हिंसा और उन्माद की राजनीति के इस दौर में विवेक की एक दुर्लभ आवाज़ थे कुलदीप नैयर

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वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का आज निधन हो गया। वे 95 वर्ष के थे. वह तीन दिन से दिल्ली के एक अस्पताल के आईसीयू में भर्ती थे. बुधवार की रात करीब साढ़े बारह बजे उन्होंने अंतिम सांस ली.

कुलदीप नैयर यूएनआई, पीआईबी, ‘द स्टैट्समैन’, ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के साथ लम्बे समय तक जुड़े रहे. वह डेक्कन हेराल्ड (बेंगलुरु), द डेली स्टार, द संडे गार्जियन, द न्यूज, द स्टेट्समैन, द एक्सप्रेस ट्रिब्यून पाकिस्तान, डॉन पाकिस्तान आदि समाचार पत्रों में स्तंभ लेख लिखते रहे. वे द टाइम्स’ लन्दन के संवाददाता भी रहे.

कुलदीप नैयर ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त और राज्यसभा सदस्य भी रहे.

 वर्ष 2015 में कुलदीप नैयर को पत्रकारिता में आजीवन उपलब्धि के लिए रामनाथ गोयनका स्मृ़ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

कुलदीप नैयर हिंसा और उन्माद की राजनीति के इस दौर में विवेक की एक दुर्लभ आवाज़ थे. गोदी मीडिया और गुंडे एंकरों के समय में कुलदीप नैयर जैसे पत्रकार का जाना बेहद अखरने वाला है, जो सत्ता के शिखरों तक आसान पहुंच रखने के बावज़ूद सत्ता के मुंह पर सच का तमाचा लगाने से कभी नहीं चूके. आपातकाल के दौरान उनकी कलम की धार और बदले में हुई गिरफ़्तारी को याद करने वालों को यह भी याद रखना चाहिए कि कुलदीप नैयर ने मौज़ूदा दौर की अघोषित इमरजेंसी को भारतीय लोकतंत्र के सामने मौज़ूद ज़्यादा बड़ी चुनौती के रूप में रेखांकित किया था.

कुलदीप नैयर की पत्रकारिता देश-विभाजन की त्रासदी के एक रचनात्मक प्रत्याख्यान के रूप में विकसित हुई. वे जीवन भर विभाजन की असमाप्त ख़ूनी सियासत का मुखर विरोध करते रहे. उनकी आत्मकथा ‘ बियॉन्ड द लाइंस’ या इसके हिंदी संस्करण ‘एक ज़िन्दगी काफ़ी नहीं’ में उन्होंने विभाजन के दर्द को बयान करते हुए उसे अनकिया करने की पुरज़ोर कोशिशों की जरूरत पर भी बल दिया है। पिछले कुछ सालों में उनकी सबसे गहरी पीड़ा यह थी कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जैसी नफ़रतें आज है, वैसी विभाजन के दौर में भी नहीं थीं.

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