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भारतीय संवैधानिक अदालतें और धर्मनिरपेक्षता (भाग-2)

इरफ़ान इंजीनियर


(पिछले अंक से जारी)

 

पिछले अंक में हमने यह चर्चा की कि किस प्रकार, संविधान का अनुच्छेद 26 जहां विभिन्न धार्मिक समुदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंध करने और परोपकार व धार्मिक लक्ष्यों संस्थाओं की स्थापना करने और उनका संचालन करने का अधिकार देता है, वहीं अनुच्छेद 25, देश के प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, उसका आचरण करने और उसका प्रचार करने का हक प्रदान करता है।

सवाल यह है कि अगर किसी धर्म या उसके पंथ के सदस्य, अपने धर्म की किसी परंपरा या प्रथा का पालन करने के विरूद्ध हों तो उनके इस अधिकार को अधिक तरजीह दी जाएगी या फिर विभिन्न धर्मों और उनके पंथों के धार्मिक मामलों का प्रबंध करने और धार्मिक संस्थाओं की स्थापना करने के अधिकार को।

कई बार व्यक्तियों के अधिकारों और उनके पंथ या धर्म के अधिकारों के बीच परस्पर टकराव या विरोधाभास हो सकता है।

पिछले अंक में हमने यह मुद्दा भी उठाया कि स्वाधीनता के बाद से, भारतीय राज्य ने कई कानून बनाकर सामाजिक सुधार की दिशा में कदम बढ़ाए, यद्यपि यह प्रक्रिया अत्यंत धीमी थी। सार्वजनिक प्रकृति के सभी हिन्दू आराधना स्थलों को हिन्दुओं के सभी वर्गों के लिए खोला गया, धार्मिक संस्थाओं की लौकिक और आर्थिक गतिविधियों का विनियमन किया गया और पारिवारिक कानूनों में सुधार किए गए।

इस अंक में हम इस विषय पर चर्चा करेंगे कि किस प्रकार भारतीय न्यायालयों ने व्यक्तियों के अधिकार और धर्मों और उनके पंथों के अधिकारों के बीच समन्वय और संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया।

भारतीय संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता को दो भागों में बांटता है। पहली है, व्यक्तियों की अपने धर्म को मानने, उसका आचरण करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता और दूसरी है, धर्मों और उनके पंथों का अपनी संस्थाएं स्थापित करने और उनका प्रबंधन करने का अधिकार।

धार्मिक स्वतंत्रता के लिए ये दोनों ही ज़रूरी और अपरिहार्य हैं। परंतु दूसरी श्रेणी के मामले में अधिक सावधानी और सतर्कता बरते जाने की ज़रूरत है।
धार्मिक पंथों को उनके धार्मिक मामलों में कई तरह की स्वतंत्रताएं और अधिकार दिए गए हैं। परंतु समस्या यह है कि इनके पालन के लिए यह ज़रूरी है कि व्यक्तियों की धार्मिक स्वतंत्रता पर कुछ अंकुश लगाए जाएं।

धार्मिक समुदाय यह अपेक्षा करते हैं कि उन्हें यह तय करने का अधिकार हो कि उनके द्वारा स्थापित और प्रबंधित संस्थाओं में आने वाले व्यक्ति किस तरह की परंपराओं और रीति-रिवाजों का पालन करें, किस तरह का व्यवहार करें और उनकी वेषभूषा किस प्रकार की हो। जाहिर है कि इससे व्यक्तियों की स्वतंत्रता कुछ हद तक प्रभावित होगी। अपनी परंपराओं, रीति-रिवाजों और नियमों में किसी भी तरह के परिवर्तन का प्रतिरोध कर, धर्म और उनके पंथ ऐसी संस्थाएं निर्मित कर सकते हैं, जिनमें प्रवेश का अधिकार उनके हाथों में हो।

धर्मों या उनके पंथों द्वारा संचालित संस्थाएं अपने नियमों, परंपराओं और रीति-रिवाजों में परिवर्तन कर सकते हैं और करते भी हैं, परंतु वे ऐसा करें या न करें, यह पूर्णतः संबंधित समुदाय या उसके नेतृत्व की मर्जी पर निर्भर करता है। उदाहरणार्थ, कुछ हिन्दू धर्मस्थल ई-आरती को मान्यता देने लगे हैं और इलेक्ट्रानिक ट्रांसफर द्वारा दान और चढ़ावा स्वीकार करने लगे हैं।

निःसंदेह व्यक्तिओं को यह अधिकार है कि वे इस तरह की संस्थाओं में प्रवेश आदि से संबंधित नियमों का विरोध करें और उन्हें चुनौती दें। उनका यह विरोध तर्क पर आधारित हो सकता है और इस पर भी कि सभी संस्थाओं को समय के साथ बदलना चाहिए।

न्यायपालिका का यह प्रयास रहा है कि इन दोनों अनुच्छेदों की इस प्रकार से व्याख्या की जाए कि दोनों के बीच संतुलन और समन्वय बना रहे।

अदालतों ने विभिन्न मूल अधिकारों को अलग-अलग खंडों में विभाजित कर उनकी अलग-अलग व्याख्या करने से परहेज किया है। सभी मूल अधिकार संविधान को ठीक तरह से लागू किए जाने के लिए ज़रूरी हैं और वे एक-दूसरे के पूरक हैं।

रूस्तम कासवजी कूपर विरूद्ध भारत सरकार प्रकरण में 11 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहाः
‘‘अब यह एक सुविचारित, स्पष्ट और सुस्थापित मान्यता है कि विभिन्न मूल अधिकारों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता।

एक अधिकार दूसरे अधिकार का पूरक होता है और उसे मजबूती प्रदान करता है। राज्य द्वारा मनमानी किए जाने के विरूद्ध ये सभी अधिकार दिए गए हैं।

जो अधिकार और स्वतंत्रताएं हमें प्राप्त हैं उन्हे टुकड़ों मे बांटकर अलग-अलग खंडों में विभाजित नहीं किया जा सकता। हर व्यक्ति कई तरह की स्वतंत्रताओं का उपभोग करता है और उसके द्वारा किया गया एक कार्य भी अनेक मूल अधिकारों पर आधारित हो सकता है।

अतः यह कहना गलत नहीं होगा कि सभी मूल अधिकारों के बीच एक तरह का समन्वय है। ये सभी नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बने हैं।”

सभी मूल अधिकारों को एक साथ देखने के लिए यह ज़रूरी है कि धार्मिक समुदायों के धार्मिक संस्थाएं स्थापित करने और उनका प्रबंधन करने के अधिकार (अनुच्छेद 26) को व्यक्तियों के अपने धर्म को मानने और उसका आचरण करने के अधिकार (अनुच्छेद 25) के ऊपर नहीं रखा जा सकता।

इस तरह की किसी भी व्याख्या को खारिज करना ही होगा। सायराबाने मामले, जिसमें तीन तलाक को अवैध ठहराया गया था, पर विचार करते समय न्यायालय ने आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के इस तर्क को कोई अहमियत नहीं दी कि इस तरह का तलाक इसलिए वैध है क्योंकि यह शरिया कानून का हिस्सा है।

ज़रूरी धार्मिक आचरण
संविधान का अनुच्छेद 25(2)(ख), राज्य को यह अधिकार देता है कि वह समाज के कल्याण के लिए कानून बनाए और धार्मिक स्वतंत्रता, राज्य के इस अधिकार के अधीन है। स्पष्टतः, भारत में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह नहीं है कि धार्मिक समुदाय, धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी दकियानूसी, सड़ी-गली या बर्बर प्रथा को बनाए रखने का दावा कर सकें।

सती प्रथा का उन्मूलन करने वाले कानून को राज्य के इसी अधिकार की सुरक्षा प्राप्त है और इसी कारण ऐसे निर्णयों को भी चुनौती नहीं दी जा सकती, जो लैंगिक न्याय के लिए पारिवारिक कानूनों में सुधार करते हैं। परंतु समाज कल्याण के नाम पर राज्य, धार्मिक परंपराओं और आस्थाओं में मनमाना हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इसी लक्ष्य से अदालतों ने किसी धर्म के ज़रूरी आचरणों और तत्वों के सिद्धांत को प्रतिपादित किया।

किसी धर्म के ज़रूरी आचरणों और तत्वों से अर्थ है वे आचरण और तत्व जो उसकी मूल आस्थाओं पर आधारित हैं। मूल आस्थाएं वे हैं, जिनके अभाव में कोई धर्म, धर्म नहीं रह जाएगा।
उच्चतम न्यायालय ने शिरूर मठ प्रकरण में पहली बार यह कहा कि किसी धर्म का ज़रूरी और अविभाज्य हिस्सा क्या है, इसका निर्धारण उस धर्म के सिद्धांतों के आधार पर किया जा सकता है।

अदालत ने कहा कि ‘‘किसी धर्म का ज़रूरी हिस्सा क्या है यह उस धर्म के मूल सिद्धांतों से निर्धारित होगा।‘‘

धार्मिक आचरण में अक्सर ऐसे कई तत्व शामिल हो जाते हैं, जो अंधविश्वास पर आधारित होते हैं या संबंधित धर्म के मूल विश्वासों या सिद्धांतों से जिनका कोई लेनादेना नहीं होता। जब तक कि इस तरह की परंपराओं को अदालतें संबंधित धर्म का अविभाज्य और अपरिहार्य हिस्सा निरूपित न करें, तब तक ऐसी परंपराओं और रीति-रिवाजों को अदालतों में चुनौती देने के अधिकार से व्यक्तियों को वंचित नहीं किया जा सकता।

एन आदित्थन विरूद्ध त्रावणकोर देवासम बोर्ड व अन्य प्रकरण में अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने किसी भी धर्म के ज़रूरी आचरण और तत्वों को निम्न शब्दों में परिभाषित किया हैः
‘कानूनी स्थिति यह है कि अनुच्छेद 25 और 26, ऐसे धार्मिक कर्मकांडों, उत्सवों और आराधना के तरीकों की रक्षा करने का वचन देते हैं जो किसी धर्म का अविभाज्य हिस्सा हैं। कौन-सी परंपरा, रीति-रिवाज, कर्मकांड या धार्मिक कृत्य किसी धर्म का ज़रूरी और अविभाज्य हिस्सा है, इसका निर्णय अदालतें संबंधित धर्मों के सिद्धांतों के आधार पर करेंगी।”

अनुच्छेद 26 के अंतर्गत, धार्मिक संस्थाएं स्थापित करने और उनका प्रबंधन करने का अधिकार विभिन्न धर्मों और उनके पंथों को है। परंतु सवाल यह है कि धार्मिक पंथ क्या है? सबरीमाला के पुजारी यह दावा करते हैं कि वे भी एक धार्मिक पंथ हैं और इसलिए संविधान के अनुच्छेद 26 के अंतर्गत उन्हें अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने और अपनी धार्मिक संस्थाओं का संचालन करने का पूर्ण अधिकार है।

उच्चतम न्यायालय ने एसपी मित्तल और शिरूर प्रकरणों में ‘धार्मिक समुदाय‘ शब्द को निम्नानुसार परिभाषित किया हैः
‘‘‘संविधान के अनुच्छेद 26 में प्रयुक्त शब्द धार्मिक समुदाय का अर्थ धर्म के अर्थ के संदर्भ में ही समझा जाना चाहिए। अतः किसी सम्प्रदाय के लिए धार्मिक सम्प्रदाय कहलाने हेतु निम्न शर्तों का पालन करना ज़रूरी होगाः

1. वह ऐसे व्यक्तियों का समूह होना चाहिए, जो एक से सिद्धांत या विश्वासों में आस्था रखते हैं और जिन्हें यह विश्वास है कि ये आस्थाएं और सिद्धांत उनकी आध्यात्मिक ज़रूरतों को पूर्ण करने के लिए अनिवार्य और ज़रूरी हैं। अर्थात उनकी एक सी आस्थाएं होनी चाहिए।
2. उनका एक संगठन होना चाहिए, व शि
3 उन्हें एक विशिष्ट नाम से जाना जाना चाहिए।

इन्हीं मानकों के आधार पर, उच्चतम न्यायालय ने स्वामीनारायण सम्प्रदाय, आनंदमार्ग आदि सहित विभिन्न मंदिरों और उपपंथों को धार्मिक सम्प्रदाय मानने से इंकार कर दिया।

इसका अर्थ यह है कि इन संस्थाओं का प्रबंधन करने वाले व्यक्तियों को यह अधिकार नहीं है कि वे संविधान के आधार पर यह दावा करें कि उन्हें अपनी धार्मिक संस्थाओं का प्रबंधन करने का पूर्ण अधिकार है और राज्य, कानून बनाकर उनके इस अधिकार पर अतिक्रमण नहीं कर सकता।
भारत का धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक ढांचा इस प्रकार का है कि राज्य को न केवल विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के बीच विवाद की स्थिति में निष्पक्षतापूर्वक विवाद का निराकरण करना चाहिए वरन यह भी है कि उसे समानता और सार्वजनिक प्रकृति के सभी हिन्दू धर्मस्थलों में हिन्दुओं के सभी वर्गों का प्रवेश सुनिश्चितत करने हेतु समय-समय पर सुधार लाने की दिशा में भी प्रयास करने चाहिए। समाज की भलाई के लिए किए जाने वाले इन प्रयासों की सफलता के लिए यह ज़रूरी है कि राज्य, धर्म से जुड़ी दुनियावी गतिविधियों, जिनमें आर्थिक व राजनैतिक गतिविधियां शामिल हैं, में हस्तक्षेप करे और उनमें सुधार लाए। राज्य ऐसी धार्मिक गतिविधियों का नियमन नहीं कर सकता और ना ही उन पर प्रतिबंध लगा सकता है, जो किसी धर्म के आचरण का ज़रूरी और अविभाज्य हिस्सा हैं।

राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि व्यक्तियों के उनके धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने के मूल अधिकार की रक्षा हो। साथ ही राज्य यह भी सुनिश्चित करेगा कि धार्मिक सम्प्रदायों को यह अधिकार हो कि वे अपनी संस्थाएं स्थापित करें और अपने धार्मिक मसलों का प्रबंधन करें।
दूसरे मामले में संविधान कहता है कि राज्य को धीरे धीरे किसी धार्मिक सम्प्रदाय के कट्टरपंथी और दकियानूसी तबकों के विरोध के बावजूद, समाज के सुधार और कल्याण के लिए कानून बनाना चाहिए।
भाजपा चाहती है कि जहां तक मुसलमानों का सवाल है भारतीय राज्य पूरी तरह सुधारवादी बन जाए। यही कारण है कि एनडीए सरकार ने उच्चतम न्यायालय में शपथपत्र दाखिल कर कहा कि तीन तलाक की प्रथा को असंवैधानिक घोषित किया जाना चाहिए और अब उसका इरादा इस प्रथा को प्रतिबंधित करने के लिए कानून बनाने का है। परंतु जब हिन्दू समुदाय का सवाल आता है, तो भाजपा हर सुधार का विरोध करती है।
हाल में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपने भाषण में कहा कि अदालतों को ऐसे फैसले सुनाने चाहिए जिन्हें लागू किया जा सके।

इसका तात्पर्य यह है कि अदालतों को पहले यह पता लगाना चाहिए कि उनके किस निर्णय को लागू किया जा सकता है और किसे नहीं, और उसके बाद फैसले देने चाहिए।

अदालतों के निर्णय, संविधान, नागरिकों के मूल अधिकारों, कानून के राज, न्याय और निष्पक्षता पर आधारित होते हैं।

क्या हम एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहते हैं जहां अदालतें इन उच्च सिद्धांतों को दरकिनार कर, इस आधार पर अपने निर्णय सुनाएं कि किस धर्म की आस्था क्या है।

अगर अदालतें ऐसा करेंगी तब स्वाभाविक तौर यह सवाल उठेगा कि अगर दो अलग-अलग धार्मिक सम्प्रदायों की आस्थाओं में टकराव हो तो किसका पक्ष लिया जाए।

क्या वे बहुसंख्यक समुदाय का पक्ष लेंगी? क्या वे शक्तिशाली सम्प्रदायों का पक्ष लेंगीं?

(अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनूदित)

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