‘ अनशन करते मेरे प्राण होम हो जाएँ तो मेरे शरीर को विधायक के घर में फेंक देना ’

उत्तराखंड में एक जगह है-गैरसैंण. गैरसैंण को आन्दोलनकारी, उत्तराखंड आन्दोलन के समय से राज्य की राजधानी देखना चाहते हैं. लेकिन सत्ता में आने-जाने वाले इसे किसी सूरत में राजधानी नहीं बनाना चाहते.

इसी गैरसैंण नगर से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर एक जगह है-गाजियाबाद. जी हाँ-गाजियाबाद. अलबत्ता इसका नाम भर ही गाजियाबाद है. बाकी दिल्ली के बगल वाले गाजियाबाद से इसका कोई मेल नहीं है. गैरसैंण ब्लाक के इस गाजियाबाद से लगभग के 4 किलोमीटर की दूरी पर एक गाँव है-देवपुरी. देवपुरी गाँव विकास के तमाम दावों के बीच आज भी सड़क से महरूम है.

खंसर नदी के किनारे-किनारे हल्की चढ़ाई चढ़ते हुए 4 किलोमीटर पैदल चल कर देवपुरी गाँव पहुंचना पड़ता है.विकास के दावे हर हुकूमत करती है पर जैसे ही देवपुरी जैसे गाँवों दिखते हैं तो विकास के दावों की कलई अपने-आप खुलने लगती है. विकास 60 साल वाला हो या 4 साल वाला विज्ञापनों में बड़ा चमत्कृत करता है.लेकिन जमीन पर उसकी हकीकत देखनी हो तो देवपुरी जैसे गाँवों में देखी जा सकती है.

एक पहाड़ी गाँव में सडक न होना,कई बार जिन्दगी के दिए के बुझने का सबब बन सकता है. बीमार या प्रसूता को अस्पताल पहुंचाने में बीमार या प्रसूता का ही नहीं, उन्हें सड़क तक पहुंचाने की कोशिश करने वालों का भी दम फूल जाता है.
देवपुरी वाले बरसों-बरस इस सड़क विहीनता से जूझते रहे. सत्ता में आने-जाने वाले उन्हें आश्वासनों का झुनझुना पकड़ाते रहे पर बदला कुछ नहीं.

9 साल पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खंडूड़ी ने गाजियाबाद से देवपुरी के पत्थरकट्टा तक 4 किलोमीटर सड़क बनाए जाने की घोषणा की. आम तौर पर खंडूड़ी, घोषणा करने से परहेज करते थे और इलाके के विकास के लिए किसी घोषणा की मांग करने वालों को टका सा जवाब देते थे, “मैं घोषणा मंत्री नहीं हूँ.” उन्ही खंडूड़ी ने 2009 में 4 किलोमीटर सड़क की घोषणा की.लेकिन देवपुरी में आज की जमीनी स्थिति, खंडूड़ी को घोषणा मंत्री नहीं बल्कि कोरी घोषणा करके लापता हो जाने वाला राजनेता सिद्ध कर रही है.

फिर आया हरीश रावत का ज़माना. वे मुख्यमंत्री रहते हुए, गुड़ तो नहीं देते थे पर गुड़ जैसी बात जरुर देते थे. देवपुरी वालों को रावत साहब ने 4 किलोमीटर स्वीकृत सड़क में 2 किलोमीटर और सड़क बनाये जाने की घोषणा की मिश्री थमा दी. सड़क चार किलोमीटर नहीं बनी तो दो किलोमीटर और कहाँ से बनती ? हमारे यहाँ लेट लतीफी को लेकर मुहावरा है-9 दिन में चले अढाई कोस.लेकिन देवपुरी में तो 9 साल में एक कदम भी नहीं चल सके.

घोषणाओं और आश्वासनों के लॉलीपॉप से देवपुरी के ग्रामीण अब आजिज आ चुके हैं. इसलिए सड़क के लिए उन्होंने आरपार की लड़ाई का इरादा कर लिया है. दो महीने पहले, उन्होंने प्रशासन को सड़क नहीं बनने, राजकीय इंटर कॉलेज, नैल,खंसर में शिक्षकों की नियुक्ति न होने आदि की दशा में आन्दोलन का नोटिस दिया.लेकिन ऊंचा सुनने वाली हमारी ऊँची व्यवस्था ने ऐसे साधारण नोटिसों पर आज से पहले कब कान दिया,जो इनके नोटिस पर कान देती ?

30 मई को गैरसैंण में उक्त मांगों की पूर्ति के लिए प्रदर्शन किया गया पर कोई सुनवाई नहीं हुई.

इस 5 जून से ग्रामीणों ने आन्दोलन को तेज कर दिया है.एक ग्रामीण रघुवीर सिंह रावत आमरण अनशन पर बैठ गये हैं.पर आमरण अनशन,धरना,प्रदर्शन का यह कार्यक्रम किसी बाजार में नहीं हो रहा है.बल्कि देवपुरी के ग्रामीण,उसी पत्थरकट्टा में आमरण अनशन,धरना,प्रदर्शन कर रहे हैं,जहाँ के नाम पर सड़क स्वीकृत है.यह आन्दोलन इस मायने में अलग है कि ग्रामीणों ने अपने गाँव को ही आन्दोलन स्थल के रूप में तब्दील कर दिया है.अब जिसे बात करनी है,सरकार पैगाम पहुंचाना है,उसे उन्हीं दिक्कतों से गुजरना होगा,जिन दिक्कतों का सामना ये ग्रामीणों दशकों से करते रहे हैं और कोई उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई.

अनशन के चौथे दिन रघुवीर सिंह रावत के वजन में कमी आई है पर हौसले उनके बुलंद हैं.चुने हुए जन प्रतिनिधियों के उपेक्षापूर्ण रवैये से वे खासे आहत हैं.वे कहते हैं कि निवर्तमान विधायक जो कांग्रेस से हैं,वे चुनाव के दौरान आये और गिनाने लगे कि मैंने ये सड़क बनवाई,वो सड़क बनवाई. रावत जी कहते हैं कि हमने पूछा कि हमारी सड़क क्यों नहीं बनवाई तो उन्होंने कहा -अररे..वो तो मैं भूल गया. वर्तमान विधायक,जो भाजपा के हैं,उनके बारे में रावत जी का कहना था कि चुनाव में उन्होंने वायदा किया था कि जीतने के तीन महीने के भीतर सड़क बन जायेगी. चुनाव जीते हुए एक साल से अधिक हो गया और अब हालत यह है कि आंदोलनरत गांववालों से वे बात करने को तक तैयार नहीं हैं.

रघुवीर सिंह रावत कहते हैं कि सड़क के लिए वे प्राण तक देने को तैयार हैं.इस लेखक से उन्होंने कहा, ” मैंने अपने लोगों से कहा है कि यदि अनशन के दौरान मेरे प्राण होम हो जाएँ तो मेरे शरीर को विधायक के घर में फेंक देना.” यह बात अपने आप में रोंगटे खड़े कर देने वाली है.इससे वह पीड़ा महसूस की जा सकती है,जो सड़क नहीं होने के चलते,ये ग्रामीण झेलते आये हैं.लेकिन लानत है, इस व्यवस्था पर कि सड़क जैसी मामूली मांग के लिए किसी व्यक्ति को अपना जीवन दांव पर लगाना पड़े.

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