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मासूमियत भरी उम्मीद जगाती: फ़िल्म हामिद

कश्मीर, कश्मीर की स्थिति, वहाँ के लोगों आदि को लेकर विभिन्न माध्यमों ने आपकी सोच को विभिन्न नजरिये से प्रभावित किया होगा।

इसके बारे में सोचते आप किसी-न-किसी पूर्वाग्रह के प्रभाव में आ ही जाते होंगे! किन्तु क्या हो यदि आपको इन सभी परिस्थितियों पर एक मासूम बच्चे की नजर से देखने का अवसर मिले!

जाहिर है तब आप इस पूरे परिवेश को एक ताजे और नए नजरिये से देखेंगे। निर्देशक ऐजाज़ खान की ‘हामिद’ भी ऐसे ही एक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करने का एक सुंदर प्रयास है।

मो. अमीन भट के नाटक ‘फोन नंबर 786’ पर आधारित यह एक संवेदनशील फिल्म है। 7 साल के बच्चे हामिद के माध्यम से कश्मीर के बच्चों की परिस्थितियों और दुविधाओं को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

एक तरफ युद्ध सी स्थिति में फंसे वहां के आम लोग और बच्चों पर उसका प्रभाव साथ ही उनकी मनोदशा का लाभ उठाते प्रयासों, सही-गलत राहें और उनके चयन को लेकर दुविधा…
हामिद (ताल्हा अरशद रेहशी) के पिता रहमत (सुमित कौल) जो ईमानदारी से काम करने वाले एक मेहनतकश कश्मीरी हैं, संवेदनशील हैं, शायरी भी करते हैं और बेशक अपने परिवार से मोहब्बत भी… एक रात बेटे की जिद पूरी करने घर से निकलते हैं तो फिर वापस नहीं लौटते। अपने पति को खोजती इशरत (रसिका दुग्गल) अब ऐसे लापता व्यक्तियों की पत्नियों में शामिल है जो वहां ‘हाफ विडो’ कहलाती हैं।

वो और उनके परिवार उनकी तलाश करते रहते हैं जब तक कि कोई अंतिम सूचना नहीं मिल जाती। हामिद को उसके दोस्त से पता चलता है कि उसके पिता अल्लाह के पास हैं। अपने पिता को वापस बुलाने के लिए उसे कई तरह के रास्ते बताए जाते हैं।

जहां एक शख्स उसे जिहाद, पत्थरबाज़ी और पहाड़ के उस पार जाने का रास्ता बताता है तो दूसरा शख्स उसे अपने पिता का काम सिखाने की बात कहता है।

ये वहां बह रही आज की दो धाराएं हैं, और सच तो यह भी है कि इन दो धाराओं के बीच उसे सही गलत की पहचान करवाने वाली कोई है तो उसकी माँ है, जो उसके जीवन को एक नैतिक बल देने वाली प्रबल माध्यम की भूमिका का निर्वहन करती है।

इन सबके बीच हामिद एक अलग रास्ता चुनता है और अल्लाह के नंबर 786 को अपनी सूझबूझ से एक मोबाईल नंबर में बदल उनसे बात करने की कोशिश करता है।

उसका फोन मिलता है एक CRPF के जवान को, जो स्वयं एक दुर्घटना का शिकार खुद को मान तनाव में है। लंबे समय से छुट्टी न मिले होने, अपने बच्चे के पैदा होने के बाद से उसे देख न पाने की झुंझलाहट उसे अलग है।

हामिद से बात करते वो अपनी सोच को और विस्तृत करता है। वो उसकी सहायता की कोशिश करता है पर उसकी भी एक सीमा है। आखिर वो दिन भी आता है जब अपने पति के लिए बुना जा रहा स्वेटर ईशरत उधेड़ना शुरू कर देती है…
आख़री दृश्य में मां अपने बेटे की बनाई नाव पर जिंदगी की नई राह की तलाश में नई उम्मीद के साथ बढ़ती एक उम्मीद की झलक दिखलाती है, पर पीछे कई संवेदनाएं और सवालात भी छोड़ती हुई… यह हामिद प्रेमचंद के ईदगाह के हामिद से अलग है।

दोनों बच्चे हैं, सरल मासूम, एक अपनी दादी तो दूसरा अपनी माँ के प्रति संवेदनशील; पर इस हामिद के परिवेश और उसकी परिस्थितियों ने उसे और ज्यादा परिपक्व बना दिया है।

किसी भ्रम से अलग वह अपने पिता से मिल सकने की कल्पना को उनकी तस्वीर के साथ कहीं दफ़ना चुका है और अपनी माँ के साथ जो ही अब सच्चाई है एक नई उम्मीद, नए इरादों के साथ नए सफर पर निकल पाने का इरादा कर चुका है, हौसला जुटा चुका है…

फिल्म में सभी का अभिनय अच्छा है, खासकर मुख्य पात्र हामिद (ताल्हा अरशद रेहशी) के अभिनय की निश्छलता बांधे रखती है।

सच कहूँ तो उसकी मासूमियत भरी अभिनय अदायगी बर्फ की शुरुआती खूबसूरत फुहार सी लगती है। पर यही बर्फबारी अनियंत्रित हो जाए तो कश्मीर की जिंदगी को थाम भी देती है। इन बच्चों की इसी मासूमियत, इनकी मुस्कान को सहेजने की जरूरत है।

रविंदर रंधावा और सुमित सक्सेना के संवाद प्रभावी हैं तो जौन विल्मर का छायांकन भी काफी आकर्षक है।
कश्मीरियों विशेषकर बच्चों में लोकप्रिय लोक गीत ‘हुकुस-बुकुस’ से प्रेरित एक गीत की चंद पंक्तियाँ कश्मीर की एक और सुरमयी छवि की छाप छोड़ती हैं…

“हुकुस बुकुस टेल्ली वण चे कुस
ओनुम बाटता लोडुम देअग
शाल कीच कीच वान्गानो…..

तुम हो कौन और मैं हूँ कौन
रहता वो हम तुम में मौन
रूहों के वो जोड़े तार
वही सिखाए दिल को प्यार
वो ही देता धूप में साया….”

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