वो सूरतें इलाही किस मुल्क बसतियाँ हैं , अब जिनके देखने को आंखें तरसतियाँ हैं

15वीं बरसी पर कॉ मंजू देवी की यादें   संतोष सहर   वो सूरतें इलाही किस मुल्क बसतियाँ हैं अब जिनके देखने को आंखें तरसतियाँ हैं (अखिल भारतीय खेत ग्रामीण मजदूर सभा का  6वां राष्ट्रीय सम्मेलन आगामी 19-20 नवम्बर को जहानाबाद में आयोजित होगा।15 साल पहले 14-15 नवम्बर 2003 को आरा में इसका स्थापना सम्मेलन हुआ था। कॉ. मंजू देवी उस सम्मेलन की जोरदार तैयारियों में दिन-रात लगी हुई थीं। उसी दौरान आज ही के दिन जहानाबाद के पुराण गांव में रणवीर हत्यारों ने गोली मारकर इनकी हत्या कर डाली…

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कामरेड शाह चाँद की याद

जाने कितनी यादे हैं कामरेड शाह चाँद की। आईपीएफ और फिर इंकलाबी मुस्लिम कान्फ्रेंस में साथ काम करने की। कामरेड तकी रहीम से नोक-झोंक फिर हंसी-मज़ाक की। उस पहले दिन की भी जब भदासी कांड हुआ। जनसंस्कृति मंच का विद्यापति भवन में सम्मेलन चल रहा था और अल-सुबह भदासी में घट रही घटना की खबर आई। उसी दिन वहाँ के ग्राम-प्रधान के रूप में उनका नाम पहली बार सुना। ग्राम-प्रधान के रूप में उन्हें आदर्श ग्राम प्रधान का खिताब सरकार ने दिया था। लेकिन सरकार को नहीं मालूम था कि…

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रमाकांत द्विवेदी ‘रमता’ : क्रांति की रागिनी का गायक

101 वीं जयंती 30 अक्टूबर 2018 एक आलेख   ‘क्रांति के रागिनी हम त गइबे करब/ केहू का ना सोहाला त हम का करीं’, ‘हमनी देशवा के नया रचवइया हईं जा/ हमनी साथी हई, आपस में भइया हईं जा’, ‘राजनीति सब के बूझे के, बूझावे के परी/ देश फंसल बाटे जाल में, छोड़ावे के परी’, ‘अइसन गांव बना दे जहंवा अत्याचार ना रहे/ जहां सपनों में जालिम जमींदार ना रहे’, ‘जीने के लिए कोई बागी बने, धनवान इजाजत ना देगा/ कोई धर्म इजाजत ना देगा, भगवान इजाजत ना देगा’, ‘जगत…

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हृदय में व्यथा का रिसाव करती हैं सुरेश सेन निशांत की कविता

श्याम अंकुरम सुरेश सेन निशांत नहीं रहे. स्तब्धकारी खबर ! मेरा उनसे परिचय राजवर्धन के संपादन में कविता संकलन ‘स्वर –एकादश ‘ से हुआ था. राजवर्धन से जब यह संग्रह मिला था उनकी कुछ ही कविताओं को पढ़ पाया था जो दिल में गहरे से धंस गई.  उनकी कविता मुझ सहित लोगों के हृदय में व्यथा का रिसाव प्रवाहित कर गई . चाहे वह कविता ‘ गूजरात’ हो या’ पिता की छड़ी ‘ हो . यही मेरा उनसे प्रथम परिचय था . दुर्भाग्य है कि मैं कभी उनसे मिल नहीं…

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पहाड़ और नदियों ने खो दिया अपने कवि को

आज जब पहाड़, जंगल और जमीन सहित पूरी मानवता खतरे में है और उन्हें बचाने के लिए संघर्ष जारी है, ऐसे में एक कवि का अचानक चले जाना एक घहरा आघात है. पहाड़ और नदियों ने अपने कवि सुरेश सेन निशांत को खो दिया. बस रह है उनकी कविताएं. किन्तु यह सर्वमान्य है कि कवि मर कर भी नहीं मरता, वह सदा मौजूद रहता है हमारे बीच अपनी रचनायों के साथ.

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निराला की कविताएँ अपने समय के अंधेरे को पहचानने में हमारी मदद करती हैं: प्रो. विजय बहादुर सिंह

विवेक निराला    निराला की 57 वीं पुण्यतिथि पर आयोजित ‘छायावाद और निराला :कुछ पुनर्विचार’ विषय पर ‘निराला के निमित्त’ की ओर से आयोजित गोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए प्रसिद्ध आलोचक प्रो. विजय बहादुर सिंह ने छायावाद की प्रासंगिकता पर कई प्रश्नों के साथ विचार करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने रेखांकित किया कि छायावाद आधुनिक भारत का सांस्कृतिक स्वप्न है। ‘अस्मिता की तलाश’ पहली बार छायावादी कविता में ही दिखाई देती है। छायावाद ने ‘मनुष्यता’ को सबसे बड़ी अस्मिता के रूप में रेखांकित किया। छायावाद के…

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निराला की कविता मनुष्य की मुक्ति की कविता है

(महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला (21 फ़रवरी-15 अक्टूबर) की पुण्यतिथि पर अपने लेख के माध्यम से उन्हें याद कर रहें हैं विवेक निराला)  निराला को अपने समय में ‘महाप्राण ’ कहा गया था और यह एकदम सही भी था क्योंकि उस पूरे दौर में एक कवि अपने समय के कई अल्पप्राण प्रतिमानों को चुनौती दे कर अपना महाप्राणत्व सिद्ध कर रहा था। अपने युग में कई तरह की आलोचनाओं और प्रत्यालोचनाओं को झेलते हुए इस कवि ने पहली बार ’मनुष्य की मुक्ति की तरह कविता की मुक्ति’ की अवधारणा प्रस्तुत की…

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कल्पना लाज़मी के सिनेमा में एक सशक्त स्त्री की छवि उभरकर सामने आती है

यूनुस खान   कल्‍पना लाजमी का जाना हिंदी फिल्‍म जगत का एक बड़ा नुकसान है। बहुत बरस पहले एक सीरियल आया था ‘लोहित किनारे’। ये दूरदर्शन का ज़माना था। मुमकिन है आपको ये सीरियल याद भी हो। इसका शीर्षक गीत शायद भूपेन हजारिका ने गाया था। असम की कहानियों पर केंद्रित ये धारावाहिक बनाया था कल्‍पना लाजमी ने, और ये कल्‍पना लाजमी से हमारा पहला परिचय था। कल्‍पना लाजमी को मुख्‍यत: ‘रूदाली’ के लिए याद किया जाता है। असल में ‘रूदाली’ ज्ञानपीठ से सम्‍मानित बंगाल की प्रसिद्ध लेखिका महाश्‍वेता देवी…

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चार आयामों का एक कवि विष्णु खरे

मंगलेश डबराल   यह बात आम तौर पर मुहावरे में कही जाती है कि अमुक व्यक्ति के न रहने से जो अभाव पैदा हुआ है उसे कभी भरा नहीं जा सकेगा. लेकिन विष्णु खरे के बारे में यह एक दुखद सच्चाई है की उनके निधन से जो जगह खाली हुई है, वह हमेशा खाली रहेगी. इसलिए की विष्णु खरे मनुष्य और कवि दोनों रूपों में सबसे अलग, असाधारण और नयी लीक पर चलने वाले व्यक्ति थे. वे कवि,आलोचक, अनुवादक, शास्त्रीय और फिल्म संगीत के गहरे जानकार, सिमेमा के मर्मज्ञ और पत्रकार…

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वैज्ञानिक दृष्टि और आलोचनात्मक यथार्थ वाले विचार संपन्न कवि थे विष्णु खरे: आलोक धन्वा

विष्णु खरे जनता के आक्रोश के संगठित होने की कामना करने वाले कवि हैं। उनकी कविताएं जनसाधारण के जीवन के दृश्यचित्रों की तरह हैं। वर्णनात्मकता और संवेदना के साथ उनकी कविताएं विचार और तर्क के गहन सिलसिले की वजह से महत्वपूर्ण हैं। उनकी कविताएं हमारे संस्कारों और रूढ़ विचारों को बदलने की क्षमता रखती हैं।

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चंद्रशेखर : नई पीढ़ी का नायक

चंद्रशेखर की सबसे प्रिय किताब थी लेनिन की पुस्तक ‘क्या करें’। नेरुदा के संस्मरण भी उन्हें बेहद प्रिय थे। अकसर अपने भाषणों में वे पाश की प्रसिद्ध पंक्ति दोहराते थे- ‘सबसे खतरनाक है हमारे सपनों का मर जाना।’ १९९३ में जब हम जे.एन.यू. छात्रसंघ का चुनाव लड़ रहे थे तो सवाल-जवाब के सत्र में किसी ने उनसे पूछा,” क्या आप किसी व्यक्तिगत मह्त्वाकांक्षा के लिये चुनाव लड़ रहे हैं? ” उनका जवाब भूलता नहीं। उन्होंने कहा,” हां, मेरी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है- भगतसिंह की तरह जीवन, चेग्वेआरा की तरह मौत ”। चंदू ने अपना वायदा पूरा किया।

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जीवन को एक कार्निवल के रूप में देखने वाला कवि कुँवर नारायण

  कमोबेश दो शताब्दियों की सीमा-रेखा को छूने वाली कुँवर नारायण की रचना-यात्रा छह दशकों से भी अधिक समय तक व्याप्त रही है। उनका पूरा लेखन आधुनिक हिंदी कविता के उत्कर्ष का पर्याय है। अपने सारभूत रूप में उनकी कविताएँ जीवन और मृत्यु से जुड़ी चिंताओं, राजनीति और संस्कृति की विसंगतियों, मानवीयता और नैतिकता की समयानुकूल अनिवार्यताओं, मिथक और इतिहास की सर्जनात्मक संभावनाओं, व्यक्ति-परिवार-समाज के बीच सापेक्षिक संबंधों को लेकर लगातार मुखर रही हैं और जहाँ कहीं भी जरूरत हुई, उन्हें प्रश्नांकित करती रही हैं। उनकी कविताओं और चिंतन में…

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आलोचना ने महादेवी वर्मा के साथ खिलवाड़ किया है : प्रो. सुधा सिंह

महादेवी वर्मा की पुण्य तिथि पर कोरस का आयोजन “श्रृंखला की कड़ियाँ में महादेवी सिमोन द बोउआर से पहले महिला प्रश्नों को उठाती हैं।” प्रो. राजेन्द्र कुमार इलाहाबाद. अवसर था महादेवी की पुण्य तिथि, 11 सितंबर पर इलाहाबाद वि.वि. के गेस्ट हाउस के सेमिनार हॉल में कोरस द्वारा आयोजित महादेवी स्मृति व्याख्यान माला का पहला व्याख्यान। विषय था- ‘समाज की महिला दृष्टि और महादेवी वर्मा का सृजन कर्म’। एकल व्याख्यान दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. सुधा सिंह का था। अपनी बात की शुरुआत करते हुए सुधा सिंह ने कहा महादेवी वंचना-प्रवंचना और अभाव…

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आत्म-अलगाव (एलिअनेशन) का प्रश्न और मुक्तिबोध

( गजानन माधव मुक्तिबोध (जन्म : 13 नवंबर 1917-मृत्यु :11 सितंबर 1964) हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि, आलोचक, निबंधकार, कहानीकार तथा उपन्यासकार रहे हैं . प्रस्तुत लेख समकालीन जनमत पत्रिका के प्रधान संपादक राम जी राय द्वारा लिखे जा रहे आलेख का सम्पादित अंश है.) क्या मुक्तिबोध आत्मनिर्वासन (सेल्फ़ एलिअनेशन) की समस्या को आाधुनिक मानव जीवन की केंद्रीय समस्या के रूप में देखते हैं? आचार्य नामवर सिंह ऐसा मानते हैं लेकिन आत्मनिर्वासन को आत्म विभाजन और फिर अस्मिता का लोप ठहराते हुए उसे अपने समय के चालू अस्तित्ववादी मुहावरे में…

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मैंने गिर्दा को कैसे जाना

(गिर्दा के स्मृति दिवस 22 अगस्त पर गिर्दा की याद) बात 1994 की है. उत्तराखंड आंदोलन पूरे ज़ोर पर था. इसी बीच में उत्तराखंड आंदोलन पर नरेंद्र सिंह नेगी जी का कैसेट आया. आन्दोलन पर 7-8 गीत उसमें थे. उन्हीं में से एक गीत था- ततुक नी लगा उदेख,घुनन मुनई नि टेक जैंता इक दिन त आलो ऊ दिन यो दुनि में मैं उस समय 12वीं में पढ़ता था और उत्तरकाशी में अपने चाचा जी के साथ रहता था. गीत सुना तो न मेरी समझ में गीत आया और न…

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वीरेन डंगवाल की याद और सृजन, कल्पना, रंगों, शब्दों और चित्रों की दुनिया

डॉ. कामिनी त्रिपाठी शासकीय नवीन कन्या महाविद्यालय बैकुंठपुर में आयोजित त्रिदिवसीय ‘वीरेन डंगवाल जन्म दिन समारोह’ का समापन 8 अगस्त को छात्राओं द्वारा वीरेन दा की कविताओं का पोस्टर बनाते हुए सम्पन्न हुआ | कार्यक्रम के पहले दिन लगभग 30 छात्राओं ने ‘नवारुण’ द्वारा प्रकाशित वीरेन दा की संपूर्ण कविताओं के संग्रह ‘कविता वीरेन’ से अपनी पसंद की कविताओं का चयन कर अपने अंदाज़ में उनका पाठ किया | छात्राओं द्वारा चयनित कविताओं को देखने से एक बात बहुत आसानी से समझी जा सकती है कि वीरेन दा की कविताएं…

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कवि वीरेन डंगवाल के 71वें जन्मदिन पर बरस रही थी कवि की याद

(पांच अगस्त को हिंदी के कवि वीरेन डंगवाल का जन्म दिन होता है । देश भर में कवि की याद में हुए आयोजनों में से कुछ झलकियाँ यहां प्रस्तुत हैं ।) बरस रही थी कवि की याद  कल पांच अगस्त को कवि वीरेन डंगवाल का जन्मदिन था .कवि तो बहुत हैं और उनकी यादें भी ,परन्तु मैंने लोगों को जिस तरह वीरेन डंगवाल को याद करते हुए सुना है ,देखा है वैसा किसी को नहीं .जो उनसे एक बार भी मिला है ,जो उनसे लोगों को मिलते हुए देखा भर…

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वत्सल उम्मीद की ठुमक के साथ मैं तो सतत रहूँगा तुम्हारे भीतर नमी बनकर: वीरेन डंगवाल

करीब 16 बरस पहले वीरेन डंगवाल के संग्रह ‘दुश्चक्र में स्रष्टा’ पर लिखते हुए मैंने उल्लास, प्रेम और सौंदर्य को उनकी कविता के केंद्रीय तत्वों के रूप में रेखांकित किया था- यह कहते हुए कि मूलतः अनाधुनिक मान लिए गए ये तत्व दरअसल वीरेन की काव्य-दृष्टि में एक वैकल्पिक आधुनिकता की खोज करते लगते हैं। अब उनके निधन के बाद जब उनका समग्र ‘कविता वीरेन’ के नाम से मेरे सामने पड़ा है तो यह देखना मेरे लिए प्रीतिकर है कि वीरेन की कविता ने उन दिनों जो प्रभाव मुझ पर…

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एक यारबाश कवि की याद

रमाशंकर सिंह   (आज वीरेन दा उर्फ डॉ. डैंग का जन्म दिन है। उनसे बड़ा यारबाश और दोस्ती को मूल्य की तरह बरतने वाला कोई दूसरा मित्र-कवि पता नहीं अब नसीब होगा या नहीं। उनकी हरकतें, प्यार, डाँट, शरारते सब जेहन में रह-रह कर कौंध जाती हैं। उनका जीवन और उनकी कविता जैसे कि एक दूसरे की पूरक हैं। एक ‘दोस्त-कवि’ को याद करते हुए कुछ वर्ष पहले ‘ रहूंगा भीतर नमी की तरह ‘ पुस्तक में एक लेख मित्र और युवा अध्येता रमाशंकर सिंह ने लिखा था जिसे वीरेन…

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मेरी तन्हाई का ये अंधा शिगाफ़, ये के सांसों की तरह मेरे साथ चलता रहा

मीना कुमारी (1 अगस्त, 1933 – 31 मार्च, 1972) का असली नाम महजबीं बानो था , इनका जन्म मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ था. वर्ष 1939 से 1972 तक इन्होंने फ़िल्मी पर्दे पर काम किया. मीना कुमारी अपने दौर की एक बेहतरीन अदाकारा होने के साथ-साथ शायरा और पार्श्वगायिका भी थीं. आइए इनकी 85 वीं सालगिरह पर भारतीय सिने जगत की इस महान अदाकारा को उनकी कुछ चर्चित ग़ज़लों की मार्फ़त याद करें. मीना कुमारी की ग़ज़लें- चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा, दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा…

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