जूल्स ब्रेतोन का ‘ सॉन्ग ऑफ द लार्क ‘ जिसे देखने के बाद विख्यात सिने अभिनेता बिल मरे ने आत्महत्या का इरादा बदल दिया

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( आज मजदूर दिवस है. ‘ तस्वीरनामा ‘ में प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक  मज़दूर-किसानों को चित्रित करने के साथ साथ , श्रम की गरिमा को भी प्रतिष्ठित करने वाले महान यथार्थवादी चित्रकार जूल्स ब्रेतोन द्वारा  1884 में बनाए गए चित्र ‘ सॉन्ग ऑफ द लार्क ‘ के बारे में बता रहे हैं. इस चित्र को देखकर विख्यात अमरीकी सिने अभिनेता बिल मरे ने आत्महत्या का इरादा त्याग दिया था )

 

1884 में बनाई गयी ‘ सॉन्ग ऑफ द लार्क ‘ चित्र की  संरचना अत्यंत सरल सी लगती है.  चित्र में क्षितिज में लाल सूरज मानों एक नये दिन के  बीज के मानिंद  अँकुआ  रहा है. दिन के इस ख़ास वक़्त की मद्धिम  रौशनी में हम चित्र के केंद्र  में एक लड़की को उपस्थित पाते हैं.

अपने  हाथ में हँसिया  थामे हुए इस लड़की के दोनों पैरों पर अगर गौर करें तो यह ‘ चलते हुए ठिठक कर रुक जाने ‘ की मुद्रा है जो मानों सुबह की इस ख़ामोशी में पूरी तन्मयता से उस गाने वाली चिड़िया (‘लार्क’) को , जो इस कैनवास में  उपस्थित नहीं  है , कैनवास के  बाहर खोज रही है.

उसकी धूल से मलिन कमीज और उसके नंगे पैर , उसके निर्धन श्रमिक होने का परिचय तो देते हैं , पर उसके सीधे खड़े होने के अंदाज़ में एक आत्म विश्वास साफ़ दिखता है. चित्र को कुछ देर तक देखने से लगता है कि मानो  आसमान की रौशनी शायद धीरे धीरे बढ़ रही है और उस बढ़ती हुई रौशनी में  चित्र के केंद्र में खड़ी इस लड़की को हम धीरे धीरे जानने लगते हैं, पहचानने लगते हैं।

जूल्स ब्रेतोन  ने चित्र में पुरुषों जैसी मज़बूत हाथों और पैरों वाली इस लड़की को प्रचलित अर्थ में ‘ खूबसूरत ‘ या कमनीय नहीं बनाया है,  और न ही इसके नाक-नक्श ही तीखे हैं ।  बावज़ूद इसके , हमें इस लड़की में श्रम का सौन्दर्य दिखता है. और हम यह भी देख पाते हैं,  कि  लार्क के गीत सुनने की इच्छा जैसी जीवन की सूक्ष्म अनुभूतियाँ इस लड़की के पास भी है .
जूल्स ब्रेतोन का चित्र ‘ लार्क चिड़िये का गीत ‘ के बारे में अनेक गंभीर समीक्षाएं और लेख लिखे गए हैैं पर उनके समान ही एक महत्वपूर्ण वाकया, एक चलचित्र अभिनेता बिल मरे का भी है।

विख्यात अमरीकी सिने अभिनेता बिल मरे (Bill Murray) से एक  साक्षात्कार में किसी पत्रकार ने उनसे कला और जीवन के बीच के रिश्तों के  बारे में पूछा था । बिल मरे को हालाँकि लोग एक हास्य अभिनेता के रूप में ही जानते है पर उन्होंने इस प्रश्न के उत्तर में एक गंभीर घटना का जिक्र किया था. एक युवा अभिनेता के रूप में , अपने संघर्ष के दिनों में एक ऐसा समय आया था, जब वे इतने हताश हो गए थे कि उन्होंने आत्महत्या करने निर्णय ले लिया था।

ऐसी मनःस्थिति में वे एक दिन टहलते हुए शिकागो आर्ट इन्स्टिट्यूट के संग्रहालय में पहुँच गए थे. संग्रहालय में बेमन टहलते हुए अचानक ही  दीवार पर टंगे एक चित्र पर उनकी नज़र पड़ी , जहाँ एक लड़की उगते सूरज की रौशनी में हाथ में हँसिया लिए खड़ी थी. बिल मरे को इस चित्र से सतत  संघर्ष और आशा की प्रेरणा मिली थी जिससे वे अपने मन से  आत्महत्या की चिंता निकाल कर,  फिर संघर्ष के पथ पर वापस लौट सके थे और शीघ्र ही अपने को एक सफल अभिनेता के रूप में स्थापित करने में कामयाब हुए थे .  बिल मरे ने कहा ,”  बाद में मुझे पता चला कि उस चित्र का शीर्षक ‘ लार्क का गीत ‘- सुबह के वक़्त खेतों में दिखने वाली छोटी चिड़िया की  चहक है.

बिल मरे ही नहीं , बल्कि अपने असंख्य दर्शकों को प्रेरित करने वाले इस चित्र को उन्नीसवीं सदी के महान यथार्थवादी चित्रकार जूल्स ब्रेतोन  ने 1884 में बनाया था

जूल्स ब्रेतोन  (1827-1906) उन्नीसवीं सदी के अन्यतम यथार्थवादी चित्रकारों में से एक हैं . उनके चित्रों में फ्रांस के ग्रामीण जीवन का चित्रण हुआ है, जहाँ उन्होंने चित्रकला की यूरोप की शास्त्रीय शैली में खेत-खलिहानों में काम करते स्त्री -पुरुषों को बनाया है.

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में यूरोप के रचनाकारों के बीच एक नयी विचार धारा की गूँज सुनाई देने लगी थी. चित्रकला में युगों से जहाँ प्रमुख रूप से राजा-रानी-सामंतों और पैसों वालों का वर्चस्व रहा था वहीं प्रगतिशील सोच के चित्रकारों ने एक सर्वथा नए सौन्दर्य शास्त्र की रचना की. यहाँ  गौरतलब है कि  इन चित्रों में संरचना, रंगों के प्रयोग जैसे  शैलीगत नियमों को  बदले बिना, चित्रकारों ने अपने चित्रों में मज़दूर-किसानों को चित्रित करने के साथ साथ, श्रम की गरिमा को भी प्रतिष्ठित किया है. और इस प्रयास में हम सर्वत्र महिलाओं की बराबर की हिस्सेदारी को भी रेखांकित होते पाते हैं.

जूल्स ब्रेतोन ने अपने पूर्ववर्ती रोमेंटिक दौर में इस्तेमाल किये गए तरीकों को  ही अपनाया है. चित्र के केंद्र में उपस्थित विषय, चरित्र या चरित्रों के विवरणों को जिस कोमलता के साथ चित्रित किया गया हैं उसके विपरीत, परिवेश का चित्रण अपेक्षाकृत खुरदरा है. चित्ररचना की ऐसी प्रक्रिया , चित्र के केंद्रीय चरित्र / चरित्रों को एक प्रमुखता देती है , साथ ही दर्शक को चित्र के मूल उद्देश्य के करीब पहुँचने में मदद भी करती हैं.

 

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