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January 20, 2020
साहित्य-संस्कृति

‘ नज़र में कोई मंज़िल है तो मौजे-वक़्त को देखो ’

 मशहूर शायर रफ़ीउद्दीन राज़ ने ग़ज़लों और नज़्मों का पाठ किया

पटना. आईएमए हाॅल, पटना में जन संस्कृति मंच ने 21 अक्टूबर को मशहूर शायर रफ़ीउद्दीन राज़ की ग़ज़लों और नज़्मों के पाठ का आयोजन किया.

21 अप्रैल 1938 को बेगूसराय, बिहार में जन्मे रफ़ीउद्दीन राज़ कनाडा और न्यूयार्क में रहते हैं. उनका पैतृक घर दरभंगा में है. जीवन में वे विभाजन और युद्ध की त्रासदी से गुजरे. रोजगार के लिए छोटी उम्र से ही कंडक्टरी और ड्राइवरी से लेकर कई तरह के काम-धंधे उन्होंने किए.

उनकी ग़ज़लों का पहला संग्रह- दीदा-ए-खुशख्वाब 1988 में आया. उसके बाद बिनाई, पैराहने फ़िक्र, अभी दरिया में पानी है, रौशनी के खदोखाल, इतनी तमाजत किसलिए, जो एक दिन आईना देखा, साज़ो-राज़ आदि कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं.

 

डाॅ. अरमान नज़्मी ने उनका परिचय कराते हुए उनके शायर की शख्सियत को बिहार की विभिन्न भाषाओं की काव्य-परंपरा और सांस्कृतिक परंपरा से जोड़कर देखा. उन्होंने कहा कि वे हमारी बिरादरी के ही बिछड़े हुए हमसफ़र हैं, जिनकी मिट्टी की गंध बार-बार बिहार खींच लाती है.

मूलतः ग़ज़लों और नज़्मों की रचना करने वाले रफ़ीउद्दीन राज़ ने ग़ज़लों और नज़्मों के अतिरिक्त कत्आ, रुबाई, दोहे और हाइकू भी सुनाए. उनकी ग़ज़लों में पुराने उस्ताद शायरों की रवायत के साथ-साथ आज की हक़ीक़त के अक्स मौजूद थे. उन्होंने ख़ुद को अम्न का सिपाही बताया और मुहब्बत को बढ़ावा देने पर जोर दिया. अपनी ग़ज़ल में उन्होंने ऊंच-नीच के भेद को ग़लत बताया और कहा कि जब एक जैसे दुख हैं, तो भेदभाव कैसा.

उनका एक शेर मानो ख़ुद उन्हीं के लिए था-

किसी से पूछते क्या हो, ज़बीनों पर नज़र डालो
लकीरें ख़ुद कहेंगी किसने कितनी ख़ाक छानी है।

रफ़ीउद्दीन राज़ ने उर्दू को भारतीय ज़बान बताते हुए कहा कि इस पर यहां की सारी ज़बानों का असर है. उनकी ख़ुशनसीबी है कि आज उनको सुनने वालों में कई ज़बानों के लोग हैं. उन्होंने कहा-

उर्दू ख़्यालों फ़िक्र का एक आसमान है
ये भारती है इसलिए इतनी महान है।

उनकी शायरी जीवन के गहरे अनुभवों का इज़हार लगी. उनके इस शेर को श्रोताओं ने काफ़ी सराहा-

रहगुज़र का मंजर तो एक धोखा है
रास्ता तो क़दमों के अंदर होता है

मौजूदा दौर के ख़ूनी और नफ़रत भरे मंज़र पर उन्होंने सवाल उठाये. उन्होंने कहा-

वो जा रहा है जहां आग की तलब लेकर
गुमां ये है वहां बर्फ़ जम चुकी होगी।

 

 

उनकी शायरी में ग़मों के बीच मुस्कुराने की बात थी, उसमें ज़िंदगी के लिए जद्दोजहद करने की प्रेरणा थी.
रफ़ीउद्दीन राज़ ने कहा-

बसारत है तो हर अनदेखा मंज़र देख सकते हो
जो पत्थर में है पोशीदा वो ठोकर देख सकते हो
नज़र में कोई मंज़िल है तो मौजे-वक़्त को देखो
वगरना तुम भी साहिल से समुंदर देख सकते हो।

संचालन करते हुए जन संस्कृति मंच के राज्य सचिव सुधीर सुमन ने रफ़ीउद्दीन राज़ के तीन शेर सुनाए-

न ख़तरा तीरगी से था न ख़तरा तीरगी का है
दर-ओ-दीवार पे पहरा अभी तक रौशनी का है……

हम से कतरा के गुज़र जा ग़मे-हस्ती
हमलोग दश्त में फूल खिलाने का हुनर जानते हैं….

तुझे छूने की हसरत में आईने का चूर हो जाना
तुम्हें पाने की ख़्वाहिश सरमदो-मंसूर हो जाना

धन्यवाद ज्ञापन शायर संजय कुमार कुंदन ने किया. इस अवसर पर शायर क़ासिम खुर्शीद, कथाकार अवधेश प्रीत, कवि रंजीत वर्मा, अनिल विभाकर, राजेश कमल, अंचित, मो. गालिब, अनीश अंकुर, अनुराधा, पुष्पराज, रंगकर्मी संतोष झा, प्रीति प्रभा, सुमन कुमार, राम कुमार, राजन कुमार, शिवदयाल, सदफ़ इक़बाल, कवि घनश्याम, कवि डॉ. निखिलेश्वर प्रसाद वर्मा, कवि एवं फिल्मकार कृष्ण समिद्ध, शायरा आराधना प्रसाद, संतोष सहर, शायर और लेखक नीलांशु रंजन, शायर ओसामा ख़ान, कलीमुररहमान, परवेज़ आलम, राम कुमार, जीवन प्रसाद वर्मा, विभा रानी श्रीवास्तव आदि मौजूद थे.

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1 comment

Shalini December 4, 2019 at 9:10 am

A commendable and admirable effort to awake the people for their duties. We should join our hands in order to strengthen our hard earned democracy in the present time of suppression…keep it up.

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