मई दिवस : इतिहास यात्रा – इरिक हाॅब्सबाॅम

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1990 में माइकेल इग्नतीफ ने ‘आब्जर्वर’ में लिखते हुये यह टिप्पणी की थी कि धर्म-निरपेक्ष समाज धार्मिक अनुष्ठानों के विकल्प देने में कभी भी सफल नही हुए हैं। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने यह भी कहा कि संभव है फ्रांस की राज्य क्रांति ने गुलामों को नागरिक बना दिया हो, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे शब्द को प्रत्येक स्कूल में खुदवा दिया हो और मठों (गिरिजाघरों) को मलबे में बदल दिया हो लेकिन जुलाई की 14 तारीख के अलावा पुराना इसाई कैलेण्डर ज्यों का त्यों बना रहा।

प्रस्तुत लेख में मेरा विषय इसाई अथवा किसी अन्य आधिकारिक कैलेण्डर में किसी धर्म-निरपेक्ष आंदोलन द्वारा किया गया शायद पहला हस्तक्षेप है अर्थात् अवकाश का एक ऐसा दिन जो एक या दो देशों में ही नहीं अपितु 1990 में आधिकारिक तौर से 107 सरकारों द्वारा मान्यता पा चुका है। इससे भी बड़ी बात यह है कि अवकाश का यह दिन किसी सरकार अथवा विजेता ने घोषित नहीं किया अपितु इसका जन्म हुआ था गरीब स्त्री-पुरूषों के एक पूर्ण रूप से अनौपचाारिक आंदोलन की कोख से। मैं बात कर रहा हूँ मई दिवस अथवा, और सटीक ढंग से, मई मास के पहले दिन की, मजदूर आंदोलन के अन्तर्राष्ट्रीय पर्व की जिसका शताब्दी समारोह 1990 में मनाया जाना चाहिये था क्योंकि इसका प्रारंभ हुआ था 1890 में।

” मनाया जाना चाहिये ” बहुत ठीक कहा है मैनें क्योंकि इतिहासकारों के अलावा शायद किसी ने भी इसमें कोई रूचि नहीं दिखायी, यहां तक कि समाजवादी दलों ने भी नहीं जो कि उनके वंशज हैं जिन्होंने 1889 में, जिसे द्वितीय इण्टरनेशन कहा जाता है, उसके महासम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय मजदूरों से मई 1890 में कार्य-दिवस को 8 घण्टे तक सीमित करने के पक्ष में प्रदर्शन करने की अपील की थी। यह बात उन दलों के लिये भी सही है जो 1889 के महासम्मेलन में अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से शामिल थे और जो आज भी अस्तित्व में हैं।

द्वितीय इण्टरनेशल में भागीदारी करने वाले दल अथवा उनके उत्तराधिकारी ही आज पश्चिम योरप में सरकारों, मुख्य विरोधी दलों अथवा वैकल्पिक सरकारों के प्रतिनिधि मुहैय्या कराते हैं। इन दलों से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे अपना गौरव-बोध अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में दिखाते अथवा उसमें कम से कम अपनी रूचि तो प्रकट करते ही।

मई दिवस की शतवार्षिकी को लेकर ब्रिटेन में सबसे कड़ा प्रतिवाद किया सेना के एक पूर्व जनरल और लंदन विश्वविद्यालय के एक काॅलेज के पूर्व प्रधान सर जाॅन हैकिट ने। उन्होने मई दिवस खत्म करने की अपील इसलिये की थी क्योंकि इसे वे एक प्रकार का सोवियत हस्तक्षेप अथवा साम्यवादी विचारधारा का प्रतीक मानते थे। उनका विचार था कि अंतरराष्ट्रिय साम्यवाद के खात्में के बाद मई दिवस को जीवित रखने का कोई औचित्य नहीं रह गया है। लेकिन ‘योरोपियन कम्यूनिटी’ के बासंती मई दिवस के जन्म का बोल्शेविकों से कोई सम्बंध नहीं है। यह कमाल समाजवाद-विरोधी राजनीतिज्ञों का है जिन्होंने यह जान लिया था कि किस तरह मई दिवस योरप के मजदूर वर्ग की चेतना में गहरे बैठा है और इसका विरोध करने के लिये उन्होंने मई दिवस के ही दिन एक नया त्यौहार मनाने का निश्चय किया ताकि लोग मई दिवस का मजदूर वर्गों से नाता भूल जांय।

यहां फ्रेंच सांसदों द्वारा अप्रैल 1920 में जारी एक प्रस्ताव का जिक्र किया जा सकता है जिस पर हस्ताक्षर करने वालों के बीच सहमति का एक ही आधार था और वह यह कि सभी के सभी समाजवाद के विरोधी थे। प्रस्ताव के अनुसार ” इस अवकाश के साथ किसी भी प्रकार की ईर्ष्या अथवा घृणा का भाव नहीं होना चाहिये (वर्ग संघर्ष के लिये यह एक प्रकार की कूट शब्दावली थी।) सभी वर्ग, अगर अब भी वर्गों का अस्त्तिव है तो, और देश की सभी उत्पादक उर्जायें एक ही विचार और एक ही आदर्श से प्रेरित होकर एकजुट हो जांय। ”

 

योरोपियन कम्यूनिटी के जन्म के पहले मई दिवस के साथ घाल-मेल करने में सबसे पीछे थे धुर दक्षिणपंथी, न कि वामपंथी। सोवियत संघ के बाद हिटलर की सरकार पहली थी जिसने मई दिवस को आधिकारिक राष्ट्रीय श्रमिक दिवस घोषित किया। मार्शल पेतिन की विचो सरकार ने पहली मई को श्रम और सहयोग के त्योहार के रूप में मान्यता दी और ऐसा माना जाता है कि इसकी प्रेरणा पेतिन के स्पेन के तानाशाह जनरल फ्रांको से मिली थी क्योंकि उस समय पेतिन जो फ्रांको के प्रशंसक थे, स्पेन में फ्रांस के राजदूत थे।

सच तो यह है कि मई दिवस पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा करने वाली योरोपियन इकोनामिक कम्यूनिटी के अधिकांश सदस्य समाजवाद-विरोधी थे तो भी उन्होने मार्गरेट थैचर के विरोध की परवाह न करते हुए इसकी घोषणा की। पश्चिमी देशों के आधिकारिक मई दिवस अनौपचारिक मई दिवसों की परंपरा को समझने और इसे मजदूर आंदोलनों, वर्ग-चेतना और वर्ग-संघर्ष से अलग करने के प्रयास थे। लेकिन ऐसा कैसे हो गया कि यह परंपरा इतनी जबर्दस्त साबित हुई कि इसके शत्रुओं को भी इसे स्वीकार करने के बारे में सोचना पड़ा जब कि उसी समय समाजवाद के प्रचंड विरोधी हिटलर, फ्रांको और पेतिन समाजवादी मजदूर आंदोलन को समूल नष्ट करने में लगे हुये थे ?

मई दिवस के संस्थानीकरण का असाधारण पहलू यह है कि यह किसी योजनावद्ध क्रम से नहीं हुआ और इस तरह यह किसी अर्थ में कोई आविष्कृत परंपरा न हो कर एक अचानक होने वाला विस्फोट माना जाना चाहिये। अवसर था फ्रांस की राज्यक्रान्ति के शताब्दी वर्ष में पेरिस में आयोजित द्वितीय इण्टरनेशनल जिसे मार्क्सवादी इण्टरनेशनल भी कहा जाता है। इसी अवसर पर इण्टरनेशनल के दो संस्थापक लेकिन प्रतिद्वन्दी कांग्रेसों में से एक के द्वारा पारित ऐसा प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया जिसके अनुसार एक निश्चित तिथि पर विश्व भर में मजदूरों का प्रदर्शन आयोजित किया जाना चाहिये जिसमें वे अपने-अपने मालिकों (सरकारी और निजी) से 8 घण्टे प्रतिदिन काम करने के वैधानिक अधिकार की मांग करें। और चूंकि अमरीकी मजदूर महासंघ ने पहले से ही 1 मई 1890 को प्रदर्शन का निर्णय ले लिया था अतः इसी दिन को अंतरराष्ट्रीय मजदूर प्रदर्शन के लिये भी चुन लिया गया।

इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि अमरीका में मई दिवस ने उतनी लोकप्रियता नहीं पाई जितनी अन्य देशों में लेकिन इसका कारण यह था कि वहां पहले से ही सितम्बर मास का पहला सोमवार आधिकारिक रूप से श्रमिक दिवस के रूप में सार्वजनिक अवकाश का दिन मौजूद था।

स्वभावतः विद्वानों ने उस प्रस्ताव के जन्म से जुड़ी बातों की पड़ताल की है और साथ ही इस पर भी गौर किया है कि किस प्रकार यह अमरीका और अन्य देशों में आठ घण्टे के कार्य-दिवस को लेकर चलने वाले श्रमिक आंदोलन से जुड़ा हुआ है।…… संक्षेप में, उस कांग्रेस के एक अपेक्षाकृत अधिक विख्यात और राजनैतिक रूप से अधिक संवेदनशील सदस्य इरोवदि वैलांत ने 1889 के वर्षों बाद उस प्रस्ताव को याद करते हुये कहा था कि ” मई दिवस इतना तेजी से छा जायेगा, ऐसा कौन अनुमान लगा सकता था ?

लेकिन जितनी बड़ी संख्या में और जिस सीमा तक मजदूरों ने इस सभाओं में हिस्सा लिया उसने उन आयोजकों को भी चौंका दिया जिन्होंने उनका आह्वान किया था। लंदन के हाइड पार्क की सभा में तीन लाख लोग जमा हुए थे जो आज भी एक रिकार्ड है। यह सही है कि सभी समाजवादी दलों और संगठनों ने सभाएं बुलाईं लेकिन इनमें से कुछ ही ने अवसर के महत्व को समझा था और इसे सफल बनाने में अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था।

अपवाद थी तो केवल आस्ट्रिया की सोशल डिमाॅक्रेटिक पार्टी जिसने जनता के मूड को भांप लिया था और, जैसा कि कुछ ही सप्ताह बाद फ्रेडरिक एंगेल्स ने कहा था, ” पूरे महाद्वीप में आस्ट्रिया ही ऐसा था और आस्ट्रिया में भी वियना जिसने उत्सव को पूरी भव्यता और सज-धज के साथ मनाया। ”

तमाम ऐसे देशों में, जो मई दिवस मनाने में सब कुछ झोंक देने से कोसों दूर थे, वहां, जैसा कि वाम राजनीति में होता है, स्थानीय दल और आंदोलन इस तरह के प्रदर्शनों के स्वीकृत रूप अथवा रूपों को लेकर विचारधारात्मक बहसों और विभाजनों में फंसे हुए थे या फिर बहुत ज्यादा चौकन्ने थे। सरकार, मध्यवर्ग अथवा मालिकों की घबराहट अथवा आक्रोषपूर्ण प्रतिक्रियाओं को देखते हुए जिम्मेदार समाजवादी लोग उत्तेजक ललकारों से प्रायः बचते थे क्योंकि उन्हे पुलिसिया दमन और आतंक की धमकियां मिलती रहती थीं। जर्मनी में तो स्थिति यही थी जहां ग्यारह वर्षों बाद पार्टी पर से अभी-अभी पाबंदी हटी थी।

पार्टी के नेता आगस्त बेबेल ने एंगेल्स को बता दिया था कि जैसी स्थिति पार्टी की जर्मनी में है उसके चलते ” हमारे पास इस बात के सभी कारण हैं कि पहले मई प्रदर्शन में हम भीड़ पर संयम रखें। हमें हर हालत में संघर्ष से बचना है। ” एंगेल्स बेबेल से सहमत थे।

सावधानी दूसरी ओर संकेत कर रही थी। लेकिन जिस चीज ने मई दिवस पर अपनी मुहर लगाई वह थी व्यवहारिक कारणों के ऊपर प्रतीकात्मकता की विजय। यह प्रतीकात्मक रूप से काम बंद करने का उपक्रम ही था जिसने मई दिवस के प्रदर्शन को महज एक प्रदर्शन, अथवा महज स्मृति अवसर, की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना दिया।

उन देशों और नगरों में जहां पार्टियां अथवा मजदूर संगठन बहुत आश्वस्त नहीं भी थे मजदूरों द्वारा हड़ताल करने पर आमादा होने के कारण मई दिवस मजदूर वर्ग के जीवन और श्रमिक अस्मिता का अंग बन गया जो कि प्रारंभिक उत्साह के बावजूद ब्रिटेन में नहीं बन पाया। क्योंकि काम के दिन काम से विरत रहने का निर्णय जहां एक ओर श्रमिक वर्ग की ताकत का उद्घोष था वहीं दूसरी ओर यह स्वतंत्रता का सारतत्व था अर्थात् पसीना बहाने के लिये मजबूर न किया जाना अपितु परिवार और मित्रों के साथ जो चाहे वह करने के लिये स्वतंत्र रहना।

इस तरह यह वर्ग-उद्घोष और वर्ग-संघर्ष का प्रतीक तथा अवकाश दोनों था अर्थात् श्रम की मुक्ति के बाद आने वाले सुखी जीवन का पूर्वाभास। 1890 की परिस्थितियों में यह सचमुच विजय का उत्सव था, क्रीड़ांगन में होने वाली विजयी दल की दौड़ की तरह। इस संदर्भ में देखने पर मई दिवस संवेग और आशा के भारी माल का वाहक बन गया।

प्रथम मई दिवस की इस अविस्मरणीय और प्रायः उम्मीद से कहीं अधिक सफलता के मद्देनजर यह स्वाभाविक ही था कि इसे दुहराने की मांग की जाती। जैसा कि ऊपर के विवरण से स्पष्ट है, एकताबद्ध स्कैंडनेवियायी आंदोलन ने 1890 की गर्मियों में पुनः इसकी मांग की और स्पेनी श्रमिकों ने भी यही किया। वर्ष समाप्त होते-होते योरप की अधिकांश पार्टियों ने इसका अनुमोदन कर दिया था। संभव है कि इसे वर्ष-दर-वर्ष आयोजित करने की बात पहले-पहल तूलूस के उग्रवादी क्रांतिकारियों ने की हो जिन्होने 1890 में इस तरह का प्रस्ताव पारित कर दिया था लेकिन जब इण्टरनेशनल के ब्रुसेल्स अधिवेशन ने 1891 में श्रमिकों को प्रतिवर्ष इसे मनाने के लिये प्रतिबद्ध कर लिया गया तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ।

लेकिन इस बात के आग्रह के साथ ही कि, सप्ताह में जब भी मई की पहली तारीख पडे़ उस दिन एक प्रदर्शन द्वारा ‘ आठ घण्टे प्रतिदिन काम करने की मांग और वर्ग संघर्ष का उद्घोष करने के इसके वास्तविक चरित्र पर जोर देने के लिये’ मई दिवस समारोहपूर्वक मनाया जाय। इसके साथ ही इसमें दो और मांगे जोड़ दी गयीं- श्रमिक कानूनों और युद्ध के विरूद्ध संघर्ष। यद्यपि इसके पश्चात् युद्ध के विरूद्ध संघर्ष मई दिवस समारोह का आधिकारिक अंग बन गया तो भी शांति का नारा लोकप्रिय मई दिवस परंपरा से वस्तुतः जोड़ा नही गया था बावजूद इसके कि यह ऐसा नारा था जो इस अवसर के अंतरराष्ट्रीय चरित्र को और अधिक दृढ़ करता था।

इसके साथ ही प्रदर्शन के निहितार्थ का विस्तार करते हुए एक और नया विषय शामिल कर लिया गया जो मई दिवस ‘समारोह मनाने’ पर जोर देता था। आंदोलन अब ऐसे चरण में था जहां पहुंच कर मई दिवस एक राजनैतिक कर्म के रूप में ही न रहकर एक त्योहार की शक्ल ले चुका था।

मई दिवस के पहले ब्रिटेन सहित लगभग सभी देशों में अवकाश धार्मिक अवसरों पर ही होते थे। ब्रिटेन में योरोपीय समुदाय का मई दिवस बैंक अवकाश में शामिल कर लिया गया है। धार्मिक अवकाश और मई दिवस दोनो में सार्वदेशिकता की आकांक्षा थी जिसे श्रमिक शब्दावली में अन्तरराष्ट्रीयतावाद कह सकते हैं। सार्वदेशिकता ने इसमें शामिल होने के लिये लोगों को उत्साहित किया और इस दिन के आकर्षण को बढ़ाया। इस अवसर के सांस्कृतिक इतिहास और चित्रांकन के लिये अत्याधिक महत्वपूर्ण मई दिवस पर निकाले जाने वाले लंबे पन्नों वाले असंख्य अखबार इस बात के प्रमाण हैं।

फासिस्ट-पूर्व इटली के 308 ऐसे अखबारों को आज भी सुरक्षित रखा गया है। 1891 में बोलोग्ना से प्रकाशित पहले मई दिवस विशेषांक में इस अवसर की सार्वदेशिकता पर लेख छपे हैं। ईस्टर और ह्निटसन जैसे धार्मिक पर्वों पर निकलने वाले विशेषांकों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में मनाये जाने वाले वसंतोत्सव से मई दिवस के समारोहों की समानता स्पष्ट है।

समाजवादियों और समाजवाद के प्रचारकों की तुलना भी पुरोहित समुदाय से यदा-कदा की जाती थी। 1898 में बेल्जियम से प्रकाशित एक पर्चे ने एक ऐसा लेख छापा था जो किसी धार्मिक उपदेश (सरमन) जैस लगता था। यह लेख बेल्जियम की समाजवादी पार्टी के दस सदस्यों के नाम से छपा था, इन दसों में सभी के सभी नास्तिक थे और लेख का मुख-वाक्य था ” दुनिया के मजदूरों एक हो ” (कार्ल मार्क्स) और  ” एक-दूसरे से प्यार करो ” (ईसा मसीह)! कुछ नमूने यहां दिये जा रहे हैंः
यह बसंत और उत्सव का समय है जब प्रकृति का अनवरत पल्लवन अपने पूरे वैभव के साथ दीप्त हो रहा है। प्रकृति की भांति आशाओं से अपने को भर लो, नये जीवन के लिये तैयार हो जाओ।
नैतिक उपदेशों के कुछ अवतारों में (आत्म-सम्मान दिखाओ, उन पेयों से सावधान रहो जो तुम्हे नशे में डाल देते हैं और उन भावनाओं से होशियार रहो, जो पतन की ओर ले जाते हैं) समाजवादी उमंगो के पश्चात् समापन स्वर्णिम विहान के उद्घोष से होता हैः

शीघ्र ही सीमाएं ओझल हो जायेंगी। शीघ्र ही युद्ध और सेनाएं समाप्त हो जायेंगी। एकजुटता और प्रेम के समाजवादी गुणों का जब भी तुम अभ्यास करोगे, तुम इस भविष्य को और निकट लाओगे। और फिर शांति और खुशहाली में एक ऐसी दुनिया का जन्म होगा जिसमें समाजवाद विजयी होगा, जब सभी का सामाजिक कर्तव्य ठीक से ऐसे समझ लिया जायेगा जिससे प्रत्येक व्यक्ति का सर्वतोमुखी विकास होगा।

फिर भी नये श्रमिक आंदोलन का मुख्य बिन्दु यह नहीं था कि यह किसी प्रकार की पवित्र आस्था है जो किसी धार्मिक प्रवचन की शैली और वाणी प्रतिध्वनित करती हो। धार्मिक आंदोलन का प्रभाव इस पर बहुत ही कम था और ऐसा था उन देशों में भी जहां जनता बहुत आस्तिक थी और चर्च के तौर-तरीकों में पूरी तरह डूबी हुई थी। साथ ही कुछ अपवादों को छोड़कर पुराने और नये विश्वास कहीं एक दूसरे से मिलते ही नहीं थे.

समाजवादी मजदूर आंदोलन के लिये लोकतंत्र केंद्रीय महत्व का था। यही नहीं कि मजदूर आंदोलन के लिये यह आनिवार्य था अपितु दोनों को अलग ही नहीं किया जा सकता था। जर्मनी में प्रथम मई दिवस की स्मृति में एक ताम्रपत्र तैयार किया गया था जिसमें एक ओर कार्ल मार्क्स का चित्र था तो दूसरी ओर स्वतंत्रता की मूर्ति का। 1891 के आस्ट्रियाई प्रतिचित्र में कार्ल मार्क्स अपनी पुस्तक पूंजी की प्रति हाथ में लेकर एक खूबसूरत टापू की ओर संकेत कर रहे हैं जिसकी पृष्ठभूमि में मई दिवस का उगता हुआ सूर्य दिखाई दे रहा है, जो भविष्य की ओर संकेत करने वाला बहुत ही लोकप्रिय प्रतीक सिद्ध हुआ।

सूर्य की किरणें फ्रांस की राज्यक्रांति के तीन नारे समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के प्रतीक हैं। मई दिवस के तमाम पुराने स्मृति चिन्हों में ये नारे दिखाई पड़ते हैं। मार्क्स ऐसे मजदूरों से घिरे हुए हैं जो उस टापू की ओर जाने वाले जहाज को चलाने के लिये तत्पर हैं। जहाज के मस्तूलों पर लिखा है: ” सभी को प्रत्यक्ष मताधिकार, आठ घण्टे प्रतिदिन श्रम और श्रमिकों की सुरक्षा। ” मई दिवस की यही मौलिक परंपरा थी।

दो-तीन वर्षों के अवधि में ही यह परंपरा समाजवादी नेताओं के उद्बोधनों और इन उद्बोधनों की उग्रवादियों और सामान्य जनों द्वारा की गयी व्याख्याओं के बीच सहजीवन के चलते असाधारण गति से आगे बढ़ी। यह परवान चढ़ी विशाल मजदूर आंदोलनों और पार्टियों के आश्चर्यजनक उभार से जिसमें प्रतिदिन बढ़ोत्तरी हो रही थी, जब इस तरह के आंदोलनों का अस्तित्व ही, वर्ग का उद्घोष ही, भावी विजय की गारण्टी माना जाता था। इससे भी अधिक यह परंपरा संकेत थी उस आसन्न विजय की जब नई दुनिया के दरवाजे श्रमिकों के सामने धड़ाधड़ खुल रहे होंगे।

जो भी हो, वह स्वर्ण युग नही आया और मजदूर आंदोलनों की तमाम बातों की तरह मई दिवस भी नियमित और संस्थानीकृत हो गया हालांकि महान संघर्षों और विजयों के पश्चात आगे आने वाले वर्षों मे विजय और उम्मीद के पुराने विस्फोट का संकेत इसमें अवश्य ही वापस लौटा। रूसी क्रान्ति के प्रारंभिक वर्षों में दीवानगी से मनाये जाने वाले मई दिवसों में इसकी झलक देखी जा सकती है और योरप में 1919-20 के दौरान लगभग हर जगह यह उत्साह तब देखने को मिला जब आठ घण्टे के कार्य दिवस को पहले मई दिवस की मांग मान ली गयी।

1935-36 में फ्रांस में लोकप्रिय मोर्चे के शुरूआती दिनों में भी इसकी झलक मिली और फासीवाद की पराजय और जबर्दस्ती अधिकृत किये गये योरप के अन्य क्षेत्रों की मुक्ति के समय भी ऐसा ही नजारा देखने को मिला। फिर समाजवादी मजदूर आंदोलन वाले तमाम देशों में 1914 के कुछ पहले ही मई दिवस रूटीन में शामिल हो गया।

विचित्र बात यह है कि मई दिवस के रूटीन बनने के वर्षों के दौरान ही यह एक अनुष्ठान जैसा बन गया।…..फिर भी मई दिवसों का महान युग तब भी नहीं समाप्त हुआ जब उन्हें कानूनी मान्यता प्राप्त हो गयी अर्थात् वे तब भी इन अवसरों पर गलियों और सड़कों पर बहुत बड़ी संख्या में लोगों को खींच लाते थे।

एक बार जब उन्हें अवकाश का दर्जा मिल गया या फिर, उससे भी बुरा, उन्हें ऊपर से थोपा जाने लगा तो उनका चरित्र अवश्य ही बदल गया। और चुंकि बड़े पैमाने पर जनसमूहों को एकमंच पर लाना उनका जैविक गुण था, वे अवैध घोषित कर दिये जाने से नहीं बच सके हालांकि अल्बानिया के समाजवादी (बाद में साम्यवादी) कार्यकर्ता फासिज़्म के काले दिनों में बिना नागा कुछ कामरेडों को उस पहाड़ी दर्रे तक भेजने में गर्व महसूस करते थे जहां स्थित बारबटो-चट्टान से समाजवाद के स्थानीय नेता ने उन्हें 1893 में सम्बोधित किया था। यह वही जगह थी जहां फासीवाद के खात्मे के बाद 1947 में गिलियानो नामक डाकू ने मई दिवस के प्रदर्शनकारियों और सैर-सपाटे के लिये आये लोगों की हत्यायें की थी।

1914 और विशेष कर 1945 के बाद से मई दिवस या तो गैरकानूनी बन गया है अथवा अधिकाधिक औपचारिक। तीसरी दुनिया के उन गिने-चुने देशों में ही पुरानी परंपरा की वास्तविक निरंतरता देखी जा सकती है जहां विशाल और अनाधिकारिक समाजवादी मजदूर आंदोलन ऐसी स्थितियों में जोर पकड़ता गया है जो मई दिवस की मूल भावना के अनुकूल हैं।

लेकिन सभी देशों में मई दिवस का पुराना चरित्र नहीं बदला है। फिर भी जहां यह कभी नई मानी जाने वाली पुरानी सरकारों के पतन से नहीं जुड़ा रहा है, जैसा कि सोवियत यूनियन और पूर्वी योरोपीय देशों में, वहां इसके लिये यह दावा करना कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि मजदूर आंदोलनों से भी जुड़े तमाम लोगों के लिये मई दिवस जैसा शब्द वर्तमान से अधिक अतीत की याद दिलाता है।

मई दिवस की शतवार्षिकी में इतिहासकार की रूचि कई कारणों से हो सकती है। एक अर्थ में यह इस बात के लिये महत्वपूर्ण है कि क्यों मार्क्स  उन स्त्रियों और पुरूषों के श्रमिक आंदोलन में इतने प्रभावशाली हो गये जिन्होंने इसके पहले उनका नाम ही नहीं सुना था लेकिन जिन्होंने एक वर्ग के रूप में सचेत बनने और संगठित होने के मार्क्स के आह्नान को पहचाना और स्वीकार किया। इसका दूसरा महत्व यह है कि यह जमीनी चिंतन और अनुभव की ऐतिहासिक ताकत को साबित करता है और इस बात पर रोशनी डालता है कि व्यक्तियों के रूप में गूंगे, ताकत से महरूम और हर तरह से नाचीज होने के बावजूद वे स्त्री और पुरूष इतिहास पर अपनी छाप छोड़ सकते हैं। लेकिन इसका सबसे अधिक महत्व हममें से तमाम ऐसे लोगों के लिये जो इतिहासकार हों या न हों यह है कि मई दिवस की यह शतवार्षिकी हमें गहराई तक हिला देने वाली शतवार्षिकी है क्योंकि जर्मन दार्शनिक अर्नस्ट ब्लाख के शब्दों में यह प्रतीक है ”आशा के सिद्धांत“ काः एक बेहतर दुनिया में एक बेहतर भविष्य की आशा। अगर 1990 में किसी और ने इसे नहीं याद किया तो भी इतिहासकार के लिये इसे याद करना उसका धर्म है।

 

( अनुवाद -रामकीर्ति शुक्ल )

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