी किया।

वन्दना मिश्र ने स्त्री जीवन की विडम्बनाओं को उजागर करती कई कविताएं सुनाई। अपनी कविता में बलात्कार के बाद स्त्री के जीवन की हालत क्या होती है, वे अपनी कविता में कहती हैं ‘खबर पढ़ते ही बच्चियों के मां-बाप/सहम जाते हैं/लगा देते हैं बेटियों पर/कुछ और बंदिशें…..बलात्कार की एक घटना/तबाह करती है एक जीवन-परिवार/और छोटी कर देती है/लड़कियों की पहले ही से बहुत सीमित दुनिया। ’

डाॅ उषा राय ने ‘बिलकिस बानो से’ और अरुणा शानबाग का कमरा‘ कविता का पाठ किया। अपनी कविता में सवाल करती है ‘कौन सी है वह सत्ता/जो हुक्म देती है/कि औरत होने के नाते/नर्स अरुणा चेन में बांधी जाय/और तेजाबी लार गिराता कुत्ता/सड़क पर शान से टहलता रहे।’

संग्रह में विमल किशोर की कविता ‘ कांरवा निकल पड़ा है’ भी शमिल है। उन्होंने यह कविता सुनाई। उनका कहना है कि ये घटनाएं हमारे मन-मस्तिष्क पर दस्तक दे रही हैं। सवाल है कि क्या हम उन्हें सुन भी पा रहे हैं या नहीं। उनका आहवान है कि हम अपने दायरे से बाहर निकले, कमरों से बाहर आये और स्त्री विरोधी व्यवस्था से संघर्ष करें। वे कहती हैं ‘ दे रही है दस्तक/पुकारती आवाज है/घबराना नहीं तुम आसिफा/तुम तो मेरा साया हो/बन्द दरवाजे कबतक/निकल पड़ा है कारवां/मांगता जवाब है/कठुआ से उन्नाव तक/गाँव से शहर तक/लंदन से न्यूयॉर्क तक/सब तरफ देखो/आग ही आग है’। उन्होंने दो और कविताएं सुनाई – ‘चिन्गारियां‘ और ‘कूड़ा बीनते बच्चे’।

इस अवसर पर रोली शेकर, अलका पांडेय और सीमा राय द्विवेदी ने भी अपनी कविताओं के माध्यम से स्त्री जीवन की विडम्बनाओं और अपने अन्दर पल रहे विचारों को व्यक्त किया।

इस अवसर पर संग्रह से नेपाली, मराठी, गुजराती और अंग्रेजी कविता के हिन्दी अनुवाद का पाठ भी किया गया। कार्यक्रम का समापन सीमा आजाद की कविता ‘अगर तुम औरत हो’ से हुआ। इस मौके पर रवीन्द्र वर्मा, सुभाष राय, भगवान स्वरूप कटियार, राजेश कुमार, डाॅ अनीता श्रीवास्तव, डाॅ निर्मला सिंह, आर के सिन्हा, कल्पना पांडेय, डाॅ सत्यवान, अशोक श्रीवास्तव, मंजु प्रसाद, श्याम अंकुरम, मीना सिंह, रमेश सेंगर, अनिल कुमार श्रीवास्तव, राम किशोर, अरुण सिंह, संदीप कुमार सिंह, अजय शर्मा, ज्योति राय, वर्षा श्रीवास्तव, आशुतोष श्रीवास्तव, के के शुक्ला, वीरेन्द्र त्रिपाठी, राजीव गुप्ता, नीतीन राज, संजय कुमार, सुरेन्द्र प्रसाद आदि मौजूद थे।

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