साहित्य-संस्कृति

न्याय के सवाल को छोड़कर सामाजिक सौहार्द की बात ही नहीं हो सकती : प्रो राजीव भार्गव

नई दिल्ली. ‘‘ जिस समाज में किसी एक समूह या समुदाय का वर्चस्व हो, जहां हिंसा, दमन-उत्पीड़न और शोषण हो, जहां असहिष्णुता हर नुक्कड़ पर दिख जाती हो, जहां एक दूसरे के खिलाफ गाली-गलौज होती हो, उसे सौहार्दतापूर्ण समाज नहीं कहा जा जा सकता।’’

राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर और सीएसडीएस से संबंधित इंस्टिट्यूट आॅफ इंडियन थाॅट के निदेशक राजीव भार्गव ने ‘सामाजिक सौहार्द की चुनौतियां’ विषय पर जन संस्कृति मंच द्वारा 17 नवंबर 2018 को गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में आयोजित सातवें कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान में ये विचार व्यक्त किये।
सामाजिक सौहार्द क्या है, उसकी कल्पना क्या है, सौहार्दतापूर्ण समाज किस तरह का होना चाहिए ? प्राचीन धार्मिक संस्कृति और उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में विकसित आधुनिक धार्मिकता में क्या फर्क है, प्रो. भार्गव ने इसकी विस्तार से चर्चा की। सम्राट अशोक के ‘वचो गुत्ति’ यानी वाक-संयम के सिद्धांत की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह सम्राट अशोक ने विभिन्न धार्मिक समूहों के साथ रहने की कल्पना की थी। वहां एक दूसरे की आलोचना, आरोप-प्रत्यारोप या कमजोरियों को देखने-दिखाने पर रोक नहीं थी, पर उसके लिए तीन शर्तें थीं यह थीं कि इसका ध्यान रखा जाए कि क्या यह किसी अच्छे मकसद से प्रेरित है, उसके लिए उचित अवसर है या नहीं और उसे किस तरह किया जाए। ठीक यही शर्तें अपने धार्मिक-दार्शनिक विचारों की अच्छाइयों के प्रचार के लिए भी थीं।
प्रो. भार्गव ने कहा कि इसके विपरीत अगर जोर-जोर से अपनी अच्छाइयों का डंका बजाया जाएगा कि हम महान हैं, हम सर्वोच्च हैं, तो हम मनोवैज्ञानिक तौर पर उस समाज का ध्वंस करेंगे। जबकि आजकल इसी तरह दूसरे को अपमानित किया जा रहा है और उसके आत्म को चोट पहुंचाई जा रही है।
प्रो. राजीव भार्गव ने कहा कि सौहार्दतापूर्ण समाज की जो कल्पना है, उसके भीतर यह अनिवार्य पहलू होना चाहिए कि वहां हर समूह, हर तबका यह महसूस करे कि वह दूसरे के बिना अधूरा है। हर समूह को एक दूसरे के साथ संबंधों को रचनात्मक बनाने के लिए उत्सुक रहना होगा। दक्षिणपंथियों की तरह एकरूपता को जबरन थोप कर सौहार्द को संभव नहीं किया जा सकता। बेशक यह कठिन काम है, पर इसके लिए चाहत और आकांक्षा होनी चाहिए। हमें अपने गंभीर मतभिन्नताओं को खत्म करना होगा, उसके लिए स्पेस और व्यवस्थाएं निर्मित करनी होंगी।
सौहार्दतापूर्ण समाज की कल्पना यह है कि वहां एक दूसरे की मर्यादा, आत्मसम्मान, कमियों-कमजोरियों का ख्याल रखा जाए। वह एक ऐसा समाज होगा जहां एक दूसरे की आलोचना भी संभव होगी और जहां असहमतियों एवं भिन्नताओं पर सहज तरीके से संवाद संभव होगा। हम अपने आप में  कभी पूर्ण नहीं हो सकते। हम अपनी झलक दूसरों में देखें और दूसरे अपनी झलक हम में देखें। अगर यह नहीं होगा, तो सामाजिक सौहार्द की स्थापना मुश्किल काम होगा।
प्रो. राजीव भार्गव के अनुसार यूरोप में पहले सेकुलरिज्म नहीं था, सेकुलरिज्म वहां बाद में आया। चर्च के खिलाफ संघर्ष के दौरान वह निर्मित हुआ। हमारे यहां का सेकुलरिज्म उससे भिन्न है, यहां ऊपर-ऊपर सब शांत दिखता है, पर भीतर उत्पीड़न और दमन है, दलितों और स्त्रियों के गंभीर सवाल हैं। हालांकि यहां सेकुलरिज्म का फोकस अंतधार्मिक दायरे पर ही ज्यादा रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि हमारे सेकुलरिज्म की जड़ें तभी मजबूत हो सकती हैं, जब हम 1947 के विभाजन के पीछे मौजूद समस्याओं को हल कर लेंगे। हमें विभाजन के समय के उन्माद में मारे गए लोगों को भी याद करना चाहिए। यह जो बदला लेने का चक्कर है, जो गुजरात और मुजफ्फरनगर में निर्मम जनसंहार कराता है, उसे कैसे रोका जाएगा, इस पर हमें विचार करना चाहिए। गांधी जी ने अपने भीतर बैठे गुंडे से निबटने की बात की थी। उससे कैसे निबटा जाए यह हमारा व्यक्तिगत और सामूहिक उत्तरदायित्व है।
जो हिंदुत्ववाद है वह प्राचीन धार्मिक  संस्कृति के खिलाफ़ है : प्रो राजीव भार्गव
एक नायाब कृति है ‘ जनवाद का तीसरा नेत्र: रामविलास शर्मा ’ : गोपाल प्रधान
संगीतकार  टीएम कृष्णा के कार्यक्रम को रद्द किये जाने पर निंदा प्रस्ताव
‘सामाजिक सौहार्द की चुनौतियां’ विषय पर सातवां कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान
प्रो. राजीव भार्गव के विचारोत्तेजक व्याख्यान के बाद सवाल-जवाब का सिलसिला शुरू हुआ, जिससे सामाजिक सौहार्द, धार्मिकता और धर्मनिरपेक्षता से संबंधित बहस और ऊंचाई पर पहुंची। कवि मुकुल सरल के एक सवाल का जवाब देते हुए प्रो. राजीव भार्गव ने कहा कि हमें एक ऐसा शासक चाहिए, जिसका झुकाव किसी एक नजरिये के प्रति नहीं हो, चूंकि समूहों की धार्मिक भिन्नताएं जाने वाली नहीं हैं, तो उन फर्कों को नजरअंदाज भी नहीं किया जाना चाहिए। हमने सोचा कि आधुनिक सेकुलरिज्म पर आधारित सौहार्दता वाला समाज हम सिर्फ कानून के हिसाब से बना लेंगे, पर वह संभव न हुआ। ब्रिटेन ने बहुसांस्कृतिवाद मुगलों से सीखा था। हमारी राजनीतिक व्यवस्था में वह बात है ही नहीं। कथक को मुसलमान और भरतनाट्यम को हिंदू बताने वाली राजनीति रहेगी, तो सौहार्दतापूर्ण समाज नहीं बनाया जा सकता।
नवगीतकार जगदीश पंकज ने सवाल उठाया कि आज जिस तरह से सामाजिक सौहार्द पर संगठित हमले हो रहे हैं, उसका मुकाबला क्या सिर्फ स्टेट के भरोसे रहकर किया जा सकता है ? वरुण सिंह का कहना था कि जो ताकतें सामाजिक सौहार्द को तोड़ रही हैं, उनका प्रतिरोध करना पड़ेगा। आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी ने बहस में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि सामाजिक सौहार्द का जो सवाल है, कहीं न कहीं वह न्याय का सवाल है। उन्होंने कहा कि आम तौर पर जब महान शासकों का जिक्र होता है तो हम अशोक, अकबर आदि की चर्चा करते हैं, जबकि हमें धर्मपाल और हर्षवर्धन का जिक्र भी होना चाहिए।
इन सारे सवालों का जवाब देते हुए प्रो. राजीव भार्गव ने कहा कि जो वर्चस्व का सवाल है, वह न्याय से ही जुड़ा हुआ है। दमन-उत्पीडन-शोषण का खात्मा अगर हम चाहते हैं, तो किसी न किसी रूप में वह न्याय का सवाल ही होगा। न्याय के सवाल को छोड़कर सामाजिक सौहार्द की बात ही नहीं हो सकती। उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ आर्थिक न्याय के जरिए ही हम इसे हासिल नहीं कर सकते।
प्रो. भार्गव का कहना था कि जो हिंदुत्ववाद है, उसकी मूल समस्या आधुनिक धर्म संबंधी परिकल्पना के भीतर है। सामाजिक सुधार की परियोजना से जुड़े राजा राम मोहन राय, विवेकानंद, दयानंद सरस्वती भी इससे मुक्त नहीं हैं। जो हिंदुत्ववाद है, वह प्राचीन धार्मिक संस्कृति के खिलाफ है। दूरदर्शन अर्काइव्स की पूर्व निदेशक और सुप्रसिद्ध नृत्य निर्देशक कमलिनी दत्त ने शिक्षण संस्थाओं में परंपराओं से अलगाव की विडंबना की ओर ध्यान दिलाया। प्रो. भार्गव ने उनसे सहमति जाहिर करते हुए कहा कि बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक परंपराओं की जो हमारी विरासत है, उसका ज्ञान विद्यार्थियों को देना चाहिए। यह बहुत जरूरी है।
आलोचक आशुतोष कुमार ने सवाल उठाया कि 1947 के विभाजन की चर्चा तो प्रायः की जाती है, पर उसके ठीक पहले नाविक विद्रोह और आजाद हिंद फौज की लड़ाई के दौरान बनी सांप्रदायिक एकता की चर्चा क्यों नहीं की जाती? जो मेहनतकश जनता की एका थी और जो जनाकांक्षा थी, उसे राजनीतिक नेतृत्व जगह देने को तैयार नहीं था। उस समय अल्पसंख्यकों के लिए न्याय का सवाल एक जरूरी सवाल था, जिसे नजरअंदाज किया गया, जो धीरे-धीरे और गंभीर होता गया है। प्रो. भार्गव ने इस पर कहा कि वर्ग के नजरिये से विभाजन, सांप्रदायिकता और सत्ता के सवाल को देखना बिल्कुल जरूरी है।
व्याख्यान से पूर्व प्रो. राजीव गर्ग, वरिष्ठ चित्रकार हरिपाल त्यागी, कवि राम कुमार कृषक, चित्रकार-लेखक अशोक भौमिक, आलोचक सुधीर सुमन ने मशहूर प्रगतिशील-जनवादी आलोचक रामविलास शर्मा के महत्व पर कुबेर दत्त द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘जनवाद का तीसरा नेत्र: रामविलास शर्मा’ का लोकार्पण किया। इस पुस्तक में रामविलास शर्मा के हवाले कहा गया है कि जब भी आपके मन में आये कि भारत को नहीं बदला जा सकता, तब 45 से 47 के बीच ढाई वर्षों का इतिहास पढ़ना चाहिए, जिससे यह मालूम पड़ेगा कि देश की जनता में कितनी ताकत थी और जिसे कितना कम समझा गया।
‘जनवाद का तीसरा नेत्र: रामविलास शर्मा’ पुस्तक की भूमिका लिखने वाले युवा आलोचक गोपाल प्रधान ने कहा कि यह लीक से हटकर लिखी गई कृति है। यह रामविलास शर्मा पर लिखे गए कुबेर दत्त के लेखों का संग्रह नहीं है। इसमें रामविलास शर्मा के साक्षात्कार और भाषण हैं और जगह-जगह कुबेर दत्त खुद भी अपने विचार व्यक्त करते हैं। यह एक अद्भुत रचनाकार द्वारा एक दूसरे अनूठे रचनाकार व्यक्तित्व पर लिखी गई नायाब पुस्तक है, जिसने हिंदी में जनवाद की लड़ाई अकेले अपने दम पर लड़ी। कुबेर दत्त ने आलोचनात्मक लेखन के व्यवस्थित मानकों या कसौटियों से अलग हटकर हिंदी के एक विराट व्यक्तित्व को प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक नई संभावनाओं को खोलती है।
गोपाल प्रधान ने कहा कि कुबेर दत्त का उत्तर जीवन उनके लेखन के नए-नए रूपों को सामने ला रहा है, जो वर्तमान की चुनौतियों का सामने करने में हमारे लिए मददगार हैं। आज की चुनौतियों से मुकाबले के लिए अतीत से संबल जुटाना जरूरी होता है। कुबेर दत्त ऐसे रचनाकारों की पीढ़ी के सदस्य थे जिन्होंने आधुनिक तकनीक यानी टेलिविजन को जनता की सेवा में लगाया।

सातवें कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान की शुरुआत जसम, दिल्ली के सचिव रामनरेश राम के स्वागत वक्तव्य से हुई। आयोजन की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि राम कुमार कृषक ने कहा कि कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान का यह आयोजन उनके सरोकारों को याद करने का मौका है। उनकी याद और उनकी याद में होने वाला व्याख्यान हमें प्रेरणा देते हैं। यह जो हमारा समय है यह संघर्ष का समय है। प्रो. राजीव भार्गव के व्याख्यान ने हमें प्रेरित किया है कि वर्तमान की चुनौतियों का सामना करने के लिए अतीत के किन पक्षों की मदद ले सकते हैं। प्रो. भार्गव की दृष्टि बाहरी नहीं, भीतरी  है।
एयरपोर्ट अथाॅरिटी की ओर से दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में कर्नाटक संगीत के ख्यातिलब्ध गायक व संगीतकार टीएम कृष्णा की प्रस्तुति को रोकने के लिए सत्ता संरक्षित ट्राल्स के दबाव और उस दबाव के कारण कार्यक्रम को रद्द किए जाने की घटना के खिलाफ कुबेर दत्त की स्मृति में हुए इस आयोजन में कवि मृत्युंजय ने निंदा प्रस्ताव पढ़ा। जसम के इस प्रस्ताव में कहा गया कि सांप्रदायिकता, जाति, वर्ण, वर्ग और पर्यावरण के जलते सवालों पर एक नागरिक और संगीतकार दोनों हैसियत से टीएम कृष्णा की मौजूदगी देश की लोकतांत्रिक स्पिरिट की नुमाइंदगी करती है। उनके द्वारा सरकार के विरोध को राष्ट्र विरोध बताए जाने की प्रवृत्ति को खतरनाकर बताते हुए प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि कलाओं और कलाकारों से मौजूदा सरकार और उसकी शह पाए लफंगों का डर हम कलाकारों को एक साथ सतर्क और मजबूत करता है।
संचालन युवा आलोचक और संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन ने किया। उन्होंने इस मौके पर व्याख्यान के विषय से संबंधित कुबेर दत्त की चार कविताओं ‘एशिया के नाम खत’, ‘स्त्री के लिए जगह’, ‘प्रेयसी के नाम’ और ‘जड़ों में’ के अंशों का पाठ भी किया। धन्यवाद ज्ञापन जन संस्कृति मंच, दिल्ली के अध्यक्ष मशहूर चित्रकार अशोक भौमिक ने किया।
आयोजन में  चर्चित आलोचक और जसम के पूर्व महासचिव प्रणय कृष्ण, उद्भावना पत्रिका के संपादक अजेय कुमार, युवा आलोचक संजीव कुमार, कवि श्याम सुशील, रंगकर्मी राजेश चंद्र, कवि इरेंद्र, लेखक-अनुवादक दिनेश अस्थाना, जितेंद्र कुमार, दिनेश, सौरभ, कात्यायनी, किसान नेता पुरुषोत्तम शर्मा, राजेंद्र प्रथोली, गिरिजा पाठक, दूरदर्शन से संबद्ध रहे बीएम शर्मा, वेद एम. राव, रवि दत्त शर्मा, विवेक भारद्वाज, मनस्विनी भारद्वाज, मेधा भारद्वाज, रोहित कौशिक और रामनिवास भी मौजूद थे। इस मौके पर घुमंतू पुस्तक मेले  की ओर से पुस्तकों, पोस्टरों और फिल्म सीडी का स्टाॅल भी लगाया गया था। ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी भी आयोजन में मौजूद थे। 
 
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