नेहरू की छवि के साथ खिलवाड़ छद्म इतिहास निर्माण की कोशिश है

रमा शंकर सिंह यह इतिहास की बिडम्बना है कि जिस जवाहरलाल नेहरु ने जीवन भर इतिहास पढ़ा, लिखा और इससे बढ़कर इतिहास बनाने का काम किया, उसी नेहरु को हमारे समय में निरादृत होना पड़ा है, विशेषकर उसके अपने देशवासियों से ही- उन देशवसियों से जिन्हें वे बेपनाह मोहब्बत करते थे. उनकी यह मोहब्बत उनके पूरे जीवन, कर्म और विचार में व्याप्त है. नेहरु ने जो कुछ भी लिखा, बोला और किया- वह सब प्रकाशित है. इस सबके बावजूद उन्हें दुष्प्रचार का सामना करना पड़ा है. पहले तो उनके व्यक्तित्व…

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मुक्तिबोध मेरे लिए -अच्युतानंद मिश्र

अच्युतानंद मिश्र फ़िराक ने अपने प्रतिनिधि संग्रह ‘बज़्मे जिंदगी रंगे शायरी’ के संदर्भ में लिखा है, जिसने इसे पढ़ लिया उसने मेरी शायरी का हीरा पा लिया .इस तरह की बात मुक्तिबोध के संदर्भ में कहनी कठिन है. इसका बड़ा कारण है कि मुक्तिबोध का समस्त लेखन किसी भी तरह की प्रतिनिधिकता के संकुचन में फिट नहीं बैठता. मुक्तिबोध सरीखे लेखकों को जब हम प्रतिनिधि रचना के दायरे में रखकर देखने की कोशिश करते हैं तो एक बड़ा आयाम हमसे छूटने लगता है. यही वजह है कि स्वन्तान्त्रयोत्तर हिंदी लेखन…

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मुक्तिबोध आस्था देते हैं मुक्ति नहीं

प्रियदर्शन मुक्तिबोध और ख़ासकर उनकी कविता ‘अंधेरे में’ पर लिखने की मुश्किलें कई हैं। कुछ का वास्ता मुक्तिबोध के अपने बेहद जटिल काव्य विन्यास से है तो कुछ का उनके मूल्यांकन की सतत चली आ रही कोशिशों से, जिनमें कुछ बहुत सरल हैं कुछ बहुत जटिल, कुछ बहुत साधारण हैं कुछ वाकई असाधारण। मुक्तिबोध के निधन के बाद उनके समकालीनों और समानधर्मा लेखकों ने जिस आत्मीयता, अधिकार और प्रामाणिकता से उन पर लिखा है, वह भी किसी नए लिखने वाले की एक मुश्किल है। और जो सबसे बड़ी मुश्किल है,…

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राफेल डील : कुछ तो है, जिसकी पर्दादारी है

जाहिद खान राफेल लड़ाकू विमान सौदे पर मोदी सरकार की लाख पर्देदारी और एक के बाद एक लगातार बोले जा रहे झूठ के बीच, इस विमान सौदे के सभी राज खुलते जा रहे हैं। ताजा खुलासा फ्रांस के पूर्व राट्रपति फ्रास्वां ओलांद ने खुद किया है। एक फ्रेंच अखबार को दिए इंटरव्यू में ओलांद ने स्पट तौर पर कहा है कि राफेल लड़ाकू विमान निर्माता कंपनी ‘डसल्ट’ ने ऑफसेट भागीदार के रूप में अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस को इसलिये चुना, क्योंकि भारत सरकार ऐसा चाहती थी। उस समय उनके…

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कोरस के सालाना कार्यक्रम ‘अजदिया भावेले’ में रजिया सज्जाद ज़हीर की कहानियों का पाठ एवं मंचन

28 अक्टूबर, पटना आज कोरस के सालाना कार्यक्रम ‘अजदिया भावेले’ की शृंखला में इस बार साहित्यकार, नाट्यकर्मी व एक्टिविस्ट रज़िया सज़्ज़ाद ज़हीर के जन्म-शती वर्ष पर उनकी कहानियों का पाठ एवं मंचन का आयोजन किया गया। भारतीय उपमहाद्वीप में प्रगतिशील धारा के साहित्य पर कोई भी बातचीत रज़िया सज्जाद ज़हीर के बिना मुक़म्मल नहीं होगी।उनकी कहानियां अविभाजित भारत के साम्राज्यवाद-विरोधी व साम्प्रदायिकता-विरोधी मूल्यों को बढ़ानेवाली व आम जन के मार्मिक व संवेदनशील संदर्भ की हैं ।उनकी कहानियों में देश के विभाजन का दर्द मुखर होकर सामने आता है। कार्यक्रम की…

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एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश का परिणाम है मोहम्मद अज़ीम की हत्या

दिल्ली के मालवीय नगर में मोहम्मद अज़ीम की हत्या पर सीपीआईएमएल, सीपीएम, आइसा, एडवा की तथ्यान्वेषी रपट नई दिल्ली. 25 अक्टूबर को मालवीय नगर के 8 साल के एक बच्चे मोहम्मद अज़ीम  की हत्या बच्चों के ही एक समूह ने पीट-पीटकर कर दी. मोहम्मद अज़ीम मालवीय नगर इलाके के लिए जामिया फरीदया मदरसा में पढ़ाई कर रहा था. बेहद गरीब पृष्ठभूमि के उन 70 बच्चों में से वह एक था जो उस मदरसे में पढ़ते थे. मोहम्मद अज़ीम की हत्या की खबर सत्तारूढ़ भाजपा और आरएसएस द्वारा चलाई जा रही मुस्लिम -विरोधी…

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कल और आएंगे नग़मों की खिलती कलियां चुनने वाले

(आज मशहूर शायर और गीतकार साहिर लुधियानवी की पुण्य तिथि है । इस मौके पर साहिर साहब को याद कर रहे हैं रंगकर्मी महदी हुसैन) महदी हुसैन साहिर का मतलब होता है जादू करने वाला, यकीनन साहिर एक जादूगर ही था, उसका जादू ज़माने के सर चढ़कर बोला, उसके हर गीत आज भी ज़िन्दा दिलों को अपनी ओर खींचने की ताकत रखते हैं – ये रात ये चांदनी फिर कहाँ, मन रे तू काहे न धीर धरे, अभी न जाओ छोड़के, वो सुबह कभी तो आएगी, मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता…

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रफ़ाल विमानों की ख़रीद में घोटाले के ख़िलाफ़ वामपंथी दलों ने आयोजित की जन सुनवाई

श्वेता राज   सभी वामपंथी पार्टियों को तरफ से आज मावलंकर हॉल में रफ़ाल घोटाले पर जन सुनवाई हुई। इस कार्यक्रम में दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों, छात्रों व आम नागरिकों ने भाग लिया। जन सुनवाई को विभिन्न वामपंथी पार्टियों के राष्ट्रीय नेताओं, कार्यकर्ता वकील तथा अन्य लोगों ने संबोधित किया। दिल्ली साइंस फोरम से डी. रघुनंदन, राफेल घोटाले को सबसे पहले सामने लाने वाले चर्चित पत्रकार रवि नायर भी जन सुनवाई में उपस्थित थे, जिन्होंने काफ़ी विस्तार से इस पर बात रखी। वकील प्रशांत भूषण ने…

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सुन्दर कल्पनाएँ सुन्दर यथार्थों की भूमि पर ही लहलहाती हैं

डॉ. स्कंद शुक्ला शरद की रातें आसमान के हीरों को निहारने के लिए हैं। बरसात अब उतनी नहीं हो रही कि पूरी कालिमा पर मेघाच्छादन रहे। लेकिन इतनी फिर भी चल रही है कि धूल के कणों को बुहार कर पृथ्वी पर वापस कर दिया जाए ताकि अन्तरिक्षीय मणियाँ जगमगा उठें। सो खगोलविदों और प्रेमियों को अगर रात की भाषा पढ़नी है , तो समय यही है। जाने दो वह कविकल्पित था , मैंने तो भीषण जाड़ों में नभचुम्बी कैलासशीर्ष पर महामेघ को झंझानिल से गरज-गरज भिड़ते देखा है !…

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तेलंगाना एक बार फिर से जमींदारों के शिकंजे में कस गया है

एन. आर.श्याम “भारतवर्ष में समय-समय पर उत्पादन के साधनों पर मालिकाना हक, उत्पादन संबंधों में बदलाव और उत्पादन करने वाली शक्तियों की उन्नति, अभिवृद्धि के लिए जहाँ एक ओर दलितों और किसानों का आंदोलन होता रहा, वहीं दूसरी तरफ उसे कुचलने का प्रयास भी होता रहा । कोरेगांव सभा को भी इसी रूप में और इस संबंध में हुई गिरफ्तारियों को भी लोगों का ध्यान भटकाने के रूप में देखा जाना चाहिए ।” ये शब्द हैं तेलगू के प्रमुख कहानी, उपन्यासकार अल्लम राजैय्या के । ये हैं तेलंगाना के कामारेड्डी…

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव नतीजों के बाद व्यापक हिंसा और आगजनी

5 अक्टूबर, शुक्रवार को इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव हुआ। सात बजे से ही समर्थक और छात्र कला संकाय के लाइब्रेरी गेट पर जमे थे। शनिवार को करीब 1 बजे इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव का परिणाम आ गया। परिणाम आते ही बम चलने लगे, नारे लगने लगे थे। इस चुनाव में एबीवीपी को फिर मुँह की खानी पड़ी। धनबल, बाहुबल के साथ मंत्री-विधायक के प्रचार के बाद भी एबीवीपी एक सीट से ज्यादा नहीं जीत पाई। दो सीट, अध्यक्ष और उपमंत्री पर समाजवादी छात्रसभा ने भारी मतों से जीत दर्ज…

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वीरेनियत-3: अंत:करण के आयतन को विस्तारित करती कविताओं की शाम

वीरेन डंगवाल स्मृति में आयोजित जसम का सालाना कार्यक्रम  बीते 28 सितंबर को आयोजित यह वीरेनियत नाम से तीसरा जलसा था। जन संस्कृति मंच की ओर से इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित इस आयोजन में गुलमोहर हॉल खचाखच भरा था। नए से लेकर पुराने कवि और कविता प्रेमी दोस्तों की यह महफ़िल युवा और वरिष्ठ कवियों को सुनने के लिए जमी हुई थी। लगभग ढाई घंटे चले इस कार्यक्रम में हिंदी कविता का विराट पैनोरमा दिखा, जो मौजूदा सांस्कृतिक हालात और सत्ता संरचना की गहरी आलोचना साझा करने वाला था।…

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रोजगार आंदोलन से जुड़े छात्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में आइसा प्रत्याशी का करेंगे समर्थन

इलाहाबाद. इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में रोजगार आंदोलन से जुड़े छात्र-छात्राएँ आइसा प्रत्याशियों का समर्थन करेंगे. ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) के अध्यक्ष पद के प्रत्याशी -शैलेश पासवान, महामंत्री- नीलम सरोज, उपमंत्री -सोनू यादव के समर्थन में कार्यालय पर आयोजित हुई प्रेस वार्ता में यह घोषणा की गई. प्रेस वार्ता में आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुचेता डे , जेएनयू छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष गीता कुमारी, एसएससी आंदोलन के नेता सुनील यादव व शशांक सिंह, यूपीएसएसएससी के नेता विवेक वर्मा, यूपीएससी- यूपीपीएससी के प्रतियोगी छात्र अजय वर्मा, यूपी पुलिस आंदोलन के…

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जबरदस्त कवि, बड़े सम्पादक, सिनेमा और संगीत के अध्येता, गंभीर पाठक, भाषाओं और यारों के धनी विष्णु खरे की याद

अशोक पाण्डे अलविदा विष्णु खरे – 1 जबरदस्त कवि, बड़े सम्पादक, सिनेमा और संगीत के अध्येता, गंभीर पाठक, भाषाओं और यारों के धनी उस आदमी की महाप्रतिभा का हर कोई कायल रहा. असाधारण उपलब्धियों और आत्मगौरव से उपजे उनके नैसर्गिक दंभ का भी मैं दीवाना था. उनका दंभ उन पर फबता था. ऐसा कोई दूसरा आदमी अभी मिलना बाकी है जिसके बारे में ऐसा कह सकूं. उनके अद्वितीय जीवन का विस्तार इतना विराट था कि भले-भलों की कल्पना तक वहां नहीं पहुँच सकती. बौनों से भरे साहित्य-संसार दुनिया में वे…

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कल्पना लाज़मी के सिनेमा में एक सशक्त स्त्री की छवि उभरकर सामने आती है

यूनुस खान   कल्‍पना लाजमी का जाना हिंदी फिल्‍म जगत का एक बड़ा नुकसान है। बहुत बरस पहले एक सीरियल आया था ‘लोहित किनारे’। ये दूरदर्शन का ज़माना था। मुमकिन है आपको ये सीरियल याद भी हो। इसका शीर्षक गीत शायद भूपेन हजारिका ने गाया था। असम की कहानियों पर केंद्रित ये धारावाहिक बनाया था कल्‍पना लाजमी ने, और ये कल्‍पना लाजमी से हमारा पहला परिचय था। कल्‍पना लाजमी को मुख्‍यत: ‘रूदाली’ के लिए याद किया जाता है। असल में ‘रूदाली’ ज्ञानपीठ से सम्‍मानित बंगाल की प्रसिद्ध लेखिका महाश्‍वेता देवी…

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अभिव्यक्ति के प्रति ईमानदार एक रचनाकार की त्रासदी ‘मंटो’

अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ‘मंटो’ बायोपिक फिल्म की बहुत समय से प्रतीक्षा कर रहा था। समय-समय पर आने वाले ट्रेलर या वीडियो के टुकड़े इंतिजार को अ-धीरज में बदल रहे थे। आज वह दिन हाथ लग ही गया। कुछ रचनाकार होते हैं जिनके लेखन के साथ-साथ उनके जीवन का भी आकर्षण किसी को खींच सकता है। यह व्यक्तिगत रुचि का मसला हो सकता है। मेरे लिए तुलसी, कबीर, ग़ालिब, निराला, मंटो जैसे रचनाकार लेखन के साथ-साथ अपने जीवन का भी आकर्षण रखते हैं। उनके लेखन से गुजरने की तरह उनके जीवन…

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जीवन को एक कार्निवल के रूप में देखने वाला कवि कुँवर नारायण

  कमोबेश दो शताब्दियों की सीमा-रेखा को छूने वाली कुँवर नारायण की रचना-यात्रा छह दशकों से भी अधिक समय तक व्याप्त रही है। उनका पूरा लेखन आधुनिक हिंदी कविता के उत्कर्ष का पर्याय है। अपने सारभूत रूप में उनकी कविताएँ जीवन और मृत्यु से जुड़ी चिंताओं, राजनीति और संस्कृति की विसंगतियों, मानवीयता और नैतिकता की समयानुकूल अनिवार्यताओं, मिथक और इतिहास की सर्जनात्मक संभावनाओं, व्यक्ति-परिवार-समाज के बीच सापेक्षिक संबंधों को लेकर लगातार मुखर रही हैं और जहाँ कहीं भी जरूरत हुई, उन्हें प्रश्नांकित करती रही हैं। उनकी कविताओं और चिंतन में…

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आक्रोश और साहित्य: बजरंग बिहारी तिवारी

आक्रोश पुराना शब्द है| पाणिनि के यहाँ (अष्टाध्यायी, 6.3.21) इसका प्रयोग मिलता है- ‘षष्ठया आक्रोशे’| इसका आशय है कि यदि भर्त्सना का भाव हो तो षष्ठी तत्पुरुष समास करने में विभक्ति का लोप नहीं होता| आक्रोश गम्यमान हो तो उत्तरपद रहते षष्ठी विभक्ति का अलुक् होता है जैसे ‘चौरस्य कुलम्’ चोर का खानदान, और अगर आक्रोश गम्यमान न होकर प्रतीत हो अर्थात् सामान्य अर्थ में हो तो अलुक् नहीं होता जैसे ‘ब्राह्मण कुलम्’| पुराने कोशों में ‘नामलिंगानुशासन’ जिसका प्रचलित नाम ‘अमरकोश’ है में आक्रोश दोष देने के अर्थ में है…

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अशोक भौमिक के ‘जीवनपुर हाट जंक्शन’ में अंतर्बाह्य के बीच कोई दीवार नहीं-योगेंद्र आहूजा

योगेंद्र आहूजा संजय  जी का आदेश  था कि मैं अशोक जी की कहानियों पर एक आधार वक्तव्य या आधार आलेख तैयार  करूं । लेकिन यह ‘आधार आलेख’ … मीर के प्रसिद्ध शेर  – इश्क  इक मीर भारी पत्थर है/कब यह तुझ  ना-तवां से उठता है – को याद करते हुए कहूं  तो – मुझ  ना-तवां के लिये इश्क  से भी भारी पत्थर साबित हुआ । अगर उनका आशय था आलोचना के या साहित्यानुशीलन के किन्हीं सिद्धांतों या पद्धति पर आधारित, एक अकादमिक किस्म का वक्तव्य तो वह मेरे बस के…

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गांव की साझी सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन गति और उसके संकट को केन्द्र में रखती है हेमंत कुमार की कहानी ‘रज्जब अली’

(हाल ही में ‘पल-प्रतिपल’ में प्रकाशित हेमंत कुमार की कहानी ‘रज्जब अली’ को हमने समकालीन जनमत पोर्टल पर प्रकाशित किया , जिस पर पिछले दिनों पोर्टल पर काफी चर्चा हुई और बहसें भी आयीं। बहस को आगे बढ़ाते हुए प्रस्तुत है कहानी पर युवा आलोचक और ‘कथा’ के संपादक दुर्गा सिंह की टिप्पणी: सं) कहानी गांव की साझी सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन गति और उसके संकट को केन्द्र में रखती है।यह संकट विभाजनकारी साम्प्रदायिक राजनीति द्वारा पैदा किया गया है। यह संकट पहले भी मौजूद था, लेकिन वह गांवों के सामूहिक ताने-बाने…

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