कल्पना लाज़मी के सिनेमा में एक सशक्त स्त्री की छवि उभरकर सामने आती है

यूनुस खान   कल्‍पना लाजमी का जाना हिंदी फिल्‍म जगत का एक बड़ा नुकसान है। बहुत बरस पहले एक सीरियल आया था ‘लोहित किनारे’। ये दूरदर्शन का ज़माना था। मुमकिन है आपको ये सीरियल याद भी हो। इसका शीर्षक गीत शायद भूपेन हजारिका ने गाया था। असम की कहानियों पर केंद्रित ये धारावाहिक बनाया था कल्‍पना लाजमी ने, और ये कल्‍पना लाजमी से हमारा पहला परिचय था। कल्‍पना लाजमी को मुख्‍यत: ‘रूदाली’ के लिए याद किया जाता है। असल में ‘रूदाली’ ज्ञानपीठ से सम्‍मानित बंगाल की प्रसिद्ध लेखिका महाश्‍वेता देवी…

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अभिव्यक्ति के प्रति ईमानदार एक रचनाकार की त्रासदी ‘मंटो’

अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ‘मंटो’ बायोपिक फिल्म की बहुत समय से प्रतीक्षा कर रहा था। समय-समय पर आने वाले ट्रेलर या वीडियो के टुकड़े इंतिजार को अ-धीरज में बदल रहे थे। आज वह दिन हाथ लग ही गया। कुछ रचनाकार होते हैं जिनके लेखन के साथ-साथ उनके जीवन का भी आकर्षण किसी को खींच सकता है। यह व्यक्तिगत रुचि का मसला हो सकता है। मेरे लिए तुलसी, कबीर, ग़ालिब, निराला, मंटो जैसे रचनाकार लेखन के साथ-साथ अपने जीवन का भी आकर्षण रखते हैं। उनके लेखन से गुजरने की तरह उनके जीवन…

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ज़मीर को हर शै से ऊपर रखने वाले मंटो

अखिलेश प्रताप सिंह. खुदा ज्यादा महान हो सकता है लेकिन मंटो ज्यादा सच्चे दिखते हैं और उससे भी ज्यादा मनुष्य, क्योंकि मंटो को सब कुछ इस कदर महसूस होता है कि शराब भी उनकी ज़ेहन की आवाज को दबा नहीं पाती है. यह फ़िल्म अगर नंदिता दास ने लिखी है और निर्देशित की है और चूँकि यह फ़िल्म मंटो जैसे हिपटुल्ला? व्यक्ति का जीवन चरित है, तो इसे देखना मनोरंजन की चहारदीवारी से आगे की चीज है. दुनिया की सभी सुंदर सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की तरह यह फिल्म दर्शक को अपने…

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कबूतरी देवी को लोगों के बीच ले जाने की शुरुआत

नैनीताल के निचले हिस्से तल्लीताल में बाजार से ऊपर चढ़ते हुए एक रास्ता खूब सारे हरे-भरे पेड़ों वाले कैम्पस तक ख़तम होता है. यह कैम्पस राजकीय कन्या इंटरमीडिएट कालेज का है. इस कैम्पस में पिछले इतवार 16 सितम्बर 2018 को नैनीताल के सक्रिय संस्कृतिकर्मी ज़हूर आलम अपनी टीम के साथ कालेज के सभागार को सिनेमा हाल में बदलने की कसरत में जुटे थे. हाल की खिड़कियों में पल्ले मौजूद थे इसलिए अँधेरा हासिल करने के लिए ज्यादा मशक्कत न करनी पड़ी. दुपहर 3.30 से शो शुरू होना था लेकिन प्रोजक्शन…

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‘अपनी धुन में कबूतरी’ की पहली स्क्रीनिंग नैनीताल में

प्रीमियर शो दुपहर 3.30 जी जी आई सी, तल्लीताल, नैनीताल उत्तराखंड के पुराने लोगों के कानों में अब भी कबूतरी देवी के गाने गूंजते रहते। ‘पहाड़ो को ठंड पाणी…’ अब भी शीतलता प्रदान करता है। 1939 में उत्तराखंड के सुरम्य जनपद चंपावत के लेटी गाँव में जन्मी कबूतरी जी को यूं तो बचपन से ही संगीत के संस्कार मिले लेकिन शादी के बाद उनकी असल सांगीतिक यात्रा तब शुरू हुई जब उनके पति की भागदौड़ के कारण वे आखिरकार रेडियो की कलाकार बनीं। फिर तो सत्तर और अस्सी का दशक…

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सुरों के उस्ताद, सुनने की उस्तादी

दिनेश चौधरी हरिभाई यानी पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जी हमेशा थोड़ी जल्दी में होते हैं। वे आँधी की तरह आये, बाँसुरी की तान छेड़ी, खाना खाये बगैर किसमिस के चार दाने मुंह में डाले और तूफान की तरह चले गये। गाड़ी से उतरकर मंच पर विराजने और लौटकर फिर अपने वाहन में सवार होने तक लोगों ने उन्हें घेरे रखा था। किसी को उनके आटोग्राफ चाहिये थे तो किसी को उनके साथ फोटू खिंचानी थी। कुछ लोग एक सेलिब्रिटी के साथ महज चंद पल गुजारने का सुख लूटना चाहते थे, सो…

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लस्ट स्टोरीज : अपनी राह तलाशती स्त्रियाँ

‘लस्ट स्टोरीज’ पिछले तीन दशकों में हुए सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक गहमागहमी से बनती गई नयी स्त्री और उसके पुरुष के साथ संबंधों को एक्सप्लोर करती है. यह स्त्री जो अलग-अलग तबकों से आती है लेकिन वह अपनी पूरी शारीरिकता के साथ मौजूद है और उसमें कोई और तरह का गिल्ट हो सकता है लेकिन अपनी शारीरिकता को लेकर आई सहजता के मामले में उसे कोई गिल्ट नहीं है.

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संजू: इसे बायोपिक की तरह न देख कर देखिए

फ़िल्म संजय दत्त की ज़िंदगी की तमाम सचाइयों को दिखाती हो या नहीं, जिस कहानी को वह सचमुच दिखाती है, वह भरोसेमंद, मार्मिक और इतिहास-संगत है या नहीं ? फ़िल्म के मूल्यांकन की सही कसौटी यह होनी चाहिए.

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जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है !

इस ख़त की कोई भूमिका नहीं हो सकती। इरफ़ान, जिनके सिरहाने की एक तरफ़ ज़िंदगी है और दूसरी तरफ़ अंधेरा, ने आत्मा की स्याही से यह ख़त लिखा है। उम्मीद की ओस। एक काव्यमय दर्शन। जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है! यह ख़त इरफ़ान भाई ने वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज को भेजा है। -(अविनाश दास, लेखक-निर्देशक .) कुछ महीने पहले अचानक मुझे पता चला था कि मैं न्यूरोएंडोक्रिन कैंसर से ग्रस्त हूं। मैंने पहली बार यह शब्द सुना था। खोजने पर मैंने पाया कि…

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काला : फ़ासीवाद की पहचान कराती फ़िल्म

सुपरस्टार रजनीकांत की जानी पहचानी शैली की फ़िल्म होते हुए भी महज एक कल्ट फ़िल्म नहीं है. यह देश के वर्तमान राजनीतिक माहौल का नाटकीय रूपक बनने की भरपूर कोशिश करती है और इसमें दूर तक सफल भी होती है.

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बॉलीवुड के स्टीरियोटाइप को तोड़ती ‘ राज़ी ’

एक ऐसे दौर में जब राष्ट्रवाद की नयी परिभाषायें गढ़ी जा रही हों और देशभक्ति पर एकाधिकार जताया जा रहा हो तो ‘राज़ी’ रुपहले परदे पर बहुत ही सशक्त तरीके से यह बताने में कामयाब होती है कि राष्ट्रवाद इकहरा नहीं हो सकता और देशभक्ति होने के लिये किसी एक मजहब का होना जरूरी नहीं है.

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राज़ी : नागरिकता और मनुष्यता का अन्तर्द्वन्द्

नेशन फर्स्ट भूमण्डलित दुनिया का नया फैशन है। अमरीका से लेकर रूस तक इसी नारे पर चुनाव जीते जा रहे हैं। भारत में भी इन दिनों इसी का बोलबाला है। यह एक नई नैतिकता है जिसे हर तरह की नैतिकता के ऊपर बिठा दिया गया है। इस सुपर नैतिकता के पीछे भी एक डर है- देश के टूट जाने का डर। ये डर ही सभी पूर्वग्रहों, नफरतों और पागलपन की जड़ है।

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गरीबों की जमीन हड़पने और उन्हें अपराधी बताने का सिंड्रोम

(‘हिचकी’ के बहाने भारत की सबसे बड़ी सामाजिक बीमारी की चर्चा) आलोक कुमार श्रीवास्तव मार्च 2018 में आयी रानी मुखर्जी की केंद्रीय भूमिका वाली फिल्म ‘हिचकी’ की मुख्य किरदार नैना माथुर जिस सेंट नॉटकर कॉन्वेन्ट स्कूल में टीचर हैं, उस स्कूल के खेल का मैदान भी मानों फिल्म का एक किरदार है और बड़ा ही अहम किरदार। जैसा कि फिल्म में बताया गया है कि अगर सेंट नॉटकर वालों को स्कूल के लिए बड़े प्लेग्राउंड की ज़रूरत न होती तो स्कूल में 9-एफ़ नाम का डिवीज़न भी न होता। और जब सेंट नॉटकर में 9-एफ़ नामक फिसड्डी और शरारती…

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