जीवनपुर हाट जंक्शन : कहानी की शक्ल में संस्मरण और संस्मरण की शक्ल में कहानी

दो सितम्बर को नोएडा में प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक के स्मृति संग्रह ‘ जीवनपुर हाट जंक्शन ’ पर घरेलू गोष्ठी में एक परिचर्चा आयोजित की गयी. यह पुस्तक सत्तर के दशक में एक मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव के तौर पर अशोक भौमिक के जीवनानुभवों की रचनात्मक अभिव्यक्ति है. यह कहानी की शक्ल में संस्मरण और संस्मरण की शक्ल में कहानी संग्रह है.

इस परिचर्चा की शुरुआत करते हुए कहानीकार योगेन्द्र आहूजा ने अपने आधार आलेख के माध्यम से अपना विचार व्यक्त किया. उन्होंने कहा कि ये कहानियाँ इस वक्त कहानी की अपेक्षा को पूरा करने वाली हैं. शोध छात्र मिथिलेश ने क्रमशः सात कहानियों पर अपने विचार व्यक्त किये और कहा कि ये कहानियाँ बेचैन करने वाली हैं.

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एनादर मार्क्स: अर्ली मैनुस्क्रिप्ट्स टु द इंटरनेशनल : अर्थशास्त्र की आलोचना

मार्क्स ने पाया कि सभी युगों के चिंतक अपने समय की विशेषता को शाश्वत ही कहते आए हैं. अपने समय के राजनीतिक अर्थशास्त्रियों के बनाए इस व्यक्ति की धारणा के विपरीत मार्क्स ने कहा कि समाज से बाहर व्यक्ति द्वारा उत्पादन उसी तरह बेवकूफाना बात है जैसे लोगों के एक साथ रहने और आपसी संवाद के बिना भाषा के विकास की कल्पना करना. वे वैयक्तिकता को सामाजिक परिघटना मानते थे. जिस तरह नागरिक समाज का उदय आधुनिक दुनिया में हुआ उसी तरह पूंजीवादी युग का मजदूरी पर आश्रित स्वतंत्र कामगार भी दीर्घकालीन ऐतिहासिक प्रक्रिया की उपज है. उसका उदय सामंती समाज के विघटन और सोलहवीं सदी से विकासमान उत्पादन की नई ताकतों के चलते हुआ है. आधुनिक पूंजीवादी व्यक्ति के उदय की समस्या को सुलझाने के बाद मार्क्स कहते हैं कि वर्तमान उत्पादन सामाजिक विकास के एक निश्चित चरण के अनुरूप है. इस धारणा के सहारे वे उत्पादन की अमूर्त कोटि को किसी खास ऐतिहासिक क्षण में उसके साकार रूप से जोड़ देते हैं .

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दो सौ साल बाद मार्क्स का अर्थशास्त्र

2018 में लुलु.काम से माइकेल राबर्ट्स की किताब ‘ मार्क्स200: -ए रिव्यू आफ़ मार्क्स इकोनामिक्स 200 ईयर्स आफ़्टर हिज बर्थ ’ का प्रकाशन हुआ. किताब में मार्क्स के अर्थशास्त्र का संक्षिप्त परिचय देने के बाद पूंजीवाद की गति के नियमों (मूल्य का नियम, पूंजी संचय का नियम और मुनाफ़े की घटती दर का नियम) का विवरण देने के बाद संकट के उनके सिद्धांत का विवेचन किया गया है. इसके बाद मार्क्स के आलोचकों के तर्कों का जायजा लिया गया है. इसके बाद पूंजीवाद के बारे में मार्क्स की उन बातों का उल्लेख है जो अब भी प्रासंगिक लगती हैं. इनमें विषमता और साम्राज्यवाद के साथ उसकी अभिन्नता, धरती के विनाश, मशीन के आगमन तथा वर्ग संघर्ष की निरंतरता पर जोर दिया गया है.

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फ़ासीवाद की ओर यात्रा: चौराहे पर अमेरिका

बड़े व्यवसायी, तानाशाह सरकार और फौजी ढांचे का यही संयुक्त मोर्चा सभी देशों में फ़ासीवादी शासन के उभार के वक्त नजर आया है. इसके अलावे चर्च, भूपति और बादशाहत जैसे शक्ति के पारंपरिक उपकरणों पर भी इसकी प्रचुर निर्भरता रही है. हां यह है कि आज के फ़ासीवाद की गतिशीलता अधिक मजबूत, विकसित और तकनीकी हो चली है. लेखक का मानना है कि दोनों विश्वयुद्धों के बीच के फ़ासीवाद के कुछ तत्व इस दौर के अमेरिकी और यूरोपीय फ़ासीवाद में अभी स्पष्ट नहीं दिखाई पड़ रहे. इनमें उन्होंने नेता की व्यक्ति पूजा, एक ही पार्टी का एकाधिकार, समानांतर सैन्य टुकड़ियां, वर्दी जैसे प्रतीक और विकराल राजकीय प्रचार तंत्र आदि को गिनाया है.

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एनादर मार्क्स: अर्ली मैनुस्क्रिप्ट्स टु द इंटरनेशनल : अर्थशास्त्र संबंधी काम की तैयारी

मार्चेलो मुस्तो की किताब ‘एनादर मार्क्स: अर्ली मैनुस्क्रिप्ट्स टु द इंटरनेशनल’ का दूसरा खंड राजनीतिक अर्थशास्त्र संबंधी मार्क्स के अध्ययन पर केंद्रित है जिसकी शुरुआत पेरिस प्रवास में हो चुकी थी. 1845 में ब्रसेल्स आए और पत्नी तथा पहली पुत्री जेनी के साथ तीन साल रहे. वहां रहने की इजाजत इस शर्त के साथ मिली कि वर्तमान राजनीति के बारे में कुछ नहीं लिखेंगे. अर्थशास्त्र की घनघोर पढ़ाई का सबूत यह कि शुरू के छह महीनों में ही छह नोटबुकें भर गईं. इसके बाद दो महीने मानचेस्टर रहकर अन्य अर्थशास्त्रियों खासकर अंग्रेजों के चिंतन का गहन अध्ययन किया और नौ नोटबुकें भर डालीं. इस समय ही इंग्लैंड के मजदूर वर्ग के हालात पर एंगेल्स की पहली किताब प्रकाशित हुई. अर्थशास्त्र के अध्ययन के अतिरिक्त इसी दौरान नए हेगेलपंथियों के विचारों के विरोध में ढेर सारा लेखन किया जो मरणोपरांत जर्मन विचारधारा के नाम से छपा. इस मेहनत का मकसद जर्मनी में लोकप्रिय नव हेगेलपंथ के ताजातरीन रूपों का खंडन करना और मार्क्स के क्रांतिकारी अर्थशास्त्रीय विचारों को ग्रहण करने की जमीन तैयार करना था. किताब पूरी तो नहीं हुई लेकिन जिसे बाद में एंगेल्स ने इतिहास की भौतिकवादी धारणा कहा उसकी पुख्ता जमीन तैयार हो गई.

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‘कुछ भी नहीं किया गया’: वीरेन डंगवाल की एक कविता का पाठ

नवारुण प्रकाशन ने अभी हाल में ‘कविता वीरेन’ (वीरेन डंगवाल की सम्पूर्ण कविताएँ) को प्रकाशित कर जारी किया है । वीरेन को याद करते हुए और इस अमूल्य किताब की सुंदर प्रस्तुति से प्रेरित होकर इसमें शामिल पहली ही कविता का एक संवेदनशील और बेहतरीन पाठ कवि-आलोचक पंकज चतुर्वेदी ने किया है । प्रस्तुत है: बड़ा कवि वह है, जो अपने बड़े होने को बार-बार सत्यापित करता है। अच्छा कवि उसे कह सकते हैं, जिसकी रचना की सिर्फ़ कुछ पंक्तियों में नहीं, बल्कि समूची संरचना में कविता विन्यस्त हो। बड़ा…

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एक और मार्क्स: वर्तमान को समझने के लिए मार्क्स द्वारा उपलब्ध कराए गए उपकरणों की जरूरत

  2018 में ब्लूम्सबरी एकेडमिक से मार्चेलो मुस्तो की इतालवी किताब का अंग्रेजी अनुवाद ‘एनादर मार्क्स: अर्ली मैनुस्क्रिप्ट्स टु द इंटरनेशनल’ प्रकाशित हुआ । अनुवाद पैट्रिक कैमिलर ने किया है । मुस्तो कहते हैं कि नए विचारों की प्रेरक क्षमता को यदि युवा होने का सबूत माना जाए तो मार्क्स बेहद युवा साबित होंगे । उनका कहना है कि पूंजीवाद के जीवन में सबसे हालिया 2008 के संकट के बाद से ही कार्ल मार्क्स के बारे में बातचीत शुरू हो गई है । बर्लिन की दीवार गिरने के बाद मार्क्स…

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आसिफ़ाओं के लिए

पिछले पाँच सालों से देश में जो धर्म-ध्वजा फहर रही है, और सांप्रदायिकता का जो उन्माद लोगों की नसों में घुल रहा है, उसी का प्रारम्भिक नतीजा है कठुआ का मामला. उससे भी चिंताजनक बात यह है कि जिस तरह से संवैधानिक-प्रशासनिक संस्थाओं एवं सेना का सांप्रदायीकरण किया जा रहा, उसका दुष्परिणाम भी कठुआ मामले में देखा जा सकता है.

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राजनीति में अतिवादी मध्य मार्ग

2015 में वर्सो से तारिक अली की पतली सी किताब ‘ द एक्सट्रीम सेन्टर: ए वार्निंग’ का प्रकाशन हुआ । पतली होने के बावजूद किताब वर्तमान राजनीति की एक बेहद निर्णायक परिघटना का खुलासा करती है । वर्तमान राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी दुर्घटना है वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच जिसे मध्य मार्ग की राजनीति कहा जाता है उसका दक्षिणपंथ के पास चला जाना। ब्रिटेन में लेबर पार्टी के उदाहरण के जरिए तारिक अली ने इस हालत का विश्लेषण किया है। उनका कहना है कि अमेरिकी लोग तो अपने देश…

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