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January 19, 2020
खबर

लोकतंत्र व आरक्षण तभी बचेगा जब संविधान बचेगा : उर्मिलेश

2019 में बेराजगारों की फौज खड़ा करने वाली मोदी सरकार को बेरोजगार कर दें – बाला जी
हमें अपने संवैधानिक अधिकारों से कोई नहीं वंचित कर सकता: जस्टिस कर्णन

अनुसूचित जाति/जनजाति कर्मचारी संघ के बैनर से पटना के बापू सभागार में संविधन -लोकतंत्र-आरक्षण बचाओ सम्मेलन, सम्मेलन में सूबे बिहार से हजारों की तादाद में जुटे कर्मचारी

पटना. अनुसूचित जाति/जनजाति कर्मचारी संघ के बैनर से 9 दिसम्बर को पटना के बापू सभागार में संविधान-लोकतंत्र-आरक्षण बचाओ सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें पूरे बिहार से कई हजार दलित व पिछड़े समाज से आने वाले कर्मचारियों ने भाग लिया. इस मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में चर्चित पत्रकार उर्मिलेश, जेएनयू छात्र संघ के वर्तमान अध्यक्ष एन साईं बालाजी, रिटायर्ड जस्टिस कर्णन सहित कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे.

संगठन की ओर से विश्वनाथ चौधरी, बिनोद चैधरी, राजू चैधरी, हरकेश्वर राम, ओमप्रकाश मांझी आदि मौजूद थे.गणमान्य व्यक्तियों में सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट गौतम, तमिलनाुड से एनथोनी डब्लू लाजार्दों, पुलिस के एडीजी एके अंबेदकर भी मंच पर मौजूद थे.

सम्मेलन को संबोधित करते हुए एन साईं बालाजी ने कहा कि जो मोदी सरकार से रोजगार मांगते हैं उन्हें देशद्रोही करार दे दिया जाता है लेकिन जो खुलेआम संविधान जला रहे हैं, हर दिन संविधान की हत्या कर रहे हैं, उन्हें प्रोत्साहित किया जा रहा है. भीमा कोरेगांव में दलितों पर हमला करने वाले खुलेआम घुम रहे हैं लेकिन कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को ‘अर्बन नक्सल’ कहकर जेल में डाल दिया गया है. मोदी सरकार और भगवा ब्रिगेड संविधान-लोकतंत्र व आरक्षण को खत्म कर देने पर आमादा है लेकिन आज पूरे देश में लोग बहादुरी से सड़कों पर उतरकर दलित उत्पीड़न कानून में संशोधन के खिलाफ लड़ रहे हैं. सरकार दलितों की हितैषी दिखने का प्रयास करती है, तो फिर सवाल है कि इन लोगों ने रोहित वेमुला की हत्या क्यों की ?

उन्होंने कहा कि आज पब्लिक सेक्टर को तहस-नहस किया जा रहा है, सीटें काट दी जा रही हैं. प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण नहीं है. इसलिए प्राइवेट सेक्टर को बढ़ावा मिल रहा है. हम प्राइवेट सेक्टर में भी आरक्षण की मांग करने आए हैं. हमें जुमला नहीं, 5 सालों का हिसाब चाहिए. मिड डे मिल, आशा वर्कर, स्कीम पर काम करने वाले अधिकांश लोग दलित-वंचित तबके के हैं, लेकिन इनके लिए सरकार के पास कुछ भी नहीं है. ऐसी सरकार को 2019 में गद्दी से उतारना ही होगा.

चर्चित पत्रकार उर्मिलेश ने कहा कि आरक्षण व लोकतंत्र तभी बचेगा जब संविधान बचेगा. आजाद देश में शायद ही ऐसी कोई सरकार होगी, जिसके मंत्री केंद्र में बैठकर संविधान को बदलने की बात करते हैं. इसके पूर्व वाजपेयी की भी सरकार ने संविधान में संशोधन के लिए एक कमिटी का गठन किया था, लेकिन वह सरकार इतनी ताकतवर नहीं थी इसलिए उसे पीछे हटना पड़ा. आज मोदी सरकार के पास बहुमत है, उसके बल पर वह हिंदुस्तान को लिंचिस्तान बना देने पर आमदा है. कमजोर लोगों के लिए ऐसी बहुमत वाली सरकार ठीक नहीं है, वह कारपोरेट की चाकरी में लग जाता है. गठबंधन की ही सरकार ठीक है. आज यूपी में बुलन्दशहर में इंसपेक्टर की सरेआम हत्या हो रही है, लेकिन यूपी के मुख्यमंत्री कहते हैं कि यह हादसा था. आज हत्यारे ही सत्ता के संचालक बन गए हैं. जो प्रतिरोध में आवाज उठाते हैं, दलितों-आदिवासियों की बात करते हैं, उन्हें अर्बन नक्सल घोषित कर दिया जाता है. 26 जनवरी 1950 को देश में जब संविधान लागू हो रहा था तो डाॅ. अंबेडकर ने कहा था कि हमें राजनीतिक रूप से लोकतंत्र तो मिल रहा है लेकिन सामाजिक व आर्थिक लोकतंत्र के लिए लड़ना होगा. स्थायी रूप से गैरबराबरी को मिटाए बिना यह नहीं होने वाला है.

आजादी की लड़ाई में कई धाराएं थीं, जिनमें मतभेद थे लेकिन वे सब की सब धाराएं देश को आगे ले जाना चाहती थीं, एक मात्र आरएसएस की धारा देश को पीछे ले जाना चाहती थीं. आज सत्ता में पहुंचकर वे संविधान की जगह मनुस्मृति थोपना चाहती हैं. अंबेदकर का केवल नाम लेती है लेकिन उनके विचारों की हत्या कर देना चाहती है. यह देश भगत सिंह-अंबेदकर के रास्ते ही बराबरी के समाज की ओर बढ़ सकता है. हमें आरएसएस व भगवा गिरोह के खिलाफ हर मोर्चे पर र्मोचेबंदी करनी होगी

जस्टिस कर्णन ने कहा कि बाबा साहेब अंबेदकर के कारण ही वे पढ़ लिख सके और पहले मद्रास और फिर बाद में कोलकाता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने. लेकिन न्यायालयों में भी जाति के आधार पर उत्पीड़न होते रहे. खुद उनके साथ कई अमानवीय घटनाएं घटीं और उन्हें प्रताड़ित किया गया. इसलिए हम सबको मजबूती से अपने संघर्ष व एकता को निर्मित करना होगा.

ओमप्रकाश मांझी ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि बिहार में एक बार फिर से दलितों के उपर हमले बढ़ गए हैं. एक तरफ संवैधानिक अधिकारों पर हमले हैं तो दूसरी ओर दलित-गरीबों को उनके पुश्तैनी अधिकारों से लगातार वंचित किया जा रहा है.

संविधान-लोकतंत्र-आरक्षण बचाओ सम्मेलन से पारित प्रस्ताव
1. पटना के बापू सभागार में आयोजित यह सम्मेलन देश की आजादी की लड़ाई के मूल्यबोध पर विकसित और बाबा साहेब द्वारा निर्मित भारत के संविधान पर शासक समूह द्वारा किए जा रहे हमले का पुरजोर विरोध करता है और इसकी रक्षा के आंदोलन को तेज करने का आह्वान करता है. संविधान में वर्णित सामाजिक न्याय, अनुसूचित जाति/जनजाति की सुरक्षा को चोर दरवाजे से खत्म किया जा रहा है. यह सम्मेलन इसका डटकर विरोध करने का आह्वान करता है. 2 अप्रैल की ऐतिहासिक हड़ताल में लादे गए तमाम झूठे मुकदमे वापस लेने की मांग सम्मेलन करता है.

2. प्रोन्नति में आरक्षण और आरक्षण की संपूर्ण संवैधानिक अधिकार को छीनने की कोशिशों के खिलाफ पूरे देश में चल रहे आंदोलन का यह सम्मेलन अभिनंदन करता है. बिहार में हमने अपनी एकजुटता के जरिए बिहार सरकार को कुख्यात शासकीय आदेश 4800 वापस लेने के लिए मजबूर किया है, इसके लिए दलित अधिकार आंदोलन का एक-एक सदस्य सहभागी है. सम्मेलन न्यायपालिका और हर तरह के शिक्षण संस्थानों – सरकारी अथवा निजी में आरक्षण को लागू करने की मांग करता है. केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा दलित व अन्य वंचित छात्रों की छात्रवृत्ति में की गई भारी कटौती को वापस लेने तथा सकल पढ़ाई खर्च आधारित छात्रवृत्ति की नई नीति व योजना बनाने की मांग करता है.

3. विकास मित्र, टोला सेवक, ममता, रसोइया, आशा आदि तमाम स्कीम वर्करों को न्यूनतम मजदूरी आधारित मासिक वेतनमान देने, उन्हें नियमित करने तथा ठेका प्रणाली वापस लेने की मांग यह सम्मेलन करता है.

4. यह सम्मेलन वास-चास की जमीन के लिए संघर्षरत दलित-गरीबों के आंदोलन का समर्थन करते हुए सरकार से मांग करता है कि बिना वैकल्पिक व्यवस्था किए किसी दलित-गरीब को उजाड़ने पर रोक लगाई जाए. सभी को जमीन और सबों के लिए पक्का मकान के सवाल को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया जाए. जल-जंगल-जमीन और अन्य क्षेत्रों से दलितों-आदिवासियों के विस्थापन पर रोक लगाई जाए.

5. मठ-मंदिर आदि की जमीनों को ब्राह्मणवादी-सामंतवादी शक्तियों द्वारा हड़पने तथा उसे आय का साधन बनाने पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग करते हुए यह सम्मेलन दलित-गरीबों के मान-सम्मान, भूमि-शिक्षा-स्वास्थ्य आदि अधिकारों के लिए संघर्ष को और मजबूती से आगे बढ़ाने का संकल्प लेता है. हमें मंदिर-मस्जिद का विवाद नहीं, भूमि-शिक्षा-रोजगार चाहिए.

6. केंद्र व राज्य सरकार की दलित विरोधी नीतियों के कारण आज बिहार सहित पूरे देश में दलितों पर हमले की बाढ़ सी आ गई है. सामंती-ब्राहमणवादी ताकतों का मनोबल एक बार फिर से बढ़ा हुआ है और वे जगह-जगह खुलकर दलितों को प्रताड़ित कर रहे हैं. यह सम्मेलन इन घटनाओं पर रोक लगाने, अपराधियों पर नियंत्रण कायम करने तथा शराबबंदी कानून की आड़ में बिहार के विभिन्न जेलों में बंद तकरीबन एक लाख से अधिक दलित-गरीबों की रिहाई और उनके पुनर्वास की मांग करता है.

7. बिहार के विभिन्न शिक्षण संस्थानों-विश्वविद्यालयों सहित सभी विभागों में आरक्षण की मौजूदा स्थिति पर राज्य सरकार अविलंब श्वेत पत्र जारी करे और शासन के उच्च पदों पर भी दलितों की भागीदारी सुनिश्चत किया जाए.

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