भारतीय चित्रकला और ‘कथा’ : 4

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( एक लम्बे समय से भारतीय चित्रकला में जो कुछ हुआ वह ‘कथाओं’ के ‘चित्रण’ या इलस्ट्रेशन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था.इसलिए यहाँ ‘सृजन’ से ज्यादा कौशल को महत्व दिया जाता रहा . इसमें कोई  संदेह नहीं कि एक ओर जहाँ कला में ‘कौशल’ या ‘नैपुण्य’  का महत्व सामंतवादी व्यवस्था में बढ़ता है वहीं दूसरी ओर कला में ‘कथा’ के महत्व को सर्वोपरि बनाये रखना , धर्मसत्ता की एक बुनियादी जरूरत होती है. अब तक के ‘तस्वीरनामा’ में हर सप्ताह हम आप किसी चित्र-विशेष  के बारे में जानते आये है. इस सप्ताह से शुरू होने वाली ‘तस्वीरनामा ‘ की श्रृंखला में पाँच लेखों के जरिये अशोक भौमिक ‘भारतीय’ चित्र कला पर कुछ जरूरी सवाल उठा रहें है जिस पर हम, पाठकों से उनकी राय और एक सार्थक बहस की भी उम्मीद करेंगे. यहाँ भारतीय चित्र कला में ‘ कथा ’  का  चौथा लेख प्रस्तुत है. सं. )

देवों और राजाओं की कथा

देवताओं की अवधारणा निस्संदेह बहुत प्राचीन है पर भारत वर्ष में इनकी इतनी बड़ी संख्या में उपस्थिति के कारण  भारतीय चित्रकला का एक बहुत बड़ा हिस्सा लम्बे समय तक इन्हीं देवी-देवताओं ‘चित्रणों’ से भरा रहा है। संचार माध्यमों के विकास के साथ साथ विभिन्न स्थापित ‘लीला कथाओं’ के चित्रणों के अलावा भी इसमें न केवल नयी नयी कथाएँ ही जुड़ती रहीं, नए नए देवताओं का जन्म भी हुआ। स्वर्ग के रहने वाले इस देव-कुटुंब के सामानांतर धरती पर अलौकिक देव-पुरुषों के संख्या निरंतर बढ़ती गयी ।

‘कथा’ के इस कारोबार में पिछली सदी से सिनेमा का जुड़ना एक बड़ी घटना थी , जिसके चलते इन नए देवताओं को त्वरित और व्यापक प्रचार के साथ साथ एक खास तरह की विश्वसनीयता भी मिली। 1960 में ‘कथाओं’ के ज़रिये अस्तित्व में आयीं एक ‘माता’ को उत्तर भारत का एक छोटा सा इलाका ही जानता था, पर 1975 में उन पर बनी फिल्म के माध्यम से उन्हें बेहद कम समय में अखिल भारतीय मान्यता मिली और आज वह एक हिन्दू देवता के रूप न केवल सुप्रतिष्ठित ही है बल्कि कई स्थापित देवी देवताओं से ज्यादा लोकप्रिय हो चुकी है।

इस चर्चा से हम ‘प्रतिमा निर्माण’ में कथा की भूमिका को सहज ही समझ सकते है। आरंभिक स्तर पर, आम तौर से किसी कथा का वाचिक रूप सामने आता है, जिसके माध्यम से , स्वाभाविक रूप से सीमित प्रसार ही संभव होता है। इस कथा का लिखित रूप इसे ब्यापक विस्तार तो देता है जिसके जरिये एक साक्षर के माध्यम से सैकड़ों निरक्षर जन ‘कथा’ को सुनते हुए कथा से परिचित होते हैं , पर इसका सबसे प्रभावशाली स्तर ,परिचित कथा के चाक्षुष अनुभव से ही हो पाता है , जो युगों से चित्रों में ‘कथा’ के चित्रण से ही संभव होता रहा है। यहाँ चित्रकार की भूमिका कम महत्वपूर्ण नहीं होती क्योंकि कथा चित्रण के जरिये किसी प्रतिमा निर्माण में , चित्रकार का अपना अनुभव, उसकी प्रांतीयता और कल्पनाशीलता का प्रभाव स्वाभाविक रूप से पड़ता है।

यहाँ एक दिलचस्प उदाहरण के तौर पर उन्नीसवीं सदी में राजा रवि वर्मा द्वारा बनाये गये चित्र , ‘काशी विश्वनाथ’ को हम देख सकते हैं । उत्तरी भारत में प्रचलित शिव मूर्ति ( चित्र 1) से भिन्न राजा रवि वर्मा ने काशी विश्वनाथ शिव को बनाते समय अपनी निजी अवधारणाओं का सहारा लिया था।  राजा रवि वर्मा के काशी विश्वनाथ (चित्र 2 ) में रवि वर्मा ने उन्हें बारह ज्योतिर्लिंगों में एक के रूप में दिखाने की कोशिश में शिव के चित्रण में , बनारस के किसी पहलवान-पण्डे के चेहरे को  शायद आधार बनाया था। इस चित्र में शिव की जटा से गंगा के उत्स की कल्पना भी यहाँ चित्रकार ने कुछ अलग ढंग से किया है , जो गोमुख से न निकल कर एक स्त्री के मुँह से निकल रही है। उनकी जटाओं में चन्द्रमा भी अनुपस्थित है। पर इसमें कोई संदेह नहीं कि इस चित्र ने दक्षिण भारत की जनता के बीच ‘काशी विश्वनाथ’ को परिचित कराने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

शिव कथा के अपनी अपनी व्याख्याओं के चलते देश के विभिन्न प्रांतों में इसके चित्रण में दिलचस्प अंतर देखने लायक है।  इस सन्दर्भ मे कोलकाता के चोरबागान  प्रेस द्वारा प्रकाशित उनके एक आरंभिक चित्र में ( चित्र 3) शिव को एक दूसरे ही रूप में देख पाते हैं ( जो इसाई कथाओं के चित्रों से प्रभावित भी लगते हैं)।

चित्र में इस प्रकार के अंतरों से यह तो समझ में आता है कि किसी स्वार्थ विशेष चलते अपने मन मुताबिक़ गढ़ी हुई किसी कथा को चित्र के जरिये व्यापक जनता के बीच एक  विश्वसनीयता या प्रमाणिकता दी जा सकती है। इस तरह से सत्ता ने स्थापित कथाओं को नया रूप देने के लिए लिए और कभी-कभी झूठ को स्थापित करने के लिए ‘चित्रों’ का, खूब सहारा लिया है।

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किसी मिथ्या ‘कथा’ को गढ़ कर उसके सहारे राजपाट चलाने की परंपरा, वैसे तो पुरानी है, पर हमें इसका एक प्राचीन और महत्वपूर्ण उदाहरण राजा ‘हम्मूराबी-संहिता’ में दिखाई देता है। हम्मूराबी (1810 से 1750 ईसा पूर्व) प्रथम बेबिलोनियाई राजवंश का छठा राजा था, जिसे इतिहास में उसकी ‘संहिता’ के लिए जाना जाता हैं। हम्मूराबी ने अपने बनाये हुए नियम -कानूनों को एक ‘संहिता’ के माध्यम से ,जनता के बीच निर्विवाद स्वीकार करवाने के लिए शातिराना ढंग से स्थापित देवकथाओं का सहारा लिया था।  सूर्य देव (तत्कालीन बेबीलोन में ‘शमाश’ के नाम से पूजित) के प्रति जनता की भीति और भक्ति का सहारा लेकर हम्मूराबी ने यह प्रचारित करवाया कि  वह स्वयं, सूर्य का ही अवतार था।  उसने पत्थर पर उकेरे हुए इस संहिता के सबसे ऊपर एक मूर्ति  बनवाई थी( चित्र 4) जिसमें सूर्य देव द्वारा हम्मूराबी को संहिता देते हुए दिखाया गया था।

चित्र 4

कहना न होगा कि  ‘कथा’ के ऐसे चित्रण में जहाँ राजा का देवता से सीधे संवाद हो रहा हो , उसकी विश्वसनीयता असंदिग्ध बन जाती है। बाद में राजा हम्मूराबी अपने को ही देवता मानने लगे थे और जनता से उन्हें पूजे जाने की उम्मीद भी करते थे।

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सदियों से देवताओं और राजाओं के बीच के रिश्तें काफी प्रगाढ़ रहें हैं। कई ऐसे राजा हुए, जिनका जन्म तो आम जनों जैसे ही हुआ पर कालांतर में वे राजा से भगवान बन गए। ‘राजा’ से ‘भगवान’ में रूपांतरण की इस प्रक्रिया में प्रायः जनता के बीच तरह तरह की कथाओं के प्रचार और चित्रों के माध्यम से उनका चित्रण बेहद प्रभावशाली होता रहा है।  एक गृहत्यागी राजा के (जो बाद में भगवान बने) जन्म के पूर्व उसकी माँ ने सपने में सफ़ेद हाथी देखा था,  इसी ‘अलौकिक’ विषय पर विश्व भर में असंख्य मूर्तियाँ मिलती हैं ! इसी प्रकार असंख्य मूर्तियाँ उनके  गृह त्यागने की घटना पर भी मिलती है। देवता के रूप में तो उनकी इतनी मूर्तियाँ मिलती है कि विश्व मूर्तिकला के इतिहास का एक बड़ा काल खंड उन्हीं की मूर्तियों का ही है। उनके जीवन की विभिन्न घटनाओं से लेकर उनके महाप्रयाण की इन मूर्तियों से कथा-चित्रण के महत्व को हम बेहतर समझ सकते हैं।

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यहाँ , हम आमजनों के मन मस्तिष्क में ईश्वर के उस स्वरुप की चर्चा करेंगे जिसे उन्होंने कथाओं और कथा चित्रणों के माध्यम से जाना । भारत में  मूर्तियों का इतिहास चित्रों से कहीं ज्यादा पुराना रहा है।  पर विज्ञान और तकनीक के विकास के साथ साथ रंगीन छपाई के संभव होने पर उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में बड़ी संख्या में छापा-चित्रों (प्रिंट्स) को बनाना संभव हो सका। इसके पहले लोग, केवल मंदिरों में जाकर ही देवताओं को जिन मूर्तियों में देखते थे, उन्हीं देवी-देवताओं को कहीं ज्यादा आकर्षक रंगों में, जीवंत से लगने वाले चित्रों के माध्यम से अपने घरों की दीवारों पर टँगें देख पा रहे थे। यह एक बड़ा अंतर था, जिसने ‘कथाओं’ के  चित्रण को मूर्तियों से ज्यादा लोकप्रिय बनाया और घर घर में ‘मंदिरों’ का बनना संभव हुआ। पर यहाँ एक बात पर हमें अवश्य ध्यान देना चाहिए की सभी चित्र , आमतौर पर प्रचलित मूर्तियों के अनुरूप ही बनाये गए थे। इन मूर्तियों और इनका अनुकरण कर बनाये गए चित्रों में देवताओं को सामान्यतः

(1) सिंहासन पर आसीन दिखाया गया है

(2)  उनके सर पर मुकुट हैं

(3) वे अलंकारों से सज्जित हैं

(4) उनके हाथों में अस्त्र है (देखें चित्र 5) ।

 

चित्र 5

देवताओं के इन गुणों को आधार मान कर हज़ारो सालों से शासकों ने अपने को इनके अनुरूप ही जनता के सामने प्रस्तुत किया। ऐसे ख़ास वेश धारण कर उन्होंने बिना किसी विशेष प्रयास के , देवताओं और उनके बीच की दूरी को कम कर जनता में भीति और भक्ति का संचार करने में सफल भी रहे । हाल के राजे रजवाड़ों ने भी इसकी महत्व को खूब समझा , उदाहरण के लिए यहाँ 1819 में अवध के शासक (चित्र 6) और 1887 के पन्ना राज के शासक (चित्र 7) के चित्रों को देखा जा सकता हैं।

चित्र 6

इस राज वेशभूषा की परंपरा का आधार और उद्देश्य , वास्तव में देवताओं की भूमिका में राजाओं का ‘चित्रण’ करने का ही रहा है ।  कहना न होगा कि यह परंपरा आज भी जारी है और सिंहासन, मुकुट, पगड़ी आदि भारतीय ‘लोकतंत्र’ में आधी शताब्दी बाद भी प्रभावी ढंग से अस्तित्व में है।

चित्र 7

यहाँ एक दूसरे उदाहरण से, चित्रकला के माध्यम से निरक्षर जनता के बीच किसी काल्पनिक ‘कथा’ को स्थापित करने की राजसत्ता की साजिश को यहाँ बेहतर समझा जा सकता है। यह चित्र (चित्र-8) सत्रहवीं सदी के आरंभिक काल में शाहजहां के दरबारी चित्रकार अबुल हसन द्वारा बनाया गया एक ऐसा चित्र है, जहाँ मुगलकालीन चित्रों की सपाटता भी हैं और साथ ही युरोपीय चित्रकला के प्रभाव भी है । चित्र में लोगों के शरीर और उनकी वेशभूषा की संरचना सपाट न होकर पश्चिम के यथार्थवादी संरचना के करीब लगते हैं।

 

चित्र 8

पूरे चित्र की संरचना में एक बिखराव के बावजूद, चित्र में क्षितिज का गोलाकार होना चित्र का एक निश्चय ही एक महत्वपूर्ण पक्ष है।  पर यदि हम इस चित्र को  गौर से देखें तो हमें चार स्वतंत्र हिस्से दिखते हैं ( देखें चित्र 9,10, 11 और 12 ) जो अपनी संरचना में चार स्वयंसम्पूर्ण संरचनाएँ होने के साथ साथ एक दुसरे से विच्छिन्न लगते है। चित्र का यह पक्ष चित्र को कमज़ोर बनता है।

अब हम चित्र की ‘कथा’ को समझेंगें, जिसे एक निश्चित उद्देश्य से इस चित्र रचना का आधार बनाया गया है।

  1. ‘ शाहजहां’ (अर्थात पूरे विश्व का सम्राट) शब्द को स्थापित करने के लिए यहाँ बादशाह को पृथ्वी (एक ग्लोब) पर खड़ा दिखाया गया है। इस ग्लोब के अंदर, बादशाह के कठोर शासन के प्रतीक के रूप में शेर और बकरी को एक साथ दिखाया गया है।
  2. चित्र में इस ग्लोब के नीचे एक मछली है और उस मछली पर एक मनुष्य बैठा है।   यह चित्र को जरूरत से ज्यादा जटिल बनाने का प्रयास सा लगता है , क्योंकि व्याख्याकारों का मानना है कि, मछली यहाँ मत्स्य अवतार का प्रतीक है और उस पर महा-प्रलय के बाद आदि पुरुष मनु बैठे है। इस प्रकार शाहजहाँ केवल एक भूखंड के यह विश्व के ही बादशाह नहीं हैं बल्कि समूचे सृष्टि के सम्राट हैं।
  3. शाहजहाँ कोई प्रजा द्वारा बनाया गया बादशाह नहीं है, बल्कि वह ईश्वर द्वारा बनाया गया बादशाह है , इस बात को स्थापित करने के लिए चित्र में चार फ़रिश्ते भी हैं। उनमें दो तो बादशाह के लिए ईश्वरदत्त ताज लिये दिखाई दे रहे हैं।

4 . बादशाह को शक्ति भी ईश्वर द्वारा दिया गया है , इस बात को समझाने के लिए एक फरिश्ता शाहजहाँ को तीर मुहैय्या करा रहा है।  बादशाह उस तीर से महामारी जैसे दानव का विनाश कर रहे हैं।

5 . इसके अलावा चित्र में किसी पुरखे की समाधि भी दिख रही है जिसका सम्बन्ध भी सीधे ईश्वर से है, क्योंकि चित्र के बाँये कोने में स्थित चौथे फ़रिश्ते ने एक माला नुमा कुछ लटकाया हुआ है, जिससे उसने समाधि और स्वर्ग के बीच रिश्ता कायम कर रखा है।

युगों -युगों से ,ऐसी ‘कथाओं ‘ के चित्रणों के माध्यम से विशाल निरक्षर और अशिक्षित जनता पर राज और धर्म की मिलीजुली सत्ता ने इतनी आसानी से राज किया है। यहाँ गौरतलब है कि, इस साजिश में चित्रकला की सबसे बड़ी भूमिका रही है।  इन्हीं चित्रों के जरिये असंख्य धार्मिक कथाएँ गढ़ी गयीं , प्रजा पर राजाओं ने शासन किया और इतिहास को अपने स्वार्थ में लिखवाया और चित्रित करा कर उसे एक प्रमाणिकता भी दी।

चित्रकला के सन्दर्भ में ‘कथा’ का महत्व केवल भारत तक ही सीमित है, ऐसा कहना गलत होगा। पर जिन देशों के लोगों के चिंतन में वैज्ञानिक, तार्किक और आधुनिक विचारों को विस्तार मिला है वहाँ ऐसे चित्र अपनी उपयोगिता खो चुके हैं और अब उन देशों में , उन्हें केवल संग्रहालयों में ही देखा जा सकता है।  पर जहाँ स्थितियाँ नहीं बदल सकी हैं वहाँ आज भी लोग चित्रकला को ‘कथाओं’ के वाहक समझते हुए चित्रों को देखने के बजाय सुनना या पढ़ना चाहते हैं। स्वाभाविक रूप से यह , राज सत्ता और धर्म सत्ता के लिए सबसे अनुकूल स्थिति है।

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