कविता जनभाषा

‘ई बिकट अंधेरे जुग मा ना, मनई मनई का देखि सके’

शैलेन्द्र कुमार शुक्ल


आधुनिक अवधी कविता के सबसे लोकप्रिय और मशहूर कवि चंद्रभूषण त्रिवेदी ‘रमई काका’ (1914-1982) हैं।

उनकी कविताओं की लोकप्रियता को लेकर आलोचकों द्वारा सवाल उठाए जाते रहे हैं।सवालों का उठना कोई गलत बात नहीं, सवालों से कविता की प्रासंगिकता पर वाजिब बात होती है। यह सवाल कवि की जीवंतता के प्रतीक होते हैं। कविता पर बात हो, कवि का मूल्यांकन हो यह ज़रूरी है।

हिंदी और अवधी के महत्वपूर्ण आलोचक प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित के एक विवादित साक्षात्कार से इन दिनों रमई काका की कविताओं पर बात शुरू हुई है।

अवधी के महत्वपूर्ण आलोचक-कवि अमरेन्द्रनाथ त्रिपाठी ने अभी हाल में ही आदरणीय सूर्यप्रसाद दीक्षित की इस धारणा से कि रमई काका की अधिकाधिक कविताएं ‘मुर्खानुरंजन प्रधान’ हैं –की ओर ध्यान दिलाया।

‘परिपेक्ष्य को सही करते हुए’ एक किताब अभी आई है- जिसमें डॉ. विनय दास से प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित की बातचीत प्रकाशित है।

प्रो. दीक्षित ने यहाँ रमई काका की कविताओं को तीन स्तरों पर विभाजित किया है-
1. सरकारी प्रचार के तौर पर लिखी कविताएं
2. बहुत लोकप्रिय रचनाएँ जो बाजार से जुड़ी हैं। इनमें हास्य-व्यंग्य है। मासूमियत है। साहित्य का रंग इनमें नहीं है
3. धरती हमरि, अन्न देउता उनके लोक जीवन से जुड़ी साहित्यिक कविताएं हैं। 30-40 कविताएं उनकी श्रेष्ठ साहित्यिक हैं। बस मेरा यह आग्रह है कि उन्हें कॉमिक कवि न माना जाय।
आगे उन्होंने कहा है –“उनकी अत्यंत लोकप्रिय और बाजारू कविताओं को मैंने ‘मुर्खानुरंजन प्रधान’ कहा है। लोकप्रियता कभी घातक भी होती है। इस लोकप्रियता के चक्कर में नीरज का ह्रास हुआ। थैली और तालियाँ कवि के लिए सबसे ज्यादा घातक हैं।”

इस टिप्पणी में अंतिम चिंता महत्वपूर्ण है, जिससे मैं भी सहमत हूँ। छिछली लोकप्रियता वाकई में एक रचनाकार के लिए घातक है। तालियाँ, थैलियाँ और वाह वाह बहुतेरे कवियों को बर्बाद कर देते है, वाचिक और मंचीय कवियों के प्रति यह चिंता जायज है।

आप कविसम्मेलनों और मुशायरों में ऐसे दृश्य देख सकते है जहां भावुकता की भभक घृणास्पद बन कर रह जाती है। लेकिन रमई काका पर यह आरोप लगा कर उन्हें कमजोर कवि मान लेना मुझे ठीक नहीं लगता।

वह हिंदी और उर्दू के कवि नहीं, अवधी के कवि हैं— यह बात हमें नहीं भूलनी चाहिए। अवधी अपने स्वभाव से बहुत उदात्त भाषा रही है। उसे मध्यकाल में भी दरबार में ले जाने की हिम्मत किसी में नहीं हुई। मुझे अब तक काका की जितनी कविताएं पढ़ने को मिली हैं, मैं उन्हें अवधी का स्वाभाविक कवि मानता हूँ।

रमई काका ने सरकारी प्रचार के लिए कौन सी कविताएं लिखी है, वे मुझे अब तक दिखाई नहीं पड़ीं। उनका एक संग्रह ‘बौछार’ (1944) मेरे पास है। इसके अलावा भिनसार, फुहार, हरपाती तरवारि इत्यादि और भी अवधी कविता के संग्रह है जो अब खोजे नहीं मिलते।

खैर उनकी ग्रंथावली पढ़ीस और वंशीधर शुक्ल की तरह आती तो मूल्यांकन कुछ और होता। बौछार की कविताएं और उस संग्रह की भूमिका डॉ. रामविलास शर्मा द्वारा जो लिखी गई है, उससे काका के बारे में मेरी जो धारणा बनती है, मैं प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित की बात से असहमत होने का पूरा अधिकार रखता हूँ।

डॉ. रामविलास शर्मा ने चंद्रभूषण त्रिवेदी ‘रमई काका’ के प्रथम कविता संग्रह ‘बौछार’(1944) की भूमिका लिखते हुए एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही हैं। यह बात केवल काका की ही कविताओं पर लागू नहीं होती बल्कि अवधी की सभी हास्य व्यंग्य की कविताओं के संदर्भ में देखी जा सकती है। वह लिखते हैं- “चंद्रभूषण जी को हास्य-रसपूर्ण तथा गंभीर दोनों ही तरह की रचनाएँ करने में वांछनीय सफलता मिली है। हास्य रस की कुछ रचनाओं में वे एक ग्राम-निवासी की दृष्टि से नई सभ्यता पर भी बौछार करते हैं।

ऐसे रचनाओं में एक दोष यह आ जाता है कि प्रत्यक्ष रूप से ग्रामीण अंधविश्वासों का समर्थन करती हैं। जहां हम पूंजीवादी संस्कृति की अतिशय और उसकी विकृति का विरोध करते हैं, वहाँ अंधविश्वासों को भी शीघ्र ही दूर करना आवश्यक समझते हैं। चंद्रभूषण जी को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए।”

डॉ. रामविलास शर्मा ने जो बात कही है, उसे ठीक से समझने की जरूरत है। वह दोष रेखांकित करते हुए कहते हैं कि जब वह नई सभ्यता के आडंबरों पर प्रहार करते हैं तो ‘प्रत्यक्ष रूप’ से ग्रामीण अंधविश्वास कविता में आ जाते हैं। और इनसे उन्हें बचना चाहिए।

यह आलोचकीय दृष्टि है। वह काका की कविताओं की तारीफ करते हैं कि वह सभ्यता पर चढ़ रहे आडंबरों पर प्रहार करते हैं लेकिन ‘प्रत्यक्ष रूप’ से ग्रामीण अंधविश्वासों का जो समर्थन वहाँ मिला वह गलत है। डॉ. शर्मा ने ‘प्रत्यक्ष रूप’ की जो बात की है उससे साफ जाहिर है कि काका का ‘अप्रत्यक्ष प्रयोजन’ संदेह के दायरे में कतई नहीं आता।

जिस रूपक से तुलसी ने काव्यशास्त्र के अंतर्गत व्याख्यायित काव्य-हेतु और काव्य-प्रयोजन को कवि तक सीमित न रख कर सामाजिक भलाई के विस्तार तक लाया और कीर्ति, कविता और संपत्ति को तभी भली माना जब वह गंगा की तरह सब का हित करने वाली हो।

जबकि आधुनिक कविता ने आधुनिकता बोध के तहत इसे पुनर्मूल्यांकित करते हुए नया मायर प्रस्तुत किया। आधुनिक अवधी के सबसे लोक प्रिय कवि चंद्रभूषण त्रिवेदी ‘रमई काका’ ने कविता, कीर्ति और संपत्ति के बरक्स कविता, सरिता और प्रभुता को केंद्रीयता प्रदान करते हुए गंगा, गाय और ब्राह्मण के राजकीय आदर्शों से स्वाभाविकता को मुक्त कर जनवादी प्रगतिशील मूल्यों से जन सुलभता प्रदान की।

कविता के संदर्भ में आधुनिकता बोध को प्रतिष्ठित करते हुए अन्याय के विरुद्ध स्वाभाविकता को असली स्वरूप प्रदान किया। यह आधुनिक अवधी कविता के स्वभाव का घोषणा-पत्र है-
“हिरदय की कोमल पंखुरिन मा, जो भँवरा असि ना गूंजि सकै ।
उसरील वाँठ हरियर न करै, डभकत नयना ना पोंछि सकै ।
जेहिका सुनतै खन बंधन की, बेड़ी झन-झन ना झन-झनाय ।
उन पाँवन मा पौरुखु न भरै, जी अपने पथ पर डगमगाय ।
अँधियारु न दूरवै सबिता बनि, अइसी कविता ते कौनु लाभु ?”

रमई काका ने आधुनिक अवधी कविता का जो यह स्वभाव स्पष्ट किया, उसके पीछे आधुनिक अवधी के तहत नई लीक के प्रवर्तक कवि पढ़ीस और क्रांतिकारी कवि वंशीधर शुक्ल की कविताएं हैं जिनकी स्वाभाविकता को काका ने यहाँ पहचाना है।

काका भी इसी मार्ग के लोक-प्रिय बटोही हैं। अन्याय के विरुद्ध तीव्र स्वाभाविक प्रतिरोध ही आधुनिक अवधी कविता का स्वभाव है, जिसमें वर्ग-संघर्ष को ठीक से पहचानते हुए जन-पक्षधरता का खुलेआम समर्थन किया गया है।

जिस गंगा को जन की भलाई के लिए तुलसी ने मानक बनाया था, काका ने उसे अपने तर्कों की प्रासंगिक प्रामाणिकता से हटा कर जन को तरजीह दी। यहाँ जन श्रमशील किसान और मजदूर है-
“जो जल कै पूंजी पावत खन, बरखा मा बहि उतराय चलै ।
पक्के भवनन का गीत देइ, कुरिया झोपड़ी बहाय चलै ।
सागर अहलक जल रासि लेहे, वहिका आपनौ जल करै दान ।
गरमी परतै जलु सूखि जाय, मुरझे खेती बिलखै किसान ।
तब सींचि सके ना धरती का, अइसी सरिता ते कौन लाभ ॥”

यह प्रतीक लोक और शास्त्र के तमाम मिथकों और प्रथाओं से निर्मित हो कर एक वर्चस्व की गहरी राजनीति के तहत संस्कृति में आए हैं। यहाँ गंगा, गाय और ब्राह्मण को खत्म करने की कोई अमानवीयता नहीं है बल्कि इनके वर्चस्व को, जहां से असमानता और अन्याय को ताकत मिलती है, उसे पुनर्मूल्यांकित कर राजनीति को चुनौती दी गई है।

जिस सरिता को रमई काका ने कविता में प्रतिबिम्बित किया, वहाँ पुराने कुंडली मारे मूल्यों को इस बहाने पुनर्मूल्यांकित किया गया। पवित्रता के ढोंग और सुंदरता के मानक हमारी सोच को कमजोर करते रहे हैं। असल समस्या की ओर हमें ध्यान देना होगा, हम उस प्रथा को तरजीह नहीं देंगे।

काका ने स्पष्ट कहा है कि ऐसी सरिता से हमारा क्या लाभ जो बारिश के दिनों में पानी पा कर पूंजीवादी सभ्यता की तरह गरीबों और किसानों की झुग्गी-झोपड़ी बहा ले जाए, ग्रीष्मकाल में तपती-सूखती धरती और खेती के लिए उसमें पानी ही न हो।

ऐसी सरिता तो बड़े-बड़े राजे-महराजे और पूँजीपतियों के लिए लाभकारी है, उनके पक्के किले नदियों के किनारे शोभा पाते हैं, और इस सरिता का चरित्र तो देखिए तपती-प्यासी धरती के हिस्से का जल अगाध जल-राशि के उद्योगी उदधि को दान कर आती है।

यदि जरूरत पड़ने पर यह सरिता मुरझाई खेती और बिलखते किसानों के काम न आये तो हमारे दिलो-दिमाग में सरिता के प्रति कुंडली मारे मूल्यों को हमारा सजग धिक्कार !

इसी तरह उन्होंने प्रभुता पर भी सवाल उठाया है। ऐसा काव्य विवेक जिस कवि के पास हो उस पर ‘मुर्खानुरंजन’ का आरोप मुझे निरधार लगता है। काका ने अपना काव्य प्रयोजन स्पष्ट किया है।

हास्य-व्यंग्य की परंपरा अवधी में कोई नई नहीं। उसके पुट मध्यकालीन अवधी में भी आप को मिलेंगे। हास्य के अपने खतरे हैं लेकिन हास्य का निहतार्थ एक विवेकवान कवि में मनुष्यता विरोधी नहीं हो पाता।

रमई काका की जिन कविताओं को बाजारू कहा गया है, उन्हें नए संदर्भों में व्याख्या की जरूरत है। ‘द्वाखा’ जैसी कविता को भी यदि हम उसके सही अर्थ में समझे तो समझ में आएगा कि काका जिन चीजों का मज़ाक उड़ाते हुए चोट करते हैं वह कितना सार्थक है।

बाजार हम पर किस रूप में हावी हुआ है। इस नई सभ्यता में जो आडंबरों के आवरण हम पर चढ़े हैं, उसका असर क्या हुआ है। शहरी और ग्रामीण जीवन के बीच जो खाई चौड़ी हुई है—उसमें निकृष्टता और श्रेष्ठता के मानदंड कहाँ से तय हुए हैं ! यह विचारणीय है। काका की ऐसी कविताएं जिनमें अशिक्षा और अफसरशाही पर प्रहार किया गया है— उसमें खुद की हंसी उड़ाई है। उसके मुख्य पात्र के रूप में खुद को रखा है।

एक ग्रामीण पर बाजार का क्या असर हुआ है, किस तरह उसका स्वाभिमान हास्यास्पद हो गया है, यह कितनी करुण टीस है कि व्यक्ति अपना ही मज़ाक उड़ाने लगता है—इस पर विचार करने की जरूरत है।

हम यदि हास्य में व्यंग्य नहीं पकड़ पा रहे तो इसमें हमारा दोष है, न कि कविता का। उनकी ही एक कविता का उदाहरण यहाँ देखा जा सकता है, जिसमें व्यवस्था पर गहरी चोट है। आप यदि कविता की गहराई में नहीं उतरना चाहते तो यह भी आप को सतही लोकप्रियता का अप्रासंगिक चित्र लग सकता है-
“उनहिन के ऊपर बैठि गएन, हम जाना गठरी बिल्टी कै।
जब बोझु परा उनके ऊपर, तब उइ खौख्यान तुरत डरिकै।
‘क्यों बे उल्लू अंधा है क्या ?’ हम कहा कि मालिक भूलि परी।
तुम हमका समझेयो उल्लू है, हम तुमका समझा है गठरी।
ई बिकट अंधेरे जुग मा ना, मनई मनई का देखि सके।
अइसे मा हम तुम दूनौ जन, उल्लू होइत तौ नीक रहे।”

दरअसल यह सरल हास्य नहीं है इसमें एक गहरा व्यंग्य भी है जो चोट करता है। रेल हमारी व्यवस्था के रूप में दिखाई देती है जिसमें एक भीड़तंत्र पसरा हुआ है। जहां पूंजी की जड़ीभूत सत्ता और सामंती अफसरशाही देसी जनता को उल्लू सिद्ध करने में लगी है और दूसरी तरफ शुद्ध परजीवी असफ़रशाह और सत्ताधीश जनता के लिए मनुष्य न हो कर चालाकी और धूर्तता से धन और ऐश्वर्य की बेहूदा गठरी बन कर बैठे हुए हैं।

यह कैसा विकट अंधकार है कि मनुष्य को मनुष्य दिखाई ही नहीं पड़ रहा है। कारण यह कि सत्ता और सत्ता के मद में मतवारे अफसरशाह पूंजी की गठरी बने दलाल मनुष्यता से च्युत हो गए हैं और जनता को यह लूटे हुए धन की गठरी ही दिखाई दे रहे हैं।

काका कहते हैं कि ऐसी व्यवस्था के अंधेर भरे युग में यदि दोनों वर्ग शातिर उल्लू ही हो जाते तो ठीक रहता, क्योंकि उल्लू को अधेरे में ही दिखाई पड़ता है। यह तंत्र ही लोकतन्त्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

इस व्यवस्था में यदि अटना है तो व्यक्ति को उल्लू होना पड़ता है, क्योंकि अशिक्षा, बेरोजगारी, आडंबर और बिडंबनाओं के गुप्प अंधेर भरे हैं। यह व्यवस्था की भ्रष्टता पर गहरा व्यंग्य है। आप ऐसी कविताओं में यदि सिर्फ मासूमियत देखेंगे तो मुझे आप की साहित्यिक कसौटियों पर संदेह होगा और आप को कविता की साहित्यिकता पर।
यदि हम मुर्खानुरंजन की बात करें तो एक बात स्पष्ट कर लेनी चाहिए कि मूर्खता भ्रांति का हठ है। जबकि कविता हठ को तोड़कर विवेक पैदा करती है।

जब भी हठ टूटेगा भ्रांति संदेह में बदलेगी। और इस तरह सवाल करने की चेतना पनपेगी। इसलिए मूर्खता के लिए कविता में कोई जगह नहीं। यदि कहीं हो भी तो वह कविता नहीं कुछ और होगी।

रमई काका लोक कवि हैं, उनमें कविता की बेहतरीन समझ है। कम से कम उनकी कविता पर मूर्खतानुरंजन के आरोप को मैं निरधार मानता हूँ। काका की जितनी भी कविताएं अमूमन ‘बुढ़ऊ का बियाह’ और ‘साहब कै भ्यांट’ इत्यादि में भी व्यवस्था और आडंबर पर गहरी चोट ही है, बशर्ते कविता में व्यंग्य और हास्य के आशय को सही तरीके से समझा जाए।

लोकजन ने सदैव इस चीज को समझा है, गाँव के बुजुर्गों के मुंह से सुनी ऐसी तमाम कविताएं, जिनका निहतार्थ मुझे कभी दोषी नहीं लगा। मैं काका की इस लोक व्याप्ति को मूर्खता का पर्याय नहीं कह सकता।

हमारी नई पीढ़ी पर यह ज़िम्मेदारी है कि अवधी का फिर से सम्यक मूल्यांकन हो। पुरानी पीढ़ी से जो गलतियाँ हुई हैं, उन पर पुनर्विचार हो। उन्हें ठीक करने की कोशिश की जाए।

(लेखक शैलेन्द्र कुमार शुक्ल, रिसर्च एसोसिएट,
हिंदी शिक्षण अधिगम केंद्र, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा

मो.ब. नं. 7498653618

ईमेल- shailendrashuklahcu@gmail.com)

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