मगर हथकड़ियां खनकी, वह उस आवाज से डर गया

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मोदी सरकार जिनको देश के दुर्दांत दुश्मन के तौर पर पेश करना चाह रही थी, ऐसा कोहराम मचाने की कोशिश की गई, गोया देश की सब समस्याएं इन अधेड़ उम्र के लोगों की वजह से हों, उन्हें तो सुप्रीम कोर्ट ने जेल ही नहीं भेजने दिया. दिल्ली उच्च न्यायालय के सामने तो पुलिस हकलाते नज़र आई.

सत्ता जिन्हें देश के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में पेश कर रही थी, उनके पास मिला क्या, ये भी बड़ा रोचक है. सरकार तो बड़ी चीज है, पुलिस के अदने से सिपाही के कहे को भी वेद वाक्य मानने वाले अखबारों ने ये ब्यौरा छापा है. बताया गया कि सुधा भारद्वाज के घर से पेन ड्राइव, लैपटॉप, मॉडेम, राऊटर और इनकम टैक्स का फॉर्म-16 बरामद हुआ. कितने विस्फोटक पदार्थ हैं- पेन ड्राइव,लैपटॉप, मॉडेम,राऊटर आदि ,आदि !

और इनकम टैक्स का फॉर्म-16 होना तो अक्षम्य अपराध है. जब बड़े-बड़े लोग बैंकों का कर्जा चुकाने के बजाय सत्ता की सरपरस्ती में विदेश भाग रहे हों तो इनकम टैक्स का फॉर्म-16 रखना और इनकम टैक्स चुकाने के इरादा भी रखना सत्ता के विरुद्ध साजिश नहीं तो क्या है !

और जरा ये भी जानिए कि जिन्हें सरकार जेल की भभकी दे रही है, वो क्या कह रहे हैं. इस संबंध में कवि वरवर राव की कविता दृष्टव्य है :

वह धरती से आतंकित हो गया (वरवर राव)

धमकी पर धमकी देते हुए
डर पर डर फैलाए
वह खुद डर गया
वह निवास स्‍थान से डर गया
वह पानी से डर गया
वह स्‍कूलों से डर गया
वह हवा से डर गया
आज़ादी को उसने बेड़ियां पहना दीं
मगर हथकड़ियां खनकी
वह उस आवाज से डर गया।

गौतम नवलखा के वक्तव्य ने तो जेल-मुकदमे की भभकी की चिंदी-चिंदी उड़ा दी.

उन्होंने कहा : इस राजनीतिक मुकदमे का मैं स्‍वागत करता हूं.
यह समूचा केस इस कायर और प्रतिशोधी सरकार द्वारा राजनीतिक असहमति के खिलाफ़ की गई राजनीतिक साजिश है जो भीमा कोरेगांव के असली दोषियों को बचाने के लिए जी जान लगा रही है और इस तरह से उसने अपने उन घोटालों और नाकामियों की ओर से ध्‍यान बंटाने का काम किया है, जो कश्‍मीर से लेकर केरल तक फैली हुई हैं। एक राजनीतिक मुकदमे को राजनीतिक तरीके से ही लड़ा जाना चाहिए और मैं इस अवसर का स्‍वागत करता हूं। मुझे कुछ नहीं करना है। अपने सियासी आकाओं की शह पर काम कर रही महाराष्‍ट्र पुलिस का असल काम है कि वह मेरे खिलाफ और मेरे संग गिरफ्तार हुए साथियों के खिलाफ अपना केस साबित करे। हमने पीयूडीआर में रहते हुए बीते चालीस साल के दौरान सामूहिक रूप से निडर होकर लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी है और मैं, पीयूडीआर का हिस्‍सा होने के नाते ऐसे कई मुकदमे कवर कर चुका हूं। अब मैं खुद किनारे खड़े रह कर एक ऐसे ही सियासी मुकदमे का गवाह बनने जा रहा हूं।

तू जि़ंदा है तो जि़ंदगी की जीत पर यक़ीन कर

अगर कहीं है स्‍वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर

ये ग़म के और चार दिन सितम के और चार दिन

ये दिन भी जाएंगे गुजर

गुज़र गए हज़ार दिन

तू जि़ंदा है…

समझे हुजूर, किन जीवट वाले लोगों से साबका पड़ा है. ये तड़ीपार अपराधी, हत्यारे, षड्यंत्रकारी नहीं हैं. ये तो डरेंगे नहीं पर पूरे फौज-फाटे,छल-छद्म के बावजूद सत्ता ही भयभीत नजर आ रही है.

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