अल्पना मिश्र की कहानी : स्याही में सुर्खाब के पंख

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( बर्बर युग की तरफ लौटाए जाते, भगाए और रौंदे जाते हम हैरान परेशान देख रहे है कि वह कौन सा विकास का इल्यूजन रचा जा रहा है, जो क्रूरता के कंधे पर सवार हो कर आ रहा है। क्रूरता का यह बैताल सत्ता के पर्वत से फिसल कर हमारी पीठों पर सवार हो चुका है और हमें हांक रहा है। धर्म सत्ता और अर्थ सत्ता के लगातार आक्रमण मनुष्यता को तार तार कर रहे हैं। स्टीवर्ट बांड की एक बात यहाँ एकदम सही लगती है कि ” टेक्नोलॉजी आती है और अगर आप स्टीमरोलर के भाग नहीं हैं तो फिर सड़क का भाग बन जाने के लिए खुद को राजी कर लीजिए।” इस कथन के परिप्रेक्ष्य में देखती हूँ कि एक अदृश्य बुलडोज़र हमें रौंदता आ रहा है- एक नहीं, कई कई बुलडोज़र, कई कई रंगों के, चौतरफा रौंदते आ रहे हैं और हम सड़क का भाग बन जाने को मजबूर किये जा रहे हैं। मोहल्ला, परिवार, गांव, शहर, देश… सब इसकी चपेट में। कठुआ, उन्नाव और देश के अलग अलग भागों में हो रही दरिंदगी दरअसल इसी फैलती, बढ़ती हिसा का विस्तार है। जिसने वात्सल्य और वासना के फर्क को मिटा दिया है। यह हिंसा कभी धर्म की ओट लेकर, कभी जाति, कभी सम्प्रदाय और वर्ग की ओट ले कर फैलाई जा रही है। इसका प्रयोजन ही भय का माहौल तैयार करना और हमें पीछे की तरफ लौटना है।यह देश के किसी एक कोने की सच्चाई नहीं, बल्कि जैसे पूरा देश ही होलोकरोस्ट (holocaust )में बदल रहा है। लेकिन यहाँ मैं एक बात और जोड़ूंगी कि जनतंत्र में ‘जन’ को नकार कर या पूरी तरह नियंत्रित मान लेना सही आकलन नहीं होगा, क्योंकि ‘जन ‘ में अभी भी असहमति का साहस बचा हुआ है और पूंजी, धर्म और सत्ता के गठजोड़ पर टिकी बर्बरता की पहचान से उपजे प्रतिरोध की आवाजें मुखर हैं –अल्पना मिश्र )

स्याही में सुर्खाब के पंख

 

सोनपती बहन जी माचिस लिए रहती हैं

 

सोनपती बहनजी को भूला नहीं जा सकता था।

वे शिक्षा के सबसे जरूरी पाठ की तरह याद रखने के लिए थीं।

वे बहुत पहले निकली थीं नौकरी करने, जब औरतें किन्हीं मजबूरियों में निकलती थीं। वे भी मजबूरी में निकली थीं, ऐसी जनश्रुति थी। जनश्रुति यह भी थी कि उनके पति की मृत्यु के बाद चार लड़कियों की जिम्मेदारी और रिश्तेदारों की हृदयहीनता ने उन्हें नौकरी करने के लिए प्रेरित किया था।

यह आम भारतीय जीवन का सच जैसा था और इसी रूप में स्वीकृत सच की तरह भी था।

जोर शोर से चलाये जा रहे स्त्री शिक्षा के अभियान के चक्कर में उन्हें घर से पकड़ कर एक रोज स्कूल में बैठा दिया गया था। स्कूल एक सेठ और उनकी पत्नी ने शुरू किया था। इस कन्या पाठशाला के लिए हर हाल में लड़कियाँ चाहिए थीं। वे लोग यानी कि सेठ और सेठानी खुद चल कर उन घरों में गए थे, जहाँ लड़कियाँ शिक्षा के उजाले से दूर अँधेरे  कोने में खड़ी अपने से छोटे बच्चों की नाक पोंछ रही थीं, टट्टी धो रही थीं, बरतन माँज रही थीं, रोटी थाप रही थीं। कहीं कहीं घास काटने गई थीं, कहीं गोबर पाथ रही थीं। ऐसे में उन्होंने समझाया कि शिक्षा के उजाले से कैसे घास और गोबर की गंहाती दुनिया से निकल कर बल्ब की धवल रोशनी में आया जा सकता है ? सोनपती, जो आगे चल कर बहन जी बनीं, स्कूल नहीं जाना चाहती थीं। वहाँ की हर क्षण रखी जाने वाली नजर से बड़ी कोफ्त होती थी, लेकिन उन्हें पकड़ कर ले जाया गया और बोरे पर बैठा दिया गया। पहाड़े रटवाये जाने लगे। खड़िया और तख्ती एक अदद उनकी अपनी हो गई। एक अदद टाट बोरा भी उनका हुआ। इस तरह अधिकार क्षेत्र बढ़ता जायेगा, ऐसी उम्मीद उनमें जग गई। इसी उम्मीद पर रट रट कर पाये गए प्रमाणपत्र सचमुच उनके काम आ जाएंगे, ऐसा उन्होंने सोचा न था। लेकिन रिश्तेदारियों ने उन्हें इस सच का सामना करने के लिए उकसाया। तभी इन प्रमाणपत्रों के असली उपयोग पर उनका ध्यान गया। कुछ इस तरह वे अपने कठिन समय को लाँघने के प्रयास में प्राइमरी पाठशाला की नौकरी पर लग गईं।

वे अक्सर नीले सफेद प्रिंट की साड़ी पहनतीं। हाथ में एक छोटा झोला होता, जिसमें उनका बटुआ खूब अंदर धंसा कर रखा रहता। उसी में एक माचिस की डिबिया पन्नी में लपेट कर धरी होती। गाहे बगाहे काम आ जाने की उम्मीद इस डिबिया में छिपी होती।

आग का अपने पास होना किसी सुकून की तरह था।

एक लम्बा काला छाता रहता, जो कई वक्तों पर कई तरह से काम आता। मक्खी भगाने, पंखा झलने, रास्ता बनाने, रास्ता दिखाने, मेज थपथपाने, किसी विद्यार्थी को प्वाइंट करने, ठेले वाले को बुलाने, चपरासी को डाॅटने आदि आदि से लेकर दुर्वासा की छड़ी के रूप तक यह छाता डटा रहता। इसतरह हाथ का छाता अपने से कुछ गज आगे बढ़ाती, कंधे पर झोला टांगे, बाजार हाट निपटाती, ग्वाले से दूध लिए सोनपती बहन जी घर पँहुचतीं। घर में हिलती डुलती लड़कियाँ सावधान में खड़ी हो जातीं। लड़कियाँ छोटी थीं, पर होशियार थीं, घर का काम काज बड़े अच्छे से संभालती थीं, सोनपती बहन जी को रोज रात में लोहे की कढ़ाई में दूध औटा कर पीने को देती थीं, ऐसा मेरी माँ मानती थीं।

लड़कियाँ छोटी थीं, पर बेचारी थीं, ऐसा हम बहनें मानते थे।

इस तरह का वैचारिक मतभेद हमारे बीच तना हुआ था।

सोनपती बहन जी को बीच बीच में बेसिक शिक्षा अधिकारी के दफ्तर जाना पड़ता। पहले नहीं जाना पड़ता था लेकिन जब से बस अड्डे वाले स्कूल की हेडमास्टरी मिली थी, तब से अक्सर वहाँ भी हाजिरी लगवानी पड़ती थी। बेसिक शिक्षा अधिकारी बार बार कहते कि ‘बहनजी, अपनी सहूलियत पहले देखिए।’ जिसका व्यंग्यार्थ होता कि ‘मेरी भी कुछ सहूलियत देखिए।’ सोनपती बहनजी उसका अन्यार्थ यूं निकालतीं कि उनकी कर्मठता पर शक किया जा रहा है। इस तरह स्कूल के हिसाब किताब को हजार बारहां जाँचतीं। बच्चों की संचयिता की किताब यानी पासबुक को अच्छी तरह देखतीं। राई रत्ती का हिसाब गड़बड़ाने न पाये, फिर भी बी. एस. ए. साहब प्रसन्न नहीं होते। वे हैरान होतीं और दूने जोश के साथ परिश्रम करतीं। एक बार बी.एस.ए. ने कहा कि ‘‘बहनजी, चपरासी का तो ख्याल रखा करिए। बेचारा इसी नौकरी के भरोसे है। कुछ खिला पिला दिया करिए।’’ इस पर उन्होंने तुरंत अपने झोले के अंदर से टिफिन निकाला और चपरासी को दे दिया। चपरासी ने हाथ में पकड़ा टिफिन साहब की मेज पर पटक कर रखा और बाहर चला गया। सोनपती बहनजी भी अपना काम पूरा हुआ मान कर ‘अच्छा साहब चलते हैं’ कहते हुए बाहर निकल आईं। उसी किसी समय के बीच, जब वे बाहर निकल रही थीं, उनके कान में आवाज गिरी-‘‘ ये औरतें! अकल नहीं है लेकिन नौकरी करने चली आयेंगी। अपनी तो अपनी, दूसरों की कमाई की भी पहरेदार बनी फिरती हैं।’’ सुनानेवाले ने आगे थोड़ा और छौंक मारी-‘‘ देखा नहीं, अभी पुराने बस अड्डेवाले स्कूल की सोनपती बहनजी आई थीं। चपरासी को कुछ खिलाने की बात पर अपना टिफिन निकाल कर देने लगीं। मूढ़ औरत!’’

सोनपती बहनजी को रहस्य कुछ कुछ समझ में आया। वे तेजी से मुड़ीं और साहब के कमरे में बिना पूछे घुस कर अपना टिफिन उठा लीं। टिफिन उठा कर वे एक मिनट को रूकीं फिर तेज कदमों से बाहर आ गयीं।

साहब के चेहरे की हँसी देखने के लिए नहीं रूकीं।

चपरासी के चेहरे की हँसी देखने के लिए भी नहीं रूकीं।

गिरती हुई आवाजों के पीछे की आकृतियों को देख लेने या सुन लेने के लिए भी नहीं।

बल्कि तमाम ध्वनिमय अक्षरों के पलाशवन से निकल गयीं। अपने छाते से रास्ता बनातीं।

बाहर निकलते हुए वे मन ही मन ठान रही थीं कि अब नौकरी के ये दाव पेंच समझने ही पड़ेंगे और वे दौड़ दौड़ कर बी.एस.ए. साहब के ऑफिस पँहुच आने की अपनी मजबूरी भी त्याग देंगी। इसके बाद वे कानों में जहर घोलती आवाजें लिए घर लौट रही थीं। सब्जी खरीद रही थीं। ग्वाले से दूध ले रही थीं। डॉक्टर को अपनी घुटने की तकलीफ दिखा रही थीं। मेडिकल स्टोर से दवा खरीद रही थीं। इस तरह थकी परेशान घर लौट रही थीं। लड़कियाँ इस थकान और परेशानी से बेखबर होतीं। घर में हिलती हुई डोलती फिरतीं। तब सोनपती बहनजी को छाते को छड़ी में बदलना पड़ता। लड़कियाँ अनुशासित थीं। तुरत फुरत लाइन लगा कर खड़ी हो जातीं। सोनपती बहनजी सट्ट सट्ट पीटती जातीं और बताती जातीं कि किसे क्या क्या नहीं आता है? किसी को दाल में नमक ठीक से डालने नहीं आता था, कोई उनके घर आने पर तुरंत पानी ले कर नहीं आया था, कोई अब तक चाय ठीक नहीं बना पाता था, किसी से आलू एकदम वैसा नहीं कटता था, जैसा कटना चाहिए था। इस तरह बहुत कमियाँ थीं, जिनकी सजा एक दिन तय थी।

तो सोनपती बहनजी एक जरूरी पाठ थीं। हमें हर दूसरे तीसरे रोज उन्हें याद करना पड़ता था। वे लड़कियों को कितनी अच्छी तरह नियन्त्रित करती थीं, यह आदर्श मेरी माँ पर छाया रहता था। वे हमें डांटते डपटते याद दिलाती रहती थीं कि अगर हम बातों से नहीं माने तो उन्हें लातों का इस्तेमाल सोनपती बहनजी की तरह करना पड़ जायेगा। वे यह भी याद दिलाती रहतीं कि वे कितनी महान हैं, क्योंकि वे सोनपती बहनजी की तरह छाते को छड़ी में नहीं बदलतीं। यह भी कि वे सोनपती बहनजी से एक दर्जा आगे तक पढ़ी हैं, इसलिए हमें आदर्श लड़की बना देने के मामले में भी वे एक दर्जा पीछे नहीं होना चाहती थीं।

वे सोनपती बहनजी की कुछ कुछ सहेली थीं। ‘ कुछ कुछ ’ इसलिए कि उनके प्रभाव से घिरे घिरे अचानक किसी क्षण उसमें से बाहर आ कर उनकी बेरहमी का मजाक बनाने लगतीं और ऐसे किस्से सुनातीं कि हमारे रोंगटे खड़े हो जाते। इसी मजाक उड़ाने और दिल दहला देने वाले क्षण में हमने जान लिया कि सोनपती बहनजी की लड़कियाँ किसी लड़के को खिड़की से देख रही थीं, कि उनकी लड़कियाँ खिलखिला कर बड़ी जोर से हँसी थीं, कि बड़ी लड़की का दुपट्टा किसी बड़े बुजुर्ग के सामने खिसक कर नीचे गिर गया था…… ऐसे ही किसी घोर अपराध पर सोनपती बहनजी ने अपने झोले से माचिस की डिबिया निकाली थीं और लड़कियों के पैरों पर छुआ छुआ कर उसका महत्त्व असंदिग्ध किया था।

इस कहानी के पीछे की कहानी यह थी कि हमसे सीनियर, हमारे स्कूल की वैशाली सारस्वत उसी रोज भाग गयी थीं।

भागने के बाद वे ‘चड्ढा’ हो गयी थीं।

‘भागना’ एक क्रिया भर नहीं था।

एक आम शब्द भर नहीं था।

अपने आप में एक ध्यानाकर्षक पद था।

तमाम तरह की विपदाएं, भय, अनाचार, कष्ट और निराशा इसमें से भरभरा कर फूटते थे। तमाम तरह की लालसाएं और विकृत कल्पनाएं भी इसी में से फूटती थीं।

नगर के, घर के घर अपनी लड़कियों को ले कर सतर्क हो उठे थे।

कोई लड़का कहीं था, जिसके साथ भागने की संभावना छिपी हुई थी।

कई और तरह के लोग इस संभावना का लाभ अपनी अपनी तरह उठा लेना चाहते थे।

लोग इससे और भी डर रहे थे।

क्या पता मेरी माँ भी अब अपने झोले में माचिस की डिबिया रखें!

 

मोहब्बत है, पैथोलॉजी सेंटर है

यह चर्चा बड़ी जोर की उठी थी कि सोनपती बहनजी की लड़की का ब्याह किसी फौजी सिपाही से तय हो रहा है। उस कस्बेनुमा शहर में फौजी साक्षात नहीं थे। अगर कोई जानता भी था तो किसी के दूर दराज के रिश्तेदार के रूप में। हम भी फौजी सिपाही के बारे में, उस दुनिया के बारे में बिल्कुल नहीं जानते थे। ‘बिल्कुल नहीं’ कहना ठीक नहीं है। थोड़ा जानते थे, जितना कोई भी समाचारों से गुजर कर जान जाता है। युद्धों की कहानी अधिकांश लोगों ने कक्षा सात तक आते आते पढ़ ली थी। वीर अब्दुल हमीद की कहानी किसी किसी को याद थी। जुबानी परम्परा से भी बहुत कुछ जानकारी बन जाती थी। इसी से लोग चीन और पाकिस्तान की दुश्मनी को बिना सीधे अनुभव के भी जान गए थे। उनके साथ के बाकी संबंधों को नहीं जानते थे। वाणिज्यिक संबंध को तो एकदम नहीं। बल्कि कोई समझाने की कोशिश करे तो मुँह बाये खड़े रह जाते कि भला इतनी दुश्मनी और लड़ाई के बाद भी व्यापार संबंध कैसे बना रह गया है!! इसके गणित में सब लोग प्रवेश नहीं कर पाते। इसलिए विचार में भी खास तवज्जो नहीं दे पाते। बहरहाल कुछ लोग युद्धों के बारे में बड़े दहशतनाक तरीके से बताने लगते मानो उनका आंखों देखा वाकया हो! कुछ लोग कम दहशतनाक तरीके से बताते। जो लोग सरकार, व्यवस्था, शासन, नेता वगैरह को हरदम गरियाते रहते, वे भी युद्ध की बात करते हुए कुछ कुछ दहशत में गूंथ सान कर शब्द उचारते। युद्ध की बात पर एकदम तटस्थ कोई नहीं रह पाता था। तटस्थ से तटस्थ आदमी भी बिना बोले जताये कान उधर ही लगा लेता था। उसके मन के भीतर भीतर कोई क्रिया प्रतिक्रिया घट जाती थी, जिसे कोई जान नहीं पाता था। इस तरह तटस्थ होने का अपराधी हो जाने से वह अपने मन के भीतर भीतर अपने को बचा ले जाता था। समाज के भीतर अपने को नहीं बचा पाता था। छिटका खड़ा होता था। ऐसा घर के बाहर और भीतर दोनों जगह हो रहा होता।

युद्धों के बीत जाने पर भी युद्ध नहीं बीतते थे।

महाभारत सब तरफ पसरी सच्चाई की तरह दमकता रहता था।

किंवदंतियों के बीत जाने पर भी वे बची रह जाती थीं।

संभावना में जीवन हरदम खदबदाता रहता था।

जीवन को महानता के अर्थ में नहीं देखा जाता था, तब भी यह सब कुछ यानी युद्धों से जुड़ा सब कुछ इतना महान लगता था कि उसमें सिर्फ इस देश का नागरिक होने भर से अपने को जोड़ कर देखना, एक अद्भुत भाव बन जाता था।

एक कहानी जरूर थी सबकी स्मृति में, पर वह किंवदंती के रूप में ज्यादा प्रचलित थी, कोई उसका गवाह होने की बात कबूल नहीं करता था। पर सुनाने वाले सब किसी गवाह के होने की बात करते थे। पैथोलॉजी सेंटर वाले डॉक्टर सुनयनधीर सारस्वत के घर की कहानी। उनकी बेटी वैशाली सारस्वत की शादी एक फौजी अफसर से तय हुई थी। सगाई की अँगूठी पहना दी गयी थी। पर शादी नहीं हो पाई। कोई कहता कि फौजी आया ही नहीं, कोई कहता कि आता कैसे? उसके आने से पहले ही वैशाली सारस्वत भाग गयी थीं। सगाई की अंगूठी पहने पहने भाग गयी थीं, इस पर हर कोई सहमत था। सगाई की अंगूठी क्यों नहीं उतार कर गयीं, इसके कारणों पर सब सहमत नहीं थे। अपने अपने हिसाब से सबके पास कारण थे। कोई कोई यहाँ तक कह देता था कि लड़की अपने कन्या जन्म में सगाई की अंगूठी एक ही बार पहनती है।

फिर मरे या जीये, अंगूठी नहीं उतरती!?!?!

उसके बाद उसका कुछ भी करना बेकार हो जाता है।

प्रेम करना भी!?!?!

प्रेम की व्यर्थता के इस तर्क पर लोग अपनी अपनी तरह के कारणों से होते हुए भी पँहुच जाते थे। इस पहुँचने के पीछे के भी कारण होते थे।

कारणों के पीछे लगातार एक भय तैरता रहता था।

दिखता नहीं था। लेकिन तैरता था। तैरते हुए सारे रेशे, फूल पत्ते, हवा, घास, ईंट पत्थर तक उससे ढक जाते थे। आदमी उसमें ढका हाँफता था।

हाँफता हुआ आदमी ‘रौता चैराहा ’ नाम के बाजार से गुजरता था। बाजार के बीच में कोई चौराहा नहीं था। सीधा लम्बा रास्ता था। लेकिन नाम में था। नाम में चैराहा था, यह लोगों की स्मृति से डिलीट हो चुका था।

लोग बाजार से गुजरते हुए एक बड़ी सफेद हवेली के सामने से भी गुजरते थे। यह हवेली पुरानी थी। शहर के बीच बाजार में जैसे कोई लटकता हुआ सफेद फव्वारा हो, उस तरह लटकी थी। बेबीलॉन का झूलता बाग इसे देख कर याद किया जा सकता था। पर लोग बहुत बचपन में रट्टा मार कर याद करने के कारण दुनिया के सभी आश्चर्यों को भूल गए थे।

केवल ताजमहल भर स्मृति में टिका बचा था। किसी किसी की स्मृति से वह भी गायब था। बहुत से लोग जानते तक नहीं थे कि वह दुनिया का एक आश्चर्य है!

डॉक्टर सुनयनधीर सारस्वत, पैथोलॉजी लैब अपने घर के बाहरी बारामदे में खुलने वाले कमरे में चलाते थे। उसी के आगे लोहे की नीले रंग से रंगी पट्टिका पर उनका नाम सफेद रंग के पेंट से अंग्रेजी में लिखा रहता। पढ़ने वाले लोग डॉक्टर एस. डी. सारस्वत तो पढ़ लेते थे लेकिन नीचे लिखी डिग्रियों और उनके संस्थानों को नहीं पढ़ते थे। अगर डॉक्टर साहब का इंतजार करते करते पढ़ भी जाते तो भी उनमें कोई भाव न जगता था कि कहाँ, कैसा, कौन सा संस्थान, कितना बड़ा, कितना छोटा? इससे उन्हें मतलब न था। यह कमरा इस शहर का एकमात्र पैथोलॉजी लैब था। लोग मल मूत्र की जाँच के लिए यहाँ आते रहते थे। भीड़ जैसी नहीं लगती थी। कम लोग आते। किसी गंभीर बीमारी में कभी कभी ही मौका पड़ता था। छोटी बीमारियों में लोग डॉक्टर के कहने के बावजूद कई दफे टाल जाते, जब तक कि डॉक्टर कोई ऐसी बात कह कर उन्हें डरा न देता, ऐसी बात, जो उनके पल्ले न पड़ती। तो, जो आता, उसे आध एक घंटा इंतजार करना पड़ता। इसलिए नहीं कि डॉक्टर साहब किसी काम में व्यस्त होते। बल्कि जब कोई आता तो डॉक्टर साहब तैयार होने लगते। नहाते, दाढ़ी बनाते, साफ कपड़े पहन कर, कुछ इत्र, फुलेल मल कर गमकते हुए निकलते। इस सब में कभी एक घंटा लग जाता, कभी एक आध काम कम होने से आधा घंटा ही लगता। बाहर बारामदे में बैठा आदमी पसीने से तर बतर हो रहा होता। माचिस की डिबिया में मल लिए या छोटी सी शीशी में मूत्र पकड़े परेशान सा बार बार बारामदे में लगी घड़ी देख रहा होता। यह घड़ी डॉक्टर साहब को किसी मरीज ने उपहार में दिया था और अनुरोध किया था कि इसे बाहर बारामदे में लगा दें, मरीजों को कुछ सुविधा हो जायेगी। घड़ी बारामदे में लग गयी थी। उसके बगल में एक कलेंडर भी लगा था। कलेंडर पिछले साल का था। कोई दुकान वाला दे गया था। इस साल दुकान वाले को काम नहीं पड़ा था। कलेंडर भी नहीं आया था। कलेंडर पर गणेश जी डिजायनर तरीके से बने थे। पता नहीं चलता था कि कोई मिठाई है या गणेश जी हैं। अंदाजे से लोग उसके साथ व्यवहार कर लेते। कोई शीश नवा लेता, कोई मिठाई समझ कर मंत्रमुग्ध आँखभर खा लेता। तभी डॉक्टर सारस्वत निकलते। उनके निकलने के पहले खुशबू का झोंका आता। इंतजार करता आदमी बिना उन्हें देखे ही उठ कर खड़ा हो जाता। डॉक्टर सारस्वत आ कर दरवाजा खोलते, अपनी टेबल, जिस पर शीशे का कवच उन्होंने लगा रखा था, उसके पीछे की कुर्सी पर बैठ जाते। बिना उनके बोले ही बारामदे का उठ कर खड़ा हुआ आदमी अंदर चला आता और आ कर उनके पास रखे स्टील के स्टूल पर बैठते हुए माचिस की डिबिया या शीशी, जो भी वह ले कर बैठने को था, बैठने की क्रिया के बीच में ही डॉक्टर साहब की तरफ बढ़ा देता। डॉक्टर उसे टेबल पर पड़ने के पहले ही थाम लेते। डॉक्टर के हाथ में दस्ताने नहीं होते। वे नंगे हाथों से ही उस शीशी या डिबिया को थामते। कम्पाउंडर भी उनके पास नहीं होता। उस छोटे कमरे में वे इधर उधर दो चार कदम चल कर अपने उस यंत्र तक पँहुचते, जिस पर यह सब कुछ जाँचा जाना था। वे एक पतली सी सींक जैसी सलाई से डिबिया के भीतर की चीज को छुआते, एकदम नाममात्र का और अपने यंत्र को खोल कर एक शीशे की प्लेट पर उसे रख देते। डिबिया बंद कर के वे उसे वापस कर देते। स्टील के स्टूल पर बैठा हुआ आदमी डिबिया वापस पा जाता। डिबिया फेंक देने की कोई जगह डॉक्टर के कमरे में नहीं थी। तब आदमी डिबिया थामे घर तक आता या डिबिया झोले में रख कर घर तक लाता। दोनों ही स्थिति में वह अपनी डिबिया अपने साथ लाता। कोई कोई इसमें भी चालाकी बरतता और डॉक्टर के लैब से निकलने के बाद सड़क पर कहीं या बाजार की भीड़ के बीच कहीं या जरा सा जहाँ सन्नाटा मिलें, डिबिया चुपके से गिरा देता। लोग इसे जान न पाते। या न जानने का भ्रम बनाये रखते। कचरा बीनने वाले बच्चे उसे कई बार अपने बोरे में भर कर उठा ले जाते।

उन्हीं डॉक्टर सारस्वत के घर का किस्सा चर्चा में था। उनकी लड़की वैशाली सगाई की अॅगूठी पहने पहने चली गयी थीं। फौजी का आना रूक गया था। उन्हीं डॉक्टर सारस्वत के घर में एक उनका लड़का था। लड़का सींक सलाई जैसा था। नाक लम्बी थी। कद भी लम्बा था। कोई कोई छः फीट का अंदाजा भी लगाता था। लड़के का नाम किसे याद रहता! डॉक्टर सारस्वत का लड़का है, इसी से सब उसे पहचानते थे। जबकि उसका नाम बड़े विचार के साथ सूरज के किसी पर्यायवाची को ले कर रखा गया था। दिनकर, दिवाकर, प्रभाकर, या शायद इससे अलग आदित्य। तो सूरज की पर्यायवाची के नाम वाला लड़का राजकीय कन्या इंटर कॉलेज के गेट के बायीं ओर खड़ा दिखता। जनश्रुति इस मामले में यह थी कि वह हमारी सीनियर निरूपमा दी को प्रेमपत्र भेजता है। रोज। स्कूल के इसी पते पर। रोज क्लास टीचर निरूपमा दी को बुलाती हैं। रोज एक स्पेशल लेक्चर उनके लिए होता है। रोज ही छुट्टी के वक्त डॉक्टर सारस्वत का लड़का गेट के बायीं ओर खड़ा दिखता। वह शायद बगल के राजकीय बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से आ जाता था। उसका खड़ा होना जनश्रुतियों की कल्पना में चार चाँद लगा देता। लोग और बातें भी सोचते। जैसे कि वह निरूपमा दी के साथ पिक्चर देखते रंगे हाथों पकड़ा गया था। फिर दोनों की बड़ी धुनाई हुई थी। कितनी धुनाई हुई थी, किसने पकड़ा था, क्या कर रहे थे उस वक्त दोनों? केवल हाथ पकड़े थे या कुछ और भी…..

सबकी कल्पना का रंग अपने अपने ढंग का होता। कोई ज्यादा धुनाई करवा देता, कोई उतनी नहीं करवाता, कोई कहता कि महाशय चार दिन खटिया से नहीं उठ पाये थे, कोई इसे एक ही दिन कहता। मुंडे मुंडे च मतिरभिन्नाः।

निरूपमा दी बैडमिंटन का रैकेट काँख में दबाए, एक कंधे पर स्कूल का बस्ता धरे, छुट्टी के समय, गेट से निकल कर, बांयीं तरफ के ठेले के पास खड़ी होतीं। ठेले से कभी मूंगफली खरादतीं, कभी बबलगम खरीदतीं, कभी कुछ नहीं खरीदतीं तो खरीदने का अभिनय करती खड़ी रहतीं। भीड़ धीरे धीरे छंट जाती। तब वे चल कर सूरज कुमार ; अब बस भी करिए ‘डॉक्टर सारस्वत का लड़का’ कहना। सूरज कुमार कहिए, चलेगा, के पास तक पँहुचतीं। फिर चुपचाप दोनों पैदल चलने लगते। इसी साथ चलने के दृश्य को आँख भर पीने के लिए लड़कियाँ छुट्टी में रिक्शा कर के घर नहीं जातीं। गेट से निकल कर इधर उधर छितरा जातीं। कुछ लोग पैदल चल कर आगे की किसी दुकान तक आते और वहीं रूक कर इंतजार करते। हम बहनें भी रूके और उस अद्भुत दृश्य का इंतजार करने लगे। देखते क्या हैं कि सामने उस पार की दुकान पर सोनपती बहनजी की लड़कियाँ भी खड़ी स्कूल के गेट की ओर देखे जा रही थीं।

‘ये भी रूकी हैं, आज इनका क्या होगा?’ हम लोगों ने मन ही मन सोचा।

‘हम भी रूके हैं, आज हमारा क्या होगा?’ यह नहीं सोचा। बस रूक गए।

सामने सड़क पर चलते, बतियाते सूरज कुमार और निरूपमा दी आ रहे थे। निरूपमा दी की घेर वाली आसमानी रंग की स्कर्ट हवा से हिल रही थी। सूरज कुमार कंधे पर एक बैग लादे थे। कभी उसे कंधे पर टांगते, कभी बाँह में लटका लेते। उनके लिए दुकानों पर खड़े, सड़क पर चलते लोग अनुपस्थित से थे। वे केवल एक दूसरे की बात सुनते थे, एक दूसरे की तरफ देखते थे। पता नही कौन सी बात थी, जिस पर वे हँस रहे थे! हँसते हुए एक दूसरे के कंधे से टकराते टकराते रह जाते या टकरा कर छू जाते या एक हथेली आगे करता, दूसरा उस पर ताली धर देता। निरूपमा दी बात बात में अपनी पोनीटेल चोटी हिलाती थीं। काँख में दबा रैकेट बतियाते हुए सामने हाथ में ले कर कुछ कहतीं। न जाने कौन सी बात पर सूरज कुमार ने निरूपमा दी की पोनीटेल छू ली थी। पोनीटेल छूते हुए कंधा भी छू गया था।

इस छू जाने से क्षण भर को वे भूल गए थे कि सड़क उनके नियमों से संचालित नहीं थी।

सड़क के जो नियम बनाए गए थे, उनसे भी सड़क संचालित नहीं थी।

तमाम गाड़ियाँ बिना किसी नियम के इधर उधर चल रही थीं।

दाँये बाँये की जरूरत गाड़ीवानों के हिसाब से तय होती थी।

पैदल वाले अगर इसकी चपेट में आ जाते तो यह गाड़ी से ज्यादा पैदल चलने वाले की गलती मानी जाती।

यह शहर का अघोषित सच था।

इसलिए जिस क्षण में सूरज कुमार सड़क को भूल गए थे, उसी क्षण में निरूपमा दी ने उन्हें बाँह से पकड़ कर खींचा था। इस अचानक के खिंचवा से सूरज कुमार का संतुलन पहले जैसा नहीं रह गया और उनके कंधे पर लदा बैग टेढ़ा हो कर बाँह पर झूल गया और वे टेढे हो कर निरूपमा दी पर गिरते हुए अपने को बचाने लगे। इस बचाने के बावजूद वे निरूपमा दी की छाती से छू गए।

यह छूना भी अचानक का छूना था।

इस अचानक के छूने में वे एक बार फिर सड़क को भूल गए। उन्हें बचपन में देखे अल्मोड़ा के पहाड़, बारिश और तितलियाँ याद आयीं। उन्होंने अपने को बचाना छोड़ दिया। तब निरूपमा दी ने उन्हें हल्का सा धक्का दे कर सीधा किया।

‘क्या कर रहे हो? सड़क है!’ शायद ऐसा कुछ कह कर सड़क का होना याद भी दिलाया। किसी ने सुना नहीं, बस, अंदाजा लगाया।

लेकिन इस अचानक के छू जाने से वे भी कुछ भूल गयीं थीं। कुछ रूकी, ठहरी सी।

यह छुअन कोई मामूली छुअन नहीं थी ।

इसका स्पंदन भी मामूली स्पंदन नहीं था।

इसने केवल निरूपमा दी या सूरज कुमार को स्पंदित नहीं किया था – फूल, पौधे, हवा, तितली, पृथ्वी का कण कण……

सामने दुकानों पर खड़ी लड़कियों……

किताबों की दुकानों पर खड़े लोगों….

साइकिल बनवाते लड़कों……

चाट, पकौड़े के ठेलों, खोमचों…..

मूंगफली के छिलकों, छिलकों के पीछे के ठोंगो….

जामुन की फलियों को सहेजे दोनों, पत्तलों…..

हम सब, सब हम को……..

जिसमें भी, जहाँ जहाँ तक भी ईश्वर की कल्पना की गयी थी, उस ईश्वर को स्पंदित किया था।

इस छुअन का वृत्त बड़ा था।

इस छुअन का विस्तार बड़ा था।

इस छुअन के वृत्त में मैं, हम, वो, वो तमाम….. घिर गए थे।

इस छुअन के वृत्त में शहर स्पंदित हो उठा था।

और उन्हें पता तक नहीं!

इस, इतने बड़े समुद्र का उमगना और सबको जलमग्न कर देना उन्हें पता नहीं!!

वे अपने में डूबे हैं!

सब उनके डूबने में डूबे हैं!

लगता है, वे गा रहे हैं!

लगता है, वे कोई बहुत मनोरम नृत्य रच रहे हैं!

हम, सब हम गीत की तन्मयता में डूबे हैं!

हम, सब हम नृत्य की विभोरता में मगन हैं!

दोनों चलते हुए कुम्हार की दुकान पर रूक गए और छोटा बड़ा गमला झुक कर देखने लगे। उनके गमले खरीदने के उपक्रम ने हमारी तन्मयता भंग कर दी। तमाम लड़कियाँ निराश हो गयीं। उनकी कल्पना में यह दृश्य चुभने लगा कि सूरज कुमार निरूपमा दी के साथ मिल कर मिट्टी के गमलों का मोल भाव करें! जब उन्होंने एक रिक्शा रोका और उस पर गमले रखवाने लगे तो हमने भी एक रिक्शा रोकने की कोशिश की। ठीक इसी क्षण सामने की लड़कियों ने भी रिक्शा रोकने की कोशिश की। रिक्शा रोकते हुए हम गमलों को देख रहे थे। गमलों से होते हुए हम सूरज कुमार और निरूपमा दी को देख रहे थे। तभी सामने के रिक्शे पर बैठते बैठते सोनपती बहनजी की बड़ी लड़की गिर गयी। गिरते हुए उसने अपने को संभाला, फिर भी पैर में कुछ चोट आ गयी। उसकी छोटी बहन ने उसका सलवार हल्का सा उठा कर चोट देखने की कोशिश की। पैर पर कई जगह माचिस की तीली के निशान थे। बहन ने चोट देखने का प्रयास छोड़ दिया और रिक्शे पर बैठ गयी। इसी बीच आगे वाले रिक्शे से एक मोटर साइकिल आ कर टकरा गयी। उस पर निरूपमा दी पाँच गमले रखे बैठी थीं। निरूपमा दी तो बच गयी, पर गमले ढमलाते हुए गिर गए और खंड खंड हो गए। मोटर साइकिल सवार उतर गया और प्रार्थना के स्वर में कहने लगा-‘‘ माफ कर दो जी। अभी दूसरे खरीद देता हूँ।’’ रिक्शे वाले को मुड़ने का इशारा कर के वह पीछे छूट गयी गमलों की दुकान की ओर भागा। इतने में पीछे से सूरज कुमार दौड़े और गमलों के टूटे हुए टुकड़े उठा कर कुछ कहने लगे। निरूपमा दी ने उन्हें हाथ के इशारे से कहा-‘सब ठीक है।’ इस तरह अचानक गमलों के बीच एक खलनायक के आ जाने से रोचकता बढ़ गयी थी और उस एक क्षण सबने चाहा था कि उनका उनका रिक्शा आगे न बढ़े, वहीं रूक जाए। सूरज कुमार के पीछे। यह भी कि सब लोग अपने रिक्शे पर पाँच  पाँच गमले लदवा कर ले चलें। काश! सूरज कुमार से निकल कर कई सूरज कुमार बन जाते और सबके रिक्शे पर गमलों का मोल भाव कर के गमले रखवा देते!

 

नगर के चौक पर नाटक का रिहर्सल

‘ गोरकी पतरकी रे……मारे गुललवा कि जियरा उड़ि उड़ि जाय…….’

फिल्म का यह गीत परम प्रसिद्धि पर चल रहा था। महिला डिग्री कॉलेज से लडकियाँ निकलतीं तो कोई न कोई, कहीं न कहीं से यही गाता और उसकी कंठ ध्वनि से निकला यह गीत लड़कियों के कान से जरूर टकराता। निरूपमा दी के पीछे चलते हुए कई लड़के ये गीत गाते। आपको यहाँ यह बताते चलूं कि सूरज कुमार को बहला फुसला कर दिल्ली पढ़ने भेज दिया गया था, लेकिन निरूपमा दी के लिए महिला डिग्री कॉलेज ही एक मात्र विकल्प था। वे इसके अलावा और कहीं नहीं हो सकती थीं। उनकी प्रसिद्धि सूरज कुमार के साथ जुड़ चुकी थी। इसलिए कई मनचले उनके पीछे मद्धिम स्वर में यह भी कहते-‘ चमक रहा है तेज तुम्हारा बन कर लाल सूर्य मंडल’ या फिर ‘सजनी हमहूं राजकुमार’ या फिर ‘इक नजर तेरी मेरे मसीहा काफी है उम्र भर के लिए… ’ आदि आदि। निरूपमा दी सिर झुकाये तेज चलतीं। लड़के भी तेज चलते। वे दौड़ने लगतीं। लड़के भी दौड़ने लगते। तब वे एक दुकान की सीढ़ी पर बैठ कर सुस्ताने लगतीं। लड़के दुकान के आस पास खड़े हो कर कोई और गाना गाने लगते। कोई कोई एकदम पास चला आता। एक दिन लड़कों ने गाना गाते हुए उन्हें दुकान के पास घेर लिया। उस दिन निरूपमा दी ने अपना रैकेट काँख से निकाल कर तान दिया। लड़के इससे और हुलस उठे। वे बढ़ चढ़ कर गाते और और चारों ओर घूमते। निरूपमा दी भी रैकेट ताने ताने घूमतीं। एक ने घूमते हुए उनका रैकेट खींच लिया। एक ने उनकी बाँह पकड़ ली। निरूपमा दी हाथ झटकती, चिल्लाती, न जाने क्या कहे जा रही थीं। दुकान वाला दुकान से उधर ही देख रहा था। वह डर कर पास नहीं आया। तभी उस नामुराद वक्त में निरूपमा दी का बड़ा भाई उधर से गुजरा। उसने दौड़ कर एक लड़के को खींचा। किसी की कॉलर पकड़ी, किसी को थप्पड़ मारा। लड़के भी बेल्ट, जूता, बैग… जो मिला ले कर युद्ध में उतर गए। निरूपमा दी को थोड़ा सा मौका मिला तो वे अपना तोड़ कर गिरा दिया गया रैकेट ले कर भाई की तरफ से भांजने लगीं । तभी उनमें से किसी लड़के ने सड़क पर पड़ा ईटे का अद्धा उठा कर निरूपमा दी के भाई पर उछाल दिया। अद्धा उछल कर उसके कपाल के बीचोंबीच लगा। निरूपमा दी का भाई बिना चक्कर खाये एकदम धड़ाम से नाचे गिर गया। अद्धा छिटक कर बगल में गिरा। लड़के चिल्लाते हर्षनिनाद करते भागे। दुकान वाला पास आ कर ‘हाय हाय’ मचाने लगा। ‘कानून का पचड़ा पड़ गया’ जैसी आवाज निरूपमा दी के कान में गिरी। वे दौड़ का दुकान में घुसीं और फोन लगाने लगीं। 100 नंबर पर पुलिस वाले फोन नहीं उठा रहे थे। तब उन्होंने चिल्ला कर कहा-‘‘ कोई अस्पताल ले चलो रे!’’

‘‘ऐ, हटो हटो, जाओ सामने वाली दुकान से पुलिस को बुलाओ! मुझे पुलिस के चक्कर में न फँसाओ!’’ दुकान वाले ने निरूपमा दी को फोन पर से हटाते हुए कहा।

अस्पताल से कोई गाड़ी या ऐम्बुलेंस बुला लेने की कोई व्यवस्था उस शहर में नहीं थी। नतीजा निरूपमा दी सड़क पर आ कर, आने जाने वालों से विनती करने लगीं-‘‘ प्लीज रूकिए, मेरी मदद करिए। अरे कोई मदद करो रे। अस्पताल ले चलो।’’

वे दौड़ दौड़ कर चलती गाड़ियों की तरफ जातीं और चिल्लातीं।

तभी पुलिस का एक हवलदार, आँखों पर किसी फिल्म के हीरो की नकल में काला चश्मा लगाये, मोटरसाइकिल का हार्न लगातार बजाता, शायद कुछ गुनगुनाता हुआ भी गुजरा। सड़क पर हल्ला गुल्ला देख कर रूक गया।

‘‘ऐ, हे, इधर आ! क्या हुआ बे?’’ उसने मोटरसाइकिल पर बैठे बैठे दुकानवाले को बुलाया। दुकानदार से पहले निरूपमा दी दौड़ीं। जल्दी जल्दी एक बेहद परेशान भाषा में सारी घटना बताने लगीं। थरथराती हुई बेचैन भाषा के जल से कुछ ही छींटे हवलदार की भाषा के जल से मैच कर पाए। उसने लड़कों के छेड़छाड़ वाली बात समझ ली और निरूपमा दी के भाई को देख कर कुछ शब्द उससे मिला कर जान लिया कि एक युद्ध अभी अभी बीता था। जिसमें लड़ाई के दौरान घायल एक सैनिक यहाँ पड़ा है। उसने धीमे शब्दों में कुछ उचारा, जो समझ में नहीं आया कि गुस्से में दी गई गाली थी या गुस्से में की गई प्रार्थना थी!! खैर, सारी बात जान कर हवलदार ने मोटरसाइकिल पर बैठे बैठे दुकानदार से कहा-‘‘ चल बे, इसे उठा कर मेरे पीछे बैठ। अस्पताल ले चलते हैं। थामे रहियो। कहीं रास्ते में मर मरा न जाए।’’ यह ‘मर मरा न जाए’ वाली बात निरूपमा दी को चुभी लेकिन वक्त ऐसा नहीं था कि कुछ कहा जाए। वे चुपचाप हवलदार की बात मानने लगीं। दुकानदार ‘मरता क्या न करता’ की स्थिति में मोटरसाइकिल पर निरूपमा दी के भाई को पकड़ कर किसी तरह बैठा। निरूपमा दी के भाई को चक्कर आते, बेहोशी घेरती, वह कभी इधर लुढ़कने को होता, कभी उधर। दुकानदार भरसक सीधा रखने की कोशिश करता, तब हवलदार गरजता-‘‘मुझे मारने पे तुला है क्या रे? एक्सीडेंट करवाया तो तू भी दफा फलां फलां में अंदर जाएगा, समझा। संभार रे, नहीं अब्बे उतर के तेरा भुर्ता बनाता हूँ । ’’

हवलदार सरकारी अस्पताल में बैठ कर कुछ कागज देखने लगा। ऐसा लगा कि वह कोई कागजी कार्यवाही कर रहा हो। तब निरूपमा दी अपनी माँ और छोटी बहन को साथ लिए पँहुचीं। पिता गोरखपुर से अब तक नहीं आए थे। अस्पताल में दोपहर के उस वक्त कोई डॉक्टर भी नहीं था। सब खाना खाने अपने अपने घर गए हुए थे। बार्ड ब्वाय जैसा लगने वाला एक लड़का हवाई चप्पल पहने इधर उधर घूम रहा था। जब हवलदार ने उसे आवाज दिया तब वह दौड़ा। लेकिन घायल को ले जाने वाला स्ट्रेचर उसके पास नहीं था।

‘‘टांग के ले जाओगे क्या बे?’’

‘‘साहब गाड़ी में जगह जगह छेद हो गया है। टूट टाट के सड़ गयी है। बरसात में बाहर पड़ी रही न।’’

‘‘ठीक है, ठीक है।’’ हवलदार ने दुकानदार को इशारा किया।

दुकानदार बहुत मजबूर हो कर उस बार्ड ब्वाय के साथ मिलकर निरूपमा दी के थाई को टांगते हुए अंदर ले आया। बार्ड ब्वाय मरहम पट्टी में जुट गया।

‘‘डॉक्टर कब तक आयेंगे?’’ निरूपमा दी ने पूछा।

‘‘पता नहीं जी।’’ बार्ड ब्वाॅय निर्लिप्त रहा।

‘‘फिर भी कुछ अंदाज होगा आपको कि कब तक आएंगे?’’ निरूपमा दी ने फिर पूछा।

बार्ड ब्वाय ने फिर भी जवाब देने की जरूरत नहीं समझी।

‘‘आप ठीक तो कर रहे हैं? मतलब आपको पता है? नहीं तो गोरखपुर लेते जाते।’’ अब निरूपमा दी ने थोड़ा बल दे कर कहा।

‘‘सबका हमीं तो करते हैं, तब आप देखने आती हैं? हम न करें तो आधे लोग यहीं मर जायें। ऐसे ही ले जाओगी तो ले जाओ। गोरखपुर तक जाते जाते मर जायेगा। समझी। अब जाओ, अपनी अम्मां को संभालो।’’ बार्ड ब्वाय ने गुस्सा कर कहा।

निरूपमा दी को ‘यहीं मर जाने’ और ‘गोरखपुर तक ले जाते ले जाते मर जाने’ वाली बात फिर चुभी। कैसे ये लोग मरने की बात इतनी निर्लिप्तता से कर रहे थे!

‘‘सिर पर चोट लगी है, इसीलिए चिंता है।’’ निरूपमा दी ने नरम पड़ कर कहा।

‘डॉक्टर आयेंगे तो उन्हें जरूर एक बार दिखा देंगी, जरूरत लगी तो ले कर गोरखपुर चली जायेंगी’ ऐसा सोचते हुए निरूपमा दी अपनी माँ के पास पँहुची और बिना बोले उनका हाथ थपक थपक कर ढाढस बंधाने लगीं कि सब्र करो, सब ठीक हो जायेगा। फिर डॉक्टर का इंतजार करते हुए वहीं जमीन पर बैठ कर हल्का हल्का रोने लगीं।

यही वह समय था, जब हवलदार ने सारे मनचले लड़कों को पकड़ कर थाने में पीटने का अभियान चला दिया। पुलिस की गाड़ी, पुलिस की ट्रक धड़धड़ाते हुए सड़कों पर घूमने लगी। जिसकी भी मोटरसाइकिल दुकानों के आगे खड़ी मिली, लाद ली गयी, स्कूटर उठा ली गयी। लाठी भांजते पुलिस वाले पान की दुकानों, एस. ई. डी. बूथों, मोबाइल फोन की दुकानों पर से लड़कों को उठा उठा कर ट्र्क में ठूंसा जाने लगा। इसी क्रम में अद्धा फेंक कर मारने वाले लड़के भी पकड़े गए। वे बड़े इत्मीनान से पान की दुकान पर खड़े पान मसाला चबा रहे थे और किसी ब्लू फिल्म की कहानी पर बहस छेड़े थे। वे लड़के भी ट्र्क में ठूंस कर थाने लाए गए।

इसी के बाद पर्दा गिर गया।

पर्दे के पीछे नगरपालिका के चेयरमैन ठाकुर बलवान सिंह बेचैन हो उठे। उन्होंने घोषणा की कि ‘‘ नगर के इसी चौराहे पर सबके सामने हवलदार को अपने हाथों से न पीटा तो मेरा नाम भी बलवान सिंह नहीं। हमारे लड़के छूने की हिम्मत किया है!’’

अँधेरा घिरने घिरने को होने लगा। नगर के चौराहे पर थाने के बाहर जितनी भीड़ थी, उससे ज्यादा भीड़ उमड़ने लगी। लड़के थाने में छटपटाने लगे। कुछ कह रहे थे कि जिसका कसूर है भइ, उसे सजा दो, सबको क्यों बंधक बना कर रखा है? कुछ कह रहे थे अच्छा जेल बना दिया है शहर को! कुछ का मानना था कि टेरर बना के कुछ लाभ कमाना होगा, ऐंठने होंगे पैसे किसी से, तो पूरा शहर निशाने पर आयेगा ही। पढ़ने वाले कुछ लड़के थे जो बिना कसूर जेल यात्रा का ठप्पा लग जाने से व्यथित हो कर रो रहे थे। अभिभावक थाने के आगे इकट्ठा हो कर तरह तरह की बातें कर रहे थे।

अँधेरा गहरा काला हो जाए, इससे पहले लोगों ने देखा कि नगर के मुख्य चैराहे की तरफ पुलिस की जीप चली आ रही है। पीछे दो कार हैं। जीप के रूकते ही उसके पीछे कार भी रूकी और झपाके से उनमें से उतर कर कई लोग बंदूक, कट्टा, लाठी, हॉकी, बल्लम ले कर खड़े हो गए। तब पुलिस की जीप खुली। उसमें से खींच कर हवलदार को उतारा गया। उसी जीप से सबसे आखिर में ठाकुर बलवान सिंह उतरे। उतर कर खड़े हो गए। तब नाटक शुरू हुआ। हथियार बंद लोग कूद कूद कर, उछल उछल कर हवलदार को तरह तरह से पीटने लगे। जब हवलदार जमीन पर पूरा चित्त गिर कर तड़पने लगा, तब चेयरमैन ठाकुर बलवान सिंह ने अपनी तोंद पर हाथ फेर कर अपनी बेल्ट उतारी और हँस कर कहा-‘‘ हमारे लल्ला को छूने चले थे। तेरा क्या बिगाड़ रहा था बे? चलो, अब हम तोहें नाटक का रिहर्सल करा देते हैं।’’ इसके बाद सटासट आठ दस बेल्ट मारा और मुड़ कर गाड़ी में आ कर बैठते हुए चिल्लाए-‘‘ उठाओ साले को। थाने छोड़ आओ। बोल देना सबेरे चार बजे से पहले नगर छोड़ के चला जावे। दिन में इसका मुँह न दिखाई पड़े।’’

हवलदार को लहूलुहान हालत में पुलिस की जीप में लादा गया और थाने के बारामदे में उतार कर लिटा दिया गया। दो तीन लोगों ने आगे बढ़ कर थाने का लॉकअप खूलवा दिया। लोग अपना अपना लड़का ले कर अपने अपने ठिकानों की तरफ जाने लगे। बचे हुए लड़के, जिनके बाप नहीं आये थे, पैदल चल कर या रिक्शा कर के अपने घर की ओर चले। कुछ लोग कहते जाते थे कि आज ठाकुर बलवान सिंह ने हमें बचा लिया। कुछ लोग ‘ठाकुर साहब की जय’ भी बोलते जाते थे।बाकी लोग सहमे से चले गए। थाने में पुलिसवालों ने हवलदार को फिर से उसी जीप में डाला और ले कर उसी सरकारी अस्पताल में पहुँचे, जिसमें दोपहर के वक्त निरूपमा दी का भाई लाया गया था।

निरूपमा दी अस्पताल के बारामदे में बैठी हल्का हल्का रो रही थीं। उसी समय हवलदार को लादे फांदे पुलिस वाले आवाजें करते, हड़बड़ाते हुए घुसे। हवलदार को इस हालत में देख कर वहाँ के सभी लोग भौंचक खड़े हो गए।

‘‘क्या हुआ साहब को?’’ निरूपमा दी की माँ ने घबड़ा कर पूछा।

‘‘अपनी हीरोइन से पूछो। इश्क ये करे और लात हम खायें। चलो, निकलो यहाँ से। नहीं तो गुस्सा आ जायेगा हमें।’’ पुलिसवाले ने गुस्सा कर कहा और बार्ड ब्वाय को स्ट्रेचर लाने को कहने लगा।

‘‘अच्छा तो यही है!’’ दूसरे पुलिस वाले ने निरूपमा दी की तरफ देख कर कहा।

‘‘साहब गाड़ी नहीं है। सड़ गयी है। बाहर बरसात में पड़ी रहती है।’’ बार्ड ब्वाय ने अपना वही पहले वाला जवाब दिया।

पुलिस वाले का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। उसने बार्ड ब्वाय का लाल रंग का टी शर्ट पकड़ कर खींचा और गरियाते हुए लतियाने लगा।

‘‘साहब, हमारी गलती नहीं है। उसमें छेद हो गया है। खराब हो गयी है।’’ लेकिन उसकी एक न सुनी गयी।

‘‘अब तू भी आँख  दिखायेगा! हाँ !’’ कह कर पुलिस वाले ने उस बहुत पिट चुके को वहीं छोड़ दिया और हवलदार को टांग कर अंदर ले जाने लगे। तब डॉक्टर जाने किस खोह से निकल कर आए। डॉक्टर ने निरूपमा दी को इशारे से बुलाया और पुलिस वालों के साथ चलने लगे।

डॉक्टर ने निरूपमा दी को एक पर्ची दी और एक खून भरी शीशी और कहा कि डॉक्टर सारस्वत के पैथोलॉजी लैब से ब्लड टेस्ट करवा कर लाओ। तुरंत जाओ। देर करने से डॉक्टर साहब सो जायेंगे। निरूपमा दी तुरंत अपनी छोटी बहन के साथ रिक्शे पर शीशी और पर्ची ले कर बैठ गयीं। रिक्शे के पास आ कर उनकी माँ ने कुछ रूपये उनके हाथ में पकड़ाये। रूपये हाथ में पकड़े पकड़े वे पैथोलॉजी सेंटर पॅहुचीं। दरवाजे की घंटी बजा कर बारामदे में लगी घड़ी देखते हुए इंतजार करने लगीं। आधे घंटे से पहले ही डॉक्टर सारस्वत बाहर आ गए। उनके आने के पहले सुगंध का झोंका नहीं आया या आया भी होगा तो निरूपमा दी अपने आप में इतनी परेशान थीं कि जान नहीं पाईं और उनके आने के पहले उठ कर खड़ी नहीं हुईं।

‘‘ऐ लड़की, क्या है?’’ डॉक्टर ने टेंशन में पूछा।

‘‘डॉक्टर साहब, ब्लड टेस्ट करवाना था। बहुत जरूरी है।’’ निरूपमा दी घूम कर डॉक्टर के सामने खड़ी हुयीं। अब डॉक्टर ने उन्हें साफ साफ देखा। अचानक ही उन्हें सूरज कुमार की बड़ी बड़ी सपनीली आँखें याद आयीं।

‘‘तो तुम हो? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की? हैं, भागो यहाँ से! पूरे शहर में हंगामा खड़ा कर दिया है तुमने! किस किस से इश्क लड़ाती फिर रही है तू लड़की? मेरे लड़के की मोटर साइकिल आज तेरे चक्कर में पुलिस वाले उठा कर ले गए। वो तो कहो लड़का पकड़ में नहीं आया। जिसको जहाँ पाया, वहीं मारा है। कुछ लड़कों की तो पसली तक टूट गयी है। भगवान बचा लिए। लेकिन मोटर साइकिल तो फँस गयी न! एक झमेला! सुबह कौन जाएगा लाने? हैं, तू खड़ी है यहाँ ? चल, भाग!’’ डॉक्टर सारस्वत ने दरवाजा बंद कर लिया। निरूपमा दी कुछ देर तक दरवाजा खटखटाती रहीं, गिड़गिड़ाती रहीं। फिर हताश हो कर बहन को ले कर मुड़ी और बारामदे की सीढ़ियां उतरते हुए गेट की तरफ आने लगीं। तभी डॉक्टर सारस्वत ने दरवाजा खोल दिया।

‘‘ऐ लड़की! इधर आ! क्या बोल रही थी?’’

निरूपमा दी दौड़ कर आयीं-‘‘जी, ब्लड टेस्ट, बहुत जरूरी है।’’  उन्होंने आँसू पोंछ पोंछ कर सब बात कही।

‘‘लाओ!’’ डॉक्टर सारस्वत अपनी कुर्सी पर बैठ गए।

‘‘एक शर्त है मेरी। मानोगी?’’ उन्होंने फुसफुसा कर निरूपमा दी के कान में कुछ कहा।

‘‘ जी, मैं शहर छोड़ दूंगी। बस, मेरा भाई ठीक हो जाए।’’ निरूपमा दी ने फिर से आँसू पोंछा और सिर हिलाया। फिर डॉक्टर सारस्वत अपनी कुर्सी से शीशी लिए उठे और दो चार कदम चल कर अपने यंत्र की तरफ चले गए।

 

समय था, जो आग से आपूरित होता हुआ था, लगता नहीं था

 

वैशाली सारस्वत, वैशाली चड्ढा बन कर अदृश्य हो गयी थीं। शहर में जहाँ देखो, तहाँ चर्चा थी। स्कूल में लड़कियों को अलग अलग अध्यापिकाओं ने अलग अलग तरह से खबरदार किया था। अदृश्य चड्ढाओं से होने वाले नुकसान एकदम दृश्य हो उठे थे। किसी को ठीक पता नहीं था कि वैशाली को चड्ढा लड़के से क्या नुकसान हुआ था ? लेकिन सबके पास अलग तरह की कथाएं थीं। लोगों ने मान लिया था कि नुकसान तय था। इसमें देर सबेर हो सकती थी। लड़कियाँ हैरान परेशान थीं। वे वैशाली चड्ढा की तरफ भी उतना ही होना चाहती थीं, जितना अपने परिवार की तरफ। इसी में डोलती वे इधर और उधर आ जा रही थीं। सोनपती बहनजी ने उस रोज माचिस की तीली से अपनी चारों लड़कियों के पैर पर बिंदी लगाई थी और कसम रखवाई थी कि कोई कितना भी दिलकश नौजवान आ कर उन्हें कैसा भी झांसा दे, उन्हें इस चक्कर में नहीं आना है। लड़कियों ने हामी भरी थी। इसके अलावा पैर पर बिंदी लगवाने से बचने का कोई उपाय भी नहीं था। उस दिन के बाद से जो सुबह आई थी, वह सोनपती बहनजी की चिंता में लड़कियों की शादी की जल्दी ले कर आई थी। सबको अचानक चारों तरफ युवा लड़के चालाक और बहलाने, फुसलाने वाले बहेलिए लगने लगे थे। लड़कियाँ किसी लड़के के साथ भागने की फिराक में रहने वाली दुश्चरित्राएं बन कर डराने लगी थीं। जिनके घरों में लड़के थे, वे सतर्क हो कर अपने अपने लड़कों को वैशालियों के दोष गिना गिना कर आजिज किए हुए थे। इस तरह लड़का और लड़की दोनों ही अचानक कसूरवार की तरह दिखने लगे थे।

इसी माहौल में वह खत खून से लिखा गया, जिसे लिखने के लिए निरूपमा दी ने अपनी तर्जनी अँगुली में सूई चुभो चुभो कर खून निकाला था और उसे पेंसिल की निब पर रख रख कर अक्षर बनाए थे। खत में खुद को वैशाली की जगह रखने की और सूरज कुमार को चड्ढा की जगह रखने की इच्छा जताई गयी थी। रामचरित मानस में जैसे सीता ने हनुमान से राम के आने की महीने भर की तिथि निर्धारित की थी, उसी प्रकार खत में महीने भर का समय निर्धारित किया गया था। उधर सोनपती बहनजी भी मास दिवस निर्धारित कर रही थीं। जुलाई के महीने में पहली लगन पर निबटा देंगी बड़ी को। कुछ तैयारियाँ भी शुरू हुई थीं। कुछ साड़ियों पर फाॅल लगाने का काम हमारे घर भी आया था। कुछ बेल बूटे काढ़े जाने लगे थे। किसके घर ढोलक मिलेगी? खोज होने लगी थी। सोनपती बहनजी स्कूल के संगीत कक्ष का हारमोनियम उठा लाई थीं। असल में संगीत कक्ष जैसा कुछ था नहीं। कभी काल्पनिक संगीत कक्ष के नाम पर हारमोनियम और ढोलक मँगाया गया था। ढोलक बी.एस.ए. के घर पर रह गयी थी। हारमोनियम स्कूल के एक कोने में पड़ा ऊँघता रहता था। उस पर मिट्टी की कई परत जम गयी थी। उसी हारमोनियम को उठा कर लाया गया था। उसे गीले कपड़े से पोंछ पोछ कर चमकाया गया था। फिर उनकी किसी लड़की ने गिटर पिटर कर के उसे छेड़ा। बड़ी अजीब सी ‘चें…चें…में….में….’ की धुन निकली। तब फलाने मास्टर की लड़की को बुलाया गया। लड़की ने संगीत की कुछ पढ़ाई की थी। लड़की ने स…रे…ग…म…. बजा कर दिखाया। कोई भी गीत चलता, वह स….रे….ग…म… बजाती रहती। हारमोनियम के इस सदुपयोग पर सब लोग खुश हुए। सोनपती बहनजी चहकीं और अपनी बड़ी लड़की के सिर पर पहली बार प्यार से हाथ फेरने लगीं। बड़ी लड़की इस अचानक के दुलार से चकरा गयी और जड़वत खड़ी रही। लड़की के सिर पर हाथ फेरते फेरते सोनपती बहनजी रो पड़ीं। लड़की तब भी जड़वत खड़ी रही। तब उन्हें अपनी भारी भूल का अहसास हुआ। उन्होंने आँसू पोंछ कर कहा-‘‘ अंदर जाओ!’’ लड़की ने राहत की सांस ली और अंदर चली गयी। अंदर उसे एक गंदा सा सलवार कुर्ता पहनने को कहा गया। फिर हल्दी लगाने की रस्म शुरू हुई। हल्दी लगाते समय एक दिन गहरी सांस ले कर बड़ी लड़की ने अपनी दोस्त से कहा, जो उसके पैरों में हल्दी पोतते हुए हँस रही थी।

‘‘ऐसे लड़के मिलते कहाँ हैं?’’

‘‘कैसे?’’ दोस्त ने हल्दी लगाना और हँसना रोक कर पूछा।

‘‘वैशाली के चड्ढा जैसे।’’ बड़ी लड़की ने धीरे से कहा।

‘‘पता नहीं।’’

दोस्त एकदम निर्लिप्त सी लगने लगी। लेकिन अगले ही क्षण वह उठी और अपने घर चली गयी। बड़ी लड़की इससे जरा भी हैरान नहीं हुई।

फिर शादी का दिन आया। खूब धूमधाम मच गयी। लोग आने लगे। यहाँ तक कि वे रिश्तेदार भी आए, जो वर्षों पहले बेगाने हो चुके थे। सोनपती बहनजी ने उन्हें ढूंढ ढूंढ कर चिट्ठी लिखी थी और खास बुलावा भेजा था। वे दिखाना चाहती थीं कि उनकी मदद के बिना भी वे कहाँ तक पहुँच गयी हैं! लड़की की शादी कर ले रही हैं! रिश्तेदार आए थे और लाख जलन के बावजूद अपनी खुशी प्रदर्शित कर रहे थे। वे न्यौता सौंपने के बाद पूरे अधिकार भाव से अपनी जिम्मेदारी समझ कर काम धाम में जुट गए थे। लगता ही नहीं था कि वे वर्षों बाद मिल रहे हैं। बल्कि आज के उनके अवतार को देख कर कोई यकीन भी नहीं कर सकता था कि इन्हीं लोगों ने सोनपती बहनजी की कभी बड़ी दुर्दशा की थी। मीन मेख निकालने वाले भी दो एक थे, पर बाकी लोग मामला संभाल लेते थे। एक रिश्तेदार शामियाने में एक तरफ कुर्सी खींच कर बैठ गए थे। वे न्यौता का हिसाब लिख रहे थे। उनके पास एक पतली सी कॉपी थी, जिस पर वे न्यौते की रकम नोट करते जाते थे और अपने बगल के झोले में रूपये का लिफाफा रखते जाते थे। कुछ लोग आ कर सीधे अपना न्यौता सोनपती बहनजी को सौंप चुके थे। धीरे धीरे लोगों को यह व्यवस्था पता चली। तब वे सोनपती बहनजी को छोड़ कर न्यौता लिखने वाले आदमी के पास अपना अपना न्यौता लिखवाने दौड़े। जो लोग पहले ही अपना न्यौता सोनपती बहनजी को सौंप चुके थे, वे भी कॉपी में अपना नाम लिखवाने दौड़े। लिखवा देना एक पक्का सबूत था। लोग दिए न्यौते का सबूत रखना चाहते थे। वे लोग लिखने वाले आदमी से कहते -‘‘ इक्यावन रूपये के बगल में लिख दो, सोनपती बहनजी को दिए।’ लिखने वाला लिख देता। लोग निश्चिंत हो कर बारात के आने का इंतजार करने लगते।

‘बारात बस आ ही रही है’ यही सुनने को मिल रहा था। कोई कहता गाँव से निकल चुकी है। घंटा भर लगेगा। कोई कहता सीवान तक पहुँच गयी है। कोई यह भी कह देता कि कितनी दूर है ही, चलती तो पहुँच न गयी होती अब तक? जरा फोन लगा के पूछो तो, क्या खबर है? इस तरह सोनपती बहनजी लगातार फोन लगा कर पूछने की कोशिश करतीं। मगर नेटवर्क हल्का सा पकड़ में आता कि चला जाता। ‘गाँव में वहाँ थोड़ा नेटवर्क की दिक्कत है’ वे परिचितों और रिश्तेदारों से कहतीं। इस तरह जब रात के ग्यारह बज गए तब सोनपती बहनजी का धैर्य टूट गया। वे चिंता में अपने रिश्तेदारों से कहने लगी कि दो लोग दूल्हे के गाँव की तरफ निकल जाएं, बारात रास्ते में कहीं पहुँची होगी तो भी पता लग जायेगा या कि कोई दिक्कत होगी तो वह भी। लेकिन रिश्तेदार कह रहे थे कि इसमें रात और मुहूर्त दोनों निकल जाएगा। न्यौता लिखने वाला आदमी हल्का हल्का मुस्करा रहा था और बार बार कॉफी मँगवा कर पी रहा था। सोनपती बहनजी मोबाइल घुमाए जा रही थीं। लगातार प्रयास में लगी थीं। मगर फोन लगता ही नहीं था। बेकार गया आज फोन का होना। उधर से कुछ खबर नहीं आ रही थी। कहाँ तो लगा था कि मोबाइल से हर पल की खबर मिलती रहेगी ! जहाँ पहुँचेंगे अपने खेमे के भीतर, तुरंत एक आदमी मिठाई, कोल्ड ड्रिंक ले कर दौड़ जाएगा। कहाँ कुछ अंदाजा ही नहीं हो रहा ? जितने मुँह, उतनी बातें शुरू हो गयी। किसी ने यह भी पूछ लिया कि सब ठीक से तय तो किया था? मामला पैसों पर तो नहीं अटका है? तभी दूल्हे के घर से चार लोग पहुँच आए। खबर मिलते सोनपती बहनजी दौड़ कर आयीं। वे लोग हाथ जोड़ कर बड़े दुख के साथ कहने लगे-‘‘ बहनजी, आप तो जानती ही हैं कि लड़का फौज में है। पाकिस्तान सीमा पर है। ऐन वक्त पर अफसरों ने उसकी छुट्टी कैंसल कर दी। उधर से निकल ही नहीं पाया। उधर कुछ आतंकवादी घुस आए हैं, लड़ाई चल रही है। हमें, आपको क्या पता कि वहाँ जब तब लड़ाई छिड़ी रह रही है। सीमा पर यही तो आफत है। हम लोग भी राह देखते देखते थक गए। वहाँ फोन भी नहीं लगता। हम कर नहीं सकते। उसके लिए भी मुश्किल है। नहीं तो कब का पता चल गया होता। सीमा का मामला है। हमलोग भी इसमें कुछ नहीं कर सकते। जैसे खबर मिली है, दौड़े चले आ रहे हैं। रास्ते भर फोन लगाते रहै, आपका फोन कभी व्यस्त आवें तो कभी पहुँच से बाहर। अब जाड़े तक इंतजार करना पड़ेगा। घबड़ाइए मत। हमलोग शादी से पीछे नहीं हटेंगे। यहीं होगी, अपने चार रिश्तेदारों की गवाही में हमसे कौल भरवा लीजिए।’’

सोनपती बहनजी जड़वत बैठी रह गयीं। यह कैसा वज्रपात हुआ ? पूरा मंडप सजा है। रिश्तेदार वर्षों बाद पधारे हैं। उनके आगे कुछ सिर ऊँचा हुआ था उनका। अब वही सिर झुक गया है। आज एक बड़ा काम निबट जाने को था। यह भगवान ने उनके साथ कैसा सुलूक किया? अब वे क्या मुँह दिखायेंगी? किस मुँह से कहेंगी कि अपने बलबूते सब साध लिया था उन्होंने ? लड़की के दुर्भाग्य का क्या कहें? उन्हीं के साथ होना था ऐसा? कहाँ तो लोग जल रहे थे कितना बढ़िया नौकरी वाला लड़का खोज लिया बहनजी ने? कहाँ आज यह दिन? दुनिया भर की बदनामी। किसी का मुँह तो नहीं रोक सकते। कौन समझेगा कि फौज में ऐसे अचानक छुट्टी कैंसल भी हो जाती है। मुझे ही कौन सा यकीन था कि सच में ऐसा हो जाएगा? सुनती थी पर यकीन नहीं करती थी। लोग भी क्यों यकीन करेंगे? पता नहीं कौन क्या कह दे?….’’

जड़वत बैठी सोनपती बहनजी में स्पंदन हुआ और वे हल्हा सी हिलीं फिर उनकी आँखों से आँसुओं की बूंदें रह रह कर टपकने लगीं। पास बैठे उनके रिश्तेदार समझाने लगे-‘‘ भाग्य से आगे तो कोई नहीं निकल सकता? आपौ नाहीं निकल सकतीं। अच्छे लोग हैं लड़के वाले, देखो, खुद भी वे लोग परेशान हैं। उनहूं के यहाँ तो सब तैयारी रही। सब धरी रह गयी कि ना। अब दूल्हा के बिना तो बिआह नाहीं हो सकता है। तो जरा धैर्य रखौ। शादी तो तय बनी हुई है ना। ये लोग पीछे नहीं हट रहे। इस पर ध्यान दो।’’ फिर वे दूल्हे के घर से आए लोगों से मुखातिब हो गए-‘‘ देखिए, वहाँ, जहाँ दूल्हा न पॅहुच पावे, तो तलवार रख कर या उसकी फोटू रख कर शादी कर देते हैं। वह चलन तो हमारे यहाँ है नहीं। नहीं तो इसका तोड़ तो है ही। लोगों ने ऐसी ही परेशानियों में बनाया होगा। ’’ यह कह कर वे रिश्तेदार थोड़ा सा हँसे। फिर हँसना रोक कर आगे कहने लगे-‘‘ फौजी आदमी की छुट्टी का कोई भरोसा है। इस पर तो पहले थोड़ा सोचना चाहिए था। देश की रक्षा भी जरूरी है भई। क्या करें? फौजी अपना सुख छोड़ देता है, नेता नहीं छोड़ते। किसी नेता को पता है कि फौजी को ऐसी स्थिति से भी गुजरना होता है? हाँ, बोलो भाइ, बताइए आपलोग, समझाइए बहनजी को।।’’ वे आखिरी बात तक आते आते थोड़ा तल्ख होने लगे। तब एक दूसरे रिश्तेदार ने बात की डोर को उस दिशा से खींच कर वापस पटरी पर किया।

‘‘देश का मामला ऐसा ही है। उसे छोड़िए, अभी की बात करिए। अगर देश बीच में न होता तो ….और किसी की बारात रूक जाये तो अब तक क्या से क्या नौबत आ जाती। बल्लम भाला चल जाता। लाठियाँ निकल जातीं। ऐसे छोड़ते हमलोग।’’

सोनपती बहनजी इस बात से डर गयी।। बात कहाँ की कहाँ जा रही थी। बारात जरूर नहीं आ पाई थी। दूल्हा जरूर ड्यूटी पर से निकल नहीं पाया था। पर देश की बात आ जाने से कहीं न कहीं मन में वे गर्व महसूस कर रही थीं और किसी भी हालत में इस रिश्ते को अपनी गांठ से सरकने नहीं देना चाहती थीं। दूसरे उन्हें डर था कि रिश्तेदार मन ही मन उनसे जल रहे होंगे, उपर से भले बन रहे हैं! कहीं इस मौके की आड़ में शादी ही न काट दें? रूलाई उन्होंने तुरंत रोकी और घबड़ा कर कहने लगीं-‘‘ कैसी बात कह रहे हैं भइया? ये गाँव थोड़े है कि बात बात में लाठी बल्लम निकल जाये। हमलोग समझते हैं एक दूसरे की मजबूरियाँ। कोई देश के लिए सीमा पर लड़ रहा है तो उसे कुछ कैसे कह सकते हैं? कोसना हो तो जाओ नेताओं को कोसो, जो रोज सीमा पर लड़ाई लगवाए रहते हैं। पता नहीं इन सबों को अपने लोगों का सुख चैन छीन कर कौन सा खजाना मिल जाता है? हम इंतजार कर लेंगे। हम भी पीछे नहीं हटेंगे। अब सुख दुख सब सांझा हो गया है हमारा। क्यों भाईसाहब?’’ उन्होंने दूल्हे के घर से आए ताउजी को संबोधित कर के कहा। दूल्हे के घर से आए लोगों को उनकी इस बात से बड़ी राहत मिली।

बात बिजली के करंट की तरह फैल गयी थी। औरतें झांक झांक कर दूल्हे के घर से आए लोगों को देख लेना चाहती थीं। आदमी बिना काम उधर से गुजर कर देख ले रहे थे। कुछ लोग वहीं आस पास खड़े हो गए थे। इस तरह दूल्हे को न देख पाने का संतोष घर वालों को देख कर पा रहे थे। बातें भी बनने लगी थीं। बड़ी लड़की ने अपनी पीली साड़ी उतार कर फेंक दी थी और पुराना सलवार कुर्ता पहन लिया था। मेहमानों को विदा कर के सोनपती बहनजी उठीं और अपने एक रिश्तेदार को बुला कर बिना किसी भाव के बोलीं-‘‘ सबको खाना खिलवा दो। बाँट दो भइया। अब खतम करो आज का कार्यक्रम।’’ उनके इतना कहते ही, वे तमाम लोग, जो बारात का इंतजार करते करते थक कर और भोजन के इंतजार से निराश हो कर ऊँघने लगे थे, एकदम जग पड़े। जग कर खाने के पंडाल की तरफ दौड़े और खाने पर झपट पड़े। औरतें और बच्चे आवाजें करते हुए निकले ओर खाने के पंडाल की तरफ दौड़े। लोग आपस में बतियाने लगे। कोहड़े की सब्जी क्या सिझा सिझा कर बनाया है, खटाई डाल कर। खाना इतना स्वादिस्ट की अंगुलियाँ चाटते रह जाओ। साग कितना बढ़िया बना है। कोई कोफ्ते पर फिदा है। रायता अलग बड़ा स्वादिस्ट है। कोई कह रहा है भई, हलवाई कहाँ से बुलाया? तो कोई हलवाई से अपनी पहचान प्रमाणित करने में जुटा है। किसी के पास ऐसे बढ़िया हलवाइयों की पूरी फेहरिश्त है। मिठाईयाँ वैसे तो सिर्फ बारातियों के लिए थीं। लेकिन अब स्थिति ऐसी नहीं रही तो कुछ उठा कर कमरे में रखवा दी गयीं। रिश्तेदार जाते समय ले जाते। बाकी बाँट दी गयी। उस पर भी लूट मची। पान का बीड़ा थाली में सजा कर रखा था। खास मगही पान था। वैसे ही पड़ा सूख रहा था। किसी ने याद दिलाया। लोग खाना खाने के बाद पान का बीड़ा उठाने लगे। थोड़ी ही देर में थाली खाली हो गयी। किसी को मिला किसी को नहीं मिल पाया। बच्चों में इसके लिए झगड़ा भी मचा। पान वाले ने समय की नजाकत भाँप कर थाली भर पान लगाने के बाद पान लगाना बंद कर दिया था। जब लोग खाने वाले पंडाल की तरफ दौड़े थे, तब वह भी खाने वाली मंडली में मिल गया था। इसलिए लोगों को वह मिला ही नहीं कि उससे और पान लगवा लेते। कोई कोई इससे भी आगे गया। उसने पान वाले को खोज लिया लेकिन वह भी पान वाले को खाने से विरत कर पान लगवा लेने में असफल हुआ। ‘बस, अभी आया जी’ पान वाला कहता रहता। पर आता नहीं। उसके इंतजार में रूके लोग इंतजार करते करते उब जाते और अंत में इधर उधर चले जाते। उसने अपना एक बंडल पान का पत्ता बचा लिया था।

उधर एक महीने की अवधि बीत गयी थी। निरूपमा दी के भाई कुछ ठीक हो रहे थे। हालाँकि उन्हें कभी कभी चक्कर आ जाता था। लोग इसे कमजोरी से ज्यादा कुछ नहीं मानते थे। तब निरूपमा दी घर से निकलीं और जा कर डॉक्टर सारस्वत के घर के गेट के पास खड़ी हो कर इंतजार करने लगीं। घर का गेट जिस दीवार में अटका था, उस की एक तरफ एक कागज चिपका था। कागज पर  खून से इबारतें लिखी थीं। खून सूख कर कड़ा हो गया था। उस पर जमाने भर की गर्द चिपक गयी थी। निरूपमा दी गेट के एकदम पास चली गयीं और कागज को पढ़ने लगीं। यह उन्हीं का खत था। वे एक क्षण को हतबुद्धि सी खड़ी रह गयीं। यह क्या देख रही थीं वे? उनका मन हुआ कि तुरंत फाड़ कर फेक दें, लेकिन तुरंत ही उन्हें यह भी ध्यान आया कि यह बात सप्रमाण सूरज कुमार को जरूर बतानी चाहिए। उनका हाथ रूक गया। वे गेट के पास टहलने लगीं। गेट की दीवार के अन्तिम छोर के कुछ पास पान की एक गुमटी थी। गुमटी का अपना प्राचीन इतिहास था। उसे बार बार यहाँ से हटा देने का प्रयास हुआ था। लेकिन गुमटी टस से मस नहीं हुई थी। शहर के कुछ खास लोग भी चाहते थे कि गुमटी यहाँ रहे। असल में गुमटी डॉक्टर सारस्वत की सफेद रंग की पुरानी हवेली के सामने एक धब्बे की तरह दिखती थी। इससे कुछ लोगों के दिल को बड़ा सुकून था। इसी सुकून को बनाए रखने के लिए गुमटी को बनाए रखा गया था। उसी गुमटी में से पान वाला झांक झांक कर देख रहा था। वह मुस्करा रहा था और रेडियो बजा रहा था। जब आधा घंटा बीत गया और सूरज कुमार गेट से निकलते हुए नहीं दिखे, तब निरूपमा दी पान वाले की गुमटी के पास आईं।

‘‘भइया, जरा अपना मोबाइल दो, एक ठो कॉल करना है। पैसा ले लेना।’’

निरूपमा दी सोचते हुए बोलीं। पानवाला उछाह से भर गया।

‘‘बोलिए, नम्बर बोलिए। अभीहै लगा देते हैं।’’

इससे पहले कि निरूपमा दी नम्बर बोलतीं, पानवाले को सूरज कुमार बारामदे से उतर कर गेट की तरफ पहुँचते दिख गए।

‘‘क्या नम्बर लगवा रही हैं? वो देखिए, भइया जी साक्षात चले आ रहे हैं।’’ पानवाले ने रस में डूब कर कहा।

‘‘आपको कैसे पता कि मैं उन्हें फोन लगा रही थी?’’ निरूपमा दी ने चिढ़ कर कहा। पानवाला इस पर कुछ बोला नहीं, भावों से भर कर मुस्कराया। उस मुस्कराहट से ध्वनित हुआ ‘हमें सब पता है जी!’’ निरूपमा दी समझ गयीं और नाराज भाव से मुड़ गयीं। उन्होंने भरी सड़क पर हाथ पकड़ कर सूरज कुमार को खून से लिखे खत के सामने खड़ा कर दिया -‘‘ देखो, अपनी आँख से देखो। कैसे आया यह यहाँ?’’ सूरज कुमार भी हतप्रभ हुए। कुछ देर को समझ में न आया कि क्या कहें? फिर गुस्सा कर उन्होंने खत फाड़ कर फेक दिया।

‘‘न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।’’ हल्की आवाज में वे बुदबुदाए।

‘‘ क्या कह रहे हो? कैसे देख रहे हो? यही है तुम्हारे आराम में खलल?’’

इस पर सूरज कुमार ने कहा-‘‘ तुम कुछ नहीं समझती? कल्पना में रहती हो! परसों यह पापा के हाथ जाने कहाँ से लग गया! बस, फिर क्या, खूब हंगामा कटा! उठा कर उन्होंने इसे गेट के बाहर फेंक दिया। कौन जाने किसने उठा कर इसे दीवार पर चिपकाया है? तुम्हारे तो सब दुश्मन हैं ? सब तुम्हारे खिलाफ काम करते हैं? है न? क्या पता इसी पान वाले ने लगा दिया हो?’’

इस पर निरूपमा दी का गुस्सा भी आग पकड़ने लगा। सूरज कुमार की लम्बी चुप्पी को वे सहन कर गयी थीं। लेकिन यह मुखरता बर्दाश्त के बाहर थी। वे तो सिर्फ वैशाली के आदर्श वाले अपने प्रस्ताव पर सूरज कुमार का विचार जानना चाहती थीं। उन्होंने सोचा नहीं था कि यह प्रस्ताव इतना छोटा नहीं है, जिस पर झट से ‘हाँ’ या ‘नहीं’ कर दिया जाए। यह प्रस्ताव तो सदी का सबसे भीषण प्रस्ताव था, यह आज उन्हें समझ में आ रहा है। वे गुस्से में बोलीं तो सूरज कुमार उससे बढ़ कर गुस्से में बोले। गुस्से में वे वह सब कहने लगे, जो कहने से अब तक अपने को रोके हुए थे। वे जाति बिरादरी से होते हुए, पिता की तबियत से ले कर अंत में यहाँ तक पहुँचे कि जो गलती वैशाली ने की, वही गलती वे नहीं दुहराना चाहते!

तब निरूपमा दी ने तेज आवाज में कहा कि ‘‘अच्छा तो अब वैशाली का आदर्श गलती में बदल गया है! यह मैंने नहीं सोचा था। मैं समझती थी तुम्हीं हो इस दुनिया में, जो वैशाली की तरफ है। वैशाली को अकेला कर दिया तुमने? अपनी बहन को? जाति बिरादरी में चले गए तुम! धन दौलत गिनने लगे? अच्छा हुआ कि बात इतनी साफ हो गई।’’

सूरज कुमार ने इस तरह नहीं सोचा था। वे नहीं जान पाए थे कि वे बहन को अकेला कर रहे हैं। यह बात उन्हें चुभ गई। अचानक उनका स्वर कमजोर पड़ गया। कमजोर स्वर के बावजूद वे अपनी टेक नहीं छोड़ पाए। कहने लगे- ‘‘जो समझना चाहो, समझो! मैं अब माता पिता को और मुसीबत में नहीं डाल सकता। इसका जो भी अर्थ लगाना है, लगाओ। नौटंकी जा कर कहीं और करो, जाओ यहाँ से!’’

झगड़ा जैसे जैसे बढ़ता था, पानवाला गुमटी से रेडियो की आवाज कभी तेज तो कभी एकदम धीमा कर देता था।  इस बीच एक दो लोग तम्बाकू का पाउच माँगने आ गए। उसे लगा कि वे उसके आनन्द संसार को भंग कर देना चाहते हैं। वह अपने आनन्द संसार को बचाना चाहता था। इसलिए आँखों ही आँखों में उन्हें कुछ देर रूकने का प्रस्ताव भेजता था। कोई रूक जाता था। रूकते हुए बगल के दृश्य में डूबने को होने लगता था।

‘‘क्यों बे! नौटंकी चालू है?’’ किसी ने हँस कर कहा।

‘‘लेटरवा आप पढ़े कि नहीं?’’ पानवाला बड़े धीरे से पूछता।

‘‘नहीं भई, कौन सा?’’ आगंतुक चौंक कर कहता।

‘‘वही, खूनवाला।’’

‘‘खूनवाला! कल कुछ लोग कह तो रहे थे। सच में था क्या?’’

आगंतुक अपनी उत्सुकता दबाते हुए पूछता।

‘‘और नहीं तो क्या? अभी अभी फाड़ के फेंके हैं महाराज!’’

‘‘फाड़े काहे को?’’

‘‘आपके इंतजार में बैठे रहते? डॉक्टर साहब निकल कर देखते तो कुल गेटवा ढहा देते, समझे!’’ पान वाला फुसफुसा कर रहस्य उद्घाटित करता।

इधर रोने की एक तेज आवाज के साथ निरूपमा दी मुड़ीं और चिल्लाईं-‘‘ ऐ, बंद करो अपना रेडियो!’’

पानवाले ने रेडियो बंद नहीं किया। हँस कर आगंतुकों से बोला-‘‘ ये लीजिए आपका तम्बाकू नम्बर 300 लगा दिए हैं।’’

निरूपमा दी मुड़ीं और तेज कदमों से अपने घर की ओर लौटने लगीं। सूरज कुमार ने गेट को बंद होने के लिए जोर से ठेला और अंदर चले गए। उन्होंने यह भी नहीं देखा कि गेट बंद नहीं हुआ था, और खुल गया था।

निरूपमा दी चलती जाती थीं, सोचती जाती थीं। सोचती थीं तो आँख भर आती थी। फिर सिर झटक कर अपने को उन विचारों से मुक्त करने की कोशिश करती थीं। क्या सोच कर निकली थीं और क्या हो गया था ? सूरज कुमार इतने महीनों से बात करना टाल रहे थे। जब भी उनके मोबाइल पर फोन लगाओ, ‘अभी थोड़ी देर में बात करता हूँ’ कह कर काट देते थे। एक तो फोन करना इतना मुश्किल था। घर में बमुश्किल एक फोन था, जिस पर सबका अधिकार था, पर वह रहता था हरदम बड़े भाई के पास। आज कल बड़े भाई कुछ ठीक हो रहे थे, इसलिए फिर से उसमें रीचार्ज वगैरह करा कर अपने पास रखने लगे थे। यह तो कोई समझता नहीं! यही कि फोन कर ले जाना भी एक आसान काम नहीं है। चलो, यह भी अच्छा हुआ कि आज सूरज कुमार की पोल पट्टी खुल गयी। कितनी ही बार उन्होंने सूरज कुमार के यह कहने पर भरोसा किया था कि ‘समझा करो’ या ‘सही समय आने दो’ या ‘थोड़ा इंतजार नहीं कर सकती।’ वे निरूत्तर होती रहती थीं। इंतजार करतीं, पर कब तक? अब उन्हें ठान ही लेना था कि बात साफ हो जानी चाहिए। इसी इरादे से उन्होंने कहा था कि बाहर आओ, घर से निकलो और बात साफ कर दो। इंतजार का कोई भविष्य हो तो इंतजार किया जाए ?सूरज कुमार तो आज भी टाल मटोल पर थे। कह रहे थे अब तुम लखनउ आ जाओ किसी बहाने, तब बात करेंगे। अब मेरे लिए यह कहाँ संभव है कि अकेले लखनउ चली जाउं? या क्या पता मुझे लखनउ निकल जाना चाहिए था? लेकिन आज जो कुछ सुना, उससे तो लखनउ जाना एक बेवकूफी के सिवाय कुछ न होता! उन्हें बहला कर रखना चाहते थे क्या? न छोड़ना चाहते थे, न अपनाना चाहते थे। यह बीच का मामला तो बड़ा मुश्किल है। आखिरकार आज मन की सब बात ज़बान पर आ ही गयी। सब पोल खुल गयी। जाति आज तक नहीं थी, न जाने कहाँ से बीच में आ गयी? दोस्ती भी तब तो जाति देख कर करनी चाहिए। उसी घर में वैशाली के आगे जाति नहीं आई थी! उसको गए भी कितना अर्सा हो गया। इन लोगों की इसी सोच के कारण उसे सबको छोड़ कर जाना पड़ा। नहीं तो कौन जाना चाहेगा अपनो से दूर? अब देखो, आज माँ बाप का मान सम्मान भी बीच में आ गया। पता नहीं सम्मान को ठेस क्यों पहुँचेगी? समझाया तो जा सकता है? लेकिन नहीं, जब खुद ही आदमी ऐसा सोचे, तो दूसरों को क्या बताएगा? वैशाली के बीच भी तो आये होंगे! वह इस दुनिया की प्राणी नहीं थी क्या? यही सब मन में उमड़ घुमड़ रहा था। सूरज कुमार को भी क्या दोष दें? सब लड़कों में हिम्मत कहाँ है? सहूलियत भर दोस्ती चाहिए। सहूलियत भर प्यार चाहिए। जिम्मेदारी भर नहीं चाहिए।

वे अपने में मगन चली जा रही थीं कि अचानक ही हल्ला मचाती लड़कों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया। वे अपने विचार में अटकी थीं। कौन थे ये लोग और क्यों आ गए थे? क्या चाहते थे? वे पूछ भी नहीं पायीं। हतप्रभ सी देखती रहीं कि दो लड़कों ने लपक कर उनका हाथ कंधे पर से पकड़ लिया। तब राजकुमार की तरह चेयरमैन साहब के लड़के सामने आए। उनके हाथ में सिंदूर की एक बड़ी सी सिंघौरा जैसी  डिबिया थी। उससे चुटकी भर सिंदूर निकाल कर चेयरमैन साहब के लड़के ने निरूपमा दी की माँग में भर दिया। लड़के हल्ला मचा कर हँसे।

‘‘अब से तुम हमारी हुई।’’ उन्होंने सगर्व ऐलान किया।

‘‘हमारी भी।’’ सिंदूर की डिबिया से सिंदूर निकाल कर दूसरे लड़के ने भी माँग में डाल दिया।

‘‘ले बे तू भी बहती गंगा में हाथ धो!’’

इस तरह माँग में सिंदूर डालने का का उत्सव शुरू हो गया। लड़के हाथ, पैर, नाक, मुँह छू छू कर देखने लगे। छूने के इस क्रम में खींचतान होने लगी। कपड़े जगह जगह से फटने लगे। निरूपमा दी जकड़े हुए हाथों को छुड़ाने की कोशिश करतीं, पैर चलातीं, गालियाँ देतीं, चीखतीं। लेकिन उनकी आवाज कहीं नहीं पहुँचती। उनका दुपट्टा किसी ने खींच कर दो टुकड़े कर दिए, फिर दो लोगों ने उसे अपने अपने सिर पर बांध लिया। जब कपड़े फट गए। कुर्ते के अंदर से ब्रा झाँकने लगी। फिर ब्रा के अंदर से शरीर झाँकने लगा। सलवार का नाड़ा खींच लिया गया। तब चेयरमैन के लड़के ने कहा-‘‘ बस, बस, उत्सव बंद करो!’’

सलवार को दोनों हाथों से पकड़े, रोती बिलखती निरूपमा दी की तरफ मुड़ कर चेयरमैन के लड़के ने कहा-‘‘ ऐसे रो रही है जैसे रेप हुआ हो! अभी तो हमने कुछ किया ही नहीं। जा, पुलिस बुला ले! चलो भई साथियों!’’ और सब हल्ला मचाते हँसी ठट्ठा करते आगे बढ़ गए।

निरूपमा दी बची रह गयीं। जमीन पर बैठ कर हिलक हिलक कर रोतीं। रोते रोते बेहोश होने जैसी हालत होने लगी। कुछ देर बाद वहीं जमीन पर वे गिर गयीं।

कुछ देर में उधर से सफेद रंग की अम्बेसडर गाड़ी गुजरी। यह गाड़ी शहर के सरकारी अस्पताल के डॉक्टर सुरेश के नाम से पहचानी जाती थी। डॉक्टर सुरेश सोनपती बहनजी के घर के पास, कुछ एक किलोमीटर की दूरी पर रहते थे। सोनपती बहन जी परेशान सी उसी गाड़ी में बैठी थीं। वे बार बार सड़क की ओर ऐसे देख रही थीं, जैसे गाड़ी की गति की सीमा को अपनी आँखों के देखने से पार कर जायेंगी। गाड़ी डॉक्टर सुरेश चला रहे थे और गाड़ी से जलने की तेज दुर्गंध आ रही थी। गाड़ी निरूपमा दी के पास से गुजरी तो सोनपती बहन जी ने भर्राये गले से डॉक्टर साहब से कहा-‘‘ डॉक्टर साहब, जनौ कोई लड़की गिरी पड़ी है।’’

डॉक्टर साहब ने गाड़ी रोक दी। उतर कर देखा तो हैरान रह गयीं।

‘‘अरे, जे के का भया? न जाने कौन दुखिया है?’’ उन्होंने डॉक्टर साहब को आवाज दी।

डॉक्टर साहब ने बहनजी की मदद से निरूपमा को उठाया और गाड़ी में पीछे उसी जगह लाद दिया, जहाँ पटरा रख कर चार जली हुई लड़कियों को लिटाया गया था। डॉक्टर सुरेश गाड़ी चलाते चलाते हिदायत देते जाते। सोनपती बहनजी आँसू पोंछती जातीं और अपने को कोसती जातीं-‘‘ डॉक्टर साहब, हमें पता ही न चला कि चारों ने कब कैसे अपने को आग लगा ली? न जाने कहाँ चूक रह गयी हमसे? जब देखा कि मेरे झोले में माचिस की डिबिया नहीं है, तभी दिमाग खटका था। लेकिन डिबिया निकालने की हिम्मत तो कोई कर ही नहीं सकता था। कब इन सबों ने यह हिम्मत की? यही हिम्मत करना था इन सबों को! इससे तो अच्छा था भाग जातीं। मेरा तो सब संसार ही लुट गया।’’ वे रोती जातीं, अस्पताल नजदीक आता जाता।

‘‘हैरानी की बात है कि चारों ने एक साथ ऐसा किया! इसका केस तो बनेगा ही बहनजी। इस बच्ची का भी केस बनेगा।’’ डॉक्टर ने चिंता से कहा।

अस्पताल में बाकायदा कार्यवाहियाँ पूरी करके चारों लड़कियों को मृत घोषित कर दिया गया। निरूपमा दी अस्पताल में भर्ती कर ली गयीं। तमाम प्रेस फोटोग्राफर दौड़े। पुलिस ड्यूटी पर आयी। फोटो लिए गए। पहले जली हुई चार लड़कियों के, फिर चिंदी चिंदी हुई एक लड़की का।

पुलिस बयान लेने लगी। सोनपती बहनजी रो रो कर, जो देखा था, सब बताने लगीं। कैसे घर में से जले की दुर्गंध से पड़ोसी इकट्ठा हुए थे। जब वे आयीं तो सबसे पहले भीड़ दिखी थी। उन्हें लगा था कि मोहल्ले के लड़कों ने आपस में मार पीट की होगी। जैसा कि अक्सर ही हो जाता था। माँ बाप अपने अपने लड़कों की तरफ से लड़ने लगते थे। फिर लड़ाई का दायरा बढ़ता था और मोहल्ले के लोग इकट्ठा होने लगते थे। अपनी अपनी तरह से, अपनी अपनी समझदारी या तरफदारी के मुताबिक लोग इसका या उसका पक्ष लेने लगते थे। कुछ लोग कोई पक्ष नहीं लेते। सिर्फ तमाशा देखते। तमाशा देखने का अपना आनन्द था। न्यायधीश की भूमिका निभाने का अपना आनन्द था तो पक्षदारी का भी आनन्द था। इसलिए जब वे नजदीक पहुँचीं तो भीड़ के पीछे से उझक कर देखने की कोशिश करने लगी थीं। धीरे से किसी से पूछ भी लिया था कि ‘‘ ए बाबू , केहू चोटाइल बा ?’’ जिससे पूछा था, वह जवाब न दे कर उन्हें देखने लगा था।

फिर उसने चिल्ला कर कहा था-‘‘ अरे, आई गयीं। सोनपती बहिनजी आई गयीं।’’

उसके चिल्लाने से भीड़ में कोई बम फूटने जैसा कुछ फूटा था और भीड़ छितरा कर उनकी तरफ मुड़ी थी। तेज चिरायंध आ रही थी। वे सोच ही नहीं पायीं कि उनके यहाँ से आ रही है? चिल्लाने वाले लड़के के चिल्लाने को भी नहीं समझ पाई थीं। जब कई औरतें उनकी तरफ लपकीं और मोहल्ले के कई बुजुर्ग आदमी – सबने उन्हें कंधे से पकड़ने की कोशिश की थी।

जब उन्होंने कंधे की पकड़ को झटक कर कहा था- ‘‘ बात क्या हुई? हमारे घर में आग लग गई क्या?’’ इतना कह कर वे अपने घर की तरफ दौड़ी थीं।

उनके पीछे मोहल्ले की कई औरतें, कई मर्द दौड़े थे।

पहले दौड़े बुजुर्ग दौड़ में पीछे रह गए थे।

बच्चे नहीं दौड़े थे। वे घर के आस पास मंडरा रहे थे। ……

दरवाजा खुला था।

बुझी हुई आग, पानी से सना घर जगह जगह से दरक गया था।

तब उन्होंने वह दृश्य देखा था, जिसे देख कर उनकी आँख फूट क्यों न गयी!

कि जिसे देखने के लिए ही बची रह गयी थी उनकी आँखों की जोत!

कि जिसे देखने के लिए ही खटती रही थीं अब तक ?

पाई पाई का जोड़ घटाना करती रही थीं ?

गांठ से सारी पूंजी ही सरक गयी जी!

वे उखड़े हुए प्लास्तर वाली अस्पताल की उस दीवार पर, जिसे कोई वर्षों पहले पान थूकने की जगह की तरह इस्तेमाल करता रहा होगा, अपना सिर धड़- धड़ पटकने लगीं।

पुलिस वाला बयान लिख रहा था। लिखना रोक कर उसने इशारे से डॉक्टर से कहा- ‘‘ शान्त कराओ महराज! बुढ़िया तो टाइम खा जाएगी! लिख लूं तो छुट्टी मिले। और भी काम हैं जमाने में….. सुपर टॉकीज वाले से दो सीट रिजर्व कराई थी – हिट फिल्म है- मैं ही देखने से बचा रह गया था- आज मूहूरत बना भी तो देखो, आज ही कहाँ अटका दिया!’’

डॉक्टर समझ गए। उन्होंने सोनपती बहनजी को हल्का सा थपक कर चेताया। तब सोनपती बहनजी हल्का हल्का कांपती हुई, टूटती हुई, मद्धिम आवाज में कहने लगीं कि कैसे फिर वे दौड़ कर डॉक्टर साहब को उनके घर से बुलायीं। संयोग से डॉक्टर साहब घर पर थे। उन्हीं की गाड़ी से आए। निरूपमा दी की तरफ से बताने वाला कोई नहीं था। सोनपती बहनजी ने ही उनकी तरफ से भी बताया। बच्ची का यह हाल किसने किया? इस पर सोनपती बहनजी कुछ नहीं बोल पायीं। डॉक्टर सुरेश भी कुछ नहीं बोले। वे अस्पताल में उस वक्त की ड्यूटी पर थे। लेकिन वे घर पर पाए गए थे।

‘‘भई, घर खाना खाने गया था। सभी जाते हैं। कुछ काम था तो थोड़ी देर और हो गयी। बस, आने ही वाला था कि यह सब हो गया।’’ उन्होंने पुलिस की बार बार की पूछ का उत्तर दिया।

‘‘नप सकते हो डॉक्टर!’’ पुलिस वाले ने मुस्करा कर कहा।

तब डॉक्टर ने धीरे से सौ सौ रूपये के कुछ नोट उसकी पॉकेट में डाल दिया। तुरंत उस घटना से उनका नाम काट दिया गया और उसकी जगह एक अज्ञात शख्स की मदद की बात लिख दी गयी। डॉक्टर साहब निश्चिंत हुए। सुबह अखबार में चेयरमैन के लड़के का नाम बदल कर छपा और शीर्षक बना-‘‘ सिंदूर की होली बीच सड़क पर’। किसी ने लिखा-‘तार तार हुई मर्यादा।’ बड़े हृदयविदारक शीर्षक बने। पुलिसवालों ने किसी अज्ञात के नाम पर एफ आई आर दर्ज की। सब काम पूरा हुआ। सब लोग चले गए। सोनपती बहनजी जमीन पर उखड़े हुए प्लास्तर वाली अस्पताल की दीवार का सहारा लिए बैठी थीं, जब उनके पड़ोसी आए और उठा कर उन्हें ले जाने लगे। वे चारों लाशों के पीछे पीछे न जाने कौन लोगों का सहारा लिए चली जा रही थीं। जब होश में आतीं तो सिर्फ इतना उचारतीं-‘‘हम जान नहीं पाए।’’ फिर वे सिर पटक पटक कर, रो रो कर चार आत्माओं की शान्ति के लिए पाठ करने लगीं……।

 

एक ही ख़्वाब, जो बार बार देखा गया

 

बड़ा सुंदर मौसम था। हवा लहरा लहरा कर चल रही थी। काली काली घटाएं घिरी थीं। घटाएं घिरी हों तब हवा लहरा लहरा कर चले, ऐसा कम होता था या ऐसा खास होता था। लगता था हवा उपर से बादलों का कोई कोई हिस्सा तोड़ कर नीचे ले आती थी और नीचे की गहरी श्यामलता को और भी स्याह, और भी काला कर देती थी। जैसे काले पर कई परत काले की चढ़ाई गयी हो, स्याही में डूबा कण कण हवा से हिल उठता था। काँपता… थरथराता सा….। आँधी ऐसे मौसम में आने की संभावना जगाती थी। उसके पीछे पीछे कभी बारिश भी चली आती थी। इसी मौसम में मैं अपनी बहनों के साथ रेलवे स्टेशन की तरफ चली जा रही थी। देखती हूँ कि आगे आगे, न जाने कहाँ से निकल कर निरूपमा दी चली आई हैं और हमसे दूनी रफ्तार से रेलवे स्टेशन की तरफ जा रही हैं। हम उन्हीं के पीछे ऐसे चलने लगे जैसे उन्हीं के कहे पर जा रहे हों। जबकि उनसे हमारी कोई बात नहीं हो पाई थी। स्टेशन के पास पहुँच कर निरूपमा दी एक बेंच के पास रूक कर हाँफने लगीं। वे हमसे तेज चल कर आई थीं। हम उनके पीछे पहुँचे और उनके पीछे वाली बेंच के पास रूक कर हाँफने लगे। वे हाँफते हुए आगे बढ़ीं और स्टेशन पर उस जगह रूक गयीं, जहाँ लिखा था ‘पीने का पानी’। नल खोलते ही पानी ऐसे गिरने लगा जैसे पहाड़ पर से झरना गिर रहा हो। निरूपमा दी ने अंजलि बना कर झरने भर जल लिया और पी गयीं। झरने भर जल पी कर वे वापस उसी बेंच पर बैठ गयीं। तब उनकी नजर हम पर पड़ी। उनकी आँखों में खुशी की चमक कौंधी। उन्होंने हाथ के इशारे से हमें ‘पीने का पानी’ वाली जगह बताई। हम सब उधर गए और अंजुरी में झरना भरने लगे। झरने में खेलने लगे। हाथ, मुँह, पाँव सब झरना हो गया। झरने भर कर हम लौटे और उसी पीछे वाली बेंच पर बैठ गए। निरूपमा दी एकदम शांत बैठी थीं। उनके पास का झरना शांत था। हमारे पास का चंचल। हम बतियाने को अकुला रहे थे। तभी कुछ और लड़कियाँ आयीं और निरूपमा दी की बेंच पर बैठ गयीं। वे भी हाँफ रही थीं। लगता था लम्बा चल कर आई थीं। निरूपमा दी ने उन्हें भी हाथ से इशारा किया कि झरना वहाँ है। वे भी झरने में भीग आयीं। इसके बाद कुछ और लड़कियाँ आयीं और हमारी बेंच पर बैठने लगीं। हम खुद ही पाँच जने थे। बैठने की जगह भर गयी थी। वे अगल बगल में खड़ी हो गयीं। हमें बतियाने में संकोच होने लगा। हम उनसे कभी नहीं मिले थे। लेकिन वे हमारी तरह ही हाँफ रही थीं। फिर लड़कियों के आने का तांता लग गया। लड़कियाँ आती जातीं और बेंचों के आस पास खड़ी होती जातीं। हमने अब तक जाना ही नहीं था कि हमारे शहर में इतनी लड़कियाँ हैं! आज हम सब एक दूसरे को देख कर हैरान थे। इतनी लड़कियाँ एक साथ बोल दें तो स्टेशन हिल सकता था! लड़कियाँ कुछ असमंजस में थीं।

तब निरूपमा दी ने ही चुप्पी तोड़ी-‘‘ तुम सब कहाँ थी अब तक?’’

इस पर लड़कियाँ तरह तरह की बातें बताने लगीं।

बातें इतनी ज्यादा थीं कि आपस में गड्डमड्ड हो जाती थीं।

अबोले का इतना बोलना अजीब सी रंगत लिए था।

तब निरूपमा दी ने सबको सुलझाने की कोशिश में कहा-‘‘ हमारी मंजिल तक कौन सी ट्रेन जाएगी? कोई इनमें से जाएगी भी?’’

इस पर पहले खुसर पुसर, फिर कुछ तेज और अंत में खुल कर बात होने लगी।

कहाँ जाएं? कैसे जाएं? किधर जाएं? की चर्चाएं। जितने मुँह उतनी बात।

इस दुनिया की वह कौन सी जगह थी, जहाँ सब जाना चाहते थे?

किसी ने कहा कि वह अभी बनी ही नहीं है।

किसी ने कहा कि मौका आया है, सब लोग आज मिल भी गए हैं तो चलो कोशिश कर के देखें।

एक ट्रेन पीछे के प्लेटफार्म पर खड़ी थी। एक अभी अभी आगे वाले पर आ कर रूकी। उनके चलने की घोषणा हो रही थी। हमारा कुछ तय नहीं हो पा रहा था। उसी समय पीछे से हाथों में लाठियाँ लिए, शोर मचाते आदमियों का एक रेला रेलवे स्टेशन में घुसता दिखा। निरूपमा दी सारी बातचीत में उदास होती जाती थीं। अचानक उन्होंने सामने से दौड़ कर आते अपने भाई को देखा। गहरी सी उदासी के भीतर हल्की सी मुस्कराहट कौंध गयी। उन्होंने हाथ ऊँचा कर के भाई को अपना होना नहीं बताया। यह अपनेआप मान लिया कि स्टेशन पर लड़कियों की भारी संख्या के भीतर से भाई उन्हें जान लेगा।

यह भरोसा था। भरोसा एक दिन में तैयार नहीं हुआ था। इसमें बचपन से ले कर अब तक का समय भरा था।

कोई चाहे तो इस समय से टूट कर अपने को अलग कर सकता था। या किसी और लाभ में समय को अपनी उम्र की स्लेट से पोंछ सकता था।

भाई नहीं पोंछ पाया था।

भाई दौड़ कर आ रहा था।

दौड़ कर आते हुए निरूपमा दी के होने को जान गया था। या दौड़ कर आने में निरूपमा दी का होना ही दौड़ का फोर्स था। उसने हाथ उठाया था। यह केवल निरूपमा दी के लिए नहीं था। यह दौड़ के पीछे के फोर्स का विस्तार था। उसने सभी लड़कियों की तरफ हाथ उठाया था। हाथ उठाने में एक तसल्ली कहीं बहुत भीतर गड़ी थी। सामने हड़बड़ी थी। जो दिखती थी।

इसी हड़बड़ी में उसने हाथ के इशारे से संकेत किया, जिसका अर्थ था ‘‘जल्दी निकलो!’’

हम अभी भी परेशान थे। निश्चय की स्थिति कुछ बनी नहीं थी।

भाई ने कहा-‘‘समझते क्यों नहीं? युद्ध के लिए तैयार हो कर आए हो क्या? ’’

हम में से कोई युद्ध के लिए तैयार हो कर नहीं आया था। तब हमें अपनी गलती समझ में आयी।

’ ‘हम एक दूसरे को जानते ही कहाँ थे?’’ किसी ने चिल्ला कर कहा।

‘‘अब जान गए न!’’ भाई ने भी चिल्ला कर कहा।

‘‘तो अब तो समय नहीं है।’’

‘‘हम ऐसा युद्ध चाहते भी नहीं।’’ किसी ने जोर दे कर कहा।

‘‘समय गवां देने की बात में अभी मत पड़ो।’’

भाई ने सबका झोला उठा कर ट्रेन में चढा़ना शुरू कर दिया। निरूपमा दी अपनी उदासी में से हड़बडा़ कर निकलीं और ‘ट्रेन में चढ़ लो’ वाले अंदाज में हाथ से सबको इशारा करती सामने की ट्रेन में घुस गयीं। जिसके सामने जो बोगी पड़ी, वह उसी में घुस गया। कुछ इधर के ट्रेन में चढ़ गयीं, कुछ उधर की ट्रेन में। हम पाँचो जन घबड़ा कर अलग अलग बोगियों में घुस गए। स्टेशन पर बिखरा हमारा सारा का सारा सामान ट्रेन में डाल देने तक ट्रेन चल पड़ी। पीछे की आवाजें नजदीक आने लगीं। भाई स्टेशन पर छूटने लगा। तब निरूपमा दी ने बहुत दुलरा कर कहा-‘‘ चलो, तुम भी।’’

भाई जैसे इसी एक बात को सुन लेना चाहता था।

वह मुस्कराया। इतनी आफत में भी मुस्कराया।

निरूपमा दी ने हाथ बढ़ाया था।

उसने भी तुरंत हाथ बढ़ा दिया।

निरूपमा दी ने थोड़ा सा झुक कर उसका हाथ पकड़ कर उपर ट्रेन में खींच लिया।

नजदीक आती आवाजें पीछे छूटने लगीं। तभी मुझे लगा कि किसी ने ट्रेन की जंजीर खींच दी है।

‘कौन?कौन?किसने? किसने?’ के स्वर गूंजने लगे।

निरूपमा दी और उनके भाई ने एक साथ चिल्ला कर कहा-‘‘ सावधान! भेदिया, भेदिया!’’

अभी अभी हम इतने सारे लोग थे और अभी अभी छिटक कर अकेले हो गए थे।

यही ख्वाब बार बार आता था कि हम किसी एक जगह पर मिलने वाले हैं।

 

( कथाकार अल्पना मिश्र दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर हैं. उनका कहानी संग्रह ‘ भीतर का वक्त ‘, ‘ छावनी में बेघर’, ‘ कब्र भी कैद औ’ जंजीरें भी ‘ और उपन्यास ‘ अन्हियारे तलछट में चमका ‘ आ चुका है )

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