अशोक भौमिक के ‘जीवनपुर हाट जंक्शन’ में अंतर्बाह्य के बीच कोई दीवार नहीं-योगेंद्र आहूजा

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योगेंद्र आहूजा

संजय  जी का आदेश  था कि मैं अशोक जी की कहानियों पर एक आधार वक्तव्य या आधार आलेख तैयार  करूं । लेकिन यह ‘आधार आलेख’ … मीर के प्रसिद्ध शेर  – इश्क  इक मीर भारी पत्थर है/कब यह तुझ  ना-तवां से उठता है – को याद करते हुए कहूं  तो – मुझ  ना-तवां के लिये इश्क  से भी भारी पत्थर साबित हुआ । अगर उनका आशय था आलोचना के या साहित्यानुशीलन के किन्हीं सिद्धांतों या पद्धति पर आधारित, एक अकादमिक किस्म का वक्तव्य तो वह मेरे बस के बाहर था । अशोक जी की कहानियां पढ़ने के दौरान जो कुछ ख्याल मन में आये, ये महज उनके चंद निजी किस्म के नोट्स हैं, कोई वक्तव्य नहीं, बस एक टिप्पणी जिनसे शायद चर्चा की शुरुआत की जा सकती है ।

 

पिछले एक, बल्कि डेढ़ दशक का वक्त हिंदी में कहानी की दुनिया में एक खलबली, एक उत्तेजना, एक बेचैनी का वक्त रहा है । यह कहना एक पुरानी बात को दोहराना है, फिर भी … हम जिस समय के वासी हैं,  वह आज तक के समूचे मानवीय इतिहास मे, पूरी ह्यूमन हिस्ट्री  में, सबसे तीव्रगति समय है । इस समय रचना करते हुए लेखक को अचेतन रूप से कहीं न कहीं वक्त से, उसकी रफ़्तार से एक होड़ लगानी होती है । अब आर्थिक संबंध तेजी से बदलते हैं । यथार्थ जो सुबह होता है, शाम को कुछ बदल जा सकता है । मानवीय रिश्तों में रोज ही कुछ चटकता है । तेजी से बदलते आर्थिक संबंधों, रोज नये उभरतेे शक्ति केंद्रों, और नये बनते गठजोड़ों के कारण सामाजिक ढाँचा और यथार्थ जटिल से जटिलतर होते जा रहे हैं । इस तीव्रगति से बदलते यथार्थ के अवबोध, अवगाहन और अभिव्यक्ति के तरीकों का भी कुछ बदलना, पारंपरिक तरीकों से कुछ जुदा होना लाजिमी था । देखते ही देखते बदल जाने वाले यथार्थ को पकड़ने और कहने के लिये कहानीकारों को अक्सर कथा का पारंपरिक ढांचा नाकाफी जान पड़ा । उन्होंने नये कथारूपों, नयी कथाविधियों की तलाश की । इसीलिये इस दौरान कहानियों के लिये एक नया स्वरूप, नयी संरचना, नया शिल्प पाने की ऐसी जद्दोजहद देखी गयी जो अभूतपूर्व थी । हिंदी की कहानी हमेशा नकारात्मक और वर्चस्वशाली ताकतों के विरुद्ध रही है, जो कुछ भी मानवीय और जीवनदायी, सारवान, गतिशील है उसे रेखांकित करती रही है, यह तो एक बुनियादी बात है ही । लेकिन इस वक्त की कहानी से जो उम्मीद की जाती है, वह सिर्फ इतनी नहीं, इससे कुछ अधिक है । यह उम्मीद की जाती है कि आज की कहानी दुख को केवल बताये नहीं, समझाये भी । रघुवीर सहाय की पंक्तियां हैं: यह क्या है जो इस जूते में गड़ता है/यह कील कहां से रोज निकल आती है/इस दुख को रोज समझना क्यों पड़ता है । कहानी केवल वर्णन न करे, व्याख्या भी करे । विवरण कोरे विवरण न हों, उनके पीछे एक विश्लेषणात्मक और साथ ही प्रतिरोधी चेतना सक्रिय हो । ये अपेक्षायें कहीं शून्य से नहीं आयीं, इन सबके अपने तर्क हैं और मैं इन्हें नकारात्मक निगाह से देखने की वकालत नहीं कर रहा । लेकिन कहानी विधा से इतनी अपेक्षाओं का जो एक नकारात्मक नतीजा हुआ उसकी ओर इशारा जरूर करना चाहता हूं ।

 

वह यह कि कहानी इस कलाविधा की मूल शर्त से विमुख होने लगी । उनमें कथातत्व हलाक हुआ । वे मस्तिष्कीय यानी सेरीब्रल अधिक होने लगीं, दिल से एक दूरी बना ली । उन्हें पढ़ना श्रमसाध्य होने लगा । तमाम ऐसी कहानियां आयीं जो निबंध या शोध प्रबंध सरीखी जान पड़ती थीं । यहां तक कि एक कहानी मैंने देखी जो कहानी कम, इंजीनियरिंग का कोई तकनीकी आलेख ज्यादा थी, जिसमें गणितीय सूत्र कहानी के कलेवर का हिस्सा थे । और ऐसी तो तमाम आपने देखी ही होंगी जिनमें शुरू में और बीच बीच में भी किन्हीं दार्शनिकों, विद्धानों के भारी भरकम उद्धरण रखे रहते हैं और अंत तक समझ में नहीं आता कि कहानी के कथ्य से उनका क्या संबंध है ।

‘जीवनपुर हाट जंक्शन’ के लेखक, प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक

अशोक जी की कहानियों के संदर्भ में जो सबसे पहले रेखांकित की जाने वाली बात है, यह कि वे इस वक्त की कहानियों से की जाने वाली अपेक्षाओं और कहानी की कला की मूल शर्तों, पठनीयता के तकाजों, दोनों को एक साथ पूरा करती हैं । पहले वाक्य से ही पाठक को अपनी गिरफ्त में ले लेना जिससे वह अंतिम वाक्य पर पहुंचने से पहले मुक्त न हो सके, बल्कि कहानी उसके बाद भी देर तक उसके साथ रहे, यह हुनर, जो एक कथाकार का असली और बेसिक हुनर है, आज के कथा परिदृष्य में उतना आम नहीं । इन्हें पढ़ते हुए सबसे पहली जिज्ञासा यही होती है, जैसा उन्होंने भूमिका में कहा भी है, कि उनसे बहुत से पाठकों ने जानना चाहा, कि ये सच्ची हैं या काल्पनिक, कहानियां हैं या संस्मरण या संस्मरण के फार्म में  कहानियां । लेकिन जब हम इन रचनाओं के मर्म में पैठते हैं, रचना के ब्यौरों की जगह रचना के सत्य पर संकेद्रित होते हैं, तो यह सवाल बेमानी हो जाता है । भूमिका में अशोक जी ने उर्दू के लेखक जोगिंदर पाल को याद किया है जो उन्हें ताजिंदगी दुखी रहने का आशीर्वाद देकर चले गये थे, और वहां वे एक मार्मिक बात बताते हैं कि उनके, जोगिंदर जी के, अंतिम दिनों में उनके पात्र उनके पास लौट आये थे, उन्हीं के संग रहने लगे थे । यह कला की या सृजन की प्रक्रिया को रहस्यमय या जादुई या अतींद्रिय बनाना नहीं है, यह पूरी तरह एक यथार्थपरक, एक वास्तविक बात है, मुमकिन के दायरे में है । मुझे लगता है कि शायद कुछ ऐसा ही करिश्मा, हांलाकि विपरीत तरह से, इस किताब में अशोक जी के साथ हुआ होगा । पुरानी यादें, वक्त और लोग, बहुत से ऐसे भी, जो अब इस दुनिया में नहीं, उनके पास लौटकर आये होंगे, चेतना को खटखटाते, लिखे जाने के लिये बाध्य करते । जोगिंदर जी के पात्र असली लोगों के रूप में उनके पास वापस आये थे, अशोक जी के जीवन में आये असली लोग अब पात्र बनकर उनके पास वापस आये हैं । पूर्वी उत्तर प्रदेश के चांदगढ़़, जो दरअसल आजमगढ़ का बदला हुआ नाम है, में अब से तीस चालीस वर्ष पहले बतौर मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव रहते, काम करते हुए उन्हें जिन लोगों के साथ जीने और करीब से जानने का मौका मिला, ये उनके व्यक्ति चित्र हैं, उनके इर्द गिर्द लिपटी गाथायें – इश्क, वासना, प्रतिहिंसा, धूर्तता, छल, अपने से बड़ी किसी चीज के लिये खुद को उत्सर्ग या नष्ट कर सकने के जज्बे, और बेबसी, बेउम्मीदी और अंतर्तम तक अभिभूत कर लेने वाली गहरी मानवीयता, यानी इंसानी मन की तमाम भावनाओं और कामनाओं और वासनाओं में लिथड़ी हुई । फिर भी मैं कहना चाहूंगा कि इस किताब का वैशिष्ट्य इसकी विषयवस्तु में नहीं है । वैशिष्ट्य यह है कि इस तरह के स्मृति आधारित लेखन में जो तमाम रिस्क या फंदे या पिटफाल्स होते हैं, वे अपने को सावधानी से उन सबसे बचाते हैं । अगर लेखक सजग न हो तो इस तरह का लेखन … सिर्फ स्मृतियों की एक जुगाली भर रह सकता है  यानी यादों की बारात – या वह मृतात्माओं से वार्तालाप हो सकता है या खो चुकी चीजों या विलुप्त वक्त का एक कसक भरा, करुण आख्यान । वह नास्टेल्जिया से ग्रस्त ऐसी भाषिक संरचना हो सकता है जो अपने समय से दूर किसी समयहीन वीरान तक ले जाती है लेकिन कोई नजर नहीं देती, विचार नहीं देती, अधिक से अधिक आज के दुखों, द्वंद्वों से कुछ देर की राहत देती है । अगर ऐसा होता तो ये महज आकर्षक, खूबसूरत, यहां तक कि मुग्ध कर लेने वाली दास्तानें होती, लेकिन वर्तमान समय के संदर्भ में मूल्यवान नहीं। इन सारे खतरों से अशोक जी बचे रह सके हैं ।

जैसा मैंने कहा कि यह कोई व्यवस्थित पर्चा नहीं, सिर्फ किताब पढ़ने के दौरान जो ख्याल आये, उनके नोट्स हैं । मुझे यह याद आया कि जब मैं अभी छात्र था और सारिका जैसी पत्रिकाओं में छपे को एक गहरे आकर्षण और कुछ आतंक से देखा करता था, वह हिंदी में समांतर कहानी का और उसके बाद जनवादी कहानी का वक्त था । मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, निर्मल वर्मा, भीष्म साहनी, मन्नू भंडारी, अमरकांत, शेखर जोशी और माकंर्डेय जैसे दिग्गज उस समय सक्रिय थे । उस दौर में तमाम अच्छी बुरी कहानियां आयीं । लेकिन कथा की दुनिया में एक अलिखित रुढ़ि प्रचलित थी । वह यह कि कहानी का संबंध केवल बाह्य यथार्थ से है । आंतरिक दुनिया में उतरना, गहरे उतरना उसके लिये एक गर्हित या वर्जित कर्म है । आज तीस सालों के बाद पलट कर देखता हूं तो यह मान्यता बहुत थोथी जान पड़ती है । इसलिये कि, मुझे लगता है कि मनुष्य के भीतर आत्म और जगत का कोई साफ सुथरा विभाजन नहीं होता । ऐसी कोई लकीर नहीं होती कि कहा जा सके कि यहां तक बाहरी यथार्थ है और इसके आगे आंतरिक यथार्थ का इलाका शुरू होता है । बाहर की दुनिया ही आभ्यंतरीकृत होकर भीतर की दुनिया बनती है । दोनों दुनियायें मिली जुली और घनिष्ट रूप में अंतर्संबंधित  होती हैं । कहानी प्रथमतः इंसान की तमामतर लड़ाइयों और जद्दोजहद के बारे में होती है – लेकिन ऐसा नहीं कि जो लड़ता  भिड़ता, जूझता मनुष्य है उसका कोई अंतर्लोक नहीं होता या उसमें भावनायें या वासनायें नहीं होतीं । लड़ाइयां भी बाहर और भीतर दोनों स्थलों पर लड़ी जाती हैं और यदि हम मनुष्य की पूरी कहानी लिखना चाहते हैं तो वह उसके पूरे ‘स्व’ की कहानी यानी उसके अंतर्बाह्य की कहानी ही हो सकती है । लेखन सिर्फ ऐसा या वैसा हो या कुछ वर्जित इलाके हैं जहां लेखक को नहीं जाना चाहिये, ऐसी धारणायें अब मुझे बेमानी जान पड़ती हैं । लेखक से जो अपेक्षा की जा सकती है वह यही कि वह जिस विषय पर भी लिखे, पूरी सच्चाई और ईमानदारी और प्रामाणिकता से, श्रेष्ठ तरीके से, अपने अद्वितीय तरीके से अपने समय के जीवन को व्यक्त करे, जीवन के औदात्य को उजागर करे, मानवीयता का विस्तार करेे । अशोक जी की इन कहानियों में भी अंतर्बाह्य के बीच कोई दीवार नहीं । वे समान दक्षता से बाहर और भीतर जो घट रहा है, एक साथ दोनों की दास्तान बयान करते हैं ।

 

एक अन्य प्रचलित रूढ़ि यह है कि जो भावनापरक ( भावुकतापूर्ण नहीं ) है वह अनाधुनिक है । साहित्य को हमारे वजूद का जो तर्कशील, वैचारिक या विश्लेषणपरक या अवधारणामूलक हिस्सा है यानी हमारा मस्तिष्क तत्व, उसे संबोधित होना चाहिये । इसके परे जो भावनाओं या मनोवेगों या वासनाओं का विशाल इलाका है, उसे संबोधित या उत्तेजित करने वाली रचना कम मूल्यवान है । द ग्रेट डिक्टेटर फिल्म में चार्ली चैपलिन जो नकली हिटलर है, अंत में जो स्पीच देता है, उस में एक वाक्य है कि हम सोचते बहुत ज्यादा हैं, महसूस कम करते हैं । लिटरेचर भी जो विचार सजग तो बनाये लेकिन भावोद्वेलित न करे, शायद एक अधूरी ही रचना है ।

 

इन कहानियों या संस्मरणों का का मेरे लिये निजी तौर पर एक और महत्व रहा है । हम जीवन और जगत के बारे में और राजनीति और साहित्य विषयक जो भी धारणायें रखते हों, सब धारणाओं की तली में एक बुनियादी धारणा, एक मूलभूत विश्वास यह रहा है कि मनुष्य बुनियादी रूप से, आत्यंतिक रूप से, जैविक रूप से अच्छा ही है । उसमें इतनी अच्छाई, सौंदर्य और सृजनशक्ति अतंर्निहित है । यह तो हमारी समाज व्यवस्था ऐसी है कि वह अवरुद्ध रहती है या व्यक्त नहीं हो पाती । बेशक दुष्ट, धूर्त, लंपट और परपीड़क भी हमेशा रहते हैं लेकिन परपीड़न, विद्वेष  और विध्वंस इंसान की मूल प्रकृति नहीं है । वह मनोविकृति है, आपवादिक है, मनुष्य का अपने मनुष्यत्व से जुदा होना है । मुक्तिबोध ने कहा था, कुछ भी सोचना विचारना या रचना अपने सीमित ‘स्व’ की चैहद्दी पार करना और अन्य से संवाद करना है । अगर लेखक के पास यह अकीदा न होता कि मनुष्य बुनियादी रूप से अच्छा है, तो उसके सामने कोई ‘अन्य’ होता ही नहीं जिससे वह संवाद कर सके । ऐसी स्थिति में न कुछ सोचने का अर्थ होता, न सपने देखने का और न लिखने का ।

 

लेकिन सोशल मीडिया के इस वक्त में पहली बार हमारा इंसानों की एक नयी किस्म से सामना होता है । अगर इस अभिव्यक्ति के लिये माफ करें तो, शैतान की अभ्यर्थना करने वाले और शैतानों से आविष्ट, तमाम मर्यादाओं और नैतिकताओं से अपने को आजाद कर चुके और ऐसा होने की शेखी बघारने वाले । उनकी तर्क, विचार और संवाद में कोई रूचि नहीं । वे तमाम द्वंद्वों और दुविधाओं को जड़ से उखाड़ चुके हैं । वे तो अर्थ के पराभव का, मूल्यों के ध्वंस का और आत्मा की बेदखली का जश्न मनाते हैं । मैंने अपने जीवन में पहली बार यह देखा कि हत्याओं रेप और भीड़ की हिंसा और जनसंहार पर कोई तसल्ली या खुशी भी महसूस कर सकता है और खुलेआम इसका ऐलान कर सकता है । उनके पक्ष में भारी भरकम तर्क दिये जा सकते हैं, जुलूस निकाले जा सकते हैं और उस जुलूस में लेखकों को, कवियों को चीन्हा जा सकता है । मुक्तिबोध ने आधी रात के अंधेरे में जिस जुलूस की झलक दिखाई थी, वह अब दिन की तेज रोशनी में शान से गुजरता है । अब सचमुच की हत्याओं के वीडियो बनाये जा सकते हैं, उन्हें प्रदर्शित किया जा सकता है और हत्यारे के प़क्ष में एक बड़ी भीड़ अदालत को घेरने आ सकती है । एक राज्य में बाढ़ आने पर कोई खुलेआम यह अपील कर सकता है कि उन्हें एक पैसा न दो । मैं सोचता हूं कि अब से दस या पंद्रह या बीस साल पहले किसी नावल में ऐसे ब्यौरे होते तो शायद उन्हें फैंटेसी माना जाता या अतिकल्पनाशील होने के लिये लेखक की लानत मलामत की जाती । लेकिन देखते ही देखते यह सब यथार्थ होकर हमारे समय का सच हो गया । यह चेतना को सुन्न कर देने वाला बल्कि अक्सर घोर अवसाद में ले जाने वाला अनुभव रहा है ।

 

किसी मानव विरोधी विचारधारा का लक्ष्य सिर्फ अर्थनीति या राजनीति या संस्थायें नहीं होतीं । उनका असली निशाना तो इंसान की आत्मा होती है । वे तो मन को ही, इंसान के बुनियादी मनोवेगों को, उसके डी एन ए को बदल डालना चाहते हैं । वे इंसान की परिभाषा बदल डालना चाहते हैं । वे अपने लिये सिर्फ एक विचारहीन भीड़ चाहते हैं । ऐसे में इस किताब को पढ़ना बहुत राहतकारी लगा है । इसलिये कि, जिसे हम जन या अवाम कहते हैं, वह एक अमूर्त शब्द है, वे उसे हमारे लिये मूर्त बनाते हैं । वे इसी जन में से कुछ चेहरों को फोकस कर उन्हें हमारे इतना करीब ले आते हैं कि हम उन्हें स्पर्श कर सकें । वे उनके अंतर्लोक तक उतरकर उनकी मनुष्यता का उत्खनन करते हैं । हम फिर इस सच्चाई के रू-ब-रू होते हैं कि हमारे देश  के साधारण जन, निरक्षर, नगण्य लोग भी किस तरह डूब कर, टूट कर प्रेम करने में, उसके लिये खुद को उत्सर्ग करने में समर्थ हैं । वे एक दूसरे के कितने मददगार हैं, किस तरह आपस में गम और खुशियां बांटते हैं । बेशक कुछ धूर्त और चालाक भी हैं, वे तो हमेशा होते ही हैं । यह जन किसी मानव विरोधी विचार या राजनीति के साथ बस थोड़ी देर तक घिसटता जा सकता है लेकिन दूर तक उसके साथ नहीं जा सकता । किताब का असली महत्व तो थोड़ी मात्रा में हमें फिर यह उम्मीद वापस देने में है ।

 

मैं वीरेन जी की इन पंक्तियों के ( चंद शब्द बदले गये हैं, जिनके लिये माफी ) साथ अपनी बात समाप्त करूंगा जो किताब पढ़ने के दौरान मुझे याद आती रहीं ।

 

लोगों में ही दीख जाते हैं लोग

लोगों में ही वे बच रहते हैं

किसी चमकदार सुघड़ मजबूत विचार की तरह

दीख जाते हैं कौंध कर जब लग रहा होता है: सब खत्म हुआ ।

लोगों में ही प्रतिबिंबित होता है भौतिकशास्त्र का

यह अविनाशी संसार

शुक्रिया शरफुददीन शुक्रिया हरिराम शुक्रिया सरला जी

शुक्रिया कहानीकार जानी और नाटकों वाले मकबूल

शुक्रिया छोटे हामिद

याद रखूंगा मैं अपना सीखा गणित का एकमात्र सूत्र.:

शून्य ही है सबसे ताकतवर संख्या

हांलाकि सबसे नगण्य भी

याद रखूंगा मैं पूरे संसार को ढोने वाली

नगण्यता की विनम्र गर्वीली ताकत

जिसे अभी सही सही अभिव्यक्त होना है ।

(योगेंद्र आहूजा का चित्र संजय जोशी द्वारा उपलब्ध कराए गए ‘जीवनपुर हाट जंक्शन’ पर आयोजित गोष्ठी के एक वीडिओ से)

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