अनुपम सिंह की कविताओं पर जसम की घरेलू गोष्ठी की रपट

अनुपम की कविताएँ अपने वक्त, अपने समाज और अपनी काया के अनुभव से उपजी हुई कविताएँ हैं- योगेंद्र आहूजा पिछली 23 जून 2018 को जसम की घरेलू गोष्ठी के तहत प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक के घर पर युवा कवयित्री अनुपम सिंह की कविताओं का पाठ और उस पर परिचर्चा आयोजित हुई। कायर्क्रम की शरुआत अनुपम सिंह द्वारा उनके काव्य पाठ से हुई। उन्होंने काव्यपाठ की शुरुआत ‘तलैया’ से की इसके बाद ‘मूढ़ महिलाएं’ , ‘अधिकारहीन बुआएं’ , ‘लड़कियाँ जवान हो रही हैं’, ‘जुए की पारियां’, ‘रंग जहाँ अपराधी होते हैं’,…

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‘समय है सम्भावना का’ : सत्ता के मौन की पहचान है

जगदीश पंकज जी का कविता संग्रह ‘समय है सम्भावना का’ इसी वर्ष आया है. जगदीश पंकज जी नवगीतकार हैं. दलित साहित्य में नवगीत की कोई समृद्ध परंपरा नहीं दिखती है. लेकिन जगदीश पंकज जी ने दलित साहित्य में इस नयी विधा को जोड़कर बहुत बड़ा योगदान दिया है. इससे दलित साहित्य का परिदृश्य व्यापक हुआ है. दलित साहित्य ने अपने आरंभ में स्वानुभूति की अभिव्यक्ति पर बल दिया और इसी को दलित साहित्य का मुख्य प्रस्थान विन्दु बनाया इसलिए साहित्य के अनगढ़पन को स्वकृति भी मिली. लालित्य और गेयता को…

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लाल किला की नीलामी के खिलाफ लेखकों, बुद्धिजीवियों , संस्कृतिकर्मियों ने प्रतिरोध मार्च निकाला

इस प्रतिरोध मार्च में आइसा, अमन बैरदारी, सेंटर फॉर दलित लिटरेचर एंड आर्ट, दलित लेखक संघ, डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट, डी.टी.आई, इप्टा, जन संस्कृति मंच, जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ, एस एफ आई, के वाई एस, एपवा, ऐक्टू, प्रतिरोध का सिनेमा समेत तमाम संगठन शामिल हुए.

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देश विरोधी व्यावसायिक मंसूबा है लाल किला को डालमिया समूह की गोद में देना

हमारी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित करना न केवल सरकार की संस्थाओं की जिम्मेदारी है बल्कि हम नागरिकों का भी दायित्व है। सरकार के इस देश विरोधी व्यावसायिक मंसूबो को सफल होने से रोकना चाहिए। इस पूरे मामले पर संस्कृति कर्मियों और लेखकों को ‘ सांस्कृतिक, ऐतिहासिक विरासत को बचाओ, सरकार के जन विरोधी व्यावसायिक मंसूबों को हराओ ‘ जैसा व्यापक अभियान चलाना चाहिए।

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