भिखारी ठाकुर लिखित ‘ गबरघिचोर ‘ के मंचन के साथ नाट्योत्सव का समापन

‘कोरस’ नाट्य समूह द्वारा ‘आज़ाद वतन-आज़ाद जुबाँ’ नाट्योत्सव का तीसरा दिन 
-नुक्कड़ ‘भगत सिंह की जिंदगी के आखिरी 12 घंटे’ व जनगीतों की प्रस्तुति रंगालय परिसर में हुआ 
पटना, 5 जून. पटना के कालिदास रंगालय में ‘कोरस’ नाट्य समूह द्वारा आयोजित ‘आज़ाद वतन-आज़ाद जुबाँ’ नाट्योत्सव के तीसरे दिन 3 जून की शाम को प्रस्तुतियाँ शुरू हुईं.
प्रस्तुतियों में पहली ‘भगत सिंह की ज़िंदगी के आख़िरी बारह घंटे’ थी. वरिष्ठ पत्रकार रेहान फ़ज़ल के लेख पर आधारित इस नाटक का निर्देशन पटना के युवा नाट्य निर्देशक और साहित्यकार प्रभात झा ने किया है.
शहीदे-आज़म भगत सिंह की ज़िंदगी के आख़िरी 12 घंटों, फाँसी का फंदा चूमने के पहले के ठीक 12 घंटों का वर्णन करता यह नाटक सिर्फ़ घटनाओं ही नहीं, बल्कि एक युवा कैसे भगतसिंह में बदल जाता है, इस परिघटना को बी बारीकी से दिखाता है. नाटक यह भी दिखाता है कि भगतसिंह ने धीरे-धीरे कैसे ‘विचारों की सान पर क्रांति की तलवार’ तेज़ की.
नुक्कड़ के पहले ‘स्ट्रग्लरर्स’ नाम की पटना की नवयुवकों/नवयुवतियों  की टीम ने जनगीत पेश किए. जनकवि गोरख और बिस्मिल अजीमाबाद के गीतों को उन्होंने गाया.
दूसरी नाट्य प्रस्तुति थी ‘ गबरघिचोर ’. निर्देशक थे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित और अपने काम की गहनता से दर्शक समुदाय का ध्यान खींचने वाले युवा निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन.  भोजपुरी के नामी कवि-नाटककार भिखारी ठाकुर का यह नाटक अभी भी प्रासंगिक है.
‘गबरघिचोर’ सामाजिक संरचना में स्त्री की जगह, महिला-पुरुष सम्बंध और विभिन्न क़िस्म की सांस्कृतिक सत्ताओं से हमारा साक्षात कराता है. अभिनय की दृष्टि से कलाकारों ने नाट्यकथा को दर्शकों के आगे जीवंत किया और अपने संगीत से मोहित.
तीन दिवसीय नाट्योत्सव का समापन समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय के वक्तव्य से हुआ।

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