क्रान्ति आती नहीं, ले आयी जाती है बरक्स कर्तार सिंह सराभा

ग़दर आन्दोलन और भारतीय राष्ट्रीय चेतना के प्रचार-प्रसार के लिए कर्तारसिंह ने ‘ग़दर’ नाम से एक पत्रिका निकालना प्रारम्भ किया, जिसके सम्पादक वह स्वयं बने। यह पत्रिका चार भाषाओं में प्रकाशित होती थी – अंग्रेज़ी, उर्दू, हिन्दी और पंजाबी। पत्रिका साप्ताहिक निकलती थी और इसकी छपाई रात्रि समय गोपनीय प्रेस में की जाती थी। कर्तारसिंह रात के समय इसकी देखभाल करते थे। अमरीका में छपी यह पत्रिका भारत पहुँचती थी और फौरन फौजियों में बाँट दी जाती थी। इससे भारतीय सिपाहियों में बेचैनी फैल गई और वे अपनी मातृभूमि के लिए मर-मिटने को तैयार हो गये। अब अंग्रेज सरकार ने इस पत्रिका पर प्रतिबन्ध लगा दिया। बावजूद पत्रिका छावनियों तक पहुँचता रहा। कई छावनियों से इसकी कापियाँ ज़ब्त की जाती रहीं फिर भी यह सिलसिला क़रीब दो साल तक जारी रहा।

Read More

मुक्तिबोध मेरे लिए -अच्युतानंद मिश्र

अच्युतानंद मिश्र फ़िराक ने अपने प्रतिनिधि संग्रह ‘बज़्मे जिंदगी रंगे शायरी’ के संदर्भ में लिखा है, जिसने इसे पढ़ लिया उसने मेरी शायरी का हीरा पा लिया .इस तरह की बात मुक्तिबोध के संदर्भ में कहनी कठिन है. इसका बड़ा कारण है कि मुक्तिबोध का समस्त लेखन किसी भी तरह की प्रतिनिधिकता के संकुचन में फिट नहीं बैठता. मुक्तिबोध सरीखे लेखकों को जब हम प्रतिनिधि रचना के दायरे में रखकर देखने की कोशिश करते हैं तो एक बड़ा आयाम हमसे छूटने लगता है. यही वजह है कि स्वन्तान्त्रयोत्तर हिंदी लेखन…

Read More

मुक्तिबोध आस्था देते हैं मुक्ति नहीं

प्रियदर्शन मुक्तिबोध और ख़ासकर उनकी कविता ‘अंधेरे में’ पर लिखने की मुश्किलें कई हैं। कुछ का वास्ता मुक्तिबोध के अपने बेहद जटिल काव्य विन्यास से है तो कुछ का उनके मूल्यांकन की सतत चली आ रही कोशिशों से, जिनमें कुछ बहुत सरल हैं कुछ बहुत जटिल, कुछ बहुत साधारण हैं कुछ वाकई असाधारण। मुक्तिबोध के निधन के बाद उनके समकालीनों और समानधर्मा लेखकों ने जिस आत्मीयता, अधिकार और प्रामाणिकता से उन पर लिखा है, वह भी किसी नए लिखने वाले की एक मुश्किल है। और जो सबसे बड़ी मुश्किल है,…

Read More

अंतःकरण और मुक्तिबोध के बहाने

(मुक्तिबोध के जन्मदिन पर समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय का आलेख) 2017 में मुक्तिबोध की जन्मशताब्दी गुज़री है और 2018 मार्क्स के जन्म की द्विशाताब्दी है। मुक्तिबोध की रचना और विश्वदृष्टि का मार्क्स की विश्वदृष्टि से गहरा नाता है। यह जोर-शोर से प्रचारित किया जा रहा है कि मार्क्स को गुज़रे 200 वर्ष हो गए, दुनिया कहाँ से कहाँ चली गई, वे अब पुराने पड़ गए। अब मार्क्सवाद प्रासंगिक नहीं रहा। भारत में तो सत्तारूढ़ दल उन्हें यह कह कर भी नकार रहे हैं कि मार्क्स विदेशी थे…

Read More

कुछ रंग इश्क के, कुछ इंकलाब के

साहिर के इंकलाबी सुर नारों की शक्ल में उतने नहीं निकलते जितने त्रासदी के ज़बरदस्त अहसास से। यह बात बहुत मायने रखती है। अपने हालात की त्रासदी का तीखा अहसास ही इंसान को प्रेरित करता है ज़िंदगी की कुछ अलग सूरतें तलाशने को। यह तलाश, यह जद्दोजहद – इंकलाब का ख़्वाब इसी से तो गढ़ा जाता है।

Read More

कल और आएंगे नग़मों की खिलती कलियां चुनने वाले

(आज मशहूर शायर और गीतकार साहिर लुधियानवी की पुण्य तिथि है । इस मौके पर साहिर साहब को याद कर रहे हैं रंगकर्मी महदी हुसैन) महदी हुसैन साहिर का मतलब होता है जादू करने वाला, यकीनन साहिर एक जादूगर ही था, उसका जादू ज़माने के सर चढ़कर बोला, उसके हर गीत आज भी ज़िन्दा दिलों को अपनी ओर खींचने की ताकत रखते हैं – ये रात ये चांदनी फिर कहाँ, मन रे तू काहे न धीर धरे, अभी न जाओ छोड़के, वो सुबह कभी तो आएगी, मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता…

Read More

निराला की कविताएँ अपने समय के अंधेरे को पहचानने में हमारी मदद करती हैं: प्रो. विजय बहादुर सिंह

विवेक निराला    निराला की 57 वीं पुण्यतिथि पर आयोजित ‘छायावाद और निराला :कुछ पुनर्विचार’ विषय पर ‘निराला के निमित्त’ की ओर से आयोजित गोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए प्रसिद्ध आलोचक प्रो. विजय बहादुर सिंह ने छायावाद की प्रासंगिकता पर कई प्रश्नों के साथ विचार करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने रेखांकित किया कि छायावाद आधुनिक भारत का सांस्कृतिक स्वप्न है। ‘अस्मिता की तलाश’ पहली बार छायावादी कविता में ही दिखाई देती है। छायावाद ने ‘मनुष्यता’ को सबसे बड़ी अस्मिता के रूप में रेखांकित किया। छायावाद के…

Read More

अपने-अपने रामविलास: प्रणय कृष्ण

आज रामविलास जी का जन्मदिन पड़ता है.  इस अवसर पर प्रणय कृष्ण का लिखा आलेख ‘अपने अपने रामविलास’ समकालीन जनमत के पाठकों के लिए यहाँ दिया जा रहा है. यह लेख डेढ़ दशक पहले तब लिखा गया था जब रामविलास जी की मृत्यु के बाद उनपर हमले किए जा रहे थे और उनकी विरासत को लेकर तमाम तरह के भ्रम फैलाए जा रहे थे. यह लेख उन हमलों और फैलाए गए भ्रमों  का जवाब है, जो आज भी प्रासंगिक है. (आलोचना के रामविलास अंक पर अविनाश कुमार, आशुतोष कुमार, रमेश कुमार,…

Read More

जबरदस्त कवि, बड़े सम्पादक, सिनेमा और संगीत के अध्येता, गंभीर पाठक, भाषाओं और यारों के धनी विष्णु खरे की याद

अशोक पाण्डे अलविदा विष्णु खरे – 1 जबरदस्त कवि, बड़े सम्पादक, सिनेमा और संगीत के अध्येता, गंभीर पाठक, भाषाओं और यारों के धनी उस आदमी की महाप्रतिभा का हर कोई कायल रहा. असाधारण उपलब्धियों और आत्मगौरव से उपजे उनके नैसर्गिक दंभ का भी मैं दीवाना था. उनका दंभ उन पर फबता था. ऐसा कोई दूसरा आदमी अभी मिलना बाकी है जिसके बारे में ऐसा कह सकूं. उनके अद्वितीय जीवन का विस्तार इतना विराट था कि भले-भलों की कल्पना तक वहां नहीं पहुँच सकती. बौनों से भरे साहित्य-संसार दुनिया में वे…

Read More

अभिव्यक्ति के प्रति ईमानदार एक रचनाकार की त्रासदी ‘मंटो’

अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ‘मंटो’ बायोपिक फिल्म की बहुत समय से प्रतीक्षा कर रहा था। समय-समय पर आने वाले ट्रेलर या वीडियो के टुकड़े इंतिजार को अ-धीरज में बदल रहे थे। आज वह दिन हाथ लग ही गया। कुछ रचनाकार होते हैं जिनके लेखन के साथ-साथ उनके जीवन का भी आकर्षण किसी को खींच सकता है। यह व्यक्तिगत रुचि का मसला हो सकता है। मेरे लिए तुलसी, कबीर, ग़ालिब, निराला, मंटो जैसे रचनाकार लेखन के साथ-साथ अपने जीवन का भी आकर्षण रखते हैं। उनके लेखन से गुजरने की तरह उनके जीवन…

Read More

ज़मीर को हर शै से ऊपर रखने वाले मंटो

अखिलेश प्रताप सिंह. खुदा ज्यादा महान हो सकता है लेकिन मंटो ज्यादा सच्चे दिखते हैं और उससे भी ज्यादा मनुष्य, क्योंकि मंटो को सब कुछ इस कदर महसूस होता है कि शराब भी उनकी ज़ेहन की आवाज को दबा नहीं पाती है. यह फ़िल्म अगर नंदिता दास ने लिखी है और निर्देशित की है और चूँकि यह फ़िल्म मंटो जैसे हिपटुल्ला? व्यक्ति का जीवन चरित है, तो इसे देखना मनोरंजन की चहारदीवारी से आगे की चीज है. दुनिया की सभी सुंदर सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की तरह यह फिल्म दर्शक को अपने…

Read More

विष्णु खरे: बिगाड़ के डर से ईमान का सौदा नहीं किया

विष्णु जी नहीं रहे। हिंदी साहित्य संसार ने एक ऐसा बौद्धिक खो दिया, जिसने ‘बिगाड़ के डर से ईमान’ की बात कहने से कभी भी परहेज़ नहीं किया। झूठ के घटाटोप से घिरी हमारी दुनिया में ऐसे लोग बहुत कम रह गए हैं। निर्मम आलोचना की यह धार बगैर गहरी पक्षधरता और ईमानदारी के सम्भव नहीं हो सकती थी। बनाव और मुँहदेखी उनकी ज़िंदगी से ख़ारिज थे। चुनौतियों का सामना वे हमेशा सामने से करते थे। अडिग-अविचल प्रतिबद्धता, धर्मनिरपेक्ष-प्रगतिशील-जनवादी दृष्टि और विभिन्न मोर्चों पर संघर्ष करने का अप्रतिम साहस हमारे…

Read More

कबूतरी देवी को लोगों के बीच ले जाने की शुरुआत

नैनीताल के निचले हिस्से तल्लीताल में बाजार से ऊपर चढ़ते हुए एक रास्ता खूब सारे हरे-भरे पेड़ों वाले कैम्पस तक ख़तम होता है. यह कैम्पस राजकीय कन्या इंटरमीडिएट कालेज का है. इस कैम्पस में पिछले इतवार 16 सितम्बर 2018 को नैनीताल के सक्रिय संस्कृतिकर्मी ज़हूर आलम अपनी टीम के साथ कालेज के सभागार को सिनेमा हाल में बदलने की कसरत में जुटे थे. हाल की खिड़कियों में पल्ले मौजूद थे इसलिए अँधेरा हासिल करने के लिए ज्यादा मशक्कत न करनी पड़ी. दुपहर 3.30 से शो शुरू होना था लेकिन प्रोजक्शन…

Read More

‘कुछ भी नहीं किया गया’: वीरेन डंगवाल की एक कविता का पाठ

नवारुण प्रकाशन ने अभी हाल में ‘कविता वीरेन’ (वीरेन डंगवाल की सम्पूर्ण कविताएँ) को प्रकाशित कर जारी किया है । वीरेन को याद करते हुए और इस अमूल्य किताब की सुंदर प्रस्तुति से प्रेरित होकर इसमें शामिल पहली ही कविता का एक संवेदनशील और बेहतरीन पाठ कवि-आलोचक पंकज चतुर्वेदी ने किया है । प्रस्तुत है: बड़ा कवि वह है, जो अपने बड़े होने को बार-बार सत्यापित करता है। अच्छा कवि उसे कह सकते हैं, जिसकी रचना की सिर्फ़ कुछ पंक्तियों में नहीं, बल्कि समूची संरचना में कविता विन्यस्त हो। बड़ा…

Read More

सुरों के उस्ताद, सुनने की उस्तादी

दिनेश चौधरी हरिभाई यानी पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जी हमेशा थोड़ी जल्दी में होते हैं। वे आँधी की तरह आये, बाँसुरी की तान छेड़ी, खाना खाये बगैर किसमिस के चार दाने मुंह में डाले और तूफान की तरह चले गये। गाड़ी से उतरकर मंच पर विराजने और लौटकर फिर अपने वाहन में सवार होने तक लोगों ने उन्हें घेरे रखा था। किसी को उनके आटोग्राफ चाहिये थे तो किसी को उनके साथ फोटू खिंचानी थी। कुछ लोग एक सेलिब्रिटी के साथ महज चंद पल गुजारने का सुख लूटना चाहते थे, सो…

Read More

एक और मार्क्स: वर्तमान को समझने के लिए मार्क्स द्वारा उपलब्ध कराए गए उपकरणों की जरूरत

  2018 में ब्लूम्सबरी एकेडमिक से मार्चेलो मुस्तो की इतालवी किताब का अंग्रेजी अनुवाद ‘एनादर मार्क्स: अर्ली मैनुस्क्रिप्ट्स टु द इंटरनेशनल’ प्रकाशित हुआ । अनुवाद पैट्रिक कैमिलर ने किया है । मुस्तो कहते हैं कि नए विचारों की प्रेरक क्षमता को यदि युवा होने का सबूत माना जाए तो मार्क्स बेहद युवा साबित होंगे । उनका कहना है कि पूंजीवाद के जीवन में सबसे हालिया 2008 के संकट के बाद से ही कार्ल मार्क्स के बारे में बातचीत शुरू हो गई है । बर्लिन की दीवार गिरने के बाद मार्क्स…

Read More

वीरेन डंगवाल की याद और सृजन, कल्पना, रंगों, शब्दों और चित्रों की दुनिया

डॉ. कामिनी त्रिपाठी शासकीय नवीन कन्या महाविद्यालय बैकुंठपुर में आयोजित त्रिदिवसीय ‘वीरेन डंगवाल जन्म दिन समारोह’ का समापन 8 अगस्त को छात्राओं द्वारा वीरेन दा की कविताओं का पोस्टर बनाते हुए सम्पन्न हुआ | कार्यक्रम के पहले दिन लगभग 30 छात्राओं ने ‘नवारुण’ द्वारा प्रकाशित वीरेन दा की संपूर्ण कविताओं के संग्रह ‘कविता वीरेन’ से अपनी पसंद की कविताओं का चयन कर अपने अंदाज़ में उनका पाठ किया | छात्राओं द्वारा चयनित कविताओं को देखने से एक बात बहुत आसानी से समझी जा सकती है कि वीरेन दा की कविताएं…

Read More

कवि वीरेन डंगवाल के 71वें जन्मदिन पर बरस रही थी कवि की याद

(पांच अगस्त को हिंदी के कवि वीरेन डंगवाल का जन्म दिन होता है । देश भर में कवि की याद में हुए आयोजनों में से कुछ झलकियाँ यहां प्रस्तुत हैं ।) बरस रही थी कवि की याद  कल पांच अगस्त को कवि वीरेन डंगवाल का जन्मदिन था .कवि तो बहुत हैं और उनकी यादें भी ,परन्तु मैंने लोगों को जिस तरह वीरेन डंगवाल को याद करते हुए सुना है ,देखा है वैसा किसी को नहीं .जो उनसे एक बार भी मिला है ,जो उनसे लोगों को मिलते हुए देखा भर…

Read More

वत्सल उम्मीद की ठुमक के साथ मैं तो सतत रहूँगा तुम्हारे भीतर नमी बनकर: वीरेन डंगवाल

करीब 16 बरस पहले वीरेन डंगवाल के संग्रह ‘दुश्चक्र में स्रष्टा’ पर लिखते हुए मैंने उल्लास, प्रेम और सौंदर्य को उनकी कविता के केंद्रीय तत्वों के रूप में रेखांकित किया था- यह कहते हुए कि मूलतः अनाधुनिक मान लिए गए ये तत्व दरअसल वीरेन की काव्य-दृष्टि में एक वैकल्पिक आधुनिकता की खोज करते लगते हैं। अब उनके निधन के बाद जब उनका समग्र ‘कविता वीरेन’ के नाम से मेरे सामने पड़ा है तो यह देखना मेरे लिए प्रीतिकर है कि वीरेन की कविता ने उन दिनों जो प्रभाव मुझ पर…

Read More

वीरेन दा की याद: ‘नदी’ कविता के बहाने से

शिव प्रकाश त्रिपाठी “ लंबे और सुरीले नहीं थे मेरे गान मेरी सांसे छोटी थी पर जब भी गाए मैंने बसंत के ही गान गाए अपनी फटी हुई छाती के बावजूद” बसंत आ चुका है पर न तो हवा में रवानगी ही आई और न फूलों में भौरें. फूल खिले तो हैं पर उनमें कालिख की एक पूरी परत चढ़ी हुई है. ये अंधकार युग की पदचाप भी हो सकती है. एक ऐसा समय गति में है, जहाँ एक तरफ पूरे विश्व में वैश्वीकरण बनाम संरक्षणवाद पर छाती-पीट बहस चल…

Read More