अनुज लगुन की नई कविताएँ : रोटी के रंग पर ईमान लिख कर चलेंगे

अनुज लुगुन ने जब हिंदी की युवा कविता में प्रवेश किया तो वह एक शोर-होड़, करियरिस्ट भावना की आपाधापी, सस्ती यशलिप्सा से बौराई और पुरस्कारों की चकाचौंध से जगमगाती युवा कवियों की दुनिया थी, वाचालता जिनका स्थायी भाव थी, कविता में चमत्कार पैदा करना जिनका कौशल और कुछ चुनिंदा कविताएँ लिख कर क्लासिक हो जाने का भ्रम पालना ही अंतिम लक्ष्य था। (तमाम अच्छे लेखन के बावजूद कमोबेश आज भी ऐसी स्थिति है) इन परिस्थितियों में एक अलग और नई आवाज़ के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराना किसी जोखिम से…

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कौशल किशोर का कविता संग्रह ‘ नयी शुरुआत ‘ : ‘ स्वप्न अभी अधूरा है ‘ को पूरा करने के संकल्प के साथ

    शैलेन्द्र शांत  “नयी शुरुआत’ साठ पार कवि कौशल किशोर की कविता की दूसरी किताब है  । सांस्कृतिक , सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में निरंतर सक्रिय रहे कौशल किशोर के इस संग्रह में 1969 से 1976 तक की कवितायें शामिल हैं. यानी कांग्रेसी शासन से मोहभंग की शुरुआत के बाद नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन से लेकर आपातकाल तक की. कवि अपने वक्तव्य में खुद कहते हैं कि -‘बहुत कच्चापन मिलेगा इनमें ‘.  साथ ही यह भी कि – ‘पर यह कवि के बनने का दौर है ‘ .  आगे यह…

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वत्सल उम्मीद की ठुमक के साथ मैं तो सतत रहूँगा तुम्हारे भीतर नमी बनकर: वीरेन डंगवाल

करीब 16 बरस पहले वीरेन डंगवाल के संग्रह ‘दुश्चक्र में स्रष्टा’ पर लिखते हुए मैंने उल्लास, प्रेम और सौंदर्य को उनकी कविता के केंद्रीय तत्वों के रूप में रेखांकित किया था- यह कहते हुए कि मूलतः अनाधुनिक मान लिए गए ये तत्व दरअसल वीरेन की काव्य-दृष्टि में एक वैकल्पिक आधुनिकता की खोज करते लगते हैं। अब उनके निधन के बाद जब उनका समग्र ‘कविता वीरेन’ के नाम से मेरे सामने पड़ा है तो यह देखना मेरे लिए प्रीतिकर है कि वीरेन की कविता ने उन दिनों जो प्रभाव मुझ पर…

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अदनान को ‘क़िबला’ कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार

युवा कवि अदनान कफ़ील ‘ दरवेश ‘ को वर्ष 2018 के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई है. 30 जुलाई 1994 को बलिया उत्तर-प्रदेश में जन्में अदनान इस समय जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली में एम. ए. हिंदी के छात्र हैं. तारसप्तक के कवि भारत भूषण अग्रवाल की स्मृति में 1979 में इस पुरस्कार को दिए जाने की शुरुआत की गयी थी. तब से हर साल समकालीन कविता में अपने योगदान और विशिष्ट पहचान बनाने वाले युवा कवि को यह पुरस्कार दिया जाता है. 17 जून…

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अमरेंद्र की अवधी कविताएँ: लोकभाषा में संभव राजनीतिक और समसामयिक अभिव्यक्तियाँ

( कवि-कथन : अवधी में कविता क्यों ? मुझसे मुखातिब शायद यही, किसी का भी, पहला सवाल हो। जवाब में कई बातें हैं लेकिन पहला कारण यही है कि जैसी सहजता मैं अपनी मातृभाषा अवधी में पाता हूँ वैसी कहीं दूसरी जगह नहीं। यह सहजता ‘प्रथम भाषा’ होने की सहजता है। यह सहजता वैसे ही है जैसे घर-गाँव में किसी रहवासू की होती है। नागर व औपचारिक जीवन के बरअक्स। सभ्यता के बहुत से भाषायी आवरण भी होते हैं जिनकी लपेट में भाषा अक्सर बँध जाती है। भाषायी मानकीकरण भी…

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वह पीड़ा का राजकुंवर था

नीरज प्यार की अहमियत और अपरिहार्यता पर बराबर इसरार करते रहे और वास्तविक जीवन में उसे असंभव जानकर उसकी करुणा से भी आप्लावित रहे. यथार्थ का एहसास न होता, तो यह शोक कहाँ से उपजता ? अहम बात यह है कि इसका उन्हें मलाल नहीं, गर्व है; क्योंकि यह पीड़ा उनके नज़दीक सच्ची मनुष्यता या जन-पक्षधरता और उससे भी अधिक जन से एकात्म होने की निशानी है.

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आसिफ़ाओं के लिए

पिछले पाँच सालों से देश में जो धर्म-ध्वजा फहर रही है, और सांप्रदायिकता का जो उन्माद लोगों की नसों में घुल रहा है, उसी का प्रारम्भिक नतीजा है कठुआ का मामला. उससे भी चिंताजनक बात यह है कि जिस तरह से संवैधानिक-प्रशासनिक संस्थाओं एवं सेना का सांप्रदायीकरण किया जा रहा, उसका दुष्परिणाम भी कठुआ मामले में देखा जा सकता है.

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आधुनिक जीवन की विसंगतियों के मध्य मानवीय संवेदना की पहचान की कवितायें

विनय दुबे की कविताओं में सहजता और दृश्य की जटिलताओं का जो सहभाव नज़र आता है, वह उन्हें अपनी पीढ़ी का अप्रतिम कवि बनाता है. अर्थ की लयात्मकता और भाषा के आरोह-अवरोह से कविता का एक नया सौंदर्य-पक्ष उभरकर सामने आता है.

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एक कविता: हिंग्लिश [शुभम श्री]

शुभम श्री हमारे साथ की ऐसी युवा कवि हैं जिनकी कविताओं में बाँकपन की छब है। एक ख़ास तंज़ भरी नज़र और भाषा को बरतने की अनूठी सलाहियत। आज पढ़िए उनकी एक कविता ‘हिंग्लिश‘। हमारे संगी कवियों को यह सवाल बेहद परेशान करता है कि भाषा का क्या करें ? इतनी अर्थसंकुचित और परम्पराक्षीण शब्द सम्पदा वाली भाषा में कविता कैसे सम्भव हो ? यह सवाल हिंदी में लगभग हर दौर के कवि को तंग करता रहा है और हर दौर में इसके जवाब मुख़्तलिफ़  आये। मैथिलीशरण गुप्त से लेकर…

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प्रेम के निजी उचाट से लौटती स्त्री की कविता : विपिन चौधरी की कवितायेँ

  विपिन की कवितायेँ लगातार बाहर-भीतर यात्रा करती हुईं एक ऐसी आंतरिकता को खोज निकालती हैं जो स्त्री का अपना निजी उचाट भी है और दरख्तों, चिड़ियों, पीले-हरे पत्तों से भरा पूरा एक नगर भी, जिसके अपने रास्ते हैं, गालियाँ हैं और मैदान भी . उसके यहाँ यह शब्दचित्र गठित इलाका अवसाद का नहीं, नहीं ही वह अवचेतन का ढंका तुपा कोई संस्तर है, बल्कि अपना खोजा हुआ संरचित कोना जिसे वह मन की संज्ञा देती है . इस खोजे हुए कोने में वह बार-बार प्रेम तलाशती है। उसके कितने ही…

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संजीव कौशल की कवितायेँ : प्रतिगामी विचारों का विश्वसनीय प्रतिपक्ष

जागृत राजनीतिक चेतना, समय और समाज की विडम्बनाओं की गहरी समझ और भाषा की कलात्मक पारदर्शिता के कारण संजीव कौशल की कवितायेँ नयी सदी की युवा पीढ़ी के बीच अपनी अलग पहचान बनाती हैं. कविता और अन्य सभी सृजनात्मक लेखन के लिए यह समय इस मायने में संकटपूर्ण है कि एक तरफ, धीरे धीरे हमारा समाज नवजागरण के मूल्यों को खोते हुए, प्रतिगामी विचारों से आक्रांत होकर सत्ता के उन्माद का शिकार होता जा रहा है, तो दूसरी तरफ हमारे कवि, लेखक, यानी मशालें लेकर चलनेवाले लोग ज्ञान मीमांसात्मक विभ्रम से ग्रस्त…

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कबीर और नागार्जुन की जयंती से जन एकता सांस्कृतिक यात्रा आरम्भ

बेगूसराय. आज ज्येष्ठ पूर्णिमा दिनांक 28/06/2018 को जन संस्कृति मंच की ओर से कबीर और आधुनिक कबीर नागार्जुन की सम्मिलित जयंती मनायी गयी। इस जयंती के अवसर पर जसम ने जन एकता सांस्कृतिक यात्रा का आयोजन किया, जो वर्तमान व्यवस्था में पल रहे फासीवादी तत्त्व के खिलाफ जन-जागृति का अभियान था। जन एकता सांस्कृतिक यात्रा की शुरुआत बेगूसराय से हुई, जहां नागार्जुन जी की छोटी बेटी मंजू देवी तथा दामाद अग्निशेखर जी ने झंडी दिखाकर जत्था को विदा किया। इस प्रथम जत्थे का नेतृत्व जसम के राज्य उपाध्यक्ष दीपक सिन्हा…

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अनुपम सिंह की कविताओं पर जसम की घरेलू गोष्ठी की रपट

अनुपम की कविताएँ अपने वक्त, अपने समाज और अपनी काया के अनुभव से उपजी हुई कविताएँ हैं- योगेंद्र आहूजा पिछली 23 जून 2018 को जसम की घरेलू गोष्ठी के तहत प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक के घर पर युवा कवयित्री अनुपम सिंह की कविताओं का पाठ और उस पर परिचर्चा आयोजित हुई। कायर्क्रम की शरुआत अनुपम सिंह द्वारा उनके काव्य पाठ से हुई। उन्होंने काव्यपाठ की शुरुआत ‘तलैया’ से की इसके बाद ‘मूढ़ महिलाएं’ , ‘अधिकारहीन बुआएं’ , ‘लड़कियाँ जवान हो रही हैं’, ‘जुए की पारियां’, ‘रंग जहाँ अपराधी होते हैं’,…

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‘समय है सम्भावना का’ : सत्ता के मौन की पहचान है

जगदीश पंकज जी का कविता संग्रह ‘समय है सम्भावना का’ इसी वर्ष आया है. जगदीश पंकज जी नवगीतकार हैं. दलित साहित्य में नवगीत की कोई समृद्ध परंपरा नहीं दिखती है. लेकिन जगदीश पंकज जी ने दलित साहित्य में इस नयी विधा को जोड़कर बहुत बड़ा योगदान दिया है. इससे दलित साहित्य का परिदृश्य व्यापक हुआ है. दलित साहित्य ने अपने आरंभ में स्वानुभूति की अभिव्यक्ति पर बल दिया और इसी को दलित साहित्य का मुख्य प्रस्थान विन्दु बनाया इसलिए साहित्य के अनगढ़पन को स्वकृति भी मिली. लालित्य और गेयता को…

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महेश्वर स्मृति आयोजन में युवा कवि अदनान कफ़ील दरवेश और विहाग वैभव का काव्य पाठ

महेश्वर चाहते थे कि कवि-लेखकों और जनता के बीच कम से कम दूरी हो: आलोक धन्वा महेश्वर की लड़ाई को आगे बढ़ाने की जरूरत है: संतोष सहर पटना, 24 जून . ‘‘महेश्वर चाहते थे कि कवि-लेखकों और जनता के बीच कम से कम दूरी हो, क्योंकि जनता ही रचना का अनंत स्रोत होती है। वह जनता जो मेहनत करती है, ईमान की रोटी खाती है। खून और कत्लोगारत में डूबो देने की नृशंसता से संघर्ष करते हुए वही जीवन को बचाती है।’’ आज बीआईए सभागार में दो दिवसीय महेश्वर स्मृति…

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पराजय को उत्सव में बदलती अनुपम सिंह की कविताएं

(अनुपम सिंह की कविताओं को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे वे अपने साथ हमें पितृसत्ता की एक बृहद प्रयोगशाला में लिए जा रहीं हैं जहाँ मुखौटे बनाए जा रहें हैं और उन सबको एक जैसा बनाए जाने की जद्दोजहद चल रही है | इससे भिन्न मान्यता रखने वालों की जीभ में कील ठोंक देने को तत्पर यह व्यवस्था निश्चित रूप से अपने लोकतान्त्रिक एवं अलोकतांत्रिक मुखौटे के बीच कार्यव्यपार चलाती रहती है | अपनी पराजय की ऐतिहासिक चेतना से सम्पन्न स्त्री इन कविताओं में फिर भी एक उत्सव की…

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सहज काव्‍य‍कथाओं सी हैं अदनान की कविताएँ

अदनान की कविताओं से गुजरना अपने समय के लोक से गुज़रना और उसकी त्रासदियों को जानते हुए उसकी लाचारी को अपनी लाचारी में बदलते देखना है. ये सहज काव्‍य‍कथाओं सी हैं जिनमें काव्‍य में विमर्श की परंपरा आगे बढ़ती है.

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कुमार मुकुल की कविताएँ : लोकतंत्र के भगवाकरण की समीक्षा

30 वर्षों से रचनारत कुमार मुकुल के कविता परिदृश्य का रेंज विशाल और वैविध्य से भरा है , प्रस्तुत कविताओं में आज के समय को कुमार मुकुल ने मूलतः लोकतंत्र के भगवाकरण की समीक्षा के बतौर सामने रखा है.

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‘ चन्द्रेश्वर की कविताएं सरल पर लिखना उतना ही कठिन ’

चन्द्रेश्वर प्रेम और प्रतिरोध के कवि हैं. ऐसी कविताओं की जरूरत थी. ये अपनी रचना प्रक्रिया और कन्टेन्ट में समकालीन कविताएं हैं. यहां व्यंग्य चित्र हैं, बहुत कुछ कार्टून की तरह. ये कविताएं जितनी सरल हैं, इन्हें लिखना उतना ही कठिन है. यहां सरलता जीवन मूल्य है.

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विहाग वैभव की कविताएँ : लोक जीवन के मार्मिक संवेदनात्मक ज्ञान की कविताएँ हैं- मंगलेश डबराल

  युवा कवि विहाग वैभव की कविताओं में क्रांति, विद्रोह, विरोध, निषेध के तीखे स्वर हैं और वह प्रेम भी है जिसे संभव करने के लिए क्रांतियाँ की जाती रही हैं. एक नवोदित और प्रतिबद्ध कवि से यही अपेक्षा की जाती है. लेकिन विहाग की संवेदना में लोक-स्मृति गहरे बसी हुई है और यह एक खूबी उन्हें अपने समकालीनों या शहराती कवियों से कुछ अलग पहचान देती है. यह लोक संवेदना भी भावुकता या रूमान से नहीं, बल्कि साधारण जनों के श्रम और संघर्ष से उत्पन्न हुई है. एक कविता…

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