जनमत

कुंभ : हिंदुत्व के एजेंडे में रंगने की साजिश

उत्तर प्रदेश के राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने जब 2019 के कुम्भ मेले का लोगो प्रतीक चिन्ह जारी किया था तो प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक को उसे देख कर धक्का लगा। उन्होंने लिखा- ‘ लोगो में तीन साधुओं को स्नान करते दिखाया गया है जिससे यह किसी साधुओं के समागम का प्रचार-पोस्टर सा लगता है जबकि सच तो यह है कि कुम्भ में भारत के कोने-कोने से लाखों आम श्रद्धालु आते हैं , जिसके चलते यह इस देश के विभिन्न प्रांतों की जनता का मेल-मिलाप का मेला है। कुम्भ मेले के लोगो या प्रतीक चिन्ह में मंदिर का चित्रण अर्थ हीन सा लगता है क्योंकि कुम्भ का मूल आकर्षण स्नान है न कि कोई मंदिर दर्शन। ‘

उन्होंने आगे लिखा -‘ इलाहबाद का कुम्भ मेला इसलिए भी अन्य सभी मेलों से ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि यह गंगा और यमुना के संगम पर आयोजित होता है। प्रतीक चिन्ह में इन दोनों नदियाँ , खोजने पर ही दिखाई देती है। पर इन सबों के अलावा , सबसे दुर्गति इस प्रतीक चिन्ह में आम श्रद्धालुओं की हुई है , जिसे नदी के तट पर एक भीड़ के रूप में आप तभी देख सकते है , जब यह प्रतीक चिन्ह विशाल आकार में कहीं प्रकाशित हो। अखबार , पत्रिका या अन्यत्र जहाँ भी इस लोगो को छोटे आकार में छापा जायेगा, जनता चींटियों की भीड़ जैसी भी नहीं दिखाई देगी , बल्कि कुछ अष्पष्ट और अर्थहीन रंगीन बिंदुओं की उपस्थिति सी लगेंगी। यह लोगो या प्रतीक चिन्ह नितांत अव्यवहारिक , अज्ञानी और कला-विरोधी व्यवस्था की पैदाइश है, जिसने केवल कुंभ मेले के साथ अन्याय किया है। ’

कुंभ मेले के लोगो पर अशोक भौमिक द्वारा दस महीने पहले लिखी यह टिप्पणी बहुत खरी है। कुंभ के लोगो की ही तरह दुनिया के इस सबसे विशाल धार्मिक आयोजन के केन्द्र में लाखों आम श्रद्धालु नहीं मोदी-योगी सरकार की अपनी ब्रांडिंग और 2019 के चुनाव हैं। इस आयोजन को ‘ मंदिर ’, ‘ साधु ’ और ‘ चुनाव ’ के लिए साधा जा रहा है और उसी के हिसाब से इसकी ‘ ब्रांडिंग’ की जा रही है।

यह अनायास नहीं है कि कुंभ मेला के लिए पिछले एक वर्ष में जारी किए गए सैकड़ों टेंडर में ‘ ब्रांडिग वर्क्स ’ और ‘ डिजिटल मीडिया प्लानिंग ’ के लिए भी टेंडर किया गया है।

कुंभ की ब्रांडिंग का सिलसिला दो वर्ष पहले से शुरू हो गया। अक्टूबर 2017 में कुंभ मेले के लिए पहली बार प्रयागराज मेला प्राधिकरण का गठन किया गया। उस वक्त प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा था कि प्राधिकरण का गठन कुंभ की विश्वभर में ब्रांडिग करने के उद्देश्य से की जा रही है। फिर कुंभ का लोगो जारी हुआ। फिर अक्टूबर 2018 में इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया गया। यही नहीं योगी सरकार अर्द्धकुंभ को हर जगह कुंभ नाम दे रही है।

हर 12 वर्ष पर कुंभ यानि पूर्ण कुंभ का आयोजन होता जबकि छह वर्ष पर अर्द्धकुंभ का। महाकुंभ का आयोजन 12 पूर्ण कुंभ के बाद यानि 144 वर्ष के अंतराल पर होता है।

वर्ष 2013 में कुंभ का आयोजन हुआ था। इसके छह वर्ष बाद यह अर्द्धकुंभ है लेकिन प्रदेश सरकार अपने लोगो से लेकर हर जगह इसे ‘ कुंभ 2019, प्रयागराज ’ कह रही है। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का आरोप है कि योगी सरकार ने योजनाओं, शहरों की तरह कुंभ का भी नाम बदल दिया है। उन्होंने कहा कि ‘ प्रयाग कुंभ का नाम केवल प्रयागराज किया जाना और अर्द्धकुंभ का नाम बदलकर ‘ कुंभ ’ किया जाना परम्परा और आस्था के साथ खिलवाड़ है।

योगी सरकार का कुंभ के लिए स्लोगन है ‘ दिव्य कुंभ, भव्य कुंभ ’। कुंभ को दिव्य और भव्य बनाने के लिए 4200 करोड़ खर्च किए जा रहे हैं। यह बजट  वर्ष 2013 के महाकुंभ 1214 करोड़ से तीन गुना से भी अधिक है।

कुंभ 2019 के लिए प्रदेश सरकार ने 445 स्थायी और अस्थायी परियोजनाओं की अनुमति दी है। इनमें तमाम योजनाएं इलाहाबाद अब प्रयागराज शहर में सड़क, ओवरब्रिज, नाला, सुंदरीकरण आदि कार्यों के लिए है। प्रयागराज-प्रतापगढ़, रायबरेली-प्रयागराज और वाराणसी-प्रयागराज राजमार्ग का उंचा करने और ठीक करने का काम किया गया है। शहर के अंदर 34 सड़कों के चैड़ीकरण का भी काम हुआ है। प्रयागराज एयरपोर्ट पर एक नया टर्मिनल भी बनाया गया है।

लेकिन असर जोर कुंभ की ब्रांडिंग पर ही है। इलाहाबाद की सड़कों पर कुंभ स्नान, साधुओं के चित्र उकेरे गए हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की दीवारें भी इससे अछूती नहीं हैं।

समकालीन जनमत के सम्पादक एवं इलाहाबाद निवासी केके पांडेय बताते हैं कि कुंभ के नाम पर इलाहाबाद में सड़कों आदि के निर्माण के बहाने इस शहर की ऐतिहासिक जगहों को भी खत्म करने का काम किया गया है। शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित जीटी रोड पर स्थित ऐतिहासिक खुशरोबाग फाटक को खत्म कर दिया गया। इसके खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका भी डाली गई है।

केके पांडेय का कहना है कि इलाहाबाद का नाम बदलकर और ऐतिहासिक स्थानों को मिटाकर शहर की पहचान हिन्दुत्व के एजेंडे के तहत बदलने की कोशिश हो रही है। कुंभ मेले को भी भाजपा-आरएसएस छाप हिंदुत्व ब्रांड बनाया जा रहा है।

बात केवल यहीं तक सीमित नहीं है। योगी सरकार के 24 मंत्री अपना सभी काम छोड़ सभी मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों, विदेशी राजदूतों को कुंभ का न्योता बांटने निकल पड़े। देश के छह लाख गांवों के लोगों को कुंभ में आने के लिए जिलाधिकारियांे को निमंत्रण पत्र भेजा जा रहा है। अखबारों में विज्ञापन छप रहे हैं और प्रदेश के हर जिले, शहर में बड़े-बड़े होर्डिंग लगकार कुंभ में चलने का आह्वान किया जा रहा है। ऐसा पहली बार हो रहा है कि कुंभ को सरकारी विज्ञापनों की जरूरत पड़ रही है नहीं तो सैकड़ों वर्ष से गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर आयोजित होने वाले कुंभ मेले से सभी परिचित हैं।

कुंभ का बड़े पैमाने पर विज्ञापन और ब्रांडिंग से स्वभाविक है कि इसके मकसद पर सवाल उठेगा। वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं। इसके पहले राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में हार से भाजपा-आरएसएस खेमे में बौखलाहट है। इन राज्यों में चुनाव के परिणाम के बारे में भाजपा-आरएसएस को पहले ही संकेत मिल गए थे और इसलिए राम मंदिर निर्माण का राग तेज होने लगा था। राम मंदिर के लिए इस बार आरएसएस खुद आगे आया है और उसने अयोध्या में धर्मसभा का आयोजन कर राम मंदिर बनाने के लिए अध्यादेश लाने की मांग रखी। हालांकि यह रैली ज्यादा प्रभावी नहीं रही और इसके ठीक बाद किसानों के दिल्ली मार्च ने सारा ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

तीन प्रमुख हिन्दी राज्यों में भाजपा की पराजय का कारण किसानों, युवाओं की नाराजगी के साथ-साथ सवर्णों की नाराजगी भी मानी जा रही है। इसलिए संसद के शीतकालीन सत्र के अखिरी दिन मोदी सरकार ने गरीब सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण देने का विधेयक लाकर और पारित कर मगन है कि इससे वह माहौल को अपने पक्ष में कर लेगी.

इसके पहले नए वर्ष की पहली तारीख को एएनआई को दिए साक्षात्कार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राम मंदिर बनाने के लिए कानून बनाने के मुद्दे पर कहा था कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की प्रतीक्षा करेगी। कुछ लोगों को इससे यह लग सकता है कि मोदी सरकार और आरएसएस का इस मुद्दे पर अलग-अलग है लेकिन भाजपा-आरएसएस को ठीक से समझने वाले जानते हैं कि वे हिन्दुत्व का एजेंडा कभी ओझल नहीं होने देते और उस पर लगातार कार्य करते रहते हैं। आरएसएस के विभिन्न संगठन और भाजपा अलग-अलग सुर में बोलते जरूर नजर आते हैं लेकिन उनके हर कार्यवाही में हिन्दुत्व का एजेंडा प्रगट या परोक्षरूप में विद्यमान रहता है। वे हर अवसर का इस एजेंडा को पूरा करने के लिए उपयोग करते हैं। कुंभ को केन्द्र में रखकर सरकार द्वारा रचा गया पूरा तामझाम इसी मकसद को पूरा करता है।

कुंभ शुरू होने के पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गंगा आरती के लिए इलाहाबाद आ चुके हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत कुम्भ मेला क्षेत्र में 29 जनवरी से एक फरवरी तक चार दिन प्रवास करेंगे। आरएसएस प्रमुख विश्व हिन्दू परिषद की ओर से 31 जनवरी व एक फरवरी को सेक्टर 14 स्थित शिविर में आयोजित धर्म संसद में भाग लेंगे। इस दौरान पह प्रमुख संत-महात्माओं से मिलेंगे।

इस धर्म संसद में संत अयोध्या में राम मंदिर निर्माण पर अपना निर्णय देंगे। धर्म संसद में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, योगगुरु बाबा रामदेव, आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर के भी आने की खबर है। कुंभ में यह ‘ जुटान ’ 2019 के लिए माहौल बनाने के ही अभियान का हिस्सा है।

कुंभ के लिए 3200 हेक्टेयर में एक शहर बसाया गया है। मेला क्षेत्र में करीब 300 किलोमीटर सड़क और 22 पांटून पुल बने हैं। पर्यटकों के लिए 4200 प्रीमियम टेंट बनाए गए हैं तो आम लोगों के लिए 20 हजार की क्षमता वाला जन परिसर स्थापित किया गया है। इसके अलावा प्रवचन, धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए तमाम पांडाल निर्मित किए गए है। मेला क्षेत्र में 1.22 लाख शौचालय, 20 हजार से अधिक कूड़ाघर बनाए गए हैं। सफाई व्यवस्था के लिए 11,400 सफाई कर्मियों की ड्यूटी लगाई गई है।

एक तरफ वीवीआईपी, वीआईपी के लिए हर तरह की सुविधाओं से युक्त प्रीमियम टेंटस हैं तो मेला क्षेत्र की सफाई के लिए तैनात 1400 कर्मचारियों के लिए न्यूनतम सुविधाएं तक नहीं दी गई हैं। सफाई कर्मियों के मुताबिक ठंड से बचाव का मुकम्मल इंतजाम न किए जाने से कुंभ शुरू होने के पहले दो सफाई कर्मियों- 58 वर्षीय जगुआ ( ग्राम बिलगांव, थाना भिसंडा जिला बांदा ) और 21 वर्षीय ननकाई ( ग्राम-बरुआ, पोस्ट -गाजीपुर, जिला -फतेहपुर) की ठंड से मौत हो चुकी है।

मेला क्षेत्र में एक बजबजाता हुआ नाला बहता है जिसमें टॉयलेट का गंदा पानी और मल गिरता है, जहाँ मिनट भर भी खड़ा नहीं हुआ जा सकता है। इसी नाले के ठीक बगल में सफाईकर्मियों की बस्ती बसा दी गयी है। ये सफाई कर्मी विभिन्न जिलों से ठेकेदार द्वारा लाए गये हैं। इसमें अधिकतर मध्यप्रदेश के सतना, सीधी, छाता, कटनी और उत्तर प्रदेश के बाँदा, महोबा, औराई के हैं। जगुआ के बेटे हरिलाल ने एक टेंट में दस से ज्यादा लोग रह रहे हैं. उसके पिता को टेंट में जगह नहीं मिली तो वह ठंड में बाहर ही सो गए थे जिससे उनको ठण्ड लग गयी और उनकी मृत्यु हो गयी।

21 वर्षीय सफाई कर्मी राधे ने बताया कि ” एक टेंट में दस-दस लोग सो रहे हैं। कपड़े का टेंट है। रात में ओस का पानी टपकता है। रात में बच्चे ठिठुरते रहते हैं और प्रशासन ने इसके लिए कोई व्यवस्था नहीं की है। जमीन पर बिछे तिरपाल पर हम सो रहे हैं। नाले के किनारे होने के कारण जमीन की नमी के कारण बहुत ठण्ड लगती है।”
कानपुर के गोलू ने बताया कि जूते, दस्ताने और मास्क की बात छोड़ दीजिए हमें सोने के लिए पुआल और आग के लिए लकड़ी दे दें वही बड़ी बात है। इसके लिए हमलोग कब से कह रहे हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है। हम महीने भर से काम कर रहा है लेकिन हमें और हमारे साथियों को दस्ताने, जूते, मास्क वगैरह नहीं दिए गए हैं।
सफाई मजदूर एकता मंच (संबद्ध ऐक्टू) के अध्यक्ष राम सिया कहते हैं कि “हमारी यूनियन पिछले मेलों में भी सफाई कर्मियों के लिए बेहतर रहन-सहन की मांग करती रही है लेकिन प्रशासन कोई कार्यवाही नहीं करता है।”

प्रदेश के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने कहा था कि स्वच्छता के दम पर कुंभ का लोहा गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड , यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन को मनवाना है लेकिन 4200 करोड़ के कुंभ बजट में सफाई कर्मियों की स्थिति तो बदतर है ही, मेला क्षेत्र में सालिड वेस्ट मैनेजमेंट पर नेशनल ग्रीन टिब्यूनल द्वारा गठित कमेटी ने भी सवाल उठाया है और कहा कि सालिड वेस्ट मैनेजमेंट के लिए पर्याप्त उपाय नहीं किए गए हैं।

लेकिन ये सवाल मीडिया में भी नहीं है।

( यह लेख मूल रूप में पहले दिव्य मराठी के प्रिंट और वेब संस्करण में 13 जनवरी को प्रकाशित हुआ है)

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