‘समय है सम्भावना का’ : सत्ता के मौन की पहचान है

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जगदीश पंकज जी का कविता संग्रह ‘समय है सम्भावना का’ इसी वर्ष आया है. जगदीश पंकज जी नवगीतकार हैं. दलित साहित्य में नवगीत की कोई समृद्ध परंपरा नहीं दिखती है. लेकिन जगदीश पंकज जी ने दलित साहित्य में इस नयी विधा को जोड़कर बहुत बड़ा योगदान दिया है. इससे दलित साहित्य का परिदृश्य व्यापक हुआ है. दलित साहित्य ने अपने आरंभ में स्वानुभूति की अभिव्यक्ति पर बल दिया और इसी को दलित साहित्य का मुख्य प्रस्थान विन्दु बनाया इसलिए साहित्य के अनगढ़पन को स्वकृति भी मिली. लालित्य और गेयता को बहुत ध्यान नहीं दिया गया. इसके पीछे प्रमुख कारण यह था कि यह माना गया कि दलित दुःख त्रासदी और प्रतिरोध को गाये जाने की अपेक्षा न की जाय लेकिन जगदीश पंकज जी का यह गीत संग्रह इस अवधारणा की सीमा को दूर करता है और इस बात को सिद्ध करता है कि दुःख के खिलाफ उपजे प्रतिरोध को गाया भी जा सकता है.
साहित्यकार अगर अपने समय की पहचान करना जानता है तो उसकी अभिव्यक्ति का यथार्थ भी मजबूत और प्रमाणिक होता है. जगदीश पंकज जी अपने समय की सच्चाई को बहुत गहराई से पहचानते हैं. और न सिर्फ पहचानते हैं बल्कि अपने समय से मुठभेड़ करते हुए यह भी घोषित करते हैं कि जिस त्रासदीपूर्ण समय का वे गीत गा रहे हैं उसी के भीतर से संभावना का समय भी दस्तक दे रहा है. उन्हीं के शब्दों में– ‘अनेक तरह की सूक्ष्म जटिलताओं से भरे इस समय में हम सभी विडम्बनाओं में जीने के लिए विवश हैं. सामाजिक सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता वाले इस समाज में दैनिक जीवन में एक साथ रहने के बावजूद हमारी वैचारिक बहुलता पर संकट मडरा रहा है. एकांगी दृष्टिकोण की विचारधारा की सक्रियता सामाजिक संस्कृति के ताने बाने के सामने चुनौती उपस्थित कर रही है. कला, साहित्य, संस्कृति, दर्शन और इतिहास के नए नए संस्करण सामने आ रहे हैं. जिनका निहितार्थ सामाजिक सद्भाव की सौहार्दपूर्ण परंपरा की सुदृढ़ परंपरा की नींव को झकझोर देने में अपनी सफलता देख रहा है. आपसी सद्भाव और सामंजस्य के प्रेरणा स्तम्भ डगमगा जाने के कगार पर पहुँच रहे हैं. समन्वय के सुदृढ़ धरातल से विघटन की खाई की ओर क्रमशः खिसकते जाने को अभिशप्त हैं. शताब्दियों से चली आ रही हमारी साझा संस्कृति और परस्पर सहिष्णुता की महान परंपरा को नष्ट भ्रष्ट कर देने के लिए जैसे किसी विकराल दानव का हाथ हमारी तरफ लगातार बढ़ता आ रहा है. अस्मिता का टकराव और विश्वास का संकट हमारी करुणामूलक सहिष्णुता और सह अस्तित्व की बुनियादी आस्थाओं को विचलित करने के कुचक्र में संलिप्त दिखाई दे रहा है.’’ कवि के इस कविता संग्रह के केंद्र में ये ही चिंतायें हैं. लेकिन हम जिस समय में हम रह रहे हैं उसकी पहचान सदमा और दुःख पहुँचाने वाले समय के रूप में किया जा रहा है. लेकिन जनता उसी समय के पहिये को उलट कर अपने लिए रास्ता तलाश रही है. चौतरफा प्रतिरोध की कार्यवाहियां इसकी गवाही देती हैं. यह वही समय है जब देशभर में दलित बहुजन अपने स्वाभिमान और दावेदारी का दावा पेश कर रहे हैं.
कविता संग्रह की पहली ही कविता व्यंग्य और यथार्थ को इतनी खूबसूरती से व्यक्त करती है कि सत्ता द्वारा सांस्कृतिक वर्चस्व के प्रतीकों, धर्मों और परम्पराओं का गुणगान और उनकी पुनः स्थापना का उद्देश्य सामने आजाता है.
मन प्रफुल्लित
तन प्रफुल्लित, और गदगद
आ रहे हैं, सुखद अच्छे दिन हमारे
हवा में बहने लगे सुविचार जिनसे
यह सदन फिर से
सवांरा जायेगा
और पौराणिक कथाओं के मिथक को
झाड़कर फिर से
निखारा जायेगा
पूर्व विस्मृत पूजा घरों को
फिर मिलेंगे मौन सत्ता के सहारे
हर दिशा में पैर फैलाए गए हैं
हर दबा कूड़ा
कुरेदा जायेगा
उत्खनन की हर नई तकनीक लेकर
श्रेष्ठता का दंभ
फिर गहराएगा
गन्दगी अपनी बहाकर मुग्ध हैं हम
अब मिलेंगे स्वच्छ गंगा के किनारे
बहस होगी, शोध होंगे पुरातन पर
विषय जो भी आज
सम्बंधित नहीं हैं
यह महाऔदार्य है सिंहासनों का
जो अभी तक साँस
प्रतिबंधित नहीं हैं
अब धरा पर ही नहीं आकाश में भी
एक रंग की रोशनी देंगे सितारे.
पूर्व विस्मृत हो गए पूजा घरों को फिर मिलेंगे मौन सत्ता के सहारे. लेकिन सच्चाई यह है कि सत्ता इससे आगे पहुँच चुकी है. अब वह मौन समर्थन की जगह खुलेआम साधु सन्यासियों को सत्ता सौंप रही है. जो वर्चस्व की संस्कृति को राजकीय वैधता दिलाने का काम कर रहे हैं. यह हमारे उदार मुल्यों को नष्ट करने के अलावा कुछ नहीं है. अब सत्ता वैज्ञानिक तकनिकी को भी इसी काम में इस्तेमाल कर रही है. इतना ही नहीं बल्कि इस तकनिकी का इस्तेमाल वह श्रेष्ठता के दंभ को बढ़ाने में भी कर रही है. कवि की नजर इसकी तरफ भी है. जब वह कहता है कि उत्खनन की हर नयी तकनीक लेकर श्रेष्ठता का दंभ फिर गहराएगा. श्रेष्ठता का यह दंभ इस स्तर तक पहुँच गया है कि अफवाहे फैलाकर मुसलमानों को , अदालितों को और महिलाओं को सरेआम पीटा जा रहा है और हत्या की जा रही है. सत्ता के लोक लुभावने वादों पर भी कवि कहता है ‘राजा जी अपने वादों से कितने दिन भरमायेंगे/ गंगू पूछ रहा है भैया कब अच्छे दिन आयेंगे. कविता कोई बनावटी रूप अख्तियार नहीं करती बल्कि सहज और सरल शब्दों में सहज और सरल गंगू के प्रश्नों को अपना विषय बनाती है. कवि को यह भी पता है कि गंगू केवल प्रश्न नहीं कर रहा है बल्कि लड़ भी रहा है तभी अश्वमेध का घोड़ा थककर हांफ रहा है और राजा सिंहासन पर बैठकर भी अन्दर अन्दर कांप रहा है. यह जनप्रतिरोध ही है जो राजा को कंपा रहा है.
राजा जी अपने वादों से
कितने दिन भरमायेंगे
गंगू पूछ रहा है, भैया
कब अच्छे दिन आयेंगे
अश्वमेध का घोड़ा थककर
लगता है आब हांफ रहा
राजा बैठा सिंहासन पर
अन्दर-अन्दर कांप रहा
चाटुकार झूठे शब्दों से
यों कबतक बहलायेंगे
दूर गरीबी कब तक होगी
कब खुशहाली आयेगी
काला धन कब तक आयेगा
कब बदहाली जायेगी
काला धन लाने वाले
कब तक आँखें मिचकायेंगे
जहाँ गन्दगी नहीं, वहां पर ही
अभियान सफ़ाई का
झाड़ू ले फोटो खिंचवाने की
बस हाथापाई का
राजा तो मन की कह देते
मेरी कब सुन पायेंगे
सूट नौलखा पहन
दिखाते हैं दुनिया को राजा जी
पूंजी के स्वागत में झुककर
खोल रहे दरवाजा जी
जख्म हमारे अभी हरे हैं
कब तक नमक लगायेंगे
खाता तो खुल गया बैंक में
पैसा कब तक आयेगा
भाषण के लम्बे वादों को
पूरा कौन करायेगा
अब तो जुमला बता रहे
आगे कितना बहकायेंगे…
धार्मिक भक्ति के सन्दर्भ में कवि मध्यकाल के कवियों की दृष्टि को आस्था का सन्दर्भ बिन्दु बनाता है और मन की सच्चाई पर जोर देता है. यह केवल धार्मिक आस्था की स्वतंत्रता की मांग भर नहीं है बल्कि पाखंडी सत्ता संचालित राजनीतिक धार्मिक आस्था का प्रतिकार भी है. ‘भक्ति सदा मन प्राण विषय है नहीं किसी की कोई बपौती’ कहकर कवि इसी बात को पुष्ट कर रहा है. सत्ता द्वारा सच्चाई की तोड़मरोड़ पर कवि कहता है ‘हर सच्चाई को जरा तोड़ो मरोड़ो जो कहीं विपरीत होती जा रही है…’ दलित कविता इस बात का उद्घोष अपने आरम्भ से ही करती आ रही है कि उसमे जरुरी सामाजिक मसले ही केंद्र में हैं. वहां थोथी सौन्दर्यपरकता भर नहीं है इसीलिए कवि को कहना पड़ता है कि – मैं रिझाने के लिए
तुमको लिखूं जो
हैं नहीं वे शब्द
मेरे कोष में भी
दोपहर की
चिलचिलाती धुप में जो
खेत क्यारी में
निराई कर रहा है
खोदता है घास-चारा
मेंड़ पर से
बांध गठ्ठर ठोस
सिर पर धर रहा है
है वही नायक
समर्पित चेतना का
मैं उसी को गा रहा
उद्घोष में भी…
कवि की नजर जनतंत्र में फैल रही अराजकता पर भी है. समसामयिक राजनीति की प्रवृत्तियों को उद्घाटित करती उनकी कविता ‘ आ गया अंधी सुरंगों से’ संवैधानिक मूल्यों को नष्ट किए जाने को रेखांकित करती है.
आ गया अंधी सुरंगों से निकलकर
देश अब जनतंत्र को सहला रहा है
जल रहे जनतंत्र की
ज्वाला प्रबल हो
किस अराजक मोड़ पर ठहरी हुई है
और आदमकद हुए
षड़यंत्र बढ़ाकर
छल-प्रपंचों की पहुँच गहरी हुई है
एकतरफा घोषणाओं का चलन अब
फिर किसी प्राचीर से गहरा रहा है
राजपथ की झांकियों में
सज रहा है
एक विकसित राष्ट्र का वैभव प्रदर्शन
और संसद से सड़क तक
हो रहा है
संविधानिक पर्व पर निर्लज्ज नर्तन…
दलित कविता की एक खास विशेषता यह रही है कि उसमे समाज-सत्ता की समीक्षा और उसकी प्रखर आलोचना होती रही है. बहुत कम कविताएँ राजसत्ता की सीधी आलोचना करती रही हैं . लेकिन जगदीश पंजक जी की कविताएँ अपने समय की हर तरह की सत्ता से टकराती हैं और खासतौर पर राजसत्ता को अपाना केंद्र बिंदु बनाती हैं. ज्ञान और सूचना के उत्पादन केन्द्रों पर भी उनकी नजर बड़े ही सूक्ष्म ढंग से जाती है और वे उन केन्द्रों द्वारा फैलाए जा रहे झूठ पर आधारित ज्ञान और सूचना की पहचान करते हैं. वह कहते हैं-
सत्य कितना पारदर्शी
रह गया है
इस समय में
छद्म की शब्दावली
बढ़ती गयी है
क्रूर भय में
झूठ दोहराया गया
विज्ञापनों में
जो निरंतर
सत्य को, विश्वास को
हर पल, निगलता जा रहा.


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