नेहरू की छवि के साथ खिलवाड़ छद्म इतिहास निर्माण की कोशिश है

रमा शंकर सिंह यह इतिहास की बिडम्बना है कि जिस जवाहरलाल नेहरु ने जीवन भर इतिहास पढ़ा, लिखा और इससे बढ़कर इतिहास बनाने का काम किया, उसी नेहरु को हमारे समय में निरादृत होना पड़ा है, विशेषकर उसके अपने देशवासियों से ही- उन देशवसियों से जिन्हें वे बेपनाह मोहब्बत करते थे. उनकी यह मोहब्बत उनके पूरे जीवन, कर्म और विचार में व्याप्त है. नेहरु ने जो कुछ भी लिखा, बोला और किया- वह सब प्रकाशित है. इस सबके बावजूद उन्हें दुष्प्रचार का सामना करना पड़ा है. पहले तो उनके व्यक्तित्व…

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ज्ञान और विचार का केंद्र शिब्ली अकादमी

दुर्गा सिंह शिब्ली मंजिल या शिब्ली अकादमी या दारुलमुसन्निफ़ीन (हॉउस ऑफ़ राइटर या लेखकों का अपना घर) आज़मगढ़ में स्थित ऐसी जगह है, जिससे कोई भी स्कॉलर अचंभित हुए बिना नहीं रहेगा. इसकी परिकल्पना अल्लामा शिब्ली नोमानी ने की थी. इसके लिए उन्होंने अपना बंगला और एक आम का बाग़ दिया. अपने परिवारीजनों से ज़मीन मांगी. भोपाल और हैदराबाद रियासत से मदद मांगी. बेगम भोपाल ने पैसों से मदद की. इसके अलावा उन्होंने अपने शागिर्दों को इसमें इन्वाल्व किया. जो लोग ऐसी हैसियत में थे उनसे ताल्लुक रखने वाले सबको…

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नेताजी बोस, नेहरू और उपनिवेश विरोधी संघर्ष

यदि आधुनिक भारत एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राष्ट्र है तो उसमें देश में चले उपनिवेश विरोधी संघर्ष का प्रमुख योगदान है। विभिन्न राजनैतिक विचारधाराओं वाले लोग इस संघर्ष में शामिल हुए और सभी ने अपने-अपने तरीके से भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के इस अभियान में योगदान दिया। लेकिन कुछ ऐसे लोग, जो धर्म को ही राष्ट्र का आधार मानते थे, इसमें शामिल नहीं हुए और आज वे चुनाव जीतने के लिए या तो इसमें भाग लेने के झूठे दावे करते हैं या स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं, विशेषकर नेहरू,…

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संघ-हिन्दू महासभा द्वारा आज़ाद हिन्द फौज के साथ किये गये विश्वासघात की लीपापोती कर रहे हैं मोदी

जो लोग नेताजी और उनके साथियों और भारत की आज़ादी के लिये अपना सर्वाेत्तम निछावर कर देनेवाले आज़ाद हिन्द फौज के नायकों और सिपाहियों से प्यार करते हैं उन्हें यह माँग करनी चाहिये कि मोदी लाल किले से नेताजी और उनकी आज़ाद हिन्द फौज के प्रति आर.एस.एस. और हिन्दू महासभा दोनों ने जो अपराध किये हैं, उनके लिये वह माफ़ी माँग लें।

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उनसे झुकने को कहा गया वो रेंगने लग गए

मार्च 1971 में हुए चौथी लोकसभा के चुनाव अपने आप में खासे महत्वपूर्ण थे। कांग्रेस इंदिरामयी हो चुकी थी। तब मार्गदर्शक-मण्डल शब्द तो गढ़ा नहीं गया था लेकिन इंदिरा गांधी को चुनौती दे सकने वाले सभी वरिष्ठ धुरंधर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (ओ) में सिमट गए थे। अपने तूफानी चुनावी दौरों में इंदिरा गांधी जनता को ये बताना नहीं भूलती थीं कि वे जवाहरलाल नेहरू की बेटी हैं और देश सेवा, त्याग, बलिदान उनके परिवार की परंपरा है। माहौल ऐसा बन गया था कि अमेरिका की पत्रिका ‘न्यूज़वीक’ ने लिखा रैलियों…

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तिलाड़ी शहादत स्मृति : जंगल, जमीन, पानी पर जनता के अधिकार की लड़ाई जारी है

राजशाही शहीदों के खून के वेग में बह गयी.पर हमारे लोकतंत्र के खेवनहारों ने राजाओं के गुण बखूबी आत्मसात किये. उन्हें जंगल,जमीन,पानी के लिए लोगों का खून बहाना मंजूर है पर संसाधनों पर जनता का अधिकार मंजूर नहीं है. तिलाडी के हमारे बहादुर पुरखों से चली आ रही यह लड़ाई,आज भी जारी है,हत्यारी राजशाही के गुणसूत्र वाले वर्तमान हुक्मरानों से.

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सई नदी गोली कांड: अवध के किसान आंदोलन का आख्यान

एका : बाबा रामचंद्र एवं मदारी पासी के नेतृत्व में अवध के किसान-आंदोलन की गाथा (1920 से 1928) राजीव कुमार पाल (अवध के चर्चित किसान आंदोलन पर ‘एका ‘ नाम से राजीव कुमार पाल द्वारा लिखित और शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रही पुस्तक का एक अंश लेखक के प्रति आभार सहित यहां दिया जा रहा है। अभी मंदसौर बीते बहुत दिन नहीं हुए हैं। किसानों की कोई जाति नहीं होती और उनके खिलाफ सामन्ती,पूँजीवादी शक्तियों में हमेशा से सत्ता समर्थित एका रही है। इस एका को खत्म करने का…

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लाल किला की नीलामी के खिलाफ लेखकों, बुद्धिजीवियों , संस्कृतिकर्मियों ने प्रतिरोध मार्च निकाला

इस प्रतिरोध मार्च में आइसा, अमन बैरदारी, सेंटर फॉर दलित लिटरेचर एंड आर्ट, दलित लेखक संघ, डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट, डी.टी.आई, इप्टा, जन संस्कृति मंच, जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ, एस एफ आई, के वाई एस, एपवा, ऐक्टू, प्रतिरोध का सिनेमा समेत तमाम संगठन शामिल हुए.

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क्यों डरती रही हैं भारत की सरकारें 1857 से

1857 ने जिस राष्ट्रवाद का आगाज किया था, उसकी विरोधी शक्तियां आजाद भारत में सत्ता के शिखर पर पहुंच चुकी हैं. यानी पहली जंग-ए-आजादी ने नया हिंदुस्तान बनाने की जो चुनौतियां हमारे सामने उपस्थित की थीं, जो लक्ष्य निर्धारित किये थे, जो सपने देखे थे, वे आज न सिर्फ अधूरे हैं, बल्कि सबसे बड़ी बाधा का सामना कर रहे हैं.

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मई दिवस : इतिहास यात्रा – इरिक हाॅब्सबाॅम

जर्मनी में प्रथम मई दिवस की स्मृति में एक ताम्रपत्र तैयार किया गया था जिसमें एक ओर कार्ल मार्क्स का चित्र था तो दूसरी ओर स्वतंत्रता की मूर्ति का। 1891 के आस्ट्रियाई प्रतिचित्र में कार्ल मार्क्स अपनी पुस्तक पूंजी की प्रति हाथ में लेकर एक खूबसूरत टापू की ओर संकेत कर रहे हैं जिसकी पृष्ठभूमि में मई दिवस का उगता हुआ सूर्य दिखाई दे रहा है, जो भविष्य की ओर संकेत करने वाला बहुत ही लोकप्रिय प्रतीक सिद्ध हुआ।

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पेशावर विद्रोह : जब गढ़वाली फौज ने स्वतंत्रता सेनानियों पर गोली चलाने से इंकार कर दिया

हवलदार मेजर चन्द्र सिंह गढ़वाली ने साथी सैनिकों से कहा -न ये हिंदुओं का झगड़ा है न मुसलमानों का. झगड़ा है कांग्रेस और अंग्रेज का. जो कांग्रेसी भाई हमारे देश की आजादी के लिये अंग्रेजों से लड़ाई लड़ रहे हैं, क्या ऐसे समय में हमें उनके ऊपर गोली चलानी चाहिये ? हमारे लिये गोली चलाने से अच्छा यही होगा कि अपने को गोली मार लें.”   23 अप्रैल 1930 को चंद्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में अंजाम दिए गए पेशावर विद्रोह को आज 88 वर्ष पूरे हो गए हैं. अंग्रेजी…

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लेनिन : जो समय से प्रभावित ही नहीं, जिसने समय को प्रभावित भी किया

गोपाल प्रधान (व्लादिमीर इल्यिच उल्यानोव जो लेनिन के नाम से लोकप्रिय हैं , के जन्म दिवस पर गोपाल प्रधान का लेख ) 1917 के अक्टूबर/नवम्बर महीने में रूस में एक ऐतिहासिक अश्रुतपूर्व प्रयास हुआ। वह प्रयास उन्नीसवीं सदी की क्रांतियों को पूर्णता प्रदान करने वाला था और बीसवीं सदी का चेहरा इससे निर्मित हुआ. सारी दुनिया का शायद ही कोई मुल्क होगा जिसकी चेतना में इस क्रांति की मौजूदगी न हो. हमारे देश में भी रवींद्रनाथ ठाकुर की ‘ रशियार चिठी ’ और प्रेमचंद के तमाम लेखन में इसका समर्थन मिलता…

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8 अप्रैल 1929: एक दिन जिसे याद रखा जाना चाहिए : प्रो. चमनलाल

8 अप्रैल 1929 को भारत के राजनितिक इतिहास का एक ऐतिहासिक दिन था, जिसके बारे में एल.के. आडवाणी जी ने भारी तथ्य्तात्मक चूक करते हुए अपनी किताब ‘माय लाइफ माय कंट्री’ में भगत सिंह की फांसी के कारण को इस दिन से जोड़ा था, जिसके कारण उनकी इतिहास के प्रति समझदारी पर भी कई सवाल खड़े हुए. 8 अप्रैल के इस दिन के महत्व को हमें ऐतिहासिक दस्तावेजों के माध्यम से समझने और भगत सिंह और साथियों के योगदान से जुडी याद को आज भी फिर से याद करने की…

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कामगार महिलाओं के संघर्ष का दिवस है महिला दिवस, मिथक और बाजार का नहीं

( राधिका मेनन के रेखा चित्रों से जानिए अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस का इतिहास ) महिला दिवस की शुभकामनाएं एक दिन पहले से आने लगीं। इन शुभकामना संदेशों में कुछ औरतों के सौन्दर्य पर थे, कुछ अच्छी बेटी, पत्नी, बहू, मां होने पर था। कछ ऐसे मैसेज भी थे जिसमें बधाई देने के साथ ही महिला दिवस पर चेहरे की मालिश कराने पर 30 फीसदी का डिस्काउंट देने की बात कही गई थी। आठ मार्च की सुबह से तो महाभारत की महिला किरदारों की ताकत पर कहानी गढते हुए संदेश आए…

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नेवी विद्रोह : स्वाधीनता संग्राम का कम चर्चित लेकिन गौरवशाली अध्याय

  1946 के नेवी विद्रोह की बरसी आज भारत की आजादी की लड़ाई के कई प्रसंग बेहद कम चर्चित हैं. 1946 का नेवी विद्रोह भी हमारे स्वाधीनता संग्राम का एक कम चर्चित लेकिन गौरवशाली अध्याय है.यह देश की अवाम यहाँ तक कि अंग्रेजों की रक्षा के लिए बनी सेनाओं के भीतर मुक्ति का विस्फोटक प्रकटीकरण था.यह तो सभी जानते हैं कि अंग्रेजी राज में सेनाओं में हिन्दुस्तानियों के साथ जबरदस्त भेदभाव होता था लेकिन वह 1857 रहा हो या 1946 जब भी सेनाओं के अन्दर से विद्रोह की चिंगारी फूटी,वह…

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