दलितों के घर भोजन: मकसद क्या है, वोट या कुछ और?

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 इतनी बेहयाई कोई शातिर फासिस्ट ही कर सकता है कि जिसके राज में दलितों पर सबसे ज्यादा हमले हो रहे हों, उनके अधिकारों और सुरक्षा को चुन चुन कर खत्म किया जा रहा हो, आज़ादी के कई दशकों बाद हासिल थोड़े बहुत सम्मान व आत्मविश्वास को कुचला जा रहा हो, उसी राज के कारिंदे दलितों के घर खाना खाने की नौटंकी करें। ऐसी नौटंकी करने के लिए अपार धूर्तता की दरकार होती है जो हिंदुत्व की राजनीति के ठेकेदारों के पास ही बची है।
लेकिन अब मनुवादियों की राह इतनी आसान नहीं है। हमले बढ़ने के साथ प्रतिरोध भी तेज़ और धारदार हुआ है।अब मनुवादी सामंती हमलों को झेलने की बजाय उसका यथासंभव मुहतोड़ जवाब भी मिल रहा है। इसलिए बीजेपी-आरएसएस को यह लग रहा है कि दलितों को जोड़े रखना उनके अस्तित्व के लिए जरूरी है।लेकिन दूसरी तरफ उसे असहिष्णु,अलोकतांत्रिक असुरक्षा बोध से ग्रस्त सवर्ण-सामंती खास व आम लोगों को यह भी संदेश देते रहना है कि उनके ‘हितों’ की रक्षा आरएसएस-बीजेपी ही कर सकती है।
इनका ‘हिन्दू राष्ट्र’ का नारा दरअसल इसी तसल्ली के लिए है कि आदर्श हिन्दू जीवन के लिए वर्णव्यवस्था  अनिवार्य है, और बीजेपी के राज में इसी व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए नीतियां बनेंगी और लागू होंगी। आज  नौकरियों और शिक्षा से दलितों की बेदखली की कार्ययोजना तैयार करके दलितों के बीच से महामंडलेश्वर बनाने, राष्ट्रपति बनाने, ब्राह्मण के कंधे पे बिठा कर दलित को मंदिर में प्रवेश कराने और दलितों के घर खाना खाने का पाखण्ड किया जा रहा है।
आरएसएस-बीजेपी यह मानती है कि दलितों के घर भोजन करके वे यह सन्देश देने में कामयाब होंगे कि दलित, हिन्दू समाज का हिस्सा हैं और इनके साथ कोई भेदभाव नहीं होता। इसके जरिये वे एक तीर से कई निशाने लगाने की कोशिश में हैं।एक तो यह कि बरसों से दलितों के बीच से सम्मान की मांग उठती रही है,इस भोज के बाद यह कहा जायेगा कि हम दलितों को सम्मान दे रहे हैं।दूसरा यह कि जब दलित सवर्णों के भाई हैं तो फिर आरक्षण की क्या जरूरत है ?
यानी अगर आरक्षण सामाजिक असमानता का परिणाम है तो यह असमानता कथित रूप से दूर हो गई भोजन करके, इसलिए आरक्षण की जरूरत नहीं है।तीसरा यह कि दलितों को हिन्दू धर्म की मुख्य धारा से जोड़कर मुसलमानों के खिलाफ साम्प्रदायिक विभाजन और चौड़ा किया जाएगा। इस तरह संघ-बीजेपी के पास एक दूरगामी प्रोजेक्ट है।
जिस समय दलितों के घर भोजन की यह नौटंकी चल रही है उसी समय एससी/एसटी एक्ट को कमजोर किया जा रहा है।उसी समय विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर भर्ती में आरक्षित तबकों को बाहर करने की साजिश चल रही है।चन्द्रशेखर रावण जैसे युवा दलित आंदोलनकारी को छल-प्रपंच के जरिये जबरन जेल में रखा गया है। पूरे देश भर में दलितों के खिलाफ हिंसा की बाढ़ आई हुई है।ऐसे में क्या सिर्फ भोजन के पाखण्ड से दलित बहल जाएगा।क्या इतनी असानी से आरएसएस-बीजेपी की रणनीति कामयाब हो जाएगी ?
जाति उन्मूलन आज के समय की मांग है लेकिन क्या वह मात्र दलितों के घर भोजन करने से होगी ? यह बताने की जरूरत नहीं है कि आरएसएस जाति उन्मूलन नहीं,जाति का पुनर्जीवन चाहता है।लेकिन अगर वास्तव में वे दलितों की अपनाना चाहते हैं तो जैसा कि डॉ. अम्बेडकर ने कहा था उन्हें अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देना चाहिए। यह सवाल पूछना चाहिए कि भाजपा दलितों के घर भोज के बाद अब अंतरजातीय विवाह और प्रेम की संस्कृति को बढ़ावा देने का कार्यक्रम लेगी ?
    1936 में अपने मशहूर लेख ‘जाति प्रथा उन्मूलन’  में बाबा साहब अम्बेडकर ने लाहौर के जाति पांति तोड़क मंडल को समझाते हुए कहा था कि ‘ ‘अंतरजातीय खान-पान की व्यवस्था जाति-भावना या जाति बोध को समाप्त करने में सफल नही हो पाई है। मुझे पूरा विश्वास है कि इसका वास्तविक उपचार अंतर्जातीय विवाह ही है।’ आगे उन्होंने कहा कि “रोटी – बेटी के सम्बंध के लिए आंदोलन करना और उसका आयोजन करना कृत्रिम साधनों से किये जाने वाले,बलात भोजन कराने के समान है। प्रत्येक पुरुष और स्त्री को शास्त्रों के बंधन से मुक्त कराइये,शास्त्रों द्वारा प्रतिष्ठापित हानिकर धारणाओं से उनके मस्तिष्क का पिंड छुडाइये,फिर देखिए वह आपके कहे बिना अपने आप अंतर्जातीय खान-पान तथा अंतरजातीय विवाह का आयोजन करेगा/करेगी।”
क्या संघ-भाजपा हिंदुओं को शास्त्रों और धर्म के बंधन से आज़ाद करने का आंदोलन चलाएगी ? यह उम्मीद है भी नहीं,लेकिन उन्हें कम से कम दलितों के भोजन का मान तो रखना चाहिए।

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