जनमत

साइकिल चिंतन : विजय कुमार

तस्वीर: कनैया, साभार गूगल

 

सड़क पर तरह-तरह के वाहनों की एक सामूहिक गति होती है – अक्सर खौफनाक और हिंसक गति. अंधाधुंध गति और रेल-पेल के बीच एक मिनट के लिए किसी साइकिल सवार पर नज़र डालिए.

क्या ऐसा नहीं लगता कि सड़क पर सामूहिक गति के समानान्तर एक वैयक्तिक गति भी है? गति की यह त्वरा संवेदना, बुद्धि और तर्क की ताकत से चालित है. हर साइकिल सवार राह के अवरोधों के साथ बड़ी जल्दी अपना सामंजस्य बिठा लेता है.

उसमें एक गज़ब का लचीलापन है. गति उस पर भूत की तरह सवार नहीं है. साइकिल सवार की अपनी इच्छा कभी उसका दामन नहीं छोड़ती.

बड़े शहरों में संवेदना, बुद्धि और तर्क के साथ रफ्तार का तालमेल बिठाते ये लोग कौन है? काले शीशों वाली सरपट दौडती घमंडी कारों के बीच अब जब भी कोई साइकिल सवार दिखाई पड़ता है तो वह या तो हैंडिल पर सब्ज़ी का झोला लटकाये घर आता कोई मजदूर होता है या छोटे-छोटे मासूम स्कूली बच्चे अथवा दूध के हंडे वाले, अंडे और पावरोटी वाले, डाकिये, परचूनिये, फेरीवाले, अखबार वाले और इस तरह तमाम लोग.

सभ्यता के इतिहास में पहिये के आविष्कार के बाद साइकिल शायद सबसे अधिक रूमानी सवारी रही है. सड़क पर तमाम तरह के वाहनों की भीड़ में साइकिल अहिंसक वाहन है.

उसकी धीमी रफ्तार में एक तरह की मानवीयता रची बसी है. यह एक ऐसा वाहन है जो पैदल राह चलते आदमी के साथ दोस्ताना ताल्लुक रखता है. साइकिल सवार अमूमन एक उत्फ़ुल्ल, उन्मुक्त और धीरज से भरा इंसान होता है. वह रफ्तार की जरूरत तथा उसकी व्यर्थता दोनों को जानता है.

साइकिल सवार एक पैदल आदमी के कंधे पर हाथ रखे आराम से गपियाते चल सकता है. सड़कों पर साइकिल सवार और पैदल आदमी की यह जुगलबंदी हमेशा संगीत की लय से भरी लगती है. उसमें एक भरोसा है, एक मासूमियत है, एक कविता है, सड़क और आदमी के संबंधों की उष्मा और एक मधुर मिलन है.

दूर से साइकिल पर लहराते आते किसी अलमस्त किशोर को देखकर क्या आप सहसा ठिठककर खड़े नहीं हो गये हैं ? वह पल जब आप अपनी जगह पर खड़े हैं, वह मुस्कराता, गाता हुआ सर्र से बगल से निकल जाता है. एक पल सिर झुका कर सड़क को देखता है, दूसरे पल सामने, तीसरे पल दायें, चौथे पल बायें.

आगे जाकर वह क्षण भर पीछे मुड़कर भी देखता है और आपको अपनी ओर लगातार ताकता हुआ पाकर पलभर शर्माता है. साइकिल कभी इस तरफ झुकती है कभी उस तरफ. उसकी जुल्फें हवा में लहराती हैं और उसकी कमीज़ किसी फूले हुए गुब्बारे की तरह है.

हवा उसके चारों तरफ ही नहीं उसके समूचे बदन में भी भरी हुई है. गति लेने उसकी पीठ धनुष की तरह झुकती है और अगले पल गर्व से अकड़ जाती है. उसके कूल्हे सीट के कभी इस तरफ तो कभी उस तरफ.

उसकी पिंडलियाँ धुली हुई पीतल की कटोरियों की तरह दूर तक चमकती जाती हैं. और इस सबके साथ हवा में तैरती चली जाती है उसके कंठ से फूटी एक दिलकश स्वर रागिनी- “ है अपना दिल तो आ ss वाss रा ss , न जाने किस पे आयेगा’ “.

सड़क पर दुर्घटनाएं होती रहती हैं पर दो साइकिल सवारों की टक्कर कभी भी दुर्घटना शब्द के दायरे में नहीं आती. दो साइकिल सवार टकराते हैं, गिरते हैं, धूल झाड़ते हैं, मुस्कराते हैं और विपरीत दिशाओं में चले जाते हैं.

भीड़ के बीच से साइकिल गुजरती है और भीड़ का हिस्सा बनी रहती है. गति और ठहराव का ऐसा द्वंद्वात्मक रिश्ता आदमी को इंसान बनाता है. यहाँ यंत्र आदमी से बड़ा नहीं है. आदमी जब चाहे इस यंत्र से उतर कर राहगीर बन जाता है.

जब साइकिल सवार पैदल चलता है तब यंत्र एक आज्ञाकारी बालक की तरह सिर झुकाये उसके साथ साथ चलता है. जिन साइकिलों में ब्रेक नहीं होते वे भी बड़ी दुर्घटनाएं नहीं करतीं. ब्रेक लगाने से पहले आदमी घंटी बजाता है जिसकी आवाज मधुर होती है.

साइकिल सबसे ज्यादा आत्मनिर्भर वाहन है. इसकी वजह से आदमी को तेल के कुएं नहीं खोदने पड़े, हवा में प्रदूषण नहीं फैला, राह बनाने के लिए पेड़ नहीं काटे गये, पहाड़ों का सीना नहीं रौंदा गया.

साइकिलों ने पहियों में ठीक- ठाक हवा, पुर्जों में थोड़ा सा तेल, बैठने लायक सीट और एक काम चलाऊ घंटी के अलावा आदमी से कभी कुछ नहीं मांगा. वे गउओं चुपचाप कहीं भी खड़ी हो जाती हैं. अपनी अद्वितीयता के प्रमाण के लिए वे नंबर प्लेट भी नहीं चाहतीं.

पिछली सदी में जिन दूरियों को साइकिलों ने नापा उनमें एक बीता हुआ युग छिपा है. जीवन सरल था, ज्यादा पेचीदगियाँ नहीं थीं, दूरियाँ कम थीं. इस छोटी सी दुनिया में हर कोई हर किसी से परिचित था. जब दूरियाँ कम थीं तो वक्त ज्यादा था ,रफ्तार से आदमी की जिंदगी का अलग तरह का रिश्ता था. उसके अनुभव अलग थे. जिन दूरियों को आदमी ने तय किया उनमें मुकाम ही सबकुछ नहीं था, राहों की भी अहमियत थी.

हर साइकिल सवार तार सप्तक गाता हुआ राहों का अन्वेषी था. रास्ता चलते कुछ दुआ सलाम होती रहती थी, खैरियत का लेन-देन होता था. पहुँचने की फिक्र थी तो राह की तसल्ली भी थी – एक मंथर गति और एक अलमस्त चाल. साइकिल चिकनी सपाट सड़कों पर चली तो धूल भरी पगडंडियों, बीहड़ रास्तों और खाई खंदकों में भी निर्विकार रही. बंधी लीक छोड़ आदमी जब भी कच्चे रास्ते पर उतरा साइकिल उसके साथ थी.

जब भी एक दोस्त ने दूसरे दोस्त को अपनी साइकिल पर बिठाया तो उसमें एक शरीर का भार खींचने की उदारता थी. प्रेमी-प्रेमिका के बीच साइकिल ने अंतरंगता के अनिर्वचनीय क्षण जुटाये. भाप के इंजन की सीटी हमारी नींद में गूंजती रही और साइकिल की घंटी किसी खोये हुए सुख की धुन बजाती रही.

जॉर्ज बेर्नार्ड शॉ ने साइकिल को एक साहित्यिक आदमी की पूंजी कहा था. पूंजी यानी अनुभवों का कच्चा माल. वे स्वयं लंदन के पार्कों में साइकिल चलाते अक्सर दिखाई पड़ते थे.

भारत में बीसवी सदी के प्रथमार्द्ध में लिखे कथा साहित्य में जगह-जगह साइकिल दिखाई देती है. यह शोध का विषय है कि प्रेमचंद की कौन कौन सी कहानियों में साइकिल के दर्शन होते हैं. इन कहानियों में जब साइकिल पर कोई पात्र आ रहा होता है या जा रहा होता है तो वहाँ कौन-सी परिस्थितियाँ चित्रित हो रही होती हैं? कौन से लोग इन साइकिलों पर चलते दिखाई देते हैं? सरकारी वकील, दफ्तर के बड़े बाबू, कस्बे के डॉक्टर, कालेज के हॉस्टल में रहने वाला कोई नवयुवक या पुलिस का दरोगा.

आज भी बार बार देखी जाने योग्य उन पुरानी लोकप्रिय श्वेत-श्याम फिल्मोँ में कुंदनलाल सहगल, अशोक कुमार, करण दीवान, शेख मुख्तार, जयंत, बलराज साहनी, देवानंद, अजित, राजकपूर, दिलीप कुमार, सुनील दत्त जब तब साइकिलों पर चढ़े दिखाई देते हैं. टिफिन बॉक्स साइकिल के हैंडल पर लटकाये हुए ये सीधे साधे पर अलमस्त लोग हैं – अपनी सीमित सी जिंदगी में खुशहाल. नर्गिस, नूतन और आशा पारिख जब साइकिल चलाती दिखती हैं तो वहाँ नये जमाने की एक पढ़ी लिखी आज़ाद ख्याल लड़की का बिंब उभरता है.चार्ली चैपलिन की फिल्मों में साइकिल से जुड़े अनेक करूण-हास्य के प्रसंग हमारी यादों में हैं.

यूरोप के सिनेमा में नवयथार्थवादी आंदोलन को शुरू करने वाले मशहूर इतालवी निर्देशक डि सिका की उस महान फिल्म ‘बाइसिकिल थीफ’ को भला कौन भूल सकता है? युद्ध से पहले के मंदी के वे दिन जब फिल्म का नायक अपने बच्चे को साइकिल पर बिठाये काम खोजने जाता दिखाई है. बाद में उसकी भयावह बेकारी और परेशानी का वह समय. उसे थोड़े से पैसों के लिए अपनी साइकिल बेचनी पड़ती है. और एक दिन किसी और की साइकिल चुराने पर वह पकड़ा जाता है और उसकी समूची जिंदगी बदल जाती है. एक गहरी तकलीफ की असाधारण फिल्म – ‘बाइसिकिल थीफ’.

19 वीं सदी जब समाप्त हो रही थी तो तोलस्तॉय ने सड़सठ साल की पकी उम्र में साइकिल चलाना सीखा था. काले चोगे मेँ एक भव्य बूढ़े को साइलकिल पर सवार देख उनकी इस्टेट के एक किसान ने कहा कि “ तोलस्तॉय ईसाई भी हैं और साइकिल भी चलाते हैं , ये दोनों बातें एक साथ कैसे संभव हैं “ एल्बर्ट आइंस्टीन ने अपने बेटे से कहा था कि ” जीवन साइकिल चलाने की तरह है । अपना संतुलन बनाए रखने के लिए आपको लगातार चलते रहना होता है।”

पर आज मन उदास है. इक्कीसवीँ सदी के इन वर्षों में धीमी और इत्मीनान वाली रफ्तार का जमाना बीता हुआ ज़माना माना जा रहा है. कुछ दिन पहले हमारे मोहल्ले में जुम्मन मियाँ की साइकिल की पुरानी दूकान बिक गयी. वहाँ अब एक ब्यूटी पार्लर खुला है. कभी-कभी किसी सूनी सड़क पर देर रात जब कोई तनहा साइकिल सवार दिखता है तो मुझे चेखव की किसी कहानी की याद आती है.

 

(डॉ. विजय कुमार, लेखन विधा-कवि, आलोचक, निबन्धकार, अनुवादक. जन्म: 11 नवम्बर 1948 (मुम्बई) शिक्षा : एम.ए.पीएचडी (मुंबई विश्वविद्यालय)

प्रकाशित कृतियाँ –

कविता संग्रह – 1.अदृश्य हो जायेंगी सूखी पत्तियां”(1981) 2.चाहे जिस शक्ल से (1995) 3. रात पाली (2006) 4. मेरी प्रिय कविताएं ( 2014)

आलोचना पुस्तकें: 1. साठोत्तरी हिन्दी कविता की परिवर्तित दिशायें (1986) 2. कविता की संगत (1996) 3. कवि-आलोचक मलयज के कृतित्व पर साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित मोनोग्राफ़ (2006) 4. कविता के पते-ठिकाने (2014)

वैचारिक निबन्ध – 1. अंधेरे समय में विचार (2006) बीसवीं सदी के युद्धोत्तर यूरोपीय विचारकों पर पुस्तक 2. खिड़की के पास कवि ( 2012 ) (विश्व के 18 प्रमुख कवियोँ पर समीक्षात्मक निबन्ध

सम्मान-पुरस्कार – कविता के लिए ‘शमशेर सम्मान, (1996) कविता की संगत ‘पुस्तक पर देवीशंकर अवस्थी सम्मान (1997) समग्र लेखन पर प्रियदर्शिनी अकादमी सम्मान (2008) महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का सम्मान (2012)

व्यवसाय- प्रारम्भ में नवभारत टाइम्स मुंबई में उप संपादक। बाद में बैंक में हिन्दी अधिकारी।

सम्प्रति – आईडीबीआई बैंक मुम्बई प्रधान कार्यालय में राजभाषा विभाग के महाप्रबंधक पद से सन् 2005 में स्वैच्छिक अवकाश। इन दिनों स्वतन्त्र लेखन।)

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