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कश्मीर एक द्विपक्षीय मसला हैः ट्रम्प के बयान पर अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की सफाई

स्टेट डिपार्टमेंट के प्रवक्ता का कहना है कि ‘‘हमें विश्वास है कि भारत और पाकिस्तान के बीच किसी सफल वार्ता की बुनियाद यह है कि पाकिस्तान अपनी ज़मीन पर जंगजूओं और आतंकियों के विरुद्ध निरंतर और अनुत्क्रमणीय कदम उठाये।’’

कश्मीर मसले पर मध्यस्थता सम्बन्धी राष्ट्रपति के बयान से हुये नुकसान की भरपाई के लिये ट्रम्प प्रशासन ने स्टेट डिपार्टमेंट के साथ मिलकर एक अभियान चलाते हुये कहा है कि यह भारत और पाकिस्तान के बीच का एक द्विपक्षीय मसला है और इस मसले पर दोनों देशों के मध्य किसी वार्ता का अमेरिका स्वागत करेगा।

यह भी कहा गया कि भारत के साथ सफल वार्ता की कुंजी है कि पाकिस्तान आतंकवाद के विरुद्ध निरंतर और अनुत्क्रमणीय कदम उठाये।

भारतीय प्रेस ट्रस्ट द्वारा यह पूछे जाने पर कि ट्रम्प की टिप्पणी से यह संकेत मिलता है कि कश्मीर नीति में कुछ परिवर्तन हुआ है, स्टेट डिपार्टमेंट के प्रवक्ता ने बताया कि ‘‘कश्मीर का मसला दोनों पक्षों के मध्य वार्ता का मुद्दा है, और भारत और पाकिस्तान यदि वार्ता के लिये बैठते हैं तो ट्रम्प प्रशासन उसका स्वागत करेगा और अमेरिका इसमें सहायता करने के लिये सदैव तैयार रहेगा।’’ भारत ट्रम्प के इस दावे का पहले ही खण्डन कर चुका है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कश्मीर मसले में उनसे मध्यस्थता करने का अनुरोध किया था।

एक दशक से अधिक समय से अमेरिका इस बात पर लगातार जोर देता रहा है कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच का द्विपक्षीय मसला है और इन दोनों ही देशों को यह तय करना है कि वार्ता की प्रकृति और व्यापकता क्या होगी।

स्टेट डिपार्टमेंट के प्रवक्ता ने कहा ‘‘हमें विश्वास है कि भारत और पाकिस्तान के बीच किसी सफल वार्ता की बुनियाद यह है कि पाकिस्तान अपनी ज़मीन पर जंगजूओं और आतंकियों के विरुद्ध निरंतर और अनुत्क्रमणीय कदम उठाये। ये कार्यवाहियाँ प्रधानमंत्री (इमरान खान) के वादों और पाकिस्तान की अन्तर्राष्ट्रीय बाध्यताओं के अनुकूल ही हैं।’’

एक प्रश्न के उत्तर में प्रवक्ता ने यह भी कहा कि ‘‘हम तनाव को कम करने और वार्ता के लिये परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के किसी प्रयास को समर्थन देना जारी रखेंगे। यह आतंकवाद की आशंका से निपटने का पहला और सर्वश्रेष्ठ तरीका है। जैसा कि राष्ट्रपति ने संकेत दिया है, हम इसमें सहायता देने के लिये हमेशा तैयार हैं।’’

सोमवार को ट्रम्प ने यह कहकर कि ओसाका, जापान में जी 20 सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिये उनसे सहयोग देने का अनुरोध किया था, भारत को सकते में डाल दिया था।

अगस्त 2018 में सत्ता में आने के बाद इमरान खान जब पहली बार अमेरिका आये तो ट्रम्प ने उनसे बातचीत के दौरान कहा, ‘‘दो हफ्ते पहले मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ था और हमने इस (कश्मीर) मसले पर बात की थी। और वास्तव में उन्होंने कहा था, ‘क्या आप मध्यस्थ या पंच बनना पसन्द करेंगे?’ मैंने कहा, ‘कहाँ’ (मोदी ने कहा) ‘कश्मीर’ में। उन्होंने कहा ‘‘क्योंकि यह मसला कई-कई सालों से चलता आ रहा है। मुझे ताज्जुब है कि यह कब तक चलता रहेगा। मेरे ख्याल से वे (भारतीय) इसका समाधान देखना चाहते हैं। मैं समझता हूँ कि आप भी इसका समाधान देखना चाहते हैं। और अगर मैं कुछ सहायता कर सकता हूँ तो मुझे मध्यस्थ बनना अच्छा लगेगा। ऐसा होना ही चाहिये……..। हमारे दो नायाब देश हैं और दोनों बहुत चुस्त हैं, उनका नेतृत्व चुस्त है और वे इस समस्या का समाधान नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन अगर आप चाहते हैं कि मैं मघ्यस्थता या पंचायत करूँ तो मैं ऐसा जरूर करना चाहूँगा। तो इस तरह के सारे मसले हल हो ही जाने चाहिये। इसके लिये उन्हें (मोदी) भी मुझसे ठीक यही बात कहनी चाहिये। तो हमलोग उनसे बात कर सकते हैं। या, मैं ही उनसे बात कर लूँगा और हम मिलकर देखते हैं कि क्या हो सकता है।’’

खान ने इन टिप्पणियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा, ‘‘राष्ट्रपति महोदय, मैं यह बात अभी कह सकता हूँ, अगर आप मध्यस्थता करके इस मसले को सुलझा दें तो अरबों से ज्यादा लोगों की दुआयें आपको लगेंगी।’’

नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय ने इस बात से इन्कार करने में देर नहीं लगायी कि मोदी ने कभी भी उनसे कश्मीर मसले पर मध्यस्थता करने के लिये कहा था।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा, ‘‘हमने (ट्रम्प की) टिप्पणियाँ अखबार में देखी हैं कि अगर भारत और पाकिस्तान दोनों कश्मीर मसले पर उनसे अनुरोध करें तो वह मध्यस्थता करने के लिये तैयार हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस तरह का कोई अनुरोध अमेरिकी राष्ट्रपति से किया ही नहीं।

कुमार ने कश्मीर मसले पर किसी तृतीय पक्ष को नकार देने के अपने परम्परागत फैसले पर कायम रहते हुये और 1972 के शिमला समझौते और 1999 के लाहौर घोषणापत्र को सन्दर्भित करते हुये कहा कि, जैसा उस समय हुआ था उसी के अनुरूप, ‘‘भारत की यह दृढ़ नीति रही है कि पाकिस्तान के साथ समस्त लम्बित मामलों पर चर्चा सिर्फ द्विपक्षीय होगी। पाकिस्तान के साथ किसी बातचीत के लिये सीमापार आतंकवाद को बन्द किया जाना जरूरी शर्त है।

पिछले ढाई दशकों में आतंक के खिलाफ़ भारत के संघर्ष का समर्थन करने में ट्रम्प अपने पूर्ववर्तियों के मुकाबले एक कदम आगे बढ़े हैं। पुलवामा आतंकी हमले के तुरंत बाद व्हाइट हाउस ने भारत के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन किया था और भारत में चुनावों के बीच में मई माह में ट्रम्प प्रशासन ने 26/11 हमले के मास्टर माइंड मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा आतंकी घोषित किया जाना सुनिश्चित किया। इसके लिये अमेरिका ने चीन पर दबाव बनाया जो इस तरह के किसी प्रस्ताव पर पिछले एक दशक से लगातार निषेधाधिकार का प्रयोग कर रहा था।

( भारतीय प्रेस ट्रस्ट/द हिन्दू से साभार, अनुवादः दिनेश अस्थाना )

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