पराजय को उत्सव में बदलती अनुपम सिंह की कविताएं

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(अनुपम सिंह की कविताओं को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे वे अपने साथ हमें पितृसत्ता की एक बृहद प्रयोगशाला में लिए जा रहीं हैं जहाँ मुखौटे बनाए जा रहें हैं और उन सबको एक जैसा बनाए जाने की जद्दोजहद चल रही है |

इससे भिन्न मान्यता रखने वालों की जीभ में कील ठोंक देने को तत्पर यह व्यवस्था निश्चित रूप से अपने लोकतान्त्रिक एवं अलोकतांत्रिक मुखौटे के बीच कार्यव्यपार चलाती रहती है |

अपनी पराजय की ऐतिहासिक चेतना से सम्पन्न स्त्री इन कविताओं में फिर भी एक उत्सव की ओर अपना मुख किए हुए सपनों के रास्ते चली जा रही है | वह दूसरी स्त्री का होंठ चूमती है उस के शरीर को अपने ही शरीर की तरह स्पर्श करती है और ऐसी आत्मीयता की नदी में समा जाती है जहां यातना की तमाम अनुभूतियाँ क्षरित होने लगती हैं |

‘माँ का चक्की से झरते पिसान’ की तरह अस्तित्व, जिससे घर के तमाम लोगों के लिए पूरियाँ बनती हैं | उसका तकली की तरह दिन-रात नाचते रहना जिससे पितृसत्ता की गति सुनिश्चित होती है तथा उसके बेतहाशा श्रम से बोझिल उसकी देह और आत्मा बस इतना ही चाहती है  कि उसकी बेटियाँ सुरक्षित रहें और कोई सुयोग्य उन्हें वर ले |

स्त्री के लिए अपने श्रम का हासिल क्या इतना ही है ? ऐसा लगता है ‘हम औरतें हैं मुखौटे नहीं’ कविता में अनुपम यह सवाल कर रही है । अपनी कविता में वह दिखती है कि कैसे स्त्री की चेतना में उसका विषकन्या बनना, चुड़ैल की तरह भटकना, अन्न और पानी के लिए तरसना,  पूरी सभ्यता की अपनी अंदरूनी क्रूरता की प्रक्रिया का ही परिणाम  है, जिसे शायद ऐसे ही अचूक ढंग से कहा भी जा सकता है जैसे उसने यहाँ कहा है |

अनुपम की कविताएं हमारे सामाजिक राजनैतिक एवं आर्थिक यथार्थ का ऐसा चित्रण हैं जो एक पारदर्शी प्रक्रिया की तरह दिखता है – परत दर परत अनुभवों से सिक्त स्त्री कविता की बे-मिसाल तस्वीर की तरह, न कि किसी ठोस हो चुके यथार्थ की तरह जो अपनी आत्मतुष्टि में ठस सा हो गया हो |

‘लड़कियाँ जवान हो रही हैं’ कविता में अनुपम ने हमारे देश के कस्बों में जवान हो रही लड़कियों का चित्र खीचा है । इस कविता में बड़ी होती लड़कियाँ अपने यौनिक अनुभव आपस में कैसे साझा करती हैं और इस बीच लड़कियाँ किस तरह से जवान होती हैं , किस तरह से वे दिखती हैं, इस जटिल विषय पर आ जाती है,  जैसे एक जगह वह कहती है – ‘चिपकी दीवारों से जैसे छिपकलियाँ / ठिठकी / एक दूसरे के अस्तित्व को स्वीकारती / और आँखों में एक समझदारी लिए हुए /’,जैसे कि आपस में बातों को साझा करना भी एक सुख है, या कि यह सुख हो सकता है -एक ऐसा समझदार सुख जिससे लड़कियाँ प्रौढ़ और स्वायत्त गुप्त ढंग से हो जाती हैं |

स्त्री की आंतरिक दुनिया की ऐसी बिंबात्मक प्रस्तुति इधर की कविताओं में कम ही देखने को मिलती है | फ्रायड को याद करते हुए सपनों में घटित होने वाली यौन हिंसा को उजागर करना कविता के लिए भी एक उपलब्धि है और फ्रायड के पितृसत्तात्मकता की कटु आलोचना भी |

उनकी फिक्र है कविता कैसे चले कि स्त्री उसके साथ हो ? वह कैसे याद करे उस अनुभव को जिसमें एक घनिष्ठ संबंधी कच्ची उमर की एक बच्ची के स्तन को अपने बाएँ हाथ से दबा देता है . एक डॉक्टर स्त्रियों का इलाज करते हुए उनके हाथ अपने शिश्न पर रख घंटों बैठा रहता है |

यहाँ वह अपना मनोवैज्ञानिक उपचार कर रहा होता है न कि उस स्त्री का | अनुपम की इस कविता को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि पितृसत्ता एक बृहद मनोरोग की उपज है.  तभी शायद अपनी कविता में अनुपम सपने में इसे चीरती हुई आगे बढ़ जाती है -निर्वस्त्र. देखने वालों को चुनौती देती हुई .

यह  डिफ़ायन्स का एक अद्भुत दृश्य है जो कविता को एक नई ऊंचाई देता है | अनुपम की कविता अभी लिखी जा रही ढ़ेर सारी कविताओं का बेहतर संस्करण ही नहीं अपनी मौलिकता में आश्वस्त करने वाला भी है .

मैंने अभी तो उसकी पिता पर लिखी कविताओं का जिक्र ही नहीं किया लेकिन मैं इतना कहना चाहती हूँ कि पितृसत्ता को चुनौती देना अपने पिता के प्रति भी बेबाक ढंग से  यानि आलोचनात्मक ढंग से बातचीत करना है | ‘पिता के लिए’  एक कविता में उसने बताया है कि किस तरह से पिता लड़कियों से कभी सत्य नहीं बोलते झूठ ही बोलते हैं क्योंकि झूठ के जरिए ही उन्हें दिमागी स्तर पर कायर, अनपढ़ और बेबस बनाया जा सकता है |

पानी का जिक्र करते हुए वे कहतीं हैं कि पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है और इंद्र कहीं दिखते नहीं हैं | अनुपम इंद्र से कहती है कि पिता बताते थे कि तुम पानी के देवता हो शायद यह झूठ कहा गया है कि तुम पानी के देवता हो क्योंकि जब इतना हाहाकार हो पृथ्वी पर , इतना कुछ नष्ट हो रहा हो, पानी के बिना आग में जल रही हो पृथ्वी तब तुम एक बूंद पानी भी न दो तो तुम किस तरह के देवता हो ?

मिथ की असत्यता को पिता की सत्ता से जोड़कर उसको भग्न करना, सच को सच की तरह प्रस्तुत करना, इस पितृसतात्मक व्यवस्था के झूठेपन को निर्मम ढंग से सामने लाना अनुपम की कविता की विशेषता लगती है .  मेरा खयाल है कि आज की स्त्री कविता के लिए अनुपम की कविताएं उपलब्धि ही नहीं वरन आगे का रास्ता भी दिखाने वाली हैं! – सविता सिंह )

 

अनुपम सिंह की कविताएं

1. हम औरतें हैं मुखौटे नहीं

वह अपनी भट्ठियों में मुखौटे तैयार करता है
उन पर लेबुल लगाकर ,सूखने के लिए
लग्गियों के सहारे टांग देता है
सूखने के बाद उनको अनेक रासायनिक क्रियाओं से गुजारता है
कभी सबसे तेज तापमान पर रखता है
तो कभी सबसे कम
ऐसा लगातार करते रहने से
उनमे अप्रत्यासित चमक आ जाती है
विस्फोटक हथियारों से लैस उनके सिपाही घर -घर घूम रहे हैं
कभी दृश्य तो कभी अदृश्य
घरों से उनको घसीटते हुये
अपनी प्रयोगशालाओ कीओर ले जा रहे हैं
वे चीख रही हैं,पेट के बल चिल्ला रही हैं
फिर भी वे ले जायी जा रही हैं
उनके चेहरों की नाप लेते समय खुश हैं वे
आपस मे कह रहे हैं ,की अच्छा हुआ इनका दिमाग नहीं बढ़ा
इनके चेहरे ,लंम्बे-गोल ,छोटे- बड़े है
लेकिन वे चाह रहे हैं की सभी चेहरे एक जैसे हो
एक साथ मुस्कुराएं
और सिर्फ मुस्कुराएं
तो उन्होने अपनी धारदार आरी से
उन चेहरों को सुडौल
एक आकार का बनाया
अब मुखौटों को उन औरतों के चेहरों पर ठोंक रहे हैं वे
वे चिल्ला रही है
हम औरते हैं
सिर्फ मुखौटे नहीं
वह ठोंके ही जा रहे हैं
ठक-ठक लगातार
और अब हम सुडौल चेहरों वाली औरतें
उनकी भट्ठियों से निकली
प्रयोगशालाओं में शोधित
आकृतियाँ हैं ।

2. अधूरा पुल 
जब दुपहरिया कुम्हार के आंवे- सी
तपने लगती है
और धूल आग की तरह गर्म
जब कुत्ते मिट्टी को गहरे खोद
गर्मी से बचने की कोशिश करते हैं
और गोरैया नल के मुहं से लटकर
हांफती है पानी के लिए
तब कुछ तांबई रंग की औरतें
खेत काट रही होती हैं
और कुछ इंसाननुमा लोग
ईंट के भट्ठे पर पक रहे होते हैं
ईंटों से भी गहरा है उनके देह का रंग
कुछ झांवे जैसा
जब कुछ लोग दुपहरिया के डर से
दरवाजा बंद कर अंधेरा कर लेते हैं घरों में
तब कुछ बच्चे भीट की तरफ
लेकर चले जाते हैं अपनी बकरियां
बकरियां चरती रहती हैं
बच्चे पेडचील्हर खेलते हैं
एक दिन ईंट के भट्ठे से भागता है एक आदमी
और बच्चों की गोल में शामिल हो जाता है
खेत काटती औरत छहाने आती है
वह भी बच्चों में शामिल हो जाती है
आदमी औरत मिलकर
बच्चों को सुनाते हैं
लकड़सुघंवा के किस्से
लकड़सुघंवा पीठ पर बोरा लादे आता है
बोरे में छुपाये रखता है
तरह – तरह की लकड़ियां
लकड़ी सुघां वश में कर लेता है बच्चों को
बच्चे जब तक होश में आते हैं
तब तक डाल दिये गये होते हैं
किसी बन रहे पुल की नींव में
सभ्यताओं को जोड़ने के लिए
इसीलिए तो कहते हैं
कि पुल जीवधारी होते हैं
पुल के पांव नहीं होते
वे टंगे रहते हैं बच्चों की पीठ पर
पुल चढ़कर आता है आतातायी
पुल से कवि कलाकार संगीतकार आते हैं
बारातें गुजरती हैं
अर्थियां आती हैं
पुल से पार हो जाती हैं कई- कई पीढियां
बच्चे पुल को पार करते बडे़ होते हैं
खोजते रहते हैं जीवधारी पुल का तिलिस्म
पुल अधूरा ही अटका रहता है उनकी स्मृति में.

3. पिताओं के मर जाने के बाद
माँओं की शामें लम्बी और उदास हो जाती हैं
उनके पास बचती है सिर्फ एक गठरी
जिसमेँ समय -समय के संघर्षों का हिसाब होता है
उसी गठरी मेँ एक छोटी पोटली रहती है
जिसमें पिताओं द्वारा मारे गए थप्पड़ों का भी बचा हुआ हिस्सा रखा रहता है सहेज कर
थोड़ा सासुओं के अत्याचार और ननद की ईर्ष्या होती है
जेठानियों के गहनों का नाम भी रहता है कोने मेँ
माँयेँ बताती हैं कि ,अपनी चारों अंगूठियाँ
अपनी ननदों को बेटे की छटठी मेँ काजर लगाने पर दे दिया था
शाम को जब माँयेँ कभी अकेले मेँ भी वह गठरी खोलतीं हैं
तो सबसे पहले अपनी नसीब को कोसते
,कोख को धिक्कारते हुये पिताओं को खूब गलियाँ देतीं हैं

4. जुए की पारियाँ
छोटे बल्बों की झालरें
बाउंड्री की तरह खींच दी गयी हैं
रोशनी से पाट दिये गए हैं गड्ढे
औरतों के सुर का उतार-चढ़ाव
बच्चों के उल्लास के साथ
शुरू हुयी ब्याह की रश्म
अंधेरी रात मौन साधे
दूर से देखती रही सब

भूत के डर से अम्मा ने
सबके हिस्से का कन्यादान किया
चादर से ढककर भरी गयी माँग
साथ फेरों से बांध दिये गए
सात- सात जन्म

धीरे-धीरे यह रश्म पूरी हुयी
धीमीं पड़ गयी मंत्रोचार की ध्वनि
औरते अपने घरों को वापस जा रही हैं
बच्चे सो गए हैं इधर-उधर
एक दूसरे पर हाथ-पाँव मारे
राख और अधजली आहुतियाँ छोड़कर
देवता गण भी चले गए

अब कोहबर पहुँचकर वह
ब्याह की थकान उतार देना चाहती है
वह बाबा के कोहबर मे जीत लेती है
जुए की सातों पारियाँ
एक और कोहबर जाना है उसे
अभी बाकी हैं जुए की
कई -कई पारियाँ

रोशनी से पाटे गए गड्ढे
सुबह दिखाई देने लगे हैं
निर्वासित अंधेरी रात
सुबह मे घुल गयी है
फेंकी गयी पत्तलों पर
कुत्ते जूझ रहे हैं
पंछियों का झुंड
मडराने लगा है आकाश में

रात का गीत
भोर की जीत
सुबह धीरे-धीरे
बिलाप में बदल रही है ।

5. नींद और जागरण के बीच एक तिलिस्मी युद्ध

मेरे जागरण में
सफ़ेद चादर में लिपटी
फैली है मरघट की शांति
मेरी नींद में कोई छोड़ गया है
हाथ कटी औरतों की लाश

मैं उतर गयी हूँ नीद में
इस युद्ध के खिलाफ
नहीं है मेरे पास कोई रक्षामंत्र
जो वायु वेग से आती हुई तीरों को रोक सके
हाथ में नफीस दस्ताने नहीं हैं
जो जंग खाए खंजरों को धर लें
जूतों से बाहर निकली हैं मेरी अंगुलियाँ
उनकी अक्षौहिणी सेनाओं के
कदम ताल से बने कीचड़ में
गिर गयी है मेरी आँख
मैं बिना आँख वाली औरत
रेत पर उतर दिया है मैंने
अपनी जर्जर नांव

अबतक शांति के लिए पूजती रही जिन देवताओं को
वे सब युद्ध के पैरोकार निकले
फिर भी समझौते के लिए प्रस्तुत थी मैं
की एक तीर आकर लगा मेरे पांव में
पसलियों में आकर फंस गईं दो मुही कमानियां
यह कहते लौटा बख्तरधारी वह सेनापति
की युद्ध में समझौते के लिए नहीं है कोई प्रावधान

दर्द से चटक रहा है मेरा घुटना
सूख गयी है रीढ़ की मज्जा
समय से पहले पीली पड़ी फसलों की तरह
डर से पीली पड़ गयी है मेरी बुद्धि
जितनी यातनाएं दी गयीं
उतना नहीं था मेरे अपराध
महान देश की महान सेनाएं
उसके सब ओहदेदार
सब कवचधारी
बंकरधारी
सब मंत्री
उनके सिपहसलार
नक्षत्रों की गणना करने वाला पुरोहित
सब खड़े हैं मुस्तैदी से मेरे खिलाफ
चाहतें हैं बंदी बनाकर ले जाना अपने देश
मेरे जीभ में कील ठोककर मेरा सच जानना चाहते हैं
मेरे हाथों और घुटनों को जकड़कर
कहते हैं निष्पक्ष लड़ रहे हैं वे युद्ध
उनकी भीषण यंत्रणा से भयभीत हूँ मैं

हाजिर होती है मेरी पुरखिन
गर्म सलाखों से दागी गयी हैं उसकी आँखें
जहग-जगह से तोड़ दी गयी हैं उसकी हड्डियाँ
पपड़ाये होंठों से कहती है –
‘’सबको बतलाओ हमारा सच’’
कांपते हाथों से युद्ध-विजयी का आशीर्वाद देती है
कहती है –जाओ धरती पर फैले विषैलेपन को
अपनी बेड़ियों में गूँथ लो
अकेले नहीं हो तुम
वे हाथ कटी औरतें हैं साथ मोर्चे पर
जाओ उनके विचारों को तेज धार दो
जैसे शत्रु अपने हथियारों को दे रहे हैं
नींद से बाहर निकलो
स्वप्न में नहीं हकीकत में चल रहा है यह युद्ध
भर लो अपने भीतर बौखलाहट
पटक दो दिवार से अपना सिर
पागल हो जाओ
रुके न तुम्हारे विचारों का यह काफिला

अब उनींदे देवताओं के भरोसे
नहीं छोड़ी जा सकती यह धरा
अवसाद में दुबे प्रेम से उबरो
नींद से जागो
देवताओं ,राजाओं और उनके प्यादों ने
अंधकारमय कर दिया है पृथ्वी को
तुम किसी की प्रतीक्षा मत करो
अब बुद्ध नहीं आयेंगे ज्ञान बांटने
शांति बांटने
दृढ करो अपनी एकता को
इकठ्ठा करो
ज्ञान बांटने के आरोप में मारे गए लोंगो को
वे बढ़ाएंगे तुम्हारा उत्साह
तुम्हारी संकल्पना शक्ति को भी

अब किसी ईश्वर के वरदान के लिए मत भटको
वे दाखिल हो गए हैं हमारी नींद में
हमारे बच्चों के स्वप्न में
पड़ गया है पहरा
जंगल से निकलकर भाग रही हैं हिरनियाँ
और उनके दुधमुहें बच्चे
फूलों का पराग छोड़
उड़ी जा रही हैं मधुमक्खियाँ
इसके पहले की शहद में न बचे मीठापन
बच्चों के स्वप्न में कोई जड़ दे सांकल
जाओ रोशनी की नदियाँ तैर जाओ

अचानक ओझल होती है
पपड़ाये होठों वाली
जर्जर नाव-सी हमारी पुरखिन
टूट गया है नींद का तिलिस्मी युद्ध
मैं अपनी जीभ छूती हूँ
नींद में घायल अपने पाँव देखती हूँ
की इस युद्ध ने बदल दिया है
एक कवि की दिशा .

6. माँ के लिए
जब कभी
माँओं के प्यार-दुलार की बात चलती है
थोड़े से बच्चे चहकते हैं
बाक़ी सब उदास हो जाते हैं।
उन उदास बच्चों के साथ खड़ी मैं
याद करना चाहती हूँ अपनी माँ का स्पर्श।
मुझे याद आती हैं उसकी गुट्ठल खुरदुरी हथेलियाँ
नाखूनों के बगल निकले काँटों-से सूतरे
जो कई बार काजल लगाते समय
आँख में गड़ जाते थे।
सिंगार पटार के बाद माथे पर बड़ी तेजी से
टीक देती थी एक काला टीका
जिसे न जाने प्यार से लगाती थी या गुस्से से।
सोचती हूँ याद करूँ
वो थपकियाँ जो माँएँ बच्चों को देकर सुलाती हैं,
देखती हूँ, वह चरखे के सामने बैठी
एक हाथ में रूई की पूनी पकड़े
दूसरे को
चरखे की घुण्डी पर टिकाए
उझक उझक कर सो रही है।
अब भी मेरे घर में मेहमानों के लिए जो सबसे सुंदर
चादर और दरियाँ हैं, उसके रेशे रेशे में
माँ झपकियाँ ले रही है
देर रात तक चरखा चलाती, ऊँघती माँ
दिन में भी तकली की तरह घूमती रहती
पाँवों में ढेरों गुरखुल छुपाए
कंकड़ पर पाँव पड़ते ही वह चीखती और ठंडी पड़ जाती।
माँ नहीं याद आती कभी माँ के रूप में
याद आती है चूल्हे की धुधुआती लकड़ियाँ
जिसे वह अपनी फूँक से अनवरत
सुलगा रही है ।
देख रही हूँ, माँ अपनी छोटी-सी गुमटी में बैठी
फरिश्तानुमा बच्चों का इंतिज़ार कर रही है
जहाँ दिन में एक दो बच्चे अपने घरों से
एकाध सेर गेहूँ चुरा लाते हैं
वह उन्हें हड़बड़ी में कुछ चूस नल्लियां पकड़ा देती है
इस समय सबसे ज़्यादा भयभीत दिखती है
वह उंकड़ू बैठी माँ।
माँ नहीं है माँ
वह चरखा तकली अटेरन है
भोर का सुकवा तारा है वह
जिससे
नई दुलहने अपने उठने का समय तय करती हैं।
माँ चक्की से झरने वाला पिसान है जिससे
घर ने मनपसंद पूरियाँ बनाईं।
अब वह एक उदास खड़ी धनकुट्टी है जिसके
भीतर की आवाज़ कहीं नहीं पहुँचती
अपने ही जंगलों में गूँज कर बिला जाती है।
यह कई बेटियों बेटों और पोतों वाली
हमारी पैसठ साला माँ के लिए
मर्सिया पढ़ने का समय है!

7.लड़कियाँ जवान हो रही हैं

हम लड़कियाँ बड़ी हो रही थीं
अपने छोटे से गाँव में
लड़कियाँ और भी थीं
छोटी अभी ज्यादा छोटी थीं
जो बड़ी थीं वे
ब्याह दी गयी थीं सही सलामत
इस तरह हम ही लड़कियाँ थीं
जिनकी उम्र बारह-तेरह की थी
हम सड़कों के बजाय
मेड़ों के रास्ते आती–जातीं
चलती कम
उड़ते हुये अधिक दिखतीं
गाँव मे नयी–नयी ब्याह कर आयीं
दुल्हन हुयी लड़कियों की भी
सहेलियाँ बन रही थीं हम
किसी के शादी-ब्याह में
हम बूढ़ी और अधेड़ उम्र की
स्त्रियों से अलग बैठतीं
और अपने जमाने के गीत गातीं
हमारी हंसी गाँव में भनभनाहट की तरह फैल जाती
गाँव के छोटे–भूगोल में
हमारे जीवन के विस्तार का समय था
अब हम सब अपने देह के उभारों के अनुभव से
एक साथ झुककर चलना सीख रही थीं
कभी तो जीवन को
हरे चने के खटलुसपन से भर देती
तो कभी माँ की बातों से उकताकर
आधे पेट ही सो जाती थीं
हम उड़ना भूलकर
अब भीड़ में बैठना सीख रहीं थीं
भीड़ से उठतीं, तो कनखियों से
एक दूसरे को पीछे देखने के लिए कहतीं
जब कभी हमारे कपडों में
मासिक धर्म का दाग लग जाता
तो देह के भीतर से लपटें उठतीं
और चेहरे पर राख बन फैल जाती
हम दागदार चेहरे वाली लड़कियाँ
उम्र के कच्चेपन में सामूहिक प्रार्थनाएँ करतीं
हे ईश्वर – बस हमारी इतनी-सी बात सुन लो
हम लड़कियाँ , अनेक प्रार्थनाएँ करती हुयी
जवान हो रही थीं
लड़कियाँ जवान हो रही थीं
उनके हिस्से की धूप, हवा, रात
और रोशनियाँ कम हो रहीं थीं
अब हम बाग में नहीं दिखतीं
गिट्टियाँ खेलते हुये भी नहीं
हम घरों के पिछवारे
लप्प –झप्प में
एक दूसरे से मिल लेती हैं
दीवार से चिपक कर ऐसे बतियातीं
जैसे लड़कियाँ नहीं छिपकलियाँ हों हम
घरों के बड़े कहीं चले जाते
तब बूढ़ी स्त्रियाँ चौखट पर बैठ
हमारी रखवाली करतीं और
किसी राजकुमार के इंतिज़ार और अनिवार्य
हताशा मे हरे कटे पेड़ की तरह उदास होती हम
लड़कियाँ जवान हो रही हैं।

8. आसान है हमें मनोरोगी कहना 

रात अनेक सपनों का कोलाज होती है
कई रातों के सपने अभी भी याद हैं
बचपन में पढ़ी कविताओं की तरह
सपने के एक सिरे से दूसरे सिरे का मतलब
अभी भी पूछतीं हूँ सबसे ।
आखिर! पश्चिम दिशा में साँप उगने का क्या मतलब होता है ?
कुछ सपने ,जो गाँव में आते थे
अब शहर की अनिद्रा में भी आने लगे हैं
एक आदमकाय ,सींगवाला जानवर
धुन्धभरी रातों में दौड़ता है
मेरे पैरों में बड़े-बड़े पत्थर बांध देता है कोई उसी क्षण
पैर घसीटे हुये, घुस गयी हूँ अडूस और ढाख के जंगलों में
अब वह जंगल ,जंगल नहीं एक सूनी सड़क है
उस साँय-साँय करती सड़क पर मैं भाग रही हूँ ।
रात को सोने से पहले ही
दिन चक्र की तरह घूम जाता है
आज फिर दूर वाले फूफा जी आए हुये हैं
वे आंखो से ,मेरे शरीर की नाप लेते हुये
अभिनय की मुद्रा मे कहते हैं –
अरे ! तुम इतनी बड़ी हो गयी
मेरे बायें स्तन को दायें हाथ से दबा देते हैं ।
वह डॉक्टरनुमा व्यक्ति फिर आया हुआ है
जो मेरे गाँव की सभी स्त्रियॉं का इलाज करता है
पूछता है –पेशाब में जलन तो नहीं होती
एक प्रश्न हम सभी की तरफ उछालकर
जाड़े की रात में भी ग्लूकोज चढाता है
और रात भर उन औरतों का हाथ
अपने शिश्न पर रखे रहता है
फिर सपने में आते हैं कुछ मुंह नोचवे
जो स्कूल जाती लड़कियों को बस में भर ले जाते हैं
छटपटाहट में नीद खुलती है
मुझे अपना चिपचिपाया हुआ बिस्तर देखकर घिन्न आती है
बीच की छूटी तमाम रातों में डरी हूँ
जिस रात, मैं उन देवताओं से गिड़गिड़ाती हूँ
की अब कोई और सपना मत दों मेरी नीद में
उसी रात ,पता नहीं कब ,कहाँ ,कैसे निर्वस्त्र ही चली गयी हूँ ।
सभी दिशाओं से आती हुयी आंखे मुझे चीर रही हैं
वे मेरी देह पर अनेक धारदार हथियारों से वार करते हैं
मुझे सबसे गहरी खायीं में फेक देते हैं वे
मेरी सांस फूल रही है ,मेरी देह मेरे विस्तार से थोड़ा उठी हुयी है
मैं सबसे पहले अपने कपड़े देखती हूँ ।
बगल में सोयी माँ पूछ रही है – क्या कोई बुरा सपना देखा तुमने
मैं कहती, नही, अम्मा तुम सो जाओ
मैं सोच रही हूँ की, फ्रायड तुम जिंदा होते
तो इन सपनों को पढ़ कर कहते
की यह मनोरोगी है

9. एक तलैया की याद में 
गाँव के बीचों-बीच
लहराती थी एक तलैया
जेठ की दुपहरिया में
ठंठी हवा बनकर

उसकी पीठ पर ऐसे स्वर होते बच्चे
जैसे दादी से कह रहे हों
मेला चलने के लिए

भैसें चली आतीं नहाने
अपना कुनबा लिए
मुहं बोर-बोर नहातीं
सगी बहनों-सी भेटती
एक दूसरे से

लड़कियां हर साँझ आतीं किनारे पर
बतियातीं
उनकी बातों को सुन-सुन हसती रही वह
कभी शिकायती नहीं हुयी
उनके पिताओं से

रात होते ही खरहे
दिन की लुका-छिपी
डर-भय भूल
आते उसके पास
उसे सलामी देते
फिर पीते पेट भर पानी

लौट आती
तुनक कर चली गयी खिचुही

लोमड़ी ,सियारिनें आतीं
पानी पीतीं ,दम भरतीं
मछलियों से बाते करतीं
फिर आने को कह
लौट जातीं अपने बच्चों के पास

जिन पेड़ों को उसने सींचा था
बड़ा किया था
बिना एहसान जताए
वे गजब के समझदार थे
बिना थके छाया करते रहे उस पर

चिड़ियों के बच्चे जब चीं..चीं..कर गला फाड़ते
चिड़िया झिझक-झिझक कर
मांगती दो बूंद पानी
चिड़िया की झिझक से
लाल-पीली हो तलैया
चली जाती उस किनारे
की तुम दो बूंद पानी के लिए
क्यों शर्मिंदा करती हो मुझे
तब चिड़िया कहती –
‘बहन दो बूंद पानी की कीमत पर ही
जिन्दा रहेंगे हमारे बच्चे’
चिड़िया की बात सुन
नम हो जाती मछलियों की आँखें
वे फिर-फिर भरजा ती आभार से
इस तरह मजबूत होता
उनके बीच भरोसे का पुल

तलैया अपनी आत्मा पर कोई कलुष लिए बिना
रात-दिन
साँझ-दोपहर
सबको पिलाती रही पानी

मेढक कछुए मछलियाँ
उसकी रसोईं में भोजनकर
सोते उसी की तलहटी में
तितिलियाँ उड़ते-उड़ते
धप्पा कर जातीं उसकी पीठ पर

हम जो मनाते रहे अपना त्यौहार
बांधते रहे एक दूसरे से गिरह
हम जो धरती के छाती पर लगाते रहे
बारूद का ढेर
और नदियों की पीठ पर
पाँव का निशान छोड़ विजयी हुए
हम जो इतराते रहे अपने कर्ता
और निर्माता भाव पर
सोखते रहे उसकी आत्मा का जल
बिना क्षमा भाव के
और खाली होती रही वह बिना शिकायती हुए

एक दिन जब
चटकने-चटकने को हुयी उसकी आत्मा
उसने समेट लिया अपना असमय बुढ़ापा
और दूर जाकर बिखेरी अपनी क्षार
की जिससे सुखी रहें वे बच्चे
जो सवार हुए थे उसकी पीठ पर
की उन लड़कियों को लग न जाय
असमय बुढ़ापे का रोग

जब गाँव छोड़कर चली गयी वह तलैया
गाँव के निकारे पर सर पटक
फेकरने लगी सियारिने
भैसों ने सूनी आँखों से दूर तक निहारा उसे
पेड़ों को बुखार चढ़ा उत्तप्प्त हो गयी उनकी सांसे
भरोसा टूट गया चिड़ियों का
बेघर हो मरी मछलियाँ
कछुए ,मेढक ,खरहे
लोमड़ियाँ ,सियारिने
सब छोड़कर चले गए गाँव

एक बार जब आग लगी उसी गाँव में
लोग नहीं छटका पाए
खूंटे से अपनी भैसे
अपने जानवर
आग लगे छप्परों के गुर्रे काटे गए
फिर भी नहीं बचा उनका घर
गुहार लगाती औरतों के मुहं फेफरी पड गयी
बच्चे आग से ऐसे सहमे
की जीवन भर उबर न पाए

घर जले
खूटें,पगहे और गांए जलीं
बुधनी की बकरियां जलीं
खेत खलिहान जले
रमई काका की दुकान जली
झुलस गए सब पेड़
औरतें ज़ार-ज़ार हो रोयीं
की कूची,बढ़नी सब जल गयी
बूंद भर पानी न मिला बुझाने को आग

गाँव की दशा-दिशा देखने पुरोहित बुलाये गए
मन्त्र पढ़े गए
कुंए पूजे ,जगतें पूजीं ,
ताल-तलैया उसके किनारे पूजे
गाँव भर की औरतों ने अर्घ्य दिया
गंगा से आचार पसार कहा –
‘हे गंगा ! हमारी इस तलैया में जल भर दो
हे सागर के पुरखों का उद्धार करने वाली गंगा
हमारे बच्चों को
हमारी फसलों को
हमारी भैसों, गायों, बैलों की
आँखों में यह जो आग जल रही है बुझाओ माँ

औरतें गंगा से
अपनी उस तलैया से
लौट आने के लिए
फिर से लहराने के लिए
कहती रह गयीं
गंगा न लौटी

कहते हैं जैसे सियारिने फेकर कर मार गयीं
वैसे ही फेकरती रह गईं औरतें
जब से सूखी वह तलैया
जब से चटकी उसकी आत्मा
वह दरार कभी न भर पायी
तब से वहां बस कहर ही बरसा है .

10. हमारा इतिहास 

एक औरत की नील पड़ी पीठ
जिसे सूरज ने अर्घ्य से लौटते हुये दागा था
देवताओं और राजाओं के कपड़े धोते-पछीटते
एक दूसरी औरत की झुकी हुयी पीठ
एक पीठ की विसात पर फेंकी गयीं पासे की गोटियाँ
एक शापित शिलाखंड
जिसके लिए औरतें
अनादिकाल से एड़ियाँ रगड़ रही हैं
एक औरत की कटी हुई नाक जिसे किसी भद्र ने
प्रणय निवेदन के अपराध मे काटा था

इतिहास का एक पन्ना
जिसके कोने में दर्ज हैं विषकन्याएँ
हाँ ,वही विषकन्याएँ
जिन्होनें कितने ही राजाओं
मंत्रियों और पुरोहितों को मार डाला
अपने तेज दांतों से

वे विषैले दांतों वाली औरतें
चीख रही हैं भरी अदालतों में
झूठ…… झूठ……झूठ
स र $$$ स $ र  झूठ
हम जन्मना विषकन्याएँ नहीं थीं
विष को धीरे –धीरे उतारा गया
नसों, धमनियों और सिराओं में

एक सच ,कि झूठे स्वाभिमान और
टुच्चे स्वार्थों के लिए औरतें
युद्ध में कभी शामिल नहीं रहीं
न तो औरतों के लिए कोई युद्ध
लड़ा गया इतिहास में
विषकन्याएँ एक स्वर में कहती हैं
कि झूठ के ताले में बंद है हमारा इतिहास
युद्ध के लिए स्वीकृति कभी नहीं दी विषकन्याओं ने

हम औरतें
जो चुड़ैल बन भटक रही हैं इधर-उधर
पीपल के पुराने पेड़ों
वीरान खंडहरों में हमारा ही निवास है
हाँ हमीं थीं जो जंगलों से निकल बावड़ी में पानी पीतीं
और अपनी ही छाया देखकर डर जाया करती थीं
बावड़ी के किनारे चुड़ैलों के ही अवशेष मिले हैं खुदाइयों में

खड़ी दोपहर में हम झुंड में चलतीं
मातम मानते हुये
जो एक साथ कूद गईं थी चिताओं में
जौहर करने
हम तो सबसे कमजोर निर्मितियाँ थीं
इसलिए सबसे अधिक रूठा करतीं
कूद जातीं कुंओं में
औ फूल बन उगतीं थीं
कुंओं से लौटती प्रतिध्वनि
हमारा ही अधूरा गाना है

शिल्पकारों नें हमारे देह कि विभिन्न आकृतियाँ बना
कील दिया स्थापत्यों में
तब से लेकर आजतक
आने जाने वाला हर राहगीर
हमारी टेढ़ी कमर पर हाथ फेर लेता है

धर्मग्रंथों और इतिहास की इन स्याह
पाण्डुलिपियों को अपनी पीठ पर लादे
औरतें फिर रही हैं प्राचीनकाल से
हमारी पीठ पर जो कूबड़ दिखाई दे रहा है
वह उसी का बचा हुआ अवशेष है
हम यक्षणियों को कैद हुये लंबा समय गुजरा है
धनकुबेर के तहख़ानों
इतिहास के पन्नों
और तुम्हारी कलाओं में
अब छटपटा रही हैं हमारी आत्माएं  ।

11. हाँ शर्तों पर टिका है मेरा प्रेम 

मुझसे प्रेम करने के लिए
तुम्हें शुरू से शुरू करना होगा
पहले पैदा होना होगा एक स्त्री की कोंख से
उसकी और तुम्हारी धड़कन
धड़कनी होगी एक साथ

मुझसे प्रेम करने के लिए
संभल कर चलना होगा हरी घास पर
उड़ते हुए टिड्डे को पहले उड़ने देना होगा
पेड़ों के पत्ते बहुत जरुरत पर ही तोड़ना होगा
की जैसे आदिवासी लड़के तोड़ते हैं
फूलों को नोच
कभी मत चढ़ाना देवताओं की मूर्तियों पर

मुझसे प्रेम करने के लिए
तोड़ने होंगें नदियों के सारे बांध
एक्वेरियम की मछलियों को मुक्त कर
मछुआरे के बच्चे से प्रेम करना होगा
करना होगा पहाड़ों पर रात का विश्राम

मुझसे प्रेम करने के लिए
छाना होगा मेरा चूता हुआ छप्पर
उस पर लौकियों की बेले चढ़ानी होंगी
मेरे लिए लगाना होगा एक पेड़
अपने भीतर भरना होगा जंगल का हरापन
और किसी को सड़क पार कराना होगा

मुझसे प्रेम करने के लिए
भटकी हुयी चिठ्ठियों को
पहुँचाना होगा उनके ठीक पते पर
मेरे साथ खेतों में काम करना होगा
रसोई में खड़ा रहना होगा एक पाँव पर
मेरी ही तरह
विस्तर पर तुम्हे पुरुष नहीं
मेरा प्रेमी होना होगा
हाँ शर्तों पर टिका है मेरा प्रेम
मुझसे प्रेम करने के लिए
अलग से नहीं करना होगा मुझसे प्रेम .

12. हमारे गाँव की विधवाएँ

उधध रंगों में लिपटी औरतें
हमारे गाँव की विधवाएँ हैं।
हमारी दादियाँ चाचियाँ माएँ हैं
जवान भाभियाँ, बहनें हैं
जो उजाड़ ओढ़ अंधेरे में
सिसकियाँ भर रही हैं।
ज्ञान की खोज में जब पोते-पोतियाँ
कहीं दूर जा रहे होते हैं
तो विधवा दादियाँ दूर से ही
अपना प्रेमाशीष हवा में छोड़ देती हैं ।
विधवाएँ टूटी हुई बाल्टियाँ हैं
जिसमें सगुन का जल नहीं भरा जाता।
विधवा हुई माएँ बेटियों के ब्याह में
अपने आंचल से उनका सिर नहीं ढकतीं
बस हारी आँखों से उन्हें निहारती रहती हैं।
मन ही मन क्षमा माँग लेती हैं माएँ
विदा होती बेटियों से
और न जाने किन जंगलों में खो जाती हैं।
शुभ कार्यों से बेदख़ल विधवाएँ
मंगलाचार को रुदन के राग में गाती हैं।
हमारे गाँव की विधवाएँ और बिल्लियाँ एक जैसी हैं
बहुवर्णी स्त्रियाँ कब बनीं विधवाएँ
बिल्लियों में किसने भरे ये रंग
न विधवाएँ जान पाती हैं
न ही बिल्लियाँ।

13. थोड़ा-थोड़ा कुछ और भी 
सपनों की दुनिया में
सीखों की गठरी
साथ लायी थीं लड़कियां
उम्र के दहलीज़ पर
मचल रही थीं
देह की अनचीन्हीं इच्छाएं
प्रशाखओं से फूट रहीं थीं
सप्तपर्णी की कोपलें
लड़कियां औरतें बन रहीं थीं
उन्हें आकर्षित करतें
उनके उम्र के लड़के
वे एक दूसरे की चिंता करतीं
ईर्ष्या करतीं एक दूसरे से

खेतों मेंड़ों से होकर
उड़ा जा रहा था मेरा भी मन
बवंडर-सा, तुम तक
बज रहा था
झिल्लियों का अनवरत संगीत
हम बंजारों-सा बदल रहीं थीं
बार-बार मिलन की जगहें
कितनी बार छीली गयी वह घास
उसकी जंग थी
अपनी हार के खिलाफ़
उस सफ़ेद डूब-सी तुम
मन-कोटरों में उग आई थी

एक उमस भरी रात
हलचलों से पटी जगहें
फिर भी बंद था एक दरवाज़ा
कम डर नहीं था उस समय
दरवाज़ा खटखटाए जाने का
कूकरों के सीटियों के बीच ही
गैस का दाब ख़त्म होना आम बात थी वहां
चीजें घटने का कोई कलेंडर नहीं था
इच्छाओं ने डर से डरते हुए भी
उसे परे ढकेल दिया था
राम की घोड़ियों की तरह
एक दूसरे को पीठ पर
लाद लिया था हमने
एक जोड़ी सांप की तरह
एक दूसरे में गुंथी रात
बूंद-बूंद पिघल रही थी हमारे बीच
हमने पहली बार महसूस की
होंठों की मुलायमियत
तुम्हारे हाथ मेरे स्तनों को
ओह !कितना तो अपनापा था
न पीठ पर खरोंच
न दांत के निशान
आहत स्वाभिमान के घमंड से
उपजी बदले की भावना भी नहीं
एक दूसरे की देह को
अपनी -अपनी आत्मा सी
बरत रहीं थीं हम
हमारे बीच महक रही थी
सप्तपर्णी की कच्च कोपलें
देह के एक-एक अंग को हमने
साझे में पहचाना था उस रात

रात बीतती रही
छंटती रही रात की उमस
हलचलों से पटी जगहों में
पसर गया अंतिम पहर का सन्नाटा
रात बीत गयी
अँधेरा चिपका रहा चहरे पर
चहरे की शिनाख्त में
छोड़े गए हैं कई जोड़ी खोजी कुत्ते
परित्यक्त जगहों की तलाश में
भटक रही हूँ ,मैं बदहवास
अपना ही बधस्थल खोज रही हूँ .
सूखे हुए कुएं
उखड़ी हुई पटरियां
खचाखच भरी जगहें
छुपने का ठौर नहीं है इस शहर में
सर्च लाइटें
बेध रही हैं
आँखों की पुतरियां
ब्रम्हांड का शोर
सुन्न कर रहा है कानों को
बेआवाज चीखती मैं
देवताओं की कसमे खाती
लौट रही हूँ
मेरे बगल में चल रही है रात
साथ-साथ चलती रात
फिर-फिर भर रही है भीतर
रात और दिन का यह घमासान
हुआ और-और गहरा अपराधबोध
ताकतवर रात पछीट रही है दिन को
पछाड़े खाता दिन
हर रात थोड़ा कमजोर दिखा
दिन की सारी कसमें तोड़
हमने हर बार रात चुनी
इस तरह हमने जाना
दिन से अधिक
ताकतवर होती है रात
उसके उथलेपन से
ज्यादा गहरी भी

हमने थोड़ा सपने जिए
थोड़ा सीखें छोड़ी
थोड़ा गुमान किया एक दूसरे पर
जब शब्द नहीं थे हमारे पास
तब भी थे कुछ मुलायम भाव
जब बन रही हो भाषा की नई दुनिया
भाषा में स्थायी महत्त्व हो रात का
तो हिचक कैसी
कैसा अपराधबोध
हाँ ! हम दो लड़कियां
थोड़ा –थोड़ा कुछ और भी थीं
प्रेम में थीं हम दो लड़कियाँ

(कवयित्री अनुपम सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं। उनकी नई कलम है, अपनी कविताओं के लिए वह काफ़ी सराही गयी हैं। टिप्पणीकार सविता सिंह समकालीन कविता और स्त्री विमर्श संबंधी लेखन का बड़ा नाम हैं। वह IGNOU के स्त्री अध्ययन केंद्र में प्रोफ़ेसर भी हैं।)


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2 Thoughts to “पराजय को उत्सव में बदलती अनुपम सिंह की कविताएं”

  1. अनुपम सिंह की कवितायेँ स्त्री-विमर्श के एक नए जाविये से देखती हैं. उनके प्रश्न उपभोक्तावादी समाज में अपनी भूमिका तलाशती स्त्री और उसके वजूद को लेकर स्थापित मान्यताओं से बहुत गहरे हैं.
    कविताओं में नए मुहावरे हैं और एक भीनी ताजगी है.
    साथ ही स्वतंत्रचेता स्त्री की अस्मिता के सरोकार स्पष्ट हैं.

  2. बेहतरीन कविताएँ….
    लाज़वाब,
    कुछ भी शेष नहीं…

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