विष्णु खरे: बिगाड़ के डर से ईमान का सौदा नहीं किया

विष्णु जी नहीं रहे। हिंदी साहित्य संसार ने एक ऐसा बौद्धिक खो दिया, जिसने ‘बिगाड़ के डर से ईमान’ की बात कहने से कभी भी परहेज़ नहीं किया। झूठ के घटाटोप से घिरी हमारी दुनिया में ऐसे लोग बहुत कम रह गए हैं। निर्मम आलोचना की यह धार बगैर गहरी पक्षधरता और ईमानदारी के सम्भव नहीं हो सकती थी। बनाव और मुँहदेखी उनकी ज़िंदगी से ख़ारिज थे। चुनौतियों का सामना वे हमेशा सामने से करते थे। अडिग-अविचल प्रतिबद्धता, धर्मनिरपेक्ष-प्रगतिशील-जनवादी दृष्टि और विभिन्न मोर्चों पर संघर्ष करने का अप्रतिम साहस हमारे…

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रज्जब अली: कहानी: हेमंत कुमार

रज्जब अली तेज कदमों से गेहूँ की सीवान के बीच से मेंड़ पर सम्हलते हुए नदी के पास कब्रिस्तान की तरफ बढ़े जा रहे थे। आज के सिवा इसके पहले वह आहिस्ता-आहिस्ता पूरी सीवान के एक-एक खेत की फसलों का मुआयना करते, लेकिन इस वक्त उन्हें सिर्फ नजीब की अम्मी की कब्र दिखाई पड़ रही थी। उनके दिलोदिमाग में काफी उथल-पुथल मची हुई थी। दिमाग सायं-सायं कर रहा था और कलेजा रह-रह कर बैठा जा रहा था। शाम का वक्त था और मौसम तेजी से बदल रहा था। अभी तीन…

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एक कविता: हिंग्लिश [शुभम श्री]

शुभम श्री हमारे साथ की ऐसी युवा कवि हैं जिनकी कविताओं में बाँकपन की छब है। एक ख़ास तंज़ भरी नज़र और भाषा को बरतने की अनूठी सलाहियत। आज पढ़िए उनकी एक कविता ‘हिंग्लिश‘। हमारे संगी कवियों को यह सवाल बेहद परेशान करता है कि भाषा का क्या करें ? इतनी अर्थसंकुचित और परम्पराक्षीण शब्द सम्पदा वाली भाषा में कविता कैसे सम्भव हो ? यह सवाल हिंदी में लगभग हर दौर के कवि को तंग करता रहा है और हर दौर में इसके जवाब मुख़्तलिफ़  आये। मैथिलीशरण गुप्त से लेकर…

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‘कुच्ची का कानून’ के मंचन के साथ ‘कोरस’ का ‘आज़ाद वतन-आज़ाद जुबाँ’ नाट्योत्सव प्रारंभ

आसिफ़ा की याद में ‘कोरस’ नाट्य समूह द्वारा ‘आज़ाद वतन-आज़ाद जुबाँ’ नाट्योत्सव की शुरुआत आज से महिलाओं का सवाल सिर्फ़ महिलाओं का नहीं, वरन पुरुषों का भी है, पूरे समाज का: प्रो. डेजी नारायण अभिव्यक्ति की आज़ादी पर ख़तरे के दौर में हम, अंग्रेजों के समय से ही चला जा रहा है  ड्रेमेटिक परफ़ारमेंस ऐक्ट : परवेज़ अख़्तर आज शाम छः बजे से पटना के कालिदास रंगालय में ‘कोरस’ नाट्यसमूह द्वारा आयोजित ‘आज़ाद वतन-आज़ाद जुबाँ’ नाट्योत्सव की शुरुआत हुई। इस नाट्योत्सव में बम्बई की टीम ‘आरम्भ मुम्बई प्रोडक्शन’ अपना नाटक ‘बंदिश’, बेगूसराय से ‘द फ़ैक्ट रंगमंडल’ अपना नाटक ‘गबरघिचोर’ और पटना…

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एक कविता: दोष नहीं कुछ इसमें [अद्दहमाण]

विद्वानों के मुताबिक़ अद्दहमाण [अब्दुल रहमान] का काल 12वीं सदी के कुछ पहले ही ठहरता है। यहाँ कुछ छंद उनके ग्रंथ ‘संदेस–रासक‘ से चुने गए हैं। हर छंद के नीचे उनके काव्यानुवाद की कोशिश की है। ये काव्यानुवाद आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी और विश्वनाथ त्रिपाठी उत्कृष्ट सम्पादित ‘रासक‘ के अर्थों पर आधारित हैं। इसलिए अनुवाद में जो भला वह आचार्यों का, बुराई मेरी। शास्त्रीय भाषा में कहें तो इन छंदों में हमारा यह पुरखा कवि अपनी कविता का ‘औचित्य‘ बताता है। औचित्य बताते हुए वह एक मूलभूत सवाल की ओर…

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एक कविता : मेट्रो-महिमा : वीरेन डंगवाल

नवारुण प्रकाशन से वीरेन डंगवाल की समग्र कविताओं का संग्रह ‘कविता वीरेन’ छपने वाला है जिसमें उनके सभी संग्रहों और उसके बाद की अन्य कविताएँ भी शामिल हैं। उसी संग्रह से एक कविता है: ‘मेट्रो महिमा’। यह कविता न सिर्फ़ वीरेन की काव्य-यात्रा के दिलचस्प पड़ावों को दिखाती है, बल्कि इस दौर में तकनीक और पूँजी के हस्तक्षेप की पड़ताल भी करती है।

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एक कविता: चोरी-चुप्पे [प्रकाश उदय]

कविता ‘चुप्पे-चोरी’, जो एक लड़की की बहक है। यह लड़की गाँव की है, नटखट है। उसने उड़ने के लिए चिड़िया के पंख और गोता लगाने के लिए मछली की नाक हासिल कर ली है। लेकिन ये सपने ही सब कुछ नहीं हैं। उसके सपनों की दुनिया का हक़ीक़त की दुनिया से एक दिलचस्प रिश्ता है। यही रिश्ता इस कविता में जान भरता है।

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