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February 23, 2020
सिनेमा

नये फिल्मकारों की फिल्मों ने जनपक्षीय सिनेमा के प्रति उम्मीद जगाई

10वां पटना फिल्मोत्सव: प्रतिरोध का सिनेमा

महानगर से लेकर गांवों और आदिवासी इलाकों तक के जन-जीवन की सच्चाइयों से रूबरू हुए दर्शक
लोककलाकार भिखारी ठाकुर और जनकवि विद्रोही से संबंधित फिल्मों का हुआ प्रदर्शन
महिलाएं कहीं अपना बैंड बना रहीं हैं, तो कहीं जल, जंगल, जमीन पर हक के लिए लड़ रही हैं
माॅॅॅब लिंचिंग का विरोध किया ‘लिंच नेशन’ ने

पटना, 10 दिसंबर. हिरावल द्वारा आयोजित 10 वें पटना फिल्मोत्सव के दूसरे दिन की शुरुआत युवा फिल्मकारों और सिनेमा के विद्यार्थियों द्वारा बनाई गई फिल्मों से हुई।

‘नये प्रयास’ सत्र में युवाओं और सिनेमा विद्यार्थियों की पांच लघु फिल्मों- वुमानिया, गुब्बारे, छुट्टी, बी-22 और लुकिंग थ्रूूू फेंस का प्रदर्शन हुआ। ‘वुमानिया’ बिहार में एक महादलित टोले में बनाए गए ‘सरगम’ बैंड से जुड़ी महिलाओं की सफलता की गाथा है।

आलोचक संतोष सहर की राय में यह एक सफल फिल्म है, क्योंकि यह बिहार में महिला सशक्तिकरण के नाम पर अब तक घटित हो चुकी कई-कई भयावह व त्रासद कथाओं के बीच से जीवित रह गई चंद कथाओं में से एक है। यह ‘रेयरनेस’ ही इसका प्राणतत्व है। ‘वुमानिया’ फिल्म के सह निर्देशक अभिषेक तथा फिल्म से जुडे़ सुशील कुमार और गुंजन को वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत ने फिल्मोत्सव की ओर से स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया।

 

‘गुब्बारे’ गुब्बारे बेचने वाली एक लड़की और एक वृद्ध की दिल को छूू लेने वाले प्रसंग पर बनी फिल्म थी। पिता की दुर्घटना के कारण लड़की गुब्बारे बेचने को मजबूर है, पर उसके गुब्बारे कोई नहीं खरीदता। पार्क में बैठा एक वृृृद्ध उसकी मदद करने के लिए उसके सारे गुब्बारे खरीद कर अपने उन दोस्तों को याद करते हुए आसमान में उड़ा देता है, जो अब इस संसार में नहीं हैं। वृृद्ध के चेहरे पर मौजूूूद एक विवशता और अकेलापन भी फिल्म को गहरे अर्थ प्रदान करते लगे।

‘बी-22’ और ‘लुकिंग थ्रूूू फेंस’ क्रिएटिव डाक्युमेंटरी कोर्स के छात्रों द्वारा निर्मित थी। दोनों ही फिल्मों ने महानगर में गरीबों के प्रति मकान मालिकों और अर्पाटमेंट्स में रहने वाले उच्च और मध्यम वर्ग के दोयम दर्जे के व्यवहार पर सवाल उठाए। जो गरीब हैं, उनके रास्ते तक बंद कर दिए जाते हैं, दैनिक व्यवहार में इस्तेमाल के लिए पानी भी उन्हें सहजता से हासिल नहीं होता।

‘छुट्टी’ आईआईटी से जुड़े लोगों द्वारा बनाया गया एक म्यूजिकल वीडियो था।

जल, जंगल, जमीन हड़पे जाने की त्रासदी और उसके विरोध का जज्बा

‘वुमानियां’ जहां महिला बैंड पर केंद्रित थी वहीं महीन मिर्जा निर्देशित फिल्म ‘अगर वो देश बनाती’ में छत्तीसगढ़ में भूमि कानूनों का सहारा लेकर अपने हक की लड़ाई लड़ने वाली उन अनाम महिलाओं के जज्बे को विषय बनाया गया था, जिनके होने से ही देश और लोकतंत्र को सही मायने में सार्थकता मिलती है। कोयला खदान, थर्मल पावर और विभिन्न किस्म के खदानों और परियोजनाओं के लिए आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन को जिस तरह सरकार और कारपोरेट कंपनियों ने निर्ममता के साथ हड़पने का काम किया, उससे उत्पन्न त्रासदी को यह कहानी दिखाती है।

 

‘नाच, भिखारी नाच’ ने लोकनाटककार और नर्तक भिखारी ठाकुर को मूर्त किया

फिल्म ‘नाच, भिखारी नाच’ भिखारी ठाकुर के साथ काम कर चुके चार कलाकारों रामचंद्र मांझी, शिवलाल बारी, लखिचंद मांझी एवं रामचंद्र मांझी की स्मृतियों, गीत-संगीत की उनकी प्रस्तुतियों और बातचीत पर आधारित था। इनके जीवनानुभवों के जरिए महान लोकनाटककार और लोकनर्तक भिखारी ठाकुर भी एक तरह से मूर्त हो उठते हैं। इस फिल्म को देश-दुनिया के कई पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं।

भिखारी ठाकुर ने 1917 में अपने नाच-नाटक दल बनाकर बिदेशिया, गबरघिचोर, बेटी-बेचवा, भाई-विरोध, गबरघिचोर, पिया निसइल सहित एक दर्जन से अधिक नाटक और गीत-नृत्य के माध्यम से तत्कालीन भोजपुरी समाज की समस्याओं और कुरीतियों के खिलाफ जागरूकता फैलाने का काम किया था. उस महान लोकनाटककार और लोकनर्तक के भोजपुरी भाषी समाज पर पड़े व्यापक प्रभाव की मानो यह फिल्म शिनाख्त करती है. इस फिल्म के निर्देशक जैनेंद्र दोस्त और शिल्पी गुलाटी थे। फिल्म की प्रस्तुति के बाद दर्शकों का निर्देशक जैनेंद्र दोस्त से संवाद भी हुआ.

भिखारी ठाकुर आज भी प्रासंगिक हैं : जैनेंद्र दोस्त

आज ‘नाच, भिखारी नाच’ के फिल्म निर्देशक जैनेंद्र दोस्त ने  ‘प्रेस कान्फ्रेन्स’ में यह कहा कि भिखारी ठाकुर हमारे बहुत बड़े लोक-कलाकार हैं। इसीलिए उन्होंने भिखारी ठाकुर के लोकनाटकों और भोजपुरी की संस्कृति तथा लौंडा नाच के सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ पर शोध किया। उन्होंने बताया कि उनकी फिल्म में भिखारी ठाकुर के साथ काम कर चुके कलाकार उनके नाच और रंगमंच को साकार करते हैं। यह फिल्म इसका अहसास कराती है कि जब भिखारी ठाकुर खुद अपनी प्रस्तुति देते होंगे, तो कैसा जादुई प्रभाव होता होगा। जैनेंद्र ने कहा कि भिखारी ठाकुर ने रोजी-रोटी के लिए विस्थापन, स्त्री के सम्मान, नशा के कुप्रभाव, संयुक्त परिवार में बढ़ती विभाजनकारी प्रवृत्ति जैसी समस्याओं को उठाया था, वे सवाल अब भी खत्म नहीं हुए हैं। भिखारी ठाकुर आज भी प्रासंगिक हैं।

जैनेंद्र दोस्त ने बताया कि उनकी फिल्म को जर्काता में गोल्ड अवार्ड, बोस्टन में बेहतरीन डाक्युमेंटरी का एवार्ड मिल चुका है। कोरिया, नेपाल और अपने देश के दिल्ली, कोलकाता, गोवा आदि शहरों में इसका प्रदर्शन हो चुका है।

जनकवि विद्रोही की जिंदगी और कविता से रूबरू हुए दर्शक

‘मैं तुम्हारा कवि हूं’ जनकवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ के जीवन और कविता-कर्म पर आधारित फिल्म थी। इस फिल्म के निर्माता-निर्देशक नितिन की यह दूसरी फिल्म है। इसे प्रतिरोध का सिनेमा अभियान से जुड़े कई फिल्म महोत्सवों में दिखाया जा चुका है। ‘मैं तुम्हारा कवि हूं’ भी एक नये और युवा फिल्मकार की फिल्मों के विषय के चुनाव संबंधी दृष्टि और समझ को सामने लाती है। विद्रोही जेएनयू पढ़ने गए और वहीं जीवन के आखिरी वर्षों तक रहे। जेएनयू कैंपस में और दिल्ली के लोकतांत्रिक-वामपंथी आंदोलनों में वे अपनी कविताओं के साथ सदैव मुखर रहे। विद्रोह, प्रतिरोध, परिवर्तन और क्रांति की अदम्य भावनाओं वाली कविता ही उनकी जिंदगी की पहचान थी। दिल्ली से बाहर भी जहां उन्होंने कविता पाठ किया, उनकी कविताओं सेे लोग जबर्दस्त रूप से प्रभावित हुए।

हिरावल द्वारा ही आयोजित एक आयोजन में कालिदास पटना का प्रेक्षागृह इसका गवाह बना था। उस अद्भुत आवेग से भरे कविता पाठ को सुनने वाले कई लोग आज दर्शक दीर्घा में मौजूद थे। फिल्म में विद्रोही की जुबान से उनकी कविताओं को सुनना और उन्हें सुनाते हुए देखना काफी प्रभावशाली लग रहा था।

‘लिंच नेशन’: हिंसा और नफरत की राजनीति का प्रतिकार

आज की अंतिम फिल्म ‘लिंच नेशन’ आज के समय की ज्वलंत समस्या पर केंद्रित थी। पिछले साल चलती ट्रेेन में 16 साल के लड़के जुनैद की भीड़ द्वारा हत्या से मर्माहत दिल्ली के स्वतंत्र पत्रकार अशफाक ने अपने पत्रकार दोस्तों फुरकान अंसारी, विष्णु सेजवाल और शाहीद अहमद से सलाह-मश्वरे के बाद पूरे देश में ‘माॅॅब लिंचिंग की घटनाओं को दस्तावेजीकृत करने का निर्णय लिया था। ‘लिंचिंग नेशन’ इसी प्रक्रिया में बनाई गई एक ऐसी फिल्म है, जो उत्पीड़ित परिवारों की व्यथा और उनके सवालों के जरिए दर्शकों को बेचैन करती है और नफरत की उस राजनीति का प्रतिकार करने की भावना से भरती है, जो भीड़ को हिंसक भेड़िये में तब्दील कर रही है।

फिल्म बताती है कि 2014 के बाद से अब तक 77 लोग माॅब लिंचिंग में मारे गए, जिनमें 33 लोगों को गौरक्षकों ने मारा है। फिल्म के निर्माण के बाद भी यह सिलसिला थमा नहीं है। अभी कुछ रोज पूूर्व एक पुलिस इंस्पेक्टर इस हिंसक-उन्मादी भीड़ का शिकार बन चुके हैं। माॅब लिचिंग को प्रोत्साहित करने वाली सत्ता और राजनीति के खिलाफ इस फिल्म ने प्रतिरोध का संदेश दिया, क्योंकि अब यह लग रहा है कि अगर यह सिलसिला नहीं थमा तो हम एक डेमोक्रेटिक नेशन नहीं रह पाएंगे, पूरी तरह यह देश लिंच नेशन बन जाएगा, जिसमें किसी के हिफाजत की गारंटी नहीं होगी।

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