अमन की शहादत

  • 37
    Shares

एक ऐसा शख्स जिसकी हत्या पर दोनों ही तरफ के लोग दुख जता रहे हैं। सभी इसे शर्मनाक और कायरतापूर्ण कार्य कह रहे हैं। यहां तक कि लश्कर ने भी दुख प्रकट किया है। भारत और पाकिस्तान दोनों मुल्कों के राजनयिकों ने इस घटना की निंदा की है।  पाकिस्तान के विदेश विभाग ने कहा है, हमें कश्मीर के लोकप्रिय पत्रकार शुजात बुखारी की अज्ञात हत्यारों द्वारा गोली मारकर हत्या करने की दुखद और स्तब्ध करने वाली सूचना मिली। ऐसी क्रूरता के पक्ष में कोई तर्क नहीं हो सकता है, इसकी जितनी निंदा की जाए, कम होगा। फिर इस शख्स को मारने वाले कौन लोग हैं ? अगर आतंकियों ने मारा है तो आतंकी क्या चाहते थे ? आतंकियों की दुश्मनी किसी सिस्टम से हो सकती है, किसी खास व्यक्ति से कैसे ?

शुजात बुखारी 15 सालों तक ‘ द हिंदू ’ के ब्यूरो चीफ रहे और अपने लेखों के दम पर उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली। शुजात बुखारी कश्मीर घाटी की प्रतिष्ठित और पुरानी साहित्य संस्था ‘ अदबी मरकज कामराज ’ के अध्यक्ष थे। उन्होंने मनीला के एंटीनियो डी मनीला यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री हासिल की और सिंगापुर के एशियन सेंटर फॉर जर्नलिज्म में फेलो थे।

हम जब भी कश्मीर की खबरें पढ़ते हैं, चाहे वो सुरक्षा बलों की गाड़ी के नीचे प्रदर्शनकारी को कुचलने का मामला हो या फिर पत्थबाजों के पत्थर से बच्चे के घायल होने का, पर्यटकों के मारे जाने का या सुरक्षाबलों के जवानों की हत्या का, हर खबर को पढ़कर हमेशा लगता कि कुछ बीच की कड़ी टूट रही है। घटना कैसे शुरू हुई और यहां तक कैसे पहुंची, इस पूरी कहानी में कुछ मिसिंग सा लगता है। उस मिसिंग फैक्ट्स को इकट्ठा करने में ही बुखारी जैसे लोग अपनी जान गंवा देते हैं। ये वे लोग हैं जो सिर्फ सरकारी खबरों पर यकीन नहीं करते थे, बल्कि ग्राउंड पर जाकर वास्तविक स्थिति का पता लगाते हैं। इन हालातों को बहुत नजदीक से देखने के बाद ये शांति के पक्ष में खड़े होते हैं। बुखारी मेन स्ट्रीम मीडिया के कुछ लोगों के लिए यह कहते थी थे, इन लोगों ने पूरे कश्मीर को पत्थरबाज और आतंकी बना डाला है। यह मीडिया शांति नहीं होने देगा।

बुखारी कश्मीर में तीन दशक से जारी हिंसा में आतंकवादियों के हाथों मारे गये चौथे पत्रकार हैं। 1991 में अलसफा के संपादक मोहम्मद शबान वकील की आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी। 1995 में बम धमाके में पूर्व बीबीसी संवाददाता यूसुफ जमील बाल-बाल बच गये थे, लेकिन एएनआई के कैमरामैन की जान चली गयी थी। 31 जनवरी, 2003 को नाफा के संपादक परवेज मोहम्मद सुल्तान की आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी। इससे हम यह समझ सकते हैं कि कश्मीर में वास्तविक फैक्ट जुटाना इतना आसान नहीं। चारों ओर से बंदूक के बीच से गुजरकर शब्दों की कड़ी बनानी पड़ती है।

कश्मीर के ऐसे हालात देखकर मन में एक सवाल उठता है कि क्या हम बुखारी की हत्या की वास्तविक वजह कभी जान पाएंगे, क्योंकि कश्मीर से आने वाली खबरें सेंसरशिप से गुजरकर आती हैं। आतंकी, अलगाववादी, सेना और सरकार के बीच पिस रही जनता का दर्द कभी हम तक नहीं पहुंचता।

आम जनता के बीच कश्मीरी पंडितों और कश्मीरी मुसलमानों को लेकर बड़ी खाई है। कोई कश्मीरियों का दर्द बयां करता है तो सामने वाला तुरंत काउंटर करते हुए कश्मीरी पंड़ितों के साथ खड़ा हो जाता है। लेकिन दोनों के दर्द को समझते हुए दोनों को मिलाने का प्रयास इस देश में नाममात्र के लोग ही कर रहे हैं। बुखारी उन चुनिंदा लोगों में एक थे। उन्होंने दोनों के बीच की कड़वाहट को दूर करने के लिए कई कॉन्फ्रेंस और प्रदर्शनियां लगाईं। ताकि दोनों एक होकर एक-दूसरे के साथ मोहब्बत से खड़े हो सकें।

हम मीडिया के लोग आराम कुर्सियों पर बैठकर भी संघर्षविराम के पक्ष में नहीं खड़े हो पाते हैं, लेकिन जिस शख्स ने अपने कश्मीर को जलते देखा था, जिसने युवाओं को गुस्से में पत्थर मारते देखा था, जिसने अलगाववादियों और आतंकियों की गोली से कश्मीरियों को मरते देखा था और आतंकियों और सेना के संघर्ष में आम नागरिको को मरते देखा था, वह शख्स संघर्ष विराम के पक्ष में पुरजोर तरीके से खड़ा था। दरअसल दूर सुरक्षित स्थानों पर बैठे लोगों को मरते-मारते हुए देखने में शायद वह दुख और पीड़ा नहीं होती है, जो वहां के स्थानीय लोग और जवानों को होती है। कुछ जवान मरते रहें और कुछ आतंकी तो आम लोगों को लगता है कि हम जवाब दे रहे हैं, लेकिन हमारे जिन जवानों की जान जाती है, कोई उनके अबोध बच्चे और विधवा बीवी और मां-पिता से पूछे कि उनके दिल पर क्या गुजरती है।

यही कुछ वजह है कि दो दिन पहले आई यूएन की मानवाधिकारों के उल्लंघन संबंधी रिपोर्ट का उन्होंने समर्थन किया था। जबकि भारत सरकार ने उसे बकवास, झूठ और पूर्वाग्रह से ग्रस्त बताया था। जो व्यक्ति हमेशा शांति के पक्ष में खड़ा रहा, अमन की वकालत करता रहा, कभी किसी के पक्ष में एकतरफा तरीके से नहीं लिखा, भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के बीच खाई पाटने की बात करता रहा, उसकी आवाज को हिंसा की बंदूक ने खामोश कर दिया। ऐसे में सिर्फ यही कहा जा सकता है कि सिर्फ कश्मीर ही नहीं कश्मीरियत के पक्ष में भी खड़े होने की जरूरत है, ताकि ऐसे लोग लड़ाई में अकेले न रह जाएं। हम सब उनके साथ इस लड़ाई में शामिल हों।

 

Related posts

Leave a Comment