शतवर्ष स्मरण : देबब्रत मुखोपाध्याय (1918-1991)

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 ( समकालीन जनमत के ‘ तस्वीरनामा ’  में इस बार चित्रकार देबब्रत मुखोपाद्ध्याय पर एक विशेष लेख और उनके चित्रों का एलबम प्रकाशित कर रहें हैं.  यह वर्ष देबब्रत मुखोपाद्ध्याय का जन्म शताब्दी वर्ष है और इस लेख के माध्यम से हम समकालीन जनमत की ओर से देबू दा को क्रांतिकारी सलाम पेश करते हैं. आज देबब्रत मुखोपाध्याय के जन्मशती वर्ष पर उन्हें याद करना, हमारे देश के उन क्रांतिकारी चित्रकला को याद करना है , जिसे सरकारी कला अकादमियाँ और गैरसरकारी गैलरियाँ जनता तक कभी नहीं पहुँचने देना चाहेंगी )

 

फैले गये हाथ दो

चिपका गये पोस्टर
बाँके तिरछे वर्ण और
लाल नीले घनघोर
हड़ताली अक्षर

– मुक्तिबोध

हमारे देश में , रेडिकल और जनपक्षधर चित्रकार कम नहीं हुए , ये बात और है कि हम उन्हें और उनके कामों के बारे में कम जानते है. पिछले कुछ वर्षों से सभी वामपंथी सांस्कृतिक संगठनों ने इस दिशा पर काफी काम किया है , जिसके चलते देश के कई छोटे-बड़े प्रांतों के आम लोग आज चित्तप्रसाद, ज़ैनुल आबेदिन, भाऊ समर्थ सरीखे जनोन्मुख चित्रकारों को हुसैन-रज़ा-सूज़ा जैसे बाज़ार के स्टार कलाकारों से कम नहीं जानते. अरबों रुपये के वैश्विक कला बाज़ार में , जहाँ कलाकार को बनाने-मिटाने की साज़िश में सरकारी संग्रहालय-अकादमियाँ , नीलाम घर , आर्ट गैलरियाँ  और परोपजीवी छद्म कला-समीक्षकों का गिरोह सम्मिलित रूप से कार्यरत हो , वहाँ मूल रूप से केवल काले-सफेद रंगों से, सस्ते कागज़ों पर जनता के जीवन संघर्षों के विभिन्न पहलुओं को अमर करते इन चित्रकारों और उनके चित्रों को यदि सभी वाम सांस्कृतिक संगठन सम्मिलित रूप से आम जनता तक पँहुचा सकी है , तो इसे निश्चित रूप से सत्ता संस्कृति के समानांतर , प्रतिरोध की संस्कृति की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए .

भारत में छात्र , मजदूर , किसानों के तमाम आन्दोलनों में संस्कृतिकर्मियों की जरूरी पर परोक्ष भूमिका रही है.  परिवर्तनकामी इन लड़ाइयों में संगीत-साहित्य-रंगमंच के साथ साथ चित्रकला ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है. कवि मुक्तिबोध ने अपनी कविता में इन अनाम राजनीतिक एजिट-प्रॉप चित्रकारों की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया है .

फिलहाल तसवीरें
इस समय हम
नहीं बना पायेंगे
अलबत्ता पोस्टर हम लगा जाएँगे।
हम धधकायेंगे।
मानो या मानो मत
आज तो चंद्र है, सविता है,

पोस्टर ही कविता है !!

दरअसल , मुक्तिबोध अपनी कविता में ,मानव मुक्ति के युद्ध के ऐसे ही ऐतिहासिक मुहूर्त को चिन्हित करते हैं , जब चित्रकार तस्वीरें बनाने के बदले पोस्टर बनाना जरूरी समझता है और जब कवि  मानता है कि   ‘ पोस्टर ही कविता है ! ‘

देवब्रत (या देबब्रत क्योंकि बांगला में शायद व ध्वनि नहीं है ) मुखोपाध्याय , जिन्हे प्यार से दोस्तों नें ‘ देबू ‘ और ‘ देबूदा ‘ के नाम से ही पुकारा ; एक ऐसे क्रांतिकारी कलाकार थे जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी जनता के संघर्षों के सहयात्री के रूप में काम किया. देवब्रत मुखोपाध्याय का जन्म 25 दिसम्बर1918 में कलकत्ते में हुआ था . उनके पिता अचिंत्य कृष्ण मुखोपाध्याय ‘ युगान्तर ‘ नाम के भूमिगत क्रांतिकारी संघटन से जुड़े हुए थे , इसलिए बहुत छोटी उम्र से देवब्रत मुखोपाध्याय को अपने पिता और उनके मित्रों की क्रांतिकारी गतिविधियों को देखने-समझने का अवसर मिला.

अचिंत्य कृष्ण मुखोपाध्याय , भारत की आज़ादी के लिए समर्पित उन व्यक्तियों में से थे , जो इस देश में पहले-पहल मार्क्सवाद की ओर आकर्षित हुए थे. पेशे से वे   वकील थे  पर चटकल मज़दूर संगठन के उपाध्यक्ष के रूप में भी सक्रिय थे. युवा देवब्रत के लिए वे केवल पिता ही नहीं, बल्कि दोस्त और मार्ग दर्शक भी थे.

देवब्रत मुखोपाध्याय को बचपन से ही चित्रकला में विशेष रूचि थी.  उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था ,” वे लोग जो भूमिगत क्रांतिकारी थे , जनता के बीच अपना परिचय छिपाकर रहते थे. वे विभिन्न संगठनों में सांस्कृतिक कार्यक्रम करते थे. मैं बचपन से ही चित्र बनाता था और चूँकि तभी से मैं संघर्षरत जनता की जिंदगी को करीब से देख-समझ सका था , इसलिए मैंने अपनी पूरी उम्र , उस जनता को ही अपने चित्रों में दिखाने की कोशिश की. “

अपने बनाए हुए पहले राजनीतिक पोस्टर के बारे में , देवब्रत मुखोपाध्याय ने यूँ याद किया था , ” सन 1939 का समय था जब स्कॉटिश चर्च कालेज के छात्रों ने हड़ताल की . उन दिनों आरकार्ट साहब कालेज के प्रिंसिपल थे. सुभाष चन्द्र बोस जेल से रिहा हुए थे. छात्र कालेज में उनका सम्मान करना चाहते थे जिसकी इज़ाज़त प्रिंसिपल ने नहीं दी. इस पर छात्रों ने हड़ताल की घोषणा की , जो स्कॉटिश चर्च कालेज के इतिहास में पहली बार हुआ था. मुझसे इस विषय पर कुछ चित्र बनाने के लिए कहा गया.  मेरे जीवन का यह पहला राजनीतिक पोस्टर था.  इस पोस्टर के बाद आज तक कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए मैंने पाँच हज़ार से भी ज्यादा पोस्टर बनाये हैं….. वे सभी न जाने कहाँ खो गए हैं.  दरअसल, वे किसी आंदोलन की फौरी जरूरतों के लिए बनाए गए थे. लिहाज़ा उनकी भूमिका की मियाद कम थी. स्कॉटिश चर्च कालेज के छात्र आंदोलन के लिए बनाया हुआ मेरा पहला पोस्टर आज भी मुझे याद है ! “

देवब्रत मुखोपाध्याय बहुत मेहनती चित्रकार थे. उन्हें स्कूली लिखाई-पढाई से ज्यादा चित्र बनाने में रूचि थी.  कक्षा दस की पढाई बीच में छोड़ कर वो घर से भाग गए थे. बाद में घर वालों ने उन्हें तत्कालीन बंगाल के कई प्रमुख कला शिक्षण संस्थानों में उन्हें भर्ती कराया पर वे कहीं भी नहीं टिक सके. देवब्रत मुखोपाध्याय ने हालाँकि कला विद्यालय की विधिवत पढाई पूरी नहीं की पर वे आजीवन एक ईमानदार सक्रिय चित्रकार बने रहे.

उन दिनों , कलकत्ता शहर की दीवारों पर चित्रकला के गुणों से सम्पन्न उन्नतमान के पोस्टरों की शुरुआत करने का श्रेय भोला चट्टोपाध्याय ( जो वी. सी. के नाम से ही ख्यात थे ) को जाता है. भोला चट्टोपाध्याय एक सजग चित्रकार थे जो यूरोप के अवाँ-गार्द कला आंदोलन से प्रभावित थे . वे उन दिनों ‘ आर्ट रिबेल सेंटर ‘ नाम की कला संस्था के सक्रिय सदस्य थे. इस संस्था में उस समय के कई प्रतिभाशाली चित्रकार सदस्य थे.  देवब्रत मुखोपाध्याय हालाँकि स्वशिक्षित चित्रकार थे पर भोला चट्टोपाध्याय के साथ रह कर उन्होंने चित्रकला के बारे में काफी कुछ जाना-समझा. देवब्रत मुखोपाध्याय ने आगे चल कर काले रंग की तेज रेखाओं को आधार बना कर अपनी एक व्यक्तिगत शैली विकसित की. उनके पास छापा-चित्र बनाने की सुविधा नहीं थी , इसलिए उन्होंने कम समय में ज्यादा पोस्टर बनाने की चुनौती को समझते हुए अपनी इस शैली को विकसित किया था.

भारत की प्रगतिशील चित्रकला का यह एक बेहद महत्वपूर्ण पक्ष है  कि सभी प्रगतिशील चित्रकारों ( यहाँ ‘ प्रगतिशील ‘ शब्द का सम्बन्ध ‘ प्रगतिशील कलाकार संघ ‘ या पी ए जी के सदस्य चित्रकारों से नहीं है ) ने अनिवार्य रूप से काले – सफेद रंगों में ही अपने चित्र बनाए थे . यह सत्य हमेँ और भी ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है जब हम पाते है कि इसके पीछे किसी दल या संगठन के सम्मिलित निर्णय नहीं था और न ही ये सभी चित्रकार एक दूसरे के कामों से सीधे  परिचित या प्रभावित थे.

देवब्रत मुखोपाध्याय ने मोम और काले रंग के प्रयोग से कई ऐतिहासिक चित्र भी बनाए थे ( देखें चित्र ‘1890 का सन्दीप का किसान विद्रोह ‘ और ‘ किसानों का अभियान ‘ ).  इस शैली में हम ज्यादा चित्रकारों को काम करते नहीं पाते हैं . देवब्रत मुखोपाध्याय के अलावा  यह ज़ैनुल आबेदिन का भी प्रिय माध्यम था ( देखें चित्र ) . पर जहाँ तक काले सफेद रंगों के प्रयोग का सम्बन्ध है , सोमनाथ होर , चित्तप्रसाद ,कमरुल इस्लाम , गोवर्धन आश , ज़ैनुल आबेदिन , सुधीर खस्तगीर , देवब्रत मुखोपाध्याय और रामकिंकर बैज सरीखे तमाम चित्रकारों के अधिकांश जनपक्षधर चित्रों की  यह एक प्रमुख उल्लेखनीय विशेषता रही है.

देवब्रत मुखोपाध्याय एक ऐसे विरल प्रगतिशील और जनपक्षधर कलाकार थे जिन्होंने बिना किसी भेद भाव के सभी वामपंथी दलों के लिए काम किया . इस विषय में उन्होंने बड़े दिलचस्प ढंग से अपनी बातें कहीं थीं .  ” जब कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन हुआ (1964) तो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों ने मान लिया  कि मैं सी पी आई (भाकपा) के साथ हूँ. उस समय श्रद्धानन्द पार्क (कलकत्ता) में सी पी एम (माकपा) के छात्र संगठन का एक सम्मेलन होने वाला था.  संगठन के छात्रों ने, जो मुझे बहुत चाहते थे अपने नेताओं की परवाह किये बगैर मुझसे इस सम्मेलन के लिए पोस्टर बनाने के लिए कहा.  मैंने बेहिचक उन्हें पोस्टर बना कर दिये. ठीक ऐसे ही नक्सल आंदोलन के दौर में सुशीतल रायचौधरी ने मुझसे माओ त्से तुंग का चित्र बनाने के लिए कहा जिसे वे दीवारों पर लगाना चाहते थे. उन लोगों ने मेरे बनाए हुए चित्र के स्टेंसिल्स काटे और पूरे बंगाल में दीवारों पर बहुत बड़ी तादाद में पोस्टर बनाये. इस तरह कम्युनिस्टों यानि वामपंथियों ने मेरे पोस्टरों का बड़े पैमाने में उपयोग किया. “

” अभी हाल ही की बात है , मिदनापुर में किसान सभा का कार्यक्रम होना था. सीपीआई  (भाकपा) के किसान मोर्चे के एक नेता ने मुझसे इस कार्यक्रम के लिए पोस्टर बनाने के लिए कहा.  मैंने एक पोस्टर बनाया, जिसमे किसानों के एक जुलूस को दिखाया गया था. नीचे लिखा था , ‘ जान देंगे , जान लेंगे ! जमीन पर अपना हक़ नहीं छोड़ेंगे !! ‘ 5000 पोस्टर छापे गए.  उन दिनों गोपीबल्ल्भपुर में नक्सली बेहद सक्रिय थे. मैं जानता था कि भाकपा के लिए ‘ जान देना ‘ तो चल सकता था , ‘ जान लेने ‘ वाली बात उनके गले के नीचे नहीं उतरेगी और उन्हें यह नक्सली पोस्टर लगेगा. पर सच तो यह था , कि  किसानों पर हमलों के खिलाफ क्या किसान हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे ? नहीं , वे भी पलटवार करेंगे ! इसीलिए मैंने यह पोस्टर बनाया था. मैं किसी  पार्टी का सदस्य नहीं था , मैंने अपने दिल से जो उचित समझा – बनाया .  “

पोस्टर/ चित्र बनाने के दो रोचक अनुभव

” मैंने अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस से लेकर तमाम अन्य किसान , छात्र , मज़दूर संगठनों के लिए न केवल पोस्टर और चित्र ही बनाए , मैंने उनके सम्मेलनों की मंच सज्जा भी की.

एक बार मुझे एक किसान सम्मेलन के मंच सज्जा के लिए कहा गया.  मैंने एक किसान जोड़े को बनाया , जो खेत में साथ – साथ काम करते धान की रोपाई करते दिख रहे थे. स्वाभाविक है कि इस काम को करते हुए शरीर को झुकाना पड़ता है और महिलाओं के वक्ष-आवरण काफी हद तक खुल से जाते हैं .  मेरे चित्र में खेत में काम करती औरत, ऐसी ही दिखी. बूढ़े , दकियानूस कामरेडों को यह आपत्तिजनक लगा , उनकी नैतिकता को ठेस पहुँची थी.  मुझे बुला कर वे भला बुरा कहने लगे. पर मेरा कसूर कहाँ था , यह मेरी  समझ में नहीं आया. मैंने तो जो देखा था वही बनाया था ! कुछ देर तक मेरे और आयोजकों के बीच बहस चलने के बाद यह तय किया गया कि सम्मेलन में शामिल होने वाले माँ-बहनों को पहले इसे दिखा कर पूछा जायेगा कि चित्र उन्हें मान्य है या नहीं. जैसा मैंने सोचा था वही हुआ , वे आयीं और चित्र को देखने के बाद , उन्हें इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा !

ऐसा ही एक बार एक मज़दूर संगठन के सम्मेलन के मंच के बैक-ड्रॉप पर मैंने स्टालिन को भारतीय मज़दूरों का नेतृत्व करते दिखाया. मैंने एक विशाल जुलूस को बनाया था , जिसके सबसे आगे एक मज़दूर था जिसकी शक्ल स्टालिन से मिलती थी. इस चित्र को देख कर कई नेता मुझ पर बरसने लगे , ‘ ये कैसे हो सकता है ?  यह नहीं चल सकता , आदि आदि ‘ । इस बार भी सम्मेलन में भाग लेने वाले आम मज़दूरों से पूछा गया और इस बार भी किसी को मेरे चित्र में कुछ भी गलत नहीं लगा !

मैंने हरदम आम जनता के विवेक पर भरोसा किया है ।  दो-चार व्यक्ति या नेता कया समझते है या क्या कहते हैं , इसकी परवाह कभी नहीं की, मैंने !

देवब्रत मुखोपाध्याय कहते थे , कि  ” कम्युनिस्ट कलाकारों को अनिवार्य रूप से जनता के पास जाना होगा.  मेरा मानना है कि हर कम्युनिस्ट चित्रकार को जनता के दरवाजे तक जाना होगा और जनता के हाथों तक अपने चित्रों को पहुँचाना होगा.

मैंने कम्युनिस्ट पार्टी के लिए हज़ारों पोस्टर बनाये. ये पोस्टर विभिन्न मीटिंगों , जुलूसों में प्रदर्शित होते रहे. लगातार ऐसे प्रदर्शनों के चलते जनता में उनके प्रति एक समझदारी बनी और उनकी माँग भी बढ़ी . पर मेरे मन में इस बात को लेकर एक सूक्ष्म अपराधबोध है. पोस्टर अपने मूल स्वरूप में एक फौरी जरूरत को ही पूरा कर सकता है. पोस्टर की तुलना में , चित्र की जिंदगी कहीं ज्यादा बड़ी होती है . लिहाज़ा फौरी घटनाओं से सम्बन्धित पोस्टरों को चित्र मान लेना , हमारी बहुत बड़ी  गलती है. बार -बार पोस्टरों को दिखा – दिखा कर वह गलती हमने की है पर अब उस गलती को सुधारने का वक़्त आ गया है. मैंने विभिन्न सम्मेलनों के लिए काफी आकर्षक पोस्टर बनाये, पर महज़ आकर्षक होने के चलते इन्हें चित्र मान लेना गलत होगा. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तात्कालिक चित्र या पोस्टरों की जरूरत है और रहेगी , पर जो लम्बे समय तक बने रहेंगे उन चित्रों की जरूरत इनसे (पोस्टरों ) से कहीं ज्यादा है. साथ ही यह भी सच है , कि तात्कालिक किसी घटना को सही ढंग से समझने और उसे सार्थक ढंग से प्रस्तुत करने से कई बार असाधारण चित्र बन सकते हैं . कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन के लिए नंदलाल बोस ने ढेरों चित्र बनाये थे , जिसमें भारत के आम लोगों की जिंदगियों को उन्होंने ‘पट ‘ शैली में चित्रित किया , उन्होंने महाभारत के अर्जुन को नहीं बनाया था उन चित्रों में ! पर इन चित्रों को न जाने क्यों ‘ हरिपुरा पोस्टर ‘ कहा गया .

लोग मुझसे पूछते हैं ,” क्या आप (कम्युनिस्ट ) पार्टी के सदस्य हैं ? ” यह सवाल मेरे लिए कभी भी महत्वपूर्ण नहीं रहा , और आज भी नहीं है. पर पार्टी ने , समाज ने मुझे जो जिम्मेदारी दी उसे मैंने पूरा करने की कोशिश की. मैं कभी हारा या टूटा नहीं. मेरे सामने , कम्युनिस्ट पार्टी को बार बार बिखण्डित होते देख कर भी मैं कभी विचलित नहीं हुआ क्योंकि मार्क्सवाद पर मेरी आस्था से इमका कोई लेना देना नहीं था . मैं जानता हूँ , बार बार कठिनाइयाँ आयेंगी और हमें  तमाम घात-प्रतिघातों के बीच से गुजरना होगा. इसका कोई विकल्प नहीं है. मार्क्सवाद किसी का मोनोपोली दर्शन नहीं है.

 

चित्रकारों की जिम्मेदारी है , कि जनता के संगठित होने के आह्वान को , अपने चित्रों में लायें । आह्वान केवल आह्वान पर ही खत्म नहीं होना चाहिए । संगठन की जरूरत क्यों है ? क्रांति की जरूरत क्यों है ? इसे भी हमें चित्रित करना है , और यहीं पर रीयलिजम् या यथार्थवाद का सवाल आता है. नेचरलिजम् या प्रकृतिवाद का सवाल आता है. पर नेचरलिजम् और रीयलिजम् एक तो नहीं है. प्रकृतिवाद में केवल आँखों की भूमिका है , यानी जो देख रहा हूँ,  बस उतना ही ! यथार्थवाद में इसी के साथ जुड़ता है इंसान का मन , उसका मस्तिष्क ! आप गोइया के चित्रों के बारे में सोचें , क्रांति के पहले के जमाने के चीनी ‘ उडकट ‘ के बारे में सोचें-समझें । हमें इन सबों से ही तो सीख लेनी होगी !

जनता के तमाम संघर्षों के सहयात्री रहे देवब्रत मुखोपाध्याय , 1971 के बांग्ला देश के मुक्ति युद्ध के समय अपने साथ मदद सामग्री लेकर सीमा पार कर बंगला देश के मुक्तिकामी जनता तक स्वयं पहुँचे थे. उन्होंने सैनिक शासन के खिलाफ जनता के सशस्त्र प्रतिरोध को बहुत करीब से देखा और उसे अपने स्केच बुक में दर्ज़ भी किया ( देखें चित्र ). इस दौर में बांग्लादेश सहायता समिति की स्मारिका ‘ ब्लीडिंग बंगाल ‘ के लिए उन्होंने आवरण चित्र भी बनाए (देखें चित्र ).

देवब्रत मुखोपाध्याय ने इप्टा की विख्यात प्रस्तुति ‘नबान्न’ के लेखक बिजन भट्टाचार्य के कई नाटकों में मंच सज्जा का काम किया. वही उन्होंने ऋतिक घटक और बादल सरकार के नाटकों के लिए भी मंच सज्जा की. उन्होंने असंख्य युवा लेखकों, कवियों के पुस्तकों के लिए आवरण बनाये. कलकत्ते के कॉफी हाउस में वे सदा युवा छात्र-छात्रों , लेखक-कवि -कलाकारों से घिरे रहते थे. जीवन के अंतिम दस वर्ष वे लकवे से पीड़ित रहे. आँख की रौशनी भी  कम हो गयी थी , फिर भी नए कवियों की किताबों के लिए वे आवरण बनाते रहे. 4 फ़रवरी 1991 को उनकी मृत्यु के बाद देवब्रत मुखोपाध्याय को चाहने वाले कवियों ने अपनी रचनाओं के ज़रिये उन्हे यूँ श्रद्धांजलि दी थी-

मैं एक कलाकार को पहचानता था
जो रौशनी के टुकड़ों से मूर्ति बनाने की कोशिश करता था
और उसकी कोशिशों को नेस्तनाबूत करता घना अँधेरा
उसपर हमले करता था
तब शुरू होता था देव और असुर के बीच शानदार युद्ध
जिसकी कहानी स्कूली बच्चे भी सुना सकते हैं
………
प्राचीन वह कलाकार आज भी मूर्ति बनने में जुटा हुआ है।

‘ प्राचीन कलाकार ‘ / कवि : राम बसु

 


यह जो जानी पहचानी जिंदगी को ही
पर राह पर
लम्बे समय तक पहचानते जाना
जितनी लम्बी परछाई बिछी है पीछे
उतना ही सामने चलना है उसे
कोई शिकायत नहीं – इस टेढ़ी-मेढ़ी
जिंदगी में
तभी तो दिया है हर रोज़ गौरव इस चलने को ही
हर घड़ी , हमराही को ले चलता है हाथ थामे …..

‘ जानी पहचानी जिंदगी की ‘ / कवि : सिद्धेश्वर सेन
*****
कुछ ऐसे लोग भी होते हैं
जो अपने रक्त- मांस नोच कर
रच पाते है , लाल-नीले मनुष्य ,
पेड़-पौधे , दुनिया।
जैसे देबू दा !

‘ जैसे देबू दा ‘ /कवि:मृगांक राय
*****
प्रखर कूँची के सामने , कितनी बार सर झुकाया मैंने , अचरज के साथ ।
क्या गति है ! बिजली से भी ज्यादा तेज , बलवान
रेखाओं का संयत रूप । रेखा मानो गर्वोन्नत गांडीव !
मानो उनके निशाने पर दुश्मन , वे जानते है संग्राम ।
और दुख भी जानता है , कि किसके दर्द का दोस्त बनना है उसे ।
‘ जनप्रवाह का अकेला पथिक ‘ /
कवि : पूर्णेन्दु पत्री

हमारे समाज में देवब्रत मुखोपाध्याय सरीखे लोग पुरस्कार सम्मान की परवाह किए बगैर काम करते रहते हैं.  अपने जीवन के अंतिम समय में जब सरकार ने उनको ‘अवनीन्द्र पुरस्कार ‘ के लिए चुना और रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय ने उन्हें डी लिट से सम्मानि करने का निर्णय लिया, तब वे इस जिंदगी को छोड़ अपने अगले सफर को निकल चुके थे.  देवब्रत मुखोपाध्याय ने अपना जीवन ही नहीं  बल्कि अपना शरीर भी इस समाज को दिया. उनकी मृत्यु  के बाद उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार चिकित्सा शास्त्र के छात्रों के लिए उन्होंने अपना देह दान किया ।
देवब्रत मुखोपाध्याय ने अपने जीवन और कर्मों से जनता के आंदोलनों में चित्रकला की भूमिका को समझा और समझाया.  विख्यात कला इतिहासकार शोभन सोम ने देवब्रत मुखोपाध्याय की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हुए अपने निबन्ध ‘ चालीस के दशक की राजनीति और राजनीतिक चित्रकला ‘ में लिखा है , ” इस देश में पहली बार देवब्रत मुखोपाध्याय ने राजनीतिक पोस्टरों की प्रदर्शनी की थी.  “

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