प्रेमचंद और अक्तूबर क्रांति

साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद विरोधी रवैये का एक निरंतरता में अनुपालन जितना प्रेमचंद के यहाँ दीखता है, वैसा हिंदी के किसी और लेखक में नहीं. असंख्य मजदूर, किसान, स्त्रियाँ पहले-पहल जबकि समाज में उनके नायकत्व की संभावना क्षीण थी प्रेमचंद की रचनाओं में यह नायकत्व हासिल कर रहे थे. उनके उपन्यास ‘ रंगभूमि ’ के केंद्र में नायक सूरदास हैं.

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काल से होड़ लेता प्रेम और मुक्ति का कवि

शमशेर जी की एक कविता है ‘काल तुझसे होड़ है मेरी’। जिन्हें यह यकीन हो कि मनुष्य अपने श्रम और संघर्ष से काल के प्रवाह को बदल सकता है, उन्हें यह कविता जरूर देखनी चाहिए।’काल के कपाल’ पर कोई गीत ही नहीं लिखना है बल्कि काल को मनुष्य सापेक्ष बनाने का अथक और अनवरत संघर्ष, बिना रुके, बिना समझौता किए और हर तरह की मानवीय अभिव्यक्तियों, उपलब्धियों के बीच जीता जागता सजीव इंसान जो अपने इतिहास को रोज गढ़ता, बनाता चलता है।

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लोक और जन की आवाज़ : त्रिलोचन और मुक्तिबोध

मिथिला विश्वविद्यालय  में मुक्तिबोध-त्रिलोचन जन्म शताब्दी पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन मिथिला विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग ने मुक्तिबोध त्रिलोचन जन्मशताब्दी के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। यू जी सी द्वारा वित्त संपोषित इस कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने उक्त दोनों कवियों को हिंदी का अत्यंत प्रसिद्ध कवि कहते हुए कहा कि एक की कविता में जन की आवाज़ है तो दूसरे में लोक की। भले ही ये किसी भी विचारधारा के हों, किन्तु इनकी कविता में भारत का…

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