जनसंस्कृति की वाहक कला और सपना सिंह की रचना

” द ट्रु आॅफ हाफ वर्ल्ड “ सपना सिंह के, एक चित्रण श्रृंखला का शीर्षक है.  इस तरह के विषय के चयन की परंपरा चित्रकला जगत में लगभग नहीं रही है. बिल्कुल इस सदी में कुछ चित्रकारों ने इस तरह के विषय केन्द्रित चित्रण की शुरुआत की. आम तौर पर कला की शिक्षा देने वाले हमारे विश्वविद्यालय, तमाम रचनात्मक संभावनाओं को विधिवत् कूट पीस कर एक ऐसा ड्राफ्टमैन बना डालते हैं, जिसे अपनी सृजनात्मकता हासिल करने में एक लंबा वक्त लगता है. बल्कि बहुत तो एक टूटपूंजिया कारीगरी में ही…

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युवा मूर्तिकार कृष्णा कुमार पासवान : प्रगतिशील वैचारिक प्रतिबद्धता और प्रभावशाली सम्प्रेषणीयता

  हमारे देश में मूर्तिकला की बहुत ही समृद्ध परंपरा रही है. शास्त्रीय स्तर की बात करें या लोक शैली की या फिर आधुनिक कला या समकालीन कला जगत की, मूर्तिकारों की अनथक मेहनत और रचनात्मकता हमें बहुत प्रभावित करती है. यद्यपि मूर्तिकला की सीमा यह है कि उसका स्वरूप मूल रूप से स्थूल होता है. मानवीय मष्तिष्क की जटिलता बढ़ने के साथ कला की रचनात्मक जटिलता का विस्तार बहुत स्वभाविक है जिसमें मूर्तिकला का स्थूल स्वरुप आड़े आता है. दक्ष मूर्तिकार निरंतर अभ्यास, प्रयोगधर्मिता और प्रतिबद्धता के बदौलत, सृजनात्मक…

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काला सच और रणजीत सिंह की कला

अमेरिकी कला ने परम स्वतंत्रता के नाम पर एक तरफ अमूर्तन की भूलभुलैया खड़ी की तो दूसरी तरफ फोटो रियलिज्म ( सुपर रियलिज्म या हाइपर रियलिज्म) को भी खड़ा करने का श्रेय उसी को जाता है. 1960 के दशक के अंत और 1970 के शुरूआती दौर में लगभग पाॅप आर्ट के बाद के दौर में फोटो रियलिज्म नाम से एक सशक्त शैली आकार लेने लगी. यद्यपि यह दौर ऐसा था जिसमें कला आंदोलन के बनने बिगड़ने में समय नहीं लगता था. इस दौर में कला शैलियों की लगभग ऐसी बाढ़…

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कद से बड़े कैनवास : श्वेता राय के चित्र

राकेश कुमार दिवाकर उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में मुहम्मदाबाद छोटा सा शहर है. उस छोटी सी जगह से एक लड़की का आधुनिक कला जगत तक का सफर कई मायनों में असाधारण है. कदम दर कदम चुनौतियों से जुझती श्वेता राय के कैनवास का कद आज निस्संदेह श्वेता से बड़ा है. पुरुषवादी सामंती मानसिकता वाला एक पिछड़ा समाज लड़कियों के लिए एक कैदखाने की तरह होता है. वहां से किसी लड़के को भी कला की आधुनिक दुनिया में पहुंचना बहुत दुष्कर कार्य होता है और लड़की का पहुंचना तो एक…

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तमाम सीमाओं को तोड़ती वरुण मौर्य की कलाकृति

राकेश कुमार दिवाकर 20 वीं सदी के उत्तरार्ध में नयी- नयी तकनीकी अनुसंधान और विकास ने कला के क्षेत्र में आमूल चूल परिवर्तन किया। 21 वीं सदी में चित्र कला, छापा कला और मूर्ति कला के भेद मिट से गए और लगभग हर पारंपरिक सीमाएं टूट गईं । कलाकारों ने साहसिक तरीके से कला को परिभाषित किया जिसे न्यू मीडिया के नाम से जाना जाता है। इस मीडिया में कई कला छात्रों का काम भी रेखांकित करने योग्य है। वरुण मौर्य (जो फिलहाल हैदराबाद विश्वविद्यालय से कला में स्नातकोत्तर की…

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