स्मृति

अलविदा फ़हमीदा रियाज़

प्रो. चमनलाल

सोने से पहले आदतन कल रात टिवीटर/फ़ेसबुक/व्हाट्सप्प पर एक नज़र डाल रहा था कि डॉ अखलाक ने फहमीदा के न रहने का संदेश डाला, फिर फरहत ने पुष्टि चाही तो अखलाक ने लिखा कि बेटी के घर लाहौर में उनका निधन हुआ। फिर टिवीटर पर सिद्धार्थ वर्दराजन के और कई सारे वेब समाचार देखे। ऐसे लगा जैसे एक हादसा हो गया। हालांकि हम लोग काफी समय से संपर्क में थे, फेसबुक पर तो दोस्त थे ही, मेल भी करते थे, लेकिन पिछले काफी अरसे से खबर नहीं थी। हम लोगों के कई साझे दोस्त थे, विशेषतः: पूर्व सांसद देवी प्रसाद त्रिपाठी, जो दिल्ली में फहमीदा की मेहमान नवाज़ी करते थे और उनके घर या साहित्यिक कार्यक्रमों में उनसे मुलाक़ात हो जाती थी। पटियाला में था तो हिन्दी में छपी उनकी तमाम किताबें मेरे संग्रह में रहती थीं, आज भी हैं। 2007 में भगत सिंह जन्म शती पर संसद के प्रांगण में जब भगत सिंह का बुत लगाया गया और ये कह कर जनता को बहकाया गया कि संसद भवन के अंदर भगत सिंह के चित्र से सरकार ने ज्यादा बड़ा काम किया है। असलियत ये है कि संसद के प्रांगण में गांधी, नेहरू, पटेल, अंबेडकर, इन्दिरा गांधी, सुभाष तमाम बुत लगे है, सिर्फ भगत सिंह का ही नहीं, जबकि बाकी सब के चित्र संसद भवन की गैलरी में भी लगे हैं, जो राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण है, जबकि भगत सिंह या अनय किसी क्रांतिकारी का बुत वहाँ नहीं लगा है और वहाँ अनेक ऐसे चित्र लगे हैं, जिनको जनता जानती तक नहीं, ज़ाहिर है कि एक साजिश के तहत संसद की गैलरी चित्र शाला में क्रांतिकारियों का प्रवेश, चित्र के रूप में भी रोका हुआ है, वरना क्या कोई कह सकता है कि भगत सिंह इन सब लोगों से कम महत्त्वपूर्ण स्वाधीनता सेनानी हैं, जिनके चित्र भीतर लगे है और जिन्हें श्रद्धांजलि देने उनके जन्म या मृत्यु दिवस पर रोज़ प्रधान मंत्री और तमाम नेता लगे रहते हैं। इस कार्यक्रम में भगत सिंह के परिवार के लोग शामिल हुए, जो बाद में मेरे पास जे॰एन॰यू॰ के निवास पर भी आए और उनकी बातचीत से इस बुत को लेकर गहरा असंतोष ज़ाहिर हुआ, जिस पर मैंने उस समय के स्पीकर सोमनाथ चटर्जी को एक पत्र भी लिखा, इस पत्र को मैंने अपने ब्लॉग bhagatsinghstudy पर डाला और ब्लॉग फहमीदा जी ने देखा और उन्होंने स्वतः: ही कविता रच डाली-भगत सिंह की मूरत, इस कविता को हमने हिन्दी अनुवाद में छापा और फहमीदा जी ने खुद ही इसका अङ्ग्रेज़ी तर्जुमा भी कर डाला जिसे संभवतः: mainstream साप्ताहिक ने उस समय छापा था। मैंने हिन्दी अनुवाद को 2009 में मेधा बुक्स से प्रकाशित अपनी किताब भगत सिंह में शामिल किया और हिन्दी-अङ्ग्रेज़ी दोनों रूपों को अपने ब्लॉग पर डाला।
यों तो फहमीदा जी अपनी अनेक कवितायो व अनय लेखन के लिए जानी जाती रहेंगी,लेकिन उनकी ये कविता-तुम भी हम जैसे निकले- तो जैसे समकालीन भारत पर एक सटीक टिप्पणी के रूप में क्लासिक बन गयी है। संदर्भ इसका जे॰एन॰यू॰ का ही है। भाजपा के वाजपेयी काल में भी जे॰एन॰यू॰ को आरएसएस ने निशाना बनाया था और एक बिगड़े रिटायर्ड फौजी ने फहमीदा पर जे॰एन॰यू॰ के अंदर चल रहे मुशायरे में भद्दा सांप्रदायिक शाब्दिक हमला किया था, और तब फहमीदा ने हम भारत वालों को इस कविता से शीशा दिखाया था, जो 2014 के बाद आरएसएस के राज में इतनी भद्दी शक्ल इख्तियार कर गया है कि अब तो पाकिस्तानी भी हमारी आरएसएस प्रदत्त ‘महान भारतीय संस्कृति’ पर हँसते हैं और दुनिया में अखलाक और जुनेद जैसी हत्याओं ने हमें कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रखा है।
ये वो वक़्त है फहमीदा जब आपकी बेहद जरूरत थी और यही वो वक़्त है जब सब एक एक कर बिछुड़ जा रहे हैं…और अब आप….फहमीदा…..अलविदा …दोस्त आप भूलेंगी नहीं….जब तक हमारी बारी नहीं आ जाती…

आपकी एक नज़्म की मार्फ़त आपको याद कर रहा हूँ

भगत सिंह की मूरत

 

दिल्ली से खबर आई है

दुहाई है दुहाई है

पार्लिमेंट काम्पलेक्स में

शहीद भगत सिंह की

सरकारी शिल्पकार ने

यह कैसी छवि बनाई है!

अरे हाय हाय

यह तो भगत सिंह नहीं

वो केसरी गबरु हमारा

जिस की देह को जला न पाए थे ठीक से

साठ पैंसठ वर्ष का मोटा कापा सा

मोटी मूँछ वाला

यह तो कोई और है

साठ वर्ष से कोशिश कर रहे थे

धर पटीशन पर पटीशन

अंग्रेजों ने ठुकराया

तुम तो मत ठुकराओ

भगत सिंह शहीद की

मूरत यहाँ लगाओ

आखिर साठ वर्ष बाद सरकार ने

छाती पर हाथ मारा और कहा

“हाँ क्यों नहीं !”

और लगा दी मूरत पार्लिमेंट कम्पलेक्स में

हैं ! यह क्या ?

यह तो भगत सिंह नहीं

हा ! हा ! हा ! प्यारे मित्रों

रोना बंद करो

जरा इस पार्लिमेंट में दूसरी मूरतों को

भी गौर से देखो

क्या यह वही जवाहरलाल है जो वह था

वही गांधी है ?

वही अबुल कलाम आज़ाद ?

इनकी असल सूरत और आत्मा

तो इस पार्लियामेंट में आने जाने वाले

कब की आमलेट बनाकर खा पी चुके

इस अंधेरे में केवल

बदली हुई मूर्तियां ही लग सकती है

कूजा भगत सिंह

वो अब बाकी नहीं रहा

उसका ज़माना बीत गया

वो जो ग़ालिब का आशिक था

और आँख मार-मार कर ग़ज़ल गा रहा है

ऐश्वर्या राय जिस पर नाच रही है

उनकी मेहरबानी

और उसके शहर लाहौर में

भगत सिंह एक सिख है, ज्यादातर लोगों के लिए

जो शायद सन सैंतालीस में

वहाँ से चला गया

ऐसे नाम सुनकर लोग घबरा जाते हैं

कम्बख्त कहीं वापिस तो नहीं आ रहा है

अपनी प्रापर्टी क्लेम करने

नहीं, नहीं, हम ऐसा नहीं होने देंगे

आखिर हम भी तो छोड़ कर आए हैं

ख़ेत खलिहान दुकानें मकान

लुधियाने में

क्यों तुमने चाहा उसकी मूरत लगाना

पार्लिमेंट कम्पलेक्स में ?

भगत सिंह सरकार का हीरो नहीं बन सकता

किसी भी सरकार का नहीं

वो खालिस हिंदुस्तानी था

उसका समय बीत गया

वो खालिस हिंदुस्तान की मिट्टी का गीत था

पानी की चमक

हवा की सरसराहट

खालिस हिंदुस्तानी जोश और ज़ज़्बा अपने वक्त का

हवा उस वक्त को उड़ा ले गई

उसकी मूरत वहीं लगी रहने दो

सरहद के इस पार और उस पार

इक्का दुक्का दिल में

हर सुबह बच्चों जैसी मासूम कामनाएं

उसके कोरे पिंडे को गेंदे के फूलों से ढांप देती हैं

और उसको सहलाती हैं

प्यार और सम्मान भरे आँसुओं के नमकीन पानी से

यह है उसका असल स्थान

भगत सिंह यहाँ खुश है!

Spread the love

Leave a Comment