पत्रकारों पर हमले के ख़िलाफ़ कन्वेंशन में पत्रकार सुरक्षा कानून और प्रेस आयोग के गठन की माँग

नई दिल्ली. कमेटी एगेंस्ट एसॉल्ट ऑन जर्नलिस्ट (काज)  द्वारा दिल्ली के कांस्टीट्युशन क्लब ऑफ इंडिया में 22 और 23 सितम्बर को पत्रकारों पर हमले के ख़िलाफ़ दो दिवसीय राष्ट्रीय कन्वेंशन आयोजित किया गया हुआ. इस दो दिवसीय कार्यक्रम में दोनों दिन पूरे समय कार्यक्रम हॉल खचाखच भरा रहा. कार्यक्रम में दूर-दराज के गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों के पत्रकारों का शामिल होना इस कार्यक्रम की अभूतपूर्व सफलता कहा जा सकता है. सम्मेलन में पत्रकार सुरक्षा कानून, पत्रकारों को लीगल सहायता और प्रेस आयोग के गठन की माँग उठी. उद्घाटन सत्र…

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गुरिल्ला इमरजेंसी के दौर में मीडिया : मध्यप्रदेश की कहानी

  भारत में मीडिया की विश्वसनीयता लगातार गिरी है, 2018 विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों की सूची में 2 अंक नीचे खिसकर 138वें पायदान पर आ गया है. कुछ महीनों पहले ही कोबरा पोस्ट द्वारा “ ऑपरेशन 136 ” नाम से किये गये स्टिंग ऑपरेशन ने बहुत साफ़ तैर पर दिखा दिया है कि मीडिया सिर्फ दबाव में ही नहीं है बल्कि इसने अपने फर्ज का सौदा कर लिया है. आज मीडिया के सामने दोहरा संकट आन पड़ा है जिसमें “ऊपरी दबाव” और “पेशे से गद्दारी” दोनों…

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पत्रकारों के उत्पीड़न के ख़िलाफ़ जनमत तैयार करने के संकल्प के साथ CAAJ कन्वेंशन का समापन

नई दिल्ली. दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन हॉल में 22-23 सितंबर को आयोजित कमेटी अगेन्स्ट असॉल्ट ऑन जर्नलिज़्म (CAAJ) सम्मेलन पत्रकारों के उत्पीड़न के ख़िलाफ़ देश भर में जनमत तैयार करने और इस लिहाज़ से एक प्रभावी तंत्र विकसित करने के संकल्प के साथ सम्पन्न हुआ। इस दो दिवसीय कन्वेंशन को प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया और अंतरराष्ट्रीय साख वाले पत्रकार संगठन ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ (CPJ) का समर्थन हासिल हुआ। इसके अलावा 30 से ज़्यादा पत्रकारिता संस्थानों और जनसंगठनों इसके आयोजन में शिरकत की। दो दिनों तक चार सत्रों में पत्रकारिता और…

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“ तुम्हारी तहजीब अपने खंजर से आप ख़ुदकुशी करेगी ”

ए.बी.पी. न्यूज़ में जिस तरह से मिलिंद खांडेकर और पुण्य प्रसून वाजपेयी की विदाई हुई और अभिसार शर्मा को खामोश किया गया,वह निश्चित ही सत्ता के दबाव का नतीजा है. ‘ मास्टरस्ट्रोक ’ का ‘ स्ट्रोक ’, ‘मास्टर’ को इस कदर चुभ गया कि ‘ मास्टर ’ ने स्ट्रोक लगाने वालों को निपटा दिया. सत्ता का संदेश साफ है या तो हमारी बोली बोलो, वरना झेलो. इस मसले पर दो तरह की प्रतिक्रियाएँ हैं. एक जिसमें पुण्य प्रसून वाजपेयी समेत कतिपय टी.वी. पत्रकारों को मसीहा के रूप में पेश किया…

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सेक्युलर इंडिया से इतनी दिक़्क़त क्यों है ?

डर या लालच के मारे किसी राजनैतिक दल का पिछलग्गू हो जाना या सरकारी भोंपा बन जाना तो समझ आता है, लेकिन क्या अब भारतीय मीडिया के इस धड़े का संपादकीय नागपुर में लिखा जा रहा है.

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पत्रकारों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र के लिए लड़ना होगा: पंकज बिष्ट

प्रगतिशील-जनवादी साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों ने ‘ मीडिया की संस्कृति और वर्तमान परिदृश्य ’ पर संगोष्ठी आयोजित की  कठुआ गैंगरेप के खिलाफ लिखी गई कविताओं की पुस्तिका का लोकार्पण भी हुआ पटना. ‘‘ पत्रकारिता की संस्कृति का सवाल लोकतंत्र की संस्कृति से जुड़ा हुआ है। समाज को बेहतर बनाने के बजाय बर्बरता की ओर ले जाने और लोगों को विवेकहीन बनाने की जो कोशिश की जा रही है, उसके प्रति पत्रकारिता की क्या भूमिका है, यह गंभीरता से सोचना होगा। पत्रकारों को यह तय करना ही होगा कि जो खबर वे छाप…

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