‘रा’ से राम, ‘रा’ से राफेल

आर एस एस न राम को छोड़ रहा है और न कांग्रेस राफेल को। दोनों ‘राम’ और ‘राफेल’ को कस कर पकड़े हुए है। अगले वर्ष लोकसभा का चुनाव है जिसमें राम सबसे बड़े हथियार हैं। राफेल तो है ही। राम मन्दिर दीवानी मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में वर्षों से लम्बित है। 29 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने सुनवाई का समय बढ़ा दिया है और जनवरी 2019 में इसके लिए बेंच बनाने की बात कही है जो सुनवाई की तिथि तय करेगी। इसके पहले 18 अक्टूबर को…

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भारतीय संवैधानिक अदालतें और धर्मनिरपेक्षता (भाग-1)

 इरफान इंजीनियऱ   पिछले कुछ वर्षों से, परंपराओं और रीति-रिवाजों के नाम पर, भारत में धर्मनिरपेक्षता को पुनर्परिभाषित करने और उसकी सीमाओं का पुनः निर्धारण करने का चलन हो गया है। संविधान निर्माताओं ने एकमत से न सही, परंतु बहुमत से धर्मनिरपेक्षता को संविधान का अविभाज्य और अउल्लंघनीय हिस्सा बनाया था। स्वाधीनता के बाद के वर्षों में इस सिद्धांत का लगभग पूर्णतः पालन किया गया और धार्मिक संस्थाओं और धार्मिक नेताओं के प्रभाव और उनकी शक्तियों में शनैः-शनैः कमी लाई गई। सुधार हुए और समुदायों पर धार्मिक नेताओं और संस्थाओं…

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राफेल डील : कुछ तो है, जिसकी पर्दादारी है

जाहिद खान राफेल लड़ाकू विमान सौदे पर मोदी सरकार की लाख पर्देदारी और एक के बाद एक लगातार बोले जा रहे झूठ के बीच, इस विमान सौदे के सभी राज खुलते जा रहे हैं। ताजा खुलासा फ्रांस के पूर्व राट्रपति फ्रास्वां ओलांद ने खुद किया है। एक फ्रेंच अखबार को दिए इंटरव्यू में ओलांद ने स्पट तौर पर कहा है कि राफेल लड़ाकू विमान निर्माता कंपनी ‘डसल्ट’ ने ऑफसेट भागीदार के रूप में अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस को इसलिये चुना, क्योंकि भारत सरकार ऐसा चाहती थी। उस समय उनके…

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नोटबंदी से काले धन पर प्रहार भी एक जुमला ही था

  दो वर्ष पूर्व आज ही के दिन यानि 8 नवंबर को रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नोटबंदी की घोषणा की गयी थी. इसके अंतर्गत 500 और 1000 रुपये के नोटों को बंद कर दिया गया था.तब इसे काले धन के खिलाफ एक मास्टरस्ट्रोक बताया गया था. परंतु दो साल बाद इस बारे में सरकार में बैठे लोगों ने एक अप्रत्याशित खामोशी अख़्तियार कर ली है. पिछले दिनों सर्जिकल स्ट्राइक की दूसरी वर्षगांठ मनाने के लिए तो देश के सभी विश्वविद्यालयों को बाकायदा सर्कुलर जारी किया गया. पर…

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नेताजी बोस, नेहरू और उपनिवेश विरोधी संघर्ष

यदि आधुनिक भारत एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राष्ट्र है तो उसमें देश में चले उपनिवेश विरोधी संघर्ष का प्रमुख योगदान है। विभिन्न राजनैतिक विचारधाराओं वाले लोग इस संघर्ष में शामिल हुए और सभी ने अपने-अपने तरीके से भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के इस अभियान में योगदान दिया। लेकिन कुछ ऐसे लोग, जो धर्म को ही राष्ट्र का आधार मानते थे, इसमें शामिल नहीं हुए और आज वे चुनाव जीतने के लिए या तो इसमें भाग लेने के झूठे दावे करते हैं या स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं, विशेषकर नेहरू,…

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अगर कहीं मैं तोता होता, तो क्या होता ?

कई दशक पहले एक हिन्दी कवि ने एक कविता लिखी थी ‘अगर कहीं मैं तोता होता, तो क्या होता ?’ पांच वर्ष पहले सुप्रीम कार्ट ने सी बी आई को, जो देश की बसे बड़ी जांच एजेन्सी है, पिंजड़े में बन्द तोता कहा था। केन्द्रीय जांच ब्यूरों यानी सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगेन्द्र सिंह ने 1996-97 में करीब बीस वर्ष पहले ही यह कहा था कि राजनीतिक वर्ग कभी इस संस्था को स्वतंत्रता नहीं देगा। सी बी आई का सिद्धान्त है – उद्योग, निष्पक्षता और ईमानदारी। 1941 में इसका गठन…

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मध्यप्रदेश में जातिगत राजनीति की दस्तक

चुनाव से ठीक पहले मध्यप्रदेश के सियासी मिजाज में बदलाव देखने को मिल रहा है. यहां राजनीति में कभी भी उत्तरप्रदेश और बिहार की तरह जातिगत मुद्दे हावी नहीं रहे हैं लेकिन कुछ परिस्थितियों के चलते इस बार इसमें बदलाव देखने को मिल रहा है. दरअसल एससी-एसटी संशोधन विधेयक पारित होने का सबसे तीखा विरोध मध्यप्रेश में ही देखने को मिला है जिसके घेरे में कांग्रेस और भाजपा दोनों हैं. इस साल 20  मार्च को सुप्रीम कोर्ट द्वारा एसटी अत्याचार निरोधक कानून को लेकर दिये गये फैसले को लेकर दलित…

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आज का भारत और गांधी का भारत

  आज के भारत की कल्पना चार वर्ष पहले तक शायद ही किसी ने की थी। अहिंसा से हिंसा की ओर, सत्य से असत्य की ओर और ‘सत्याग्रह’ से मिथ्याग्रह की ओर देश बढ़ रहा है और हम सब गांधी की 150 वीं वर्षगांठ धूमधाम से मना रहे हैं। सरकारी योजनाओं की कमी नहीं है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी के लेख समाचार पत्रों में प्रकाशित हो रहे हैं। वे बापू की 150 वीं जयन्ती के आयोजनों का शुभारम्भ कर रहे हैं। उन्होंने बापू के समानता और समावेशी विकास के सिद्धान्त की…

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सवालों का जवाब मांगना गांधी ने सिखाया – प्रो सुधीर चंद्र

हिन्दू कालेज में ‘आज के सवाल और गांधी’ विषय पर व्याख्यान  डॉ रचना सिंह नई दिल्ली। गांधी ने दुनिया को सिखाया है कि ना कहना मनुष्य का सबसे बड़ा अधिकार है जिसके साथ हमारा नैतिक साहस भी जुड़ा है. आज किसी भी तरह के सवालों को खड़ा करना और उनकी बात करना मुश्किल हो गया है. यह किसी सभ्य जनतांत्रिक समाज के लिए बेहद चिंता की बात है. यह बातें सुप्रसिद्ध इतिहासकार और लेखक सुधीर चंद्र ने हिन्दू कालेज में ‘आज के सवाल और गांधी’ विषय पर व्याख्यान में कही.…

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जेल का भय रिश्ते का आधार नहीं, संवैधानिक नैतिकता से बनेगा लोकतांत्रिक समाज

अगर हमारे कानून सामाजिक नैतिकता के आधार पर बनने लगे तो सोचिए कि हमारे समाज का क्या होगा ! क्योंकि सामाजिक नैतिकता तो अक्सर यही कहती है कि जाति के बाहर विवाह अनैतिक है, समलैंगिक रिश्ते रखना अनैतिक है, किसी लड़की का अपनी मर्जी के कपड़े पहनना अनैतिक है, किसी लड़की का अपने लिए बराबरी आज़ादी पाना अनैतिक है, किसी दलित लड़की या लड़के का किसी सवर्ण लड़के या लड़की से प्रेम संबंध अनैतिक है। सामाजिक नैतिकता तो पितृसत्तात्मक और जातिवादी नैतिकता है। और इसीलिए हम सामाजिक नैतिकता की बजाए संवैधानिक नैतिकता की ओर कदम बढ़ाते हैं तो हमारा समाज ज्यादा सुन्दर, ज्यादा लोकतांत्रिक बनेगा । इसकी हमें कोशिश करनी चाहिए।

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मजदूरों को निचोड़ने और फेंकने का काल है यह

आज संगठित और असंगठित, दोनों क्षेत्रों में मजदूरों की दशा, अमानवीयता का सामना कर रही है। अपने देश में ज्यादातर मजदूर असंगठित क्षेत्रों में काम करते हैं और लचर श्रम कानून की सीमा से परे होते हैं । केवल 8-9 प्रतिशत मजदूर ही श्रम कानून के अंतर्गत आते हैं । फिर भी नीति नियंताओं की आंखों का पानी मर चुका है। विशेष दुर्दशा असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की है जिनकी संख्या कुल मजदूरों का लगभग 92 प्रतिशत हैं । संगठित क्षेत्रों में महज 5 प्रतिशत मजदूर हैं। जिस शिकागो सम्मेलन के द्वारा काम के आठ घंटे निर्धारित करने की लम्बी लड़ाई मजदूरों ने लड़ी थी और जिसे आज भी मजदूर दिवस के रूप में पूरी दुनिया में मनाया जाता है, वह बेमानी हो चुका है । आज श्रमिकों से अठारह-अठारह घंटे काम लिया जा रहा है। बदले में किसी प्रकार की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए समय नहीं दिया जा रहा ।

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साम्प्रदायिक मनोवृत्ति से मुक्ति की तलाश

समाज में बढ़ते साम्प्रदायिक मनोवृत्ति को कैसे रोका जाये? कैसे नई पीढ़ी में भरी जा रही हिन्दू-मुस्लिम विभाजन, नफरत और भेद-भाव को कम किया जाये, इसी बिन्दु के इर्द-गिर्द शीरोज बतकही की 11वीं कड़ी में रविवार को चर्चा हुई।

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सरकारी खजाने से चुनावी यात्रा का औचित्य

  जावेद अनीस मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान अपने लम्बे कार्यकाल के दौरान बेहिसाब घोषणाओं, विकास के लम्बे-चौड़े  दावों और विज्ञापनबाजी में बहुत आगे साबित हुये है, वे हमेशा घोषणा मोड में रहते हैं और उनकी सरकार के चमचमाते विज्ञापन प्रदेश के साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी खुले जेब के साथ प्रसारित होते हैं जिसमें मुख्य रूप से शिवराज और उनकी सरकार की ब्रांडिंग की जाती है. अब विधान सभा चुनाव से ठीक पहले सीएम शिवराज सिंह द्वारा ‘जन आशीर्वाद यात्रा’ निकली जा रही है यह पूरी तरह से एक…

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उसका भाषण था कि मक्कारी का जादू…

सौरभ यादव, शोध छात्र, दिल्ली विश्वविद्यालय 15 अगस्त, नई दिल्ली ।आज देश के 72 वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रचलित परम्परा के अनुसार प्रधानमंत्री ने डालमिया के गोद लिए लाल किले से देश को पहली बार संबोधित किया। यहां पहली बार शब्द का प्रयोग दो वजहों से किया जा रहा है । पहला तो ये कि मोदी जी को इस ‘पहली बार’ शब्द से विशेष प्रेम है, दूसरा इसलिए क्योंकि इससे पहले के प्रधानमन्त्रियों ने भारत सरकार के अधीन आने वाले लाल किले से देश को सम्बोधित किया था लेकिन हाल…

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एक और मार्क्स: वर्तमान को समझने के लिए मार्क्स द्वारा उपलब्ध कराए गए उपकरणों की जरूरत

  2018 में ब्लूम्सबरी एकेडमिक से मार्चेलो मुस्तो की इतालवी किताब का अंग्रेजी अनुवाद ‘एनादर मार्क्स: अर्ली मैनुस्क्रिप्ट्स टु द इंटरनेशनल’ प्रकाशित हुआ । अनुवाद पैट्रिक कैमिलर ने किया है । मुस्तो कहते हैं कि नए विचारों की प्रेरक क्षमता को यदि युवा होने का सबूत माना जाए तो मार्क्स बेहद युवा साबित होंगे । उनका कहना है कि पूंजीवाद के जीवन में सबसे हालिया 2008 के संकट के बाद से ही कार्ल मार्क्स के बारे में बातचीत शुरू हो गई है । बर्लिन की दीवार गिरने के बाद मार्क्स…

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समाज का सच सामने लाती है हेमंत कुमार की कहानी ‘रज्जब अली’

(कथाकार हेमंत कुमार की कहानी  ‘ रज्जब अली  ’ पत्रिका ‘ पल-प्रतिपल ’ में प्रकाशित हुई है. इस कहानी की विषयवस्तु, शिल्प और भाषा को लेकर काफी चर्चा हो रही है. कहानी पर चर्चा के उद्देश्य से समकालीन जनमत ने 22 जुलाई को इसे प्रकाशित किया था. कहानी पर पहली टिप्पणी युवा आलोचक डॉ. रामायन राम की आई  जिसे हमने प्रकाशित किया है,  दूसरी टिप्पणी जगन्नाथ दुबे की आई जो डॉ. रामायन राम द्वारा उठाए गए सवालों से भी टकराती है . इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए प्रस्तुत है…

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हेमन्त कुमार की कहानी ‘ रज्जब अली ’ में सामंती वैभव देखना प्रतिक्रियावाद को मजबूत करना है

कहानी में मूल समस्या साम्प्रदायिकता है. यह कहानी हमारे समय के लिहाज से एक बेहद जरूरी कहानी है. इसलिए जरूरी यह है कि इस कहानी के मूल मन्तव्य पर बात हो. कहानी के मूल मन्तव्य पर बात न करके हम उन्ही प्रतिक्रियावादी साम्प्रदायिक ताकतों के हाथ मजबूत करते दिखेंगे.

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समलैंगिक और ट्रांस जेंडर लोगों के सम्मान और बराबरी के अधिकार पर हमला है सेक्शन 377

1917 के रूसी क्रांति के बाद रूस की क्रांतिकारी सरकार ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर किया. भारत में समलैंगिकता को अपराध बनाने वाले तो अंग्रेज़ ही थे. अंग्रेज़ चले गए पर अपना कानून छोड़ गए, जिसे भेदभावपूर्ण लोग ‘भारत की संस्कृति ‘ कहते हैं !

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झारखंड के कोचांग में नुक्कड़ नाटक दल की महिलाओं के साथ हुए बलात्कार कांड पर जसम का निंदा प्रस्ताव व बयान

जन संस्कृति मंच झारखंड के खूंटी जिले के कोचांग में नुक्कड़ नाटक करने गईं नाटक टीम की लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना की निंदा करता है।यह कृत्य बेहद अमानवीय और सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है। जिस तरह पूरे देश में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा हो रही है वह राष्ट्र के सामने एक बड़ी चुनौती है जो भारतीय लोकतंत्र को आइना दिखाती है। निर्भया के बाद पूरे देश मे फैले महिलाओं की बेख़ौफ़ आज़ादी के आंदोलन के बाद बने कड़े कानूनों के बावजूद देश मे बलात्कार की…

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उन्नीस की बलिवेदी पर कश्मीर

कश्मीर को एक बार फिर चुनावी राजनीति की बलिवेदी पर चढ़ा दिया गया है. कश्मीर की निरन्तर जारी त्रासदी का सबसे बड़ा कारण यही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों में यह चुनावी वैतरणी का सबसे बड़ा सहारा बना रहा है.

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