भारतीय चित्रकला और ‘कथा’ : 4

चित्रकला के सन्दर्भ में ‘कथा’ का महत्व केवल भारत तक ही सीमित है, ऐसा कहना गलत होगा। पर जिन देशों के लोगों के चिंतन में वैज्ञानिक, तार्किक और आधुनिक विचारों को विस्तार मिला है वहाँ ऐसे चित्र अपनी उपयोगिता खो चुके हैं और अब उन देशों में , उन्हें केवल संग्रहालयों में ही देखा जा सकता है। पर जहाँ स्थितियाँ नहीं बदल सकी हैं वहाँ आज भी लोग चित्रकला को ‘कथाओं’ के वाहक समझते हुए चित्रों को देखने के बजाय सुनना या पढ़ना चाहते हैं। स्वाभाविक रूप से यह , राज सत्ता और धर्म सत्ता के लिए सबसे अनुकूल स्थिति है।

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‘ किसानों का दमन कर मोदी सरकार ने सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार खो दिया है ’

  नई दिल्ली. अखिल भारतीय किसान महासभा ने दिल्ली के गाजीपुर बार्डर पर किसानों के शांतिपूर्ण मार्च को रोकने और आन्दोलनकारी किसानों का दमन करने की कड़ी निंदा की है. किसान महासभा के राष्ट्रीय सचिव पुरुषोत्तम शर्मा ने कहा कि एक तरफ मोदी सरकार किसानों के शांतिपूर्ण आन्दोलन का दमन कर रही है और दूसरी ओर देश भर में भीड़ हत्याओं को संगठित करने वाले फासिस्ट गिरोहीं को खुला संरक्षण दे रही है. उन्होंने कहा कि सरकार की किसान विरोधी नीतियों के चलते आत्महत्या को मजबूर देश के पीड़ित किसानों…

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गांव में डॉ. अम्बेडकर व गौतम बुद्ध की मूर्ति रखने पर दलितों का उत्पीड़न

डॉ संदीप पांडेय उ.प्र. के राजधानी लखनऊ से सटे जिलों के दो गांवों में दलित समुदाय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर व भगवान गौतम बुद्ध की मूर्तियां लगा पाने में असफल है क्योंकि गांव के बाहर के शासक दल के प्रभावशाली लोग व प्रशासन के अधिकारी विरोध कर रहे हैं। सीतापुर जिले की बिस्वां तहसील के थानगांव थाना क्षेत्र के गांव गुमई मजरा ग्राम सभा रामीपुर गोड़वा व बाराबंकी जिले के देवा थाना क्षेत्र के सरसौंदी गांव में मूर्तियां लगाने हेतु जिला प्रशासन के माध्यम से शासन से अनुमति भी मांगी गई…

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‘ तथाकथित हिंदुत्ववादी सरकार ने एक साधू को मरने के लिए छोड़ दिया है ’

आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं राज्य सभा सदस्य संजय सिंह और प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता एवं सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) के नेता संदीप पाण्डेय ने गंगा के संरक्षण की मांग को आमरण अनशन कर रहे स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद की मांगों की अनदेखी करने पर केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना की है. दोनों नेताओं ने कहा कि ‘ तथाकथित हिंदुत्ववादी सरकार ने एक साधू को मरने के लिए छोड़ दिया है ’.

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युवा कविता की एक सजग, सक्रिय और संवेदनशील बानगी है निशांत की कविताएँ

जब भी कोई नई पीढ़ी कविता में आती है तो उसके समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न होता है कि वह अपने से ठीक पहले की पीढ़ी की कविताओं को किस तरह पढ़े. इस पढ़ने में उसकी अपनी अनुपस्थिति जरुरी है या उपस्थिति. कवि का पढ़ना उसका लिखना भी होता है. इस कठिन-कविता के दौर में निशांत ने न सिर्फ अपना अलग मुकाम बनाया है, बल्कि अपने से पहले की पीढ़ी की कविता को पढ़ने का ढब भी विकसित किया है. बेरोजगारी, प्रेम, अकेलापन, संघर्ष और यारबासी- ये कुछ ऐसे विषय है जिससे हर युवा…

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हत्या जिनकी भी हो, पुरजोर विरोध कीजिएः तभी बचेगा समाज, तभी बचेगा देश !

एप्पल कंपनी में मैनेजर के पद पर काम करने वाले विवेक तिवारी को शुक्रवार देर रात गश्त कर रहे उत्तर प्रदेश पुलिस के कॉन्स्टेबल ने लखनऊ में गोली मारकर हत्या कर दी। उत्तर प्रदेश में पिछले 16 महीनों में जबसे आदित्यनाथ की सरकार बनी है, तब से अब तक दो हज़ार से भी ज़्यादा तथाकथित पुलिस एनकाउंटर हुए हैं, जिनमें 58 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। इन मुठभेड़ों में सबसे हालिया मुठभेड़ अलीगढ़ की है जहां पत्रकारों के सामने मुस्तकिम और नौशाद नामक व्यक्ति की हत्या कर दी गई…

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आधार पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय : आने वाला इतिहास असहमति वाले अल्‍पमत निर्णय को ही सही ठहरायेगा

सर्वोच्‍च न्‍यायालय का निर्णय लाखों लोगों को मायूस करने वाला है, क्‍योंकि देश के गरीबों को पीडीएस एवं मनरेगा जैसी जनकल्‍याण की योजनाओं से वंचित करने के लिए आधार का इस्‍तेमाल करने की वैधता प्रदान कर दी गई है. सर्वोच्‍च न्‍यायालय इस इस तथ्‍य को महसूस करने में असफल रहा है कि भोजन या रोजगार का हक़ ऐसे अधिकार हैं जिनसे किसी को भी, किसी भी आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता है. बड़े पैमाने पर मौजूद इस तथ्‍य को भी पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है कि आधार में एनरोलमेण्‍ट कराने को बाद भी 27 प्रतिशत गरीबों को जनकल्‍याण योजनाओं का लाभ नहीं दिया जा रहा है.

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मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी : सर्वोच्‍च न्‍यायालय की निगरानी में एस.आई.टी. द्वारा जांच ही उचित

यह संतोषजनक है कि पुणे पुलिस द्वारा बिना जांच किये ही आरोप लगा कर जेल भेजने की सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने अनुमति नहीं दी और उन्‍हें हाउस अरेस्‍ट में ही रखा, लेकिन बेहतर होता कि सर्वोच्‍च न्‍यायालय की निगरानी में एस.आई.टी. द्वारा जांच करवाई जाती क्‍योंकि पुणे पुलिस की गतिविधियों में खुद ही कई गैरकानूनी काम हुए हैं, जिन्‍हें कि इस मामले में जस्टिस चन्‍द्रचूड़ ने असहमति वाले अल्‍पमत के निर्णय में चिन्हित किया है.

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असली नक्सलियों के बीच

भाकपा माले खुद को आज भी बदल रही है . इसी महीने 5 सितम्बर को गौरी लंकेश की बरखी पर पार्टी महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य और मैंने एक सम्मेलन को सम्बोधित किया था . बाद में उसी रोज फासिज्म के खिलाफ सड़क पर एक नुक्क्ड़ सभा को भी सम्बोधित किया था . मैंने यही महसूस किया , दीपांकर लकीर के फ़क़ीर बनना नहीं चाहते . उनकी पार्टी एक नए वैचारिक आयाम में प्रवेश करना चाहती है . या उसके लिए पंख फड़फड़ा रही है . माले ने मार्क्सवाद को फुले ,आंबेडकर के विचारों और भगत सिंह के सपनों से मंडित करने की पहल की है . 1990 के दशक में ही इस पार्टी ने ब्राह्मणवाद विरोध को अपनी कार्य सूची में शामिल किया था . आज वह इस पर जोर दे रहे हैं .

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कल्पना लाज़मी के सिनेमा में एक सशक्त स्त्री की छवि उभरकर सामने आती है

यूनुस खान   कल्‍पना लाजमी का जाना हिंदी फिल्‍म जगत का एक बड़ा नुकसान है। बहुत बरस पहले एक सीरियल आया था ‘लोहित किनारे’। ये दूरदर्शन का ज़माना था। मुमकिन है आपको ये सीरियल याद भी हो। इसका शीर्षक गीत शायद भूपेन हजारिका ने गाया था। असम की कहानियों पर केंद्रित ये धारावाहिक बनाया था कल्‍पना लाजमी ने, और ये कल्‍पना लाजमी से हमारा पहला परिचय था। कल्‍पना लाजमी को मुख्‍यत: ‘रूदाली’ के लिए याद किया जाता है। असल में ‘रूदाली’ ज्ञानपीठ से सम्‍मानित बंगाल की प्रसिद्ध लेखिका महाश्‍वेता देवी…

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जनगीतों का सामाजिक सन्दर्भ

डॉ. राजेश मल्ल   साहित्य अपने अन्तिम निष्कर्षों में एक सामाजिक उत्पाद होता है। कत्र्ता के घोर उपेक्षा के बावजूद समय और समाज की सच्चाई उसके होठों पर आ ही जाती है। ऐसे में जब कविता का मूल भाव समाज परिवर्तन हो तो समाज में निहित द्वन्द्व, अन्तर्विरोध अत्यन्त स्वाभाविक रूप से कविता में घुल-मिलकर प्रवाहित होते हैं। ‘जनगीतों’ का स्वरूप कुछ ऐसे ही बना-रचा हुआ है। सामाजिक अन्तः सम्बन्ध और उनमें निहित असमानता के तनावपूर्ण रूप जनगीतों के मूल विषय हैं। जनगीतों में सर्वाधिक गैर बराबरी तथा शोषण और…

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ज़मीर को हर शै से ऊपर रखने वाले मंटो

अखिलेश प्रताप सिंह. खुदा ज्यादा महान हो सकता है लेकिन मंटो ज्यादा सच्चे दिखते हैं और उससे भी ज्यादा मनुष्य, क्योंकि मंटो को सब कुछ इस कदर महसूस होता है कि शराब भी उनकी ज़ेहन की आवाज को दबा नहीं पाती है. यह फ़िल्म अगर नंदिता दास ने लिखी है और निर्देशित की है और चूँकि यह फ़िल्म मंटो जैसे हिपटुल्ला? व्यक्ति का जीवन चरित है, तो इसे देखना मनोरंजन की चहारदीवारी से आगे की चीज है. दुनिया की सभी सुंदर सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की तरह यह फिल्म दर्शक को अपने…

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चार आयामों का एक कवि विष्णु खरे

मंगलेश डबराल   यह बात आम तौर पर मुहावरे में कही जाती है कि अमुक व्यक्ति के न रहने से जो अभाव पैदा हुआ है उसे कभी भरा नहीं जा सकेगा. लेकिन विष्णु खरे के बारे में यह एक दुखद सच्चाई है की उनके निधन से जो जगह खाली हुई है, वह हमेशा खाली रहेगी. इसलिए की विष्णु खरे मनुष्य और कवि दोनों रूपों में सबसे अलग, असाधारण और नयी लीक पर चलने वाले व्यक्ति थे. वे कवि,आलोचक, अनुवादक, शास्त्रीय और फिल्म संगीत के गहरे जानकार, सिमेमा के मर्मज्ञ और पत्रकार…

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तीन तलाक़ अध्यादेश

क्या कोई समाचार चैनल है जिसने तत्काल/त्वरित तीन तलाक़ के खिलाफ अध्यादेश पर चर्चा करने से पहले खुद को और दर्शकों को विवाह व तलाक़ के सिविल/दीवानी तथा आपराधिक/फौजदारी मामलों के बीच अन्तर के बारे में शिक्षित करने का समय भी लिया है ? ज्यादातर मीडिया चैनल इस भ्रामक तथ्य को फैला रहे हैं कि जो मुस्लिम शौहर गैर कानूनी ढंग से तलाक़ दे पत्नियों को बेसहारा कर देते हैं उसको अपराध की श्रेणी में लाकर एक ‘विशेषाधिकार’ को समाप्त कर देता है, जिसका फायदा मुसलमान पुरुषों को अकेले ही…

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‘ भविष्य का भारत ’ की संघी दृष्टि

संघ भविष्य के भारत को हिन्दू राष्ट्र मानेगा। इसे सभी नहीं मान सकते। राजनीतिक दलों को वोट की चिन्ता है। इसलिए वे खुलकर हिन्दू राष्ट्र के विरोध में खड़े नहीं होंगे, पर बौद्धिक वर्ग जो क्रीतदास नहीं है, वह हिन्दू राष्ट्र का सदैव विरोध करेगा। भविष्य का भारत केवल हिन्दुओं का भारत नहीं हो सकता। नहीं होना चाहिए। हिन्दुत्व और भारतीय तत्व दोनों एक नहीं है। कभी हो भी नहीं सकते हैं।

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जीवन को एक कार्निवल के रूप में देखने वाला कवि कुँवर नारायण

  कमोबेश दो शताब्दियों की सीमा-रेखा को छूने वाली कुँवर नारायण की रचना-यात्रा छह दशकों से भी अधिक समय तक व्याप्त रही है। उनका पूरा लेखन आधुनिक हिंदी कविता के उत्कर्ष का पर्याय है। अपने सारभूत रूप में उनकी कविताएँ जीवन और मृत्यु से जुड़ी चिंताओं, राजनीति और संस्कृति की विसंगतियों, मानवीयता और नैतिकता की समयानुकूल अनिवार्यताओं, मिथक और इतिहास की सर्जनात्मक संभावनाओं, व्यक्ति-परिवार-समाज के बीच सापेक्षिक संबंधों को लेकर लगातार मुखर रही हैं और जहाँ कहीं भी जरूरत हुई, उन्हें प्रश्नांकित करती रही हैं। उनकी कविताओं और चिंतन में…

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव के लिए आइसा ने घोषित किया अपना पैनल

इलाहाबाद. इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव 2018 के लिए ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) ने सदस्यों की आम सभा बुलाकर अपने प्रत्याशियों की घोषणा की। अध्यक्ष पद के लिए शैलेश कुमार पासवान (एमए अंग्रेजी), उपाध्यक्ष के लिए शिवा पाण्डेय (एम म्यूजिक), महामंत्री के लिए नीलम सरोज (मॉस कॉम) व उपमंत्री पद के लिए सोनू यादव (एमए अंग्रेजी) को प्रत्याशी घोषित किया गया। आइसा प्रदेश सचिव सुनील मौर्य ने कहा कि भाजपा को केंद्र सरकार में आए हुए चार साल से ज्यादा हो गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने इलाहाबाद की…

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‘ सनातन संस्था ’ और ‘अरबन नक्सल ’

सनातन संस्था के बारे में लोगों को कम जानकारी है। पत्रकारों, सम्पादकों और टी वी चैनलों का ध्यान इस पर नहीं जाता। इसके ठीक विपरीत ‘अरबन नक्सल’ पर काफी कुछ छापा जाता है और टी वी चैनलों पर पिछले एक सप्ताह से यह ‘प्राइम टाइम’ में छाया रहा है। रिपब्लिक टी वी, जी टी वी, इंडिया न्यूज सब ने ‘अरबन नक्सल’ को प्रमुखता दी। ‘टुकड़े टुकड़े होंगे’ से ‘अरबन नक्सल’ तक का यह प्रचार-प्रसार और ‘सनातन संस्था’ एवं ‘हिन्दू जन जागृति समिति’ से आंख मुंदने का क्या अर्थ है ?

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एन.एच.74 भूमि घोटाला : अफसरों की बलि से किसकी जान बची ?

उत्तराखंड में दो आई.ए.एस. अफसरों चंद्रेश कुमार यादव और पंकज कुमार पाण्डेय को एन.एच.74 के भूमि घोटाले में निलंबित किए जाने की खबर है. इस घोटाले में राष्ट्रीय राजमार्ग के अधिग्रहण के लिए ज़मीनों के अधिग्रहण में बड़े पैमाने पर गड़बड़ झाला हुआ.इस मामले में कुछ पी.सी.एस. अधिकारियों समेत राजस्व कर्मी जेल में हैं. बहरहाल दो आई.एस.अफसरों के निलंबन की खबर के साथ ही होड़ मच गयी, सरकार की पीठ ठोकने की कि त्रिवेन्द्र रावत पहले मुख्यमंत्री हैं,जिन्होने आई.ए.एस. अफसरों को निलंबित किया है. यह होड़ जानकारी के अभाव में…

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आलोचना ने महादेवी वर्मा के साथ खिलवाड़ किया है : प्रो. सुधा सिंह

महादेवी वर्मा की पुण्य तिथि पर कोरस का आयोजन “श्रृंखला की कड़ियाँ में महादेवी सिमोन द बोउआर से पहले महिला प्रश्नों को उठाती हैं।” प्रो. राजेन्द्र कुमार इलाहाबाद. अवसर था महादेवी की पुण्य तिथि, 11 सितंबर पर इलाहाबाद वि.वि. के गेस्ट हाउस के सेमिनार हॉल में कोरस द्वारा आयोजित महादेवी स्मृति व्याख्यान माला का पहला व्याख्यान। विषय था- ‘समाज की महिला दृष्टि और महादेवी वर्मा का सृजन कर्म’। एकल व्याख्यान दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. सुधा सिंह का था। अपनी बात की शुरुआत करते हुए सुधा सिंह ने कहा महादेवी वंचना-प्रवंचना और अभाव…

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