एक तरफ ‘ स्वच्छ भारत ‘ का ढोंग दूसरी तरफ हर 3 दिन में एक सफाईकर्मी की मौत

उर्मिला चौहान पूरे देश मे सफाई कर्मचारियों की हालत दिन पर दिन और खराब होती जा रही है। विडम्बना तो ये है कि 2014 में जब मोदी सरकार द्वारा ‘स्वच्छ भारत मिशन’ की घोषणा की तब से अब तक सैकड़ों मजदूर सीवरों और गटर की भेंट चढ़ चुके हैं। ‘सफाई कर्मचारी आन्दोलन’ द्वारा किये गये सर्वे के अनुसार, हर तीसरे दिन पर एक मजदूर की मौत होती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अकेले 2017 में 300 सफाई कर्मचारियों की जाने गयी। पिछले सितंबर-अक्टूबर में दिल्ली शहर के ही सीवर के…

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घर की सांकल खोलता हुआ कवि हरपाल

बजरंग बिहारी   कविता जीवन का सृजनात्मक पुनर्कथन है। इस सृजन में यथार्थ, कल्पना, आकांक्षा, आशंका और संघर्ष के तत्व शामिल रहते हैं। रचनाकार अपनी प्रवृत्ति, समय के दबाव और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप इन तत्वों का अनुपात तय करता है। विचार जीवन से आगे बढ़े हुए होते हैं। जीवन की गति स्वाभाविक रूप से धीमी होती है। कवि भावों के लेप से विचार और जीवन में सामंजस्य बैठाने का प्रयास करता है। यह कवि के विवेक पर निर्भर करता है कि वह जीवन और विचार में किसे प्रमुखता दे। ऐसा…

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नोटबंदी से काले धन पर प्रहार भी एक जुमला ही था

  दो वर्ष पूर्व आज ही के दिन यानि 8 नवंबर को रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नोटबंदी की घोषणा की गयी थी. इसके अंतर्गत 500 और 1000 रुपये के नोटों को बंद कर दिया गया था.तब इसे काले धन के खिलाफ एक मास्टरस्ट्रोक बताया गया था. परंतु दो साल बाद इस बारे में सरकार में बैठे लोगों ने एक अप्रत्याशित खामोशी अख़्तियार कर ली है. पिछले दिनों सर्जिकल स्ट्राइक की दूसरी वर्षगांठ मनाने के लिए तो देश के सभी विश्वविद्यालयों को बाकायदा सर्कुलर जारी किया गया. पर…

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विकास, विस्थापन और साहित्य (संदर्भ झारखंड)

आज इस बात में किसी को कोई संदेह नहीं रह गया है कि ग्लोबल पूंजीवाद के लाभ-लोभ के चलते दुनिया में गरीबी और पर्यावरण का संकट बढ़ता जा रहा है। अपनी लालच के सिवा उसके सामने आदमी और प्रकृति की चिंता का कोई मायने नहीं रह गया है। विकास की पूंजीवादी अवधारणा या रास्ता विनाश का रास्ता बन गया है। वह जीवन और प्रकृति के विनाश का स्रोत बन गया है। आज दुनिया भर में कुलीन आर्थिक संस्थाओं- आइएमएफ़, वर्ल्ड बैंक, एनएफटीए, डब्यूटीओ आदि के खिलाफ़ विेद्रोह हो रहे हैं। विकास के वैकल्पिक रास्ते पर, न्यायोचित और टिकाऊ मानवीय विकास (Equitable and sustainable human development) के रास्ते का सवाल बहस के केंद्र में आ गया है। यहां इस पर बहस में जाने का अवसर नहीं है लेकिन विकास के इस विनाश की पूरी तस्वीर देखनी हो तो हमें आदिवासी क्षेत्रों की ओर रुख करना चाहिये, जहां सबकुछ साफ-साफ अपनी पूरी नग्नता के साथ मौजूद है।

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1984 के सिख क़त्ले-आम के मुजरिमों की तलाश का 34 साल लम्बा पाखंड !

1984 के सिखों के क़त्लेआम के मामले में आरएसएस/भाजपा अपने आप को कांग्रेस से भिन्न साबित करने के लिए चाहे जो भी दावे करे लेकिन दोनों में तनिक भी अंतर नहीं है। इन दोनों से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। मुजरिमों की खोज और उनको उचित सज़ा दिलाने का मक़सद तभी पूरा हो सकता है, जब हम भारतीय एक साथ 34 साल से चल रहे ‘न्याय के पाखंड’ के खिलाफ लामबंद होंगे। यह लड़ाई सिखों को इन्साफ दिलाने के लिए ही नहीं है बल्कि एक प्रजातान्त्रिक-धर्मनिरपेक्ष देश को बचने की भी है।

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मामूली दृश्यों से जीवन का विचलित करने वाला वृत्तान्त तैयार करतीं शुभा की कविताएँ

मंगलेश डबराल   शुभा शायद हिंदी की पहली कवि हैं, जो अभी तक कोई भी संग्रह न छपवाने के बावजूद काफ़ी पहले विलक्षण  कवि के रूप में प्रतिष्ठित हो गयी थीं. कई लोग उन्हें सबसे प्रमुख और अलग तरह की समकालीन कवयित्री मानते हैं, और इंतज़ार करते हैं कि कभी उनका संग्रह हाथ में ले सकेंगे. स्वाभाविक रूप से शुभा नारीवादी हैं, लेकिन यह नारीवाद बहुत अलग तरह का, वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध और वामपंथी है. लेकिन उसके अंतःकरण की तामीर एक ऐसे ‘अतिमानवीय दुःख’ से हुई है, जिसे न…

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विश्वविद्यालयों में काँचा इलैया की किताबों से कौन डरता है ?

लक्ष्मण यादव विश्वविद्यालय एक लोकतान्त्रिक मुल्क में अपने समय-समाज के अंतर्विरोधों से संवाद करते हुए तार्किक-वैज्ञानिक विवेक सम्पन्न बोध से लैस नागरिक तैयार करते हैं। जिन मुल्कों में सामाजिक-सांस्कृतिक विषमता जितनी ज्यादा होगी, उन मुल्कों में ज्ञान के ऐसे प्रतिष्ठानों की ज़िम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। आज़ाद भारत जैसे अंतर्विरोधों के मुल्क में विश्वविद्यालयों को ये बड़ी ज़िम्मेदारी निभानी थी, लेकिन वे उतने खरे न उतरे। तमाम विरोधी विचारों, मान्यताओं व सांस्कृतिक बोध को विश्वविद्यालयों में सबसे पहले जगह देनी थी, उनमें भी वंचित-शोषित दलित-पिछड़े-आदिवासी-अल्पसंख्यक-महिला तबके के लिए यह…

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स्टैच्यू ऑफ यूनिटी नहीं, यह स्टैच्यू ऑफ डिस्प्लेसमेंट है

शशांक मुकुट शेखर सरकार हजारों आदिवासियों की मृत्यु का जश्न मनाने की तैयारियों में तल्लीन है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 31 अक्टूबर को सरदार पटेल की प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ का अनावरण करने वाले हैं. प्रतिमा के भव्य अनावरण के लिए जोरशोर से तैयारियां चल रही है. हेलिकॉप्टर से फूलों की बारिश की जानी है. और भी तमाम तरह के तामझाम होने वाले हैं. देशभर से कलाकारों को बुलाया जा रहा है. सरकार अनावरण समारोह को एक जश्न की तरह मनाने के सारे जुगत करने में लगी है. मगर इसी दिन…

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दलित-बहुजन बौद्धिकता के विमर्श का दमन है प्रो. कांचा इलैया की पुस्तकों को पाठ्यक्रम से हटाना

नई दिल्ली. जन संस्कृति मंच ने दिल्ली विश्वविद्यालय की स्टैंडिंग कमिटी द्वारा प्रो. कांचा इलैया की पुस्तकों को एम.ए राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रम से हटाए जाने की निंदा करते हुए इसे भारत में उभर रही दलित-बहुजन बौद्धिकता के विमर्श का दमन बताया है. जसम की ओर से रामनरेश राम द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय कि स्टैंडिंग कमिटी ने अपनी मीटिंग में यह प्रस्ताव पास किया है कि कांचा इलैया की तीन किताबें ‘मैं हिन्दू क्यों नहीं हूँ ’, ‘ पोस्ट हिन्दू इंडिया’ ,…

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प्रेम के बहाने एक अलग तरह का सामाजिक विमर्श रचती पल्लवी त्रिवेदी की कविताएँ

निरंजन श्रोत्रिय   युवा कवयित्री पल्लवी त्रिवेदी की कविताओं को महज़ ‘प्रेम कविताएँ’ या रागात्मकता की कविताएँ कहने में मुझे ऐतराज़ है। पल्लवी की विलक्षण काव्य-प्रतिभा प्रेम के बहाने एक अलग तरह का सामाजिक विमर्श रचती हैं जिसमें स्त्री-विमर्श, पुरूष का अहं, रिश्तों की संरचना और मनोभावों के उदात्त स्वरूप सभी कुछ सम्मिलित हैं। प्रेम को परिभाषित करना वैसे भी दुष्कर है। उसे अनिर्वचनीय कहा गया है। वह ‘मूकास्वादनवत्’ एवं ‘सूक्ष्मतरमनुभव स्वरूपम्’ है। प्रेम की प्रक्रिया का विकास स्थूल से सूक्ष्म और व्यष्टि से समष्टि की ओर होता है। युवा…

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रफ़ाल विमानों की ख़रीद में घोटाले के ख़िलाफ़ वामपंथी दलों ने आयोजित की जन सुनवाई

श्वेता राज   सभी वामपंथी पार्टियों को तरफ से आज मावलंकर हॉल में रफ़ाल घोटाले पर जन सुनवाई हुई। इस कार्यक्रम में दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों, छात्रों व आम नागरिकों ने भाग लिया। जन सुनवाई को विभिन्न वामपंथी पार्टियों के राष्ट्रीय नेताओं, कार्यकर्ता वकील तथा अन्य लोगों ने संबोधित किया। दिल्ली साइंस फोरम से डी. रघुनंदन, राफेल घोटाले को सबसे पहले सामने लाने वाले चर्चित पत्रकार रवि नायर भी जन सुनवाई में उपस्थित थे, जिन्होंने काफ़ी विस्तार से इस पर बात रखी। वकील प्रशांत भूषण ने…

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नित्यानंद गायेन की कविताओं में प्रेम अपनी सच्ची ज़िद के साथ अभिव्यक्त होता है

कुमार मुकुल   नित्यानंद जब मिलते हैं तो लगातार बोलते हैं, तब मुझे अपने पुराने दिन याद आते हैं। कवियों की बातें , ‘कांट का भी दिमाग’ खा डालने वालीं। नित्यानंद की कविताएँ रोमान से भरी होकर भी राजनीतिक विवेक को दर्शाती हैं। एक बार बातचीत में आलोकधन्वा ने कहा था – लोग नहीं जानते,रोमान्टिक होना कितना कठिन है, रोमांटिसिज्म के बिना कोई बड़ा कवि नहीं हो सकता। नित्यानंद लिखते हैं – अरे बुद्धु, कवि मरते नहीं मार दिए जाते हैं अक्सर कभी प्रेम के छल से कभी सत्ता के…

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बुलेट ट्रेन के लिए भूमि अधिग्रहण से प्रभावित किसानों, आदिवासियों के साथ आये कई दल

दिल्ली के कंसिट्यूशन क्लब हाल में 15 अक्टूबर 2018 को ” भारत में बुलेट ट्रेन – किसकी कीमत पर ” विषय को केंद्र कर एक जन कन्वेंशन आयोजित किया गया. इस कार्यक्रम का आयोजन “भूमि अधिकार मंच” के बैनर तले किया गया था. कार्यक्रम में महाराष्ट्र और गुजरात से इस योजना से विस्थापित होने वाले किसान और आदिवासी बड़ी संख्या में पहुंचे थे. जमीनी स्तर पर इस आंदोलन को नेतृत्व दे रहे कार्यकर्ताओं ने अपने सारगर्भित अनुभव लोगों से साझा किए.

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पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती दे रहा है #MeToo आंदोलन

यह आंदोलन इस यथास्थिति को तोड़ता है. कुछ स्त्रियां इस संकल्प के साथ आ खड़ी हुई हैं कि हम चुपचाप स्वीकार नहीं करेंगे ,कहेंगे हां कहेंगे. यह कहना भी उस पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था के लिए चुनौती है. वह अपनी सत्ता को यों ही जाने नहीं दे सकता. इसलिए वह मजाक उड़ायेगा, व्यंग्य लेख लिखेगा, चर्चा करके माहौल बनायेगा. दर असल यही वह श्रेष्ठता बोध और सत्ता का गुरूर है जिसकी परिणति निर्भया जैसे काण्डों में होती है.

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निराला की कविताएँ अपने समय के अंधेरे को पहचानने में हमारी मदद करती हैं: प्रो. विजय बहादुर सिंह

विवेक निराला    निराला की 57 वीं पुण्यतिथि पर आयोजित ‘छायावाद और निराला :कुछ पुनर्विचार’ विषय पर ‘निराला के निमित्त’ की ओर से आयोजित गोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए प्रसिद्ध आलोचक प्रो. विजय बहादुर सिंह ने छायावाद की प्रासंगिकता पर कई प्रश्नों के साथ विचार करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने रेखांकित किया कि छायावाद आधुनिक भारत का सांस्कृतिक स्वप्न है। ‘अस्मिता की तलाश’ पहली बार छायावादी कविता में ही दिखाई देती है। छायावाद ने ‘मनुष्यता’ को सबसे बड़ी अस्मिता के रूप में रेखांकित किया। छायावाद के…

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अपने समय की आहट को कविता में व्यक्त करता कवि विवेक निराला

युवा कवि विवेक निराला की इन कविताओं को पढ़ कर लगता है मानो कविता उनके लिए एक संस्कार की तरह है-एकदम नैसर्गिक और स्वस्फूर्त! इन कविताओं में एक निर्झर-सा प्रवाह है-एक-एक शब्द, संवेदनों और शिल्प में कल-कल की ध्वनि-सा! उनकी कविता एक यत्नहीन कविता-सी है, सायास या प्रविधि जैसा कुछ भी नहीं। इस युवा कवि में अपने समय की आहट सुनने का गजब का माद्दा है। अपने समय की तमाम विसंगतियों और विद्रूपताओं को वे बहुत हौले-से, बगैर किसी काव्य-उत्तेजना के अपनी कविता में उतारते हैं। बगैर किसी आहट के…

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चुनाव आयोग का फैसला बड़ी पूंजी व अपराधी-माफिया के हित वाला

भारत के निर्वाचन आयोग ने अपराधिक पृष्ठिभूमि वाले उम्मीदवारों को अपने मुकदमों की जानकारी जनता को देने के लिए एक नायाब आदेश निकाला है. चुनाव आयोग का कहना है कि उम्मीदवार चुनाव से दो दिन पहले तीन बार स्थानीय टीवी चैनलों और समाचार पत्रों को विज्ञापन देकर अपने मुकदमों की सूचना जनता को दे. क्या चुनाव आयोग का यह फैसला टीवी चैनल और समाचार पत्र के मालिकों को सीधे अनुचित आर्थिक लाभ पहुंचाने वाला नहीं है ? क्या यह फैसला चुनाव को और भी महँगा और सिर्फ बड़ी पूंजी के…

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अकबर की ख़बर रोको, आयकर छापे की लाओ, कुछ करो,जल्दी भटकाओ

हिन्दी के अखबारों ने अकबर के मामले में मेरी बात को साबित किया है कि हिन्दी के अख़बार हिन्दी के पाठकों की हत्या कर रहे हैं। लोगों को कुछ पता नहीं है। हर जगह आलोक नाथ की ख़बर प्रमुखता से है मगर अकबर की ख़बर नहीं है। है भी तो इस बात का ज़िक्र नहीं है कि अकबर पर किन किन महिला पत्रकारों ने क्या क्या आरोप लगाए गए हैं। अख़बार जनता के ख़िलाफ़ हो गए हैं।

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सबरीमाला में महिलाओं का प्रवेश

यह सही है कि पितृसत्तात्मकता सभी संस्थागत धर्मों का अविभाज्य हिस्सा है। मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश का आंदोलन इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर चोट कर रहा है और इसके अच्छे नतीजे भविष्य में सामने आ सकते हैं। यद्यपि कानून बनाने से किसी समस्या का पूर्ण समाधान नहीं होता परंतु यह अपने वैध अधिकारों को प्राप्त करने के लिए संघर्षरत समूहों की यात्रा में एक मील का पत्थर होता है।

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फ़िल्म स्क्रीनिंग में कब हँसते और चुप होते हैं लोग

सितम्बर महीने में रिलीज़ हुई दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘अपनी धुन में कबूतरी’ धीरे –धीरे हिट होती जा रही है. 20 दिन से कम के अंतराल में इसकी तीन शहरों में तीन सफल स्क्रीनिंगें हुईं. 2 अक्टूबर को रुद्रपुर शहर के नवरंग रेस्तरां में हुई शानदार स्क्रीनिंग से फ़िल्म स्क्रीनिंग के बारे में कुछ नए निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं. मुख्यधारा के पैसा कमाऊ सिनेमा के विपरीत दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘अपनी धुन में कबूतरी’ कई लोगों के सहयोग से निर्मित हुई है इसलिए इसके बनने और फिर दिखाने में मुनाफ़े को बढ़ाने की…

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