रंगों और कूचियों के अनोखे उस्ताद उर्फ़ अशोक दा !

बिना किसी कला स्कूल से शिक्षित हुए बिना किसी बड़े गुरु के शिष्य हुए अपनी कला भाषा की खोज करना और उसमे एक बड़ा मुकाम हासिल करना अशोक दा की बड़ी उपलब्धि है. यह भाषा उन्होंने वर्षों काले रंग से बहुत मेहनत से कैनवास पर इचिंग करते हुए हासिल की जिसकी वजह से आज हम उनके चित्र देखते ही अनायास कह उठते हैं कि ‘अरे यह तो अशोक भौमिक का चित्र है.’

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हम सबके गंगा जी

वामपंथी आन्दोलनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नब्बे के दशक में एक व्यक्ति को बहुत शिद्दत से मार्क्सवादी साहित्य की किताबों का स्टाल लगाए देखा करता था. बाद में जब प्रतिरोध का सिनेमा और गोरखपुर फ़िल्म फेस्टिवल की सक्रियता बढ़ी तब इस शख्स से सीधी मुलाक़ात संभव हुई. ये थे हम सबके गंगा जी. हमारे पहले गोरखपुर फ़िल्म फेस्टिवल में भी गंगा जी का स्टाल लगा और फिर वे अपने एक अन्य सहयोगी और मित्र गौड़ साहब के साथ आगे चार फेस्टिवलों में शरीक होते रहे. मैं आदतन उनसे हर रोज…

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अलविदा, स्टार गुरु जी !

  मैंने 1989 के जुलाई महीने में जे एन यू के भारतीय भाषा विभाग के हिंदी विषय में एडमिशन लिया. कोर्स एम ए का था. इससे पहले मैं इलाहाबाद में गधा पचीसी के 23 साल बिता चुका था पूरब के तथाकथित ऑक्सफ़ोर्ड से काफ़ी अच्छी तरह से ऊब चुका था. जे एन यू के हिंदी विभाग में एडमिशन के लिए कोशिश का बड़ा आकर्षण नामवर जी, केदार नाथ सिंह और मैनेजर पाण्डेय थे जो न सिर्फ़ भारतीय भाषा केंद्र के आकर्षण थे बल्कि समाज विज्ञान, इतिहास और विज्ञान के छात्र…

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फेंस के इधर -उधर और झुनू बहनजी का मोहल्ला छोड़ना

  ग़ाज़ियाबाद में हिंडन पार के जिस इलाके में पिछले 15 साल से रहता हूँ. वह लगभग 2 एकड़ में पांच ब्लाकों में बसा एक अपार्टमेंट है जिसमे ज्यादातर ख़बरनवीस रहते हैं . दो ब्लाक आठ मंज़िलों वाले हैं जिनमे लिफ्ट की सवारी करनी पड़ती है.तीन ब्लाक चार मंज़िले हैं जिनमें सीढ़ियाँ चढ़नी होती है. जब हम 2003 में यहाँ रहने आये तो 16 फ्लैट वाले हमारे बिना लिफ्ट वाले सी ब्लाक में कुछ जमा चार या पांच घर आबाद थे. पड़ोसी के नाम पर गिलहरी, कबूतरों या गमले में…

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