सातवाँ कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान में ‘सामाजिक सौहार्द की चुनौतियाँ ‘ पर बोलेंगे प्रो राजीव भार्गव

नई दिल्ली. सातवाँ कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान 17 नवम्बर को शाम 5 से नई दिल्ली के गाँधी शांति प्रतिष्ठान ( दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, आई टी ओ ) में आयोजित किया गया है. प्रति वर्ष जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम में  इस बार का व्याख्यान सामाजिक सौहार्द की चुनौतियाँ विषय पर राजनीतिक दार्शनिक प्रो. राजीव भार्गव देंगे. इस अवसर पर आलेख प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कुबेर दत्त के लेखों के संग्रह ‘जनवाद का तीसरा नेत्र – रामविलास शर्मा ’ का लोकार्पण भी होगा. यह जानकारी जन संस्कृति…

Read More

फ़िल्म स्क्रीनिंग में कब हँसते और चुप होते हैं लोग

सितम्बर महीने में रिलीज़ हुई दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘अपनी धुन में कबूतरी’ धीरे –धीरे हिट होती जा रही है. 20 दिन से कम के अंतराल में इसकी तीन शहरों में तीन सफल स्क्रीनिंगें हुईं. 2 अक्टूबर को रुद्रपुर शहर के नवरंग रेस्तरां में हुई शानदार स्क्रीनिंग से फ़िल्म स्क्रीनिंग के बारे में कुछ नए निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं. मुख्यधारा के पैसा कमाऊ सिनेमा के विपरीत दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘अपनी धुन में कबूतरी’ कई लोगों के सहयोग से निर्मित हुई है इसलिए इसके बनने और फिर दिखाने में मुनाफ़े को बढ़ाने की…

Read More

कबूतरी देवी को लोगों के बीच ले जाने की शुरुआत

नैनीताल के निचले हिस्से तल्लीताल में बाजार से ऊपर चढ़ते हुए एक रास्ता खूब सारे हरे-भरे पेड़ों वाले कैम्पस तक ख़तम होता है. यह कैम्पस राजकीय कन्या इंटरमीडिएट कालेज का है. इस कैम्पस में पिछले इतवार 16 सितम्बर 2018 को नैनीताल के सक्रिय संस्कृतिकर्मी ज़हूर आलम अपनी टीम के साथ कालेज के सभागार को सिनेमा हाल में बदलने की कसरत में जुटे थे. हाल की खिड़कियों में पल्ले मौजूद थे इसलिए अँधेरा हासिल करने के लिए ज्यादा मशक्कत न करनी पड़ी. दुपहर 3.30 से शो शुरू होना था लेकिन प्रोजक्शन…

Read More

‘अपनी धुन में कबूतरी’ की पहली स्क्रीनिंग नैनीताल में

प्रीमियर शो दुपहर 3.30 जी जी आई सी, तल्लीताल, नैनीताल उत्तराखंड के पुराने लोगों के कानों में अब भी कबूतरी देवी के गाने गूंजते रहते। ‘पहाड़ो को ठंड पाणी…’ अब भी शीतलता प्रदान करता है। 1939 में उत्तराखंड के सुरम्य जनपद चंपावत के लेटी गाँव में जन्मी कबूतरी जी को यूं तो बचपन से ही संगीत के संस्कार मिले लेकिन शादी के बाद उनकी असल सांगीतिक यात्रा तब शुरू हुई जब उनके पति की भागदौड़ के कारण वे आखिरकार रेडियो की कलाकार बनीं। फिर तो सत्तर और अस्सी का दशक…

Read More

रंगों और कूचियों के अनोखे उस्ताद उर्फ़ अशोक दा !

बिना किसी कला स्कूल से शिक्षित हुए बिना किसी बड़े गुरु के शिष्य हुए अपनी कला भाषा की खोज करना और उसमे एक बड़ा मुकाम हासिल करना अशोक दा की बड़ी उपलब्धि है. यह भाषा उन्होंने वर्षों काले रंग से बहुत मेहनत से कैनवास पर इचिंग करते हुए हासिल की जिसकी वजह से आज हम उनके चित्र देखते ही अनायास कह उठते हैं कि ‘अरे यह तो अशोक भौमिक का चित्र है.’

Read More

हम सबके गंगा जी

वामपंथी आन्दोलनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नब्बे के दशक में एक व्यक्ति को बहुत शिद्दत से मार्क्सवादी साहित्य की किताबों का स्टाल लगाए देखा करता था. बाद में जब प्रतिरोध का सिनेमा और गोरखपुर फ़िल्म फेस्टिवल की सक्रियता बढ़ी तब इस शख्स से सीधी मुलाक़ात संभव हुई. ये थे हम सबके गंगा जी. हमारे पहले गोरखपुर फ़िल्म फेस्टिवल में भी गंगा जी का स्टाल लगा और फिर वे अपने एक अन्य सहयोगी और मित्र गौड़ साहब के साथ आगे चार फेस्टिवलों में शरीक होते रहे. मैं आदतन उनसे हर रोज…

Read More

अलविदा, स्टार गुरु जी !

  मैंने 1989 के जुलाई महीने में जे एन यू के भारतीय भाषा विभाग के हिंदी विषय में एडमिशन लिया. कोर्स एम ए का था. इससे पहले मैं इलाहाबाद में गधा पचीसी के 23 साल बिता चुका था पूरब के तथाकथित ऑक्सफ़ोर्ड से काफ़ी अच्छी तरह से ऊब चुका था. जे एन यू के हिंदी विभाग में एडमिशन के लिए कोशिश का बड़ा आकर्षण नामवर जी, केदार नाथ सिंह और मैनेजर पाण्डेय थे जो न सिर्फ़ भारतीय भाषा केंद्र के आकर्षण थे बल्कि समाज विज्ञान, इतिहास और विज्ञान के छात्र…

Read More

फेंस के इधर -उधर और झुनू बहनजी का मोहल्ला छोड़ना

  ग़ाज़ियाबाद में हिंडन पार के जिस इलाके में पिछले 15 साल से रहता हूँ. वह लगभग 2 एकड़ में पांच ब्लाकों में बसा एक अपार्टमेंट है जिसमे ज्यादातर ख़बरनवीस रहते हैं . दो ब्लाक आठ मंज़िलों वाले हैं जिनमे लिफ्ट की सवारी करनी पड़ती है.तीन ब्लाक चार मंज़िले हैं जिनमें सीढ़ियाँ चढ़नी होती है. जब हम 2003 में यहाँ रहने आये तो 16 फ्लैट वाले हमारे बिना लिफ्ट वाले सी ब्लाक में कुछ जमा चार या पांच घर आबाद थे. पड़ोसी के नाम पर गिलहरी, कबूतरों या गमले में…

Read More