सामंती वैभव के प्रति नॉस्टेल्जिया से ग्रस्त है कहानी ‘ रज्जब अली ’

‘ रज्जब अली ’ कहानी में कथाकार बड़ा आख्यान रचने की कोशिश में कई ऐसी गलतियाँ कर बैठे हैं जिसकी वजह से अपने बड़े उद्देश्य के बावजूद इसकी विश्वसनीयता सन्देह के घेरे में आ जाती है. सबसे पहली बात यह कि आज के भारत का फासीवाद निश्चित तौर पर मुसलमानों और दलितों के दमन के जरिये आगे बढ़ रहा है लेकिन आज के दमन का रूप वह नहीं है जो प्रेमचंद के जमाने मे था या आज से चार-पांच दशक पहले तक था. आज दलित पीड़ित हैं लेकिन मजलूम नहीं हैं.

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दलितों के घर भोजन: मकसद क्या है, वोट या कुछ और?

जिस समय दलितों के घर भोजन की यह नौटंकी चल रही है उसी समय एससी/एसटी एक्ट को कमजोर किया जा रहा है।उसी समय विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर भर्ती में आरक्षित तबकों को बाहर करने की साजिश चल रही है।चन्द्रशेखर रावण जैसे युवा दलित आंदोलनकारी को छल-प्रपंच के जरिये जबरन जेल में रखा गया है। पूरे देश भर में दलितों के खिलाफ हिंसा की बाढ़ आई हुई है।

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दलितों का भारत बंद : दलित आन्दोलन का नया दौर और नया रूप

  पिछले चार सालों में भारत में दलित आन्दोलन नए रूप में विकसित होना प्रारम्भ कर चुका है.रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या,गुजरात का ऊना आन्दोलन,सहारनपुर में भीम आर्मी का आन्दोलन,महाराष्ट्र के भीमा कोरे गांव का संघर्ष और 2 अप्रैल का दलितों द्वारा किया गया स्वत:स्फूर्त भारत बंद,इन सभी आंदोलनों ने यह साबित किया है कि भारत में दलित आन्दोलन अब नए दौर में प्रवेश कर चुका है. आज के समय में दलित आन्दोलन ज्यादा व्यापक मुद्दों,विस्तृत नजरिये और उग्र तेवर के साथ सामने आया है. लोकतंत्र पर बढ़ते फासीवादी हमले और…

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