आत्म-अलगाव (एलिअनेशन) का प्रश्न और मुक्तिबोध

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( गजानन माधव मुक्तिबोध (जन्म : 13 नवंबर 1917-मृत्यु :11 सितंबर 1964) हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि, आलोचक, निबंधकार, कहानीकार तथा उपन्यासकार रहे हैं . प्रस्तुत लेख समकालीन जनमत पत्रिका के प्रधान संपादक राम जी राय द्वारा लिखे जा रहे आलेख का सम्पादित अंश है.)

क्या मुक्तिबोध आत्मनिर्वासन (सेल्फ़ एलिअनेशन) की समस्या को आाधुनिक मानव जीवन की केंद्रीय समस्या के रूप में देखते हैं? आचार्य नामवर सिंह ऐसा मानते हैं लेकिन आत्मनिर्वासन को आत्म विभाजन और फिर अस्मिता का लोप ठहराते हुए उसे अपने समय के चालू अस्तित्ववादी मुहावरे में फिट कर देते हैं और मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ को ‘अस्मिता की खोज’ करार देते हैं। दूसरे आचार्य रामविलास शर्मा “शोषण” को वर्तमान युग की सबसे ज्वलंत समस्या मानते हुए मुक्तिबोध को पूरी तरह से विभाजित व्यक्तित्व और मानसिक असंतुलन वाला ठहराते हुए कहते हैं -‘‘व्यक्तित्व-विभाजन मुक्तिबोध की अनेक कविताओं का विषय है। यह ऐसी स्थिति है जिससे उनका निकटतम संबंध है।‘ इस पर बात आगे की जायेगी. लेकिन अगर रामविलास जी मान भी लेते कि मुक्तिबोध आत्मविभाजन के शिकार नहीं थे और उनकी कविताओं में एलियनेशन का प्रश्न केंद्रीय रूप से मौजूद है, फिर भी वे इसे यह कह कर खारिज कर देते कि यह युवा मार्क्स की ‘1848 की आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपि’ में था, प्रौढ़ मार्क्स में तो वर्तमान युग की केंद्रीय समस्या शोषण है। वैसे ‘शोषण’ शब्द मुक्तिबोध की कविताओं में बारहा और विभिन्न रूपों में आता है, यहां तक कि केंद्रीय प्रश्न के रूप में भी-

‘‘सारे प्रश्न छलमय
और उत्तर और भी छलमय….
समस्या एक
मेरे सभ्य नगरों और ग्रामों में
सभी मानव सुखी, सुंदर व शोषण-मुक्त कब होंगे

खैर! विभाजित व्यक्तित्व, एलिअनेशन और शोषण में प्रमुखता का प्रश्न, ‘अस्मिता की खोज’ आदि पर अलग से विचार किया जाना बेहतर होगा। फिलहाल मुक्तिबोध की कविताओं में ‘एक अपरूप शून्य के प्रति, ‘ब्रह्मराक्षस’ कविता की पंक्ति- ‘‘किंतु युग बदला व आया कीर्ति व्यवसायी’’से लेकर ‘अंधेरे में’ कविता की पंक्ति- ‘‘शुनःशेप के पिता अजीगर्त समान ही / व्यक्तित्व वह अपने से खोया हुआ / वही उसे मिलता था रात में / दिन में था पागल’ तक ऐसी बहुत सारी पंक्तियां बिखरी पड़ी हैं, जो यह बताती हैं कि मुक्तिबोध एलिअनेशन की आधुनिक स्थिति से बहुत अच्छी तरह परिचित थे, उसके ऐतिहासिक, मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य के साथ।

अंग्रेजी शब्द एलिअनेशन के लिये हिंदी में कई शब्द चलन में हैं। ‘अजनबीपन’ से लेकर ‘अलगाव’, वियोजन’, आत्मनिर्वासन आदि। आप कोई एक शब्द अपने लिये चुन सकते हैं। जो हो, पहला सवाल तो यही कि यह एलिअनेशन है क्या बला?

कहते हैं कर्म की गति न्यारी है। मार्क्स के अनुसार मानव समाज के इस गहन गति का इतिहास द्विआयामी है। एक तरफ यह इतिहास मनुष्य के प्रकृति पर नियंत्रण का इतिहास है तो ठीक उसी के साथ यह मनुष्य के खुद से अलगाव के बढ़ते जाने का भी इतिहास है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि अलगाव एक ऐसी परिस्थिति है, जिसमें आदमी अपने ही उत्पाद के, रचना के अधीन हो जाता है, और कि जिनसे उसका सामना एक दुश्मन की तरह होता है। वह अपने ही द्वारा सृजित संसार को पराया पाता है, जैसे यह उसकी न होकर कोई और दुनिया हो। पूंजीवादी समाज की जितनी भी संस्थाएं हैं- धर्म, राज्य और राजनीतिक अर्थशास्त्र – उन सबपर एलिअनेशन की परिस्थति की छाप होती है यानीं उससे ग्रसित होती हैं। ये संस्थाएं आपस में अंतरसंबंधित और अंतरनिर्भर होती हैं। जैसे मनुष्य जब तक धर्म की काल्पनिक दुनियां का वाशिंदा बना रहता है, तबतक वह अपने सार को किसी ईश्वर, ब्रह्म या ऐसी ही किसी परा-शक्ति की दी हुई एक वस्तु के रूप में समझता है- ‘त्वदीयं वस्तु गांविंद् तुभ्यमेव समर्पये।‘ उसी तरह अपनी आत्मकेंद्रित जरूरतों के तहत वह व्यवहार में अपने श्रम के उत्पाद और अपनी क्रियाओं को किसी परायी शक्ति- धन वा मुद्रा- के अधीन कर देता है और उसे प्राकृतिक मानता हुआ उसी का उत्पाद और क्रिया मानता है। ‘‘धन वा मुद्रा अपने आप में क्या है? कुछ नहीं. वह मुनुष्य के कार्य का उतपाद है उसके ही अस्तित्व का एलिअनेटेड (अलगाया) सार है. वही सार मनुष्य को अपने अधीन कर लेता है और मनुष्य उस ‘लक्ष्मी’ की पूजा करने लगता है। और जिस तरह पंडे-पुरोहित, मुल्ला-मौलवी, पादरी, साधू-संत, पीर-पैगंम्बर उस ईश्वर, खुदा, गॉड के बीच मध्यस्थ बन जाते हैं, जिन्हें मनुष्य अपनी सारी अद्भुत उच्च आत्मिक शक्तियां और सभी तरह के धार्मिक विश्वासों को समर्पित कर देता है, उसी तरह राज्य मनुष्य और मानवी आज़ादी के बीच मध्यस्थ बनकर आता है जिसे मनुष्य अपनी गैर दैवी और मानवी आज़ादी सौंप देता है। बेशक, पूंजीवाद के अंतरगत एलिअनेशन मनुष्य के रोज़मर्रे के कामकाज से गहरे जुड़ा हुआ रहता है, महज़ उसके मानसिक क्रियाकलापों से नहीं जैसा कि एलिअनेशन के अन्य रूप हो सकते हैं। मसलन जैसा कि मार्क्स का कहना है-‘धर्मिक अलगाव मूलतः मनुष्य के चेतना जगत में उत्पन्न होता है, मनुष्य के आत्मिक दुनिया में, लेकिन आर्थिक अलगाव वास्तविक जीवन में उत्पन्न होता है….इसलिये वह भैतिक और आत्मगत संसार दोनों को प्रभावित करता है।’

एलिअनेशन अनिवार्यतः एक ऐतिहासिक अवधारणा है। अपनी ऐतिहासिक प्रक्रिया में मानवी अलगाव सभी चीजों को ‘स्वयं से जुदा और बेचने वाली वस्तु में बदलने के साथ पूरी हो गई है।’ ‘बिक्री अलगाव का व्यवहार है। अलगाव ‘‘बिक्री योग्य” के सार्वभौमिक विस्तार के रूप में आया, सभी चीजों को माल के रूप में बदल देने के बतौर, मनुष्य के व्यक्तित्व, उसके नैसर्गिक गुणों तक को- ‘यह व्यक्तित्व के व्यवसायीकरण का युग है।’(मुक्तिबोध) एक ऐसा युग जिसमें मनुष्य को वस्तु रूप में बदल दिया गया, जो अपने को माल की तरह बेचने के लिये बाजार में खड़ा है। अब मनुष्य के बीच के रिश्ते वस्तुओं के बीच के रिश्ते में बदल गये। इसे ही री-इफिकेशन कहते हैं।

अपने श्रम के उत्पाद और उत्पादन प्रक्रिया से आदमी के अलगाव की यह परिस्थिति आदमी का खुद से भी अलगाव का बायस बनती है। ऐसे में वह महसूस ही नहीं कर सकता कि वह अपने व्यक्तित्व का आत्मसंभवा पूर्ण विकास कर सकता है। ‘काम तो उसके लिये बाहरी चीज लगती है। वह उसे अपने स्वभाव का हिस्सा लगता ही नहीं। उसे अपने काम से कभी खुशी नहीं मिलती। फलतः वह अपने काम में कभी संतुष्टि नहीं पाता बल्कि अपने को नकारता है। अपने को कभी महसूस भी करता है तो अवकाश के समय जब वह घर पर होता है बाकी काम के समय वह अपने को गृहहीन महसूस करता है। श्रम करते हुए वह अपने को किसी अन्य के लिये श्रम करता पाता है, जो उसके लिये नहीं है। उसे अपना श्रम दुख, अपनी शक्ति शक्तिहीनता, अपना ही सृजन बांझपन कुल मिलाकर उसकी अपनी व्यक्तिगत, शारीरिक, मानसिक ऊर्जा, उसका निजी जीवन… एक ऐसी क्रिया की तरह लगता है जो उससे स्वतंत्र है और उसके लिये नहीं है, बल्कि उसे उसी के खिलाफ निर्देशित कर दिया गया है।‘

ऐसा मजदूर को ही नहीं एक भिन्न तरह से कवि को भी महसूस होता है, (अन्यथा जिसे लगता है कि वह स्वतंत्र रूप से और अपने मन का काम कर रहा है) जब किसी क्षण में वह कहता है- ‘हो इसी कर्म पर वज्रपात!’ (निराला)

खुद से एलियनेटेड मनुष्य मानव समाज से भी एलियनेट हो जाता है, यहां तक कि अपनी मनुष्य प्रजाति मात्र से। मनुष्य मनुष्य से अलगाव में होता है। जब वह खुद के खिलाफ होता है तो वह दूसरे के भी खिलाफ जा खड़ा होता है। प्रत्येक आदमी दूसरे आदमी से अलगाव में जैसे मानव जीवन से ही अलगाव हो जाता है। आधुनिक नागरिक समाज हमारे सामने इसी रूप में आता है।-

प्रसाद ने ‘कामायनी’ में लिखा-

ज्ञान और कुछ क्रिया भिन्न
इच्छा पूरी कैसे हो मन की
एक दूसरे से न मिल सके
यह विडंबना है जीवन की

निराला ने मनुष्य का मनुष्य से और मनुष्य के मानव समाज से अलगाव की इस परिस्थिति को महज विडंबना के रूप में नहीं उससे कहीं गहरे जाकर पकड़ने की कोशिश की। वे इसे ज्ञानात्मक संवेदना तक भले न उठा पाये हों लेकिन इसका गहरा घनीभूत संवेदनात्मक ज्ञान उन्हें था –

गहन है यह अंध कारा
स्वार्थ के अवगुंठनों से
हुआ है लुंठन हमारा
खड़ी है दीवार जड़ की घेर कर
बोलते हैं लोग ज्यों मुंह फेर कर
इस गगन में नहीं दिनकर
नहीं शशधर नहीं तारा

कल्पना का ही अपार समुद्र यह
गरजता है घेर कर तनु रूद्र यह
कुछ नहीं आता समझ में
कहां है श्यामल किनारा
प्रिय मुझे वह चेतना दो देह की
याद जिससे रहे वंचित गेह की
खोजता-फिरता न पाता हुआ
मेरा हृदय हारा
इसी तरह ‘अर्चना’ में संकलित एक गीत की इन पंक्तियों को भी देखिये-
गीत गाने दो मुझे तो
वेदना को रोकने को।

चोट खाकर राह चलते
होश के भी होश छूटे,
हाथ जो पाथेय थे, ठग-
ठाकुरों ने रात लूटे,
कंठ रुकता जा रहा है
आ रहा है काल देखो।

भर गया है जहर से
संसार जैसे हार खाकर,
देखते हैं लोग लोगों को
सही परिचय न पाकर,
बुझ गयी है लौ पृथा की,
जल उठो फिर सींचने को

इन गीतों या अन्य और गीतों व कविताओं को इस नुक़्ते नज़र से देखें तो हमें इनमें व्यक्त संवेदनात्मक तीव्रता, विकलता, अवसाद को गहरे जाकर समझने में बहुत मदद मिल सकती है। और हम निराला के संवेदनात्मक उद्देश्यों- ‘कहां है श्यामल किनारा,’ देह की ‘वह चेतना’ जो वंचित गेह की याद बनाए रखे- से संगति बनाने, इसे हासिल करने, पा लेने की चुनौती को स्वीकार करने, उसके हमारे लिये महत्व को आत्मसात करने की बेचैनी से हम और गहरे स्तर पर भर जाएं। कहिए तो इन गीतों का यही संवेदनात्मक उद्देश्य-लक्ष्य है। कहा जाये तो स्वयं निराला और उनके रचनाओं की और बेहतर और नई समझ के लिये भी एलियनेशन की समझ का भारी महत्व है।

मुक्तिबोध के यहां भी यह विकलता, अवसाद, हार की पीड़ा उसी तीव्रता के साथ मिलती है। उनकी नगरी के गगन में भी ‘चांद नहीं है, सूर्य नहीं है, ज्वाल नहीं है/ सिर्फ धुएं के बादल-दल हैं/…छाये हुए धूम की मानो हजार आंखें/द्वेषभरी चिनगियां हजारों/ जहरीली हैं।’ मुक्तिबोध यह सब देखकर विकल और संतप्त जरूर होते हैं लेकिन वे यहीं तक नहीं रुकते, आगे जाते हैं। अलगाव की इस परिस्थिति को ज्ञानात्मक संवेदना की ऊंचाई तक ले जाते हैं और फिर इसे गहरी संवेदना के साथ चित्रित करते हैं-

“इस वस्तुस्थिति से सामंजस्य-यत्न जितना भी अधिक किया
इस जग को और-और अज़ीब पाया
जिसमें तुम और-और ज़्यादा अज़नबी बने
अपने को बदनसीब पाया।
जितनी ही अधिक मित्रता की
उतनी ही अधिकाधिक शत्रुता रखी
अपने ही से।
अपने से जुदा हुए
निज की छाया दो भागों में बंट गयी
अपना सिर अलग-अलग दो एंगल में तन गया
हाथों के भीतर से फूटे दो नये हाथ
उग आये नये अज़नबी पंजे खतरनाक
जीने के लिये, स्वयं से पृथक भिन्न…

(चुप रहो मुझे सब कहने दो)

अब मनुष्य या किसी चीज का अगर अलगाव हुआ है तो ज़ाहिर है उसका यह अलगाव निश्चित चीज से हुआ है और यह किसी निश्चित कारणों का परिणाम है- अलगाव के विषय हैं मनुष्य से संबंधित घटनाओं और परिस्थितियों के आपसी संघात- जो अपने को ऐतिहासिक ढांचे, फ्रेमवर्क में ज़ाहिर करते हैं। ‘ब्रह्मराक्षस’ कविता में आई पंक्ति ‘किंतु युग बदला व आया कीर्ति व्यवसायी….- को इस संदर्भ और अर्थ में सही तौर पर समझा जा सकता है। यहां यह पंक्ति एलियनेशन के बारे में ऊपर जो कुछ भी कहा गया है उन सभी बातों को अपने में समेटे हुए है। यानीं कि एलिअनेशन अनिवार्यतः एक ऐतिहासिक अवधारणा है और कि अपनी ऐतिहासिक प्रक्रिया में मानवी अलगाव अब सभी चीजों को ‘स्वयं से जुदा और बेचने वाली वस्तु में बदलने के साथ पूरी हो गई है। वह अब कीर्ति तक का व्यवसाय करने लगी है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि आधुनिक युग के आने से पहले इस ‘अलगाव’ का ढांचा और तरह का रहा होगा। ‘एक अपरूप शून्य के प्रति’ कविता उस और तरह के ढाँचे को रूपायित करती उसके वर्मान रूप को भी अपने में समेटती है –

सृजन के घर में तुम
एक मनोहर शक्तिशाली
विश्वात्मक फैंटेसी
…..
विपरीत दोनों दूर छोरों द्वारा पुजकर
स्वर्ग के पुल पर
चुंगी के नाकेदार
भ्रष्टाचारी मजिस्ट्रेट, रिश्वतखोर थानेदार!!

इसी तरह इससे मुक्ति पाना भी अंतरनिहित तौर पर ऐतिहासिक अवधारणा है, जो इस बात का ख़याल रखती है कि यह प्रक्रिया सफलता पूर्वक संपन्न हो जो एक गुणात्मक रूप से भिन्न स्थितियों की ओर ले जा रही है- पूंजीवादी समाज, उपभोक्ता समाज के ध्वंस और समाजवाद के निर्माण की ओर।

यहीं हमें एलियनेशन के इस प्रश्न को कुछ और संदर्भों के साथ भी देख लेना चाहिये।

मिथक और अलगाव
वह अवधारणा जो महज ऐतिहासिकता का आभास देती है समस्या का रहस्यीकरण करने की तरफ ले जाती है। मसलन मिथकों का एक अनिवार्य कार्य मानव विकास की मूलभूत सामाजिक ऐतिहासिक प्रक्रिया को अलौकिक में बदल देता है। या कि ‘‘वैश्विक अलगाव” सच्चे ऐतिहासिक निर्धारकों को नकारना और समस्या का रहस्यीकरण करना है। वास्तव में अगर एलियनेशन की समस्या को ठोस सामाजिक-आर्थिक प्रक्रिया से अलग-थलग कर दिया जाये तो ऐतिहासिक प्रक्रिया में निहित जटिल कारकों की सही समझदारी की जगह महज इतिहासाभास ले लेगा। मुक्तिबोध की कविताएं इन दोनों तरह के -मिथक के अलौकिकीकरण और ‘वैश्विक अलगाव’ के इतिहासाभास के भेदन, खंडन और नकार की कविताएं भी हैं।

बकौल मार्क्स श्रम सार्वभौम स्तर पर -उत्पादक क्रिया के रूप में- मनुष्य के अस्तित्व का रूप है (मोड ऑफ एक्जिस्टेंस)। और खास रूप में पूंजीवादी श्रम-विभाजन के बतौर। अपने इसी रूप में ‘श्रम सभी तरह के अलगाव का स्रोत है।’
श्रम, श्रम विभाजन, खरीद-बिक्री (एक्सचेंज) और निजी संपत्ति एलियनेशन (अलगाव) के रहस्य को समझने की केंद्रीय अवधारणाएं हैं। ये ‘मध्यस्थताएं’ (उमकपंजपवदे) हैं, जो आदमी और उसकी क्रियाओं के बीच हस्तक्षेप करती हैं और आदमी को अपने श्रम का सुख प्राप्त करने से वंचित कर देती हैं। अपने उत्पादक (सृजनात्मक) योग्यताओं, क्षमताओं के प्रयोग और उसके फल पर स्वाभाविक मानवी अधिकार के हक में मार्क्स ने अलगाव की आलोचना को इन ‘मध्यस्थताओं’ को खत्म कर देने के रूप में सूत्रबद्ध किया।

संक्षेप में एक अलगावग्रस्त समाज में लोगों की मानसिक बुनावट, उनकी चेतना जिन परिस्थितियों में वे अपने को पाते हैं, और उत्पादन प्रक्रिया में उनका जो स्थान होता है, बहुत हद तक उसका ही प्रतिबिंब होती है। मार्क्स के ज्ञान के समाजशास्त्र की यही विषयवस्तु थी।

अलगाव की इस समस्या को अपने समय, समाज और संस्कृति में तलाशते हुए मुक्तिबोध मार्क्स के ‘ज्ञान के समाजशास्त्र’ की इस पद्धति को अपनाते और आगे ले जाते हैं। अलगाव के मूल स्रोत की शिनाख्त करते हैं और फिर उसे उसके मूल, संगत निष्कर्षों तक ले जाते हैं। मुक्तिबोध के‘ज्ञान का समाजशास्त्र’ की विवेचना यहां उद्देश्य नहीं है लेकिन उनके समग्र साहित्य के आधार पर मुक्तिबोध के ‘ज्ञान का समाजशास्त्र’ का व्यवस्थित अध्ययन किया जाना चाहिये, और यह महत्व का काम होगा, जो अब तक नहीं किया गया है।

फिर भी यहां इतना कहना जरूरी लग रहा है कि अपने इसी ज्ञान के समाजशास्त्र के आधार पर मुक्तिबोध सदियों से स्थापित और चले आ रहे सत् चित् आनंद की बहुप्रतिष्ठित स्थापना और उसके आधार पर निर्मित सौंदर्य के प्रतिमान को नकार देते हैं। और ‘सत् चित् आनंद’ के आदर्शवाद की जगह यथार्थ-संगत ‘सत् चित् वेदना’ को और सौन्दर्य के प्रतिमान रहे आये को ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ करार देते हुए उसकी जगह सौंदर्य के नये मान को अपनी कविताओं-रचनाओं में प्रतिष्ठित करते हैं, और उसे हम सबके लिये भी प्रस्तावित करते हैं।

अलगाव और आधुनिक राज्य

एलियनेशन और आत्मकेंद्रित आधुनिक राज्य के बीच नाभिनाल का संबंध है। आधुनिक राज्य अलग-थलग, नितांत अपने तक सीमित वैयक्तिकता और अमूर्त वैयक्तिकता के आधार पर खड़ा और उसी का हिमायती है।

आधुनिक समाज व्यक्ति को उसके समाज से, मनुष्य जाति मात्र से संबद्ध नहीं करता, उससे उच्छिन्न करता है। सर्वहारा को छोड़ दें, जिसे अपने अस्तित्व के लिए हर वक्त ही संघबद्ध रहना पड़ता है, अन्य वर्गों के लिए अब यह अंशतः संयोग पर और अंशतः व्यक्ति के अपने प्रयास पर निर्भर करता है कि वह अपने को समाज से जोड़े रखे। व्यक्तिवाद, वैयक्तिक अस्तित्व ही वर्तमान बुर्जुआ समाज का अंतिम सत्य और लक्ष्य है। वह इस अहसास को मुसलसल प्रत्यक्ष करता रहता है। अर्थात ‘वास्तविक मनुष्य, आज के राजनीतिक संविधान का, निजी व्यक्ति है।‘ (दि रीयल मैन इज द प्राइवेट इन्डिविजुअल ऑफ प्रेजेन्ट डे पोलिटिकल कास्टिीट्यूशन -मार्क्स) वह मनुष्य का अपनी मनुष्य जाति से संबंध विच्छेद करता है। अर्थात वर्तमान समाज का अंतरविरोध यह है कि ‘‘मनुष्य का अपने सार(मनुष्य जाति) से अलगाव हो गया है’’- मार्क्स)। मुक्तिबोध की कविता पंक्तियां -‘‘व्यक्ति स्वातंत्र्य का वादी छल नहीं सकता/ मुक्ति के मन को/ जन को’’ या कि ‘‘कविता में कहने की आदत नहीं/ पर कह दूं/ वर्तमान समाज चल नहीं सकता/पूंजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता’’ या कि ‘‘अपनी मुक्ति के रास्ते/ अकेले में नहीं मिलते/ यदि वह है तो सबके साथ है’’ आदि इस स्थिति का बयान और प्रत्याखान एकसाथ करती हैं।

व्यक्तित्व अपना ही खोया हुआ अपने से

‘एक अपरूप शून्य के प्रति’ कविता में मुक्तिबोध की अपरूप ब्रह्म की आलोचना दुनिया की आलोचना, धर्म की आलोचना नियमों-कानूनों की और ब्रह्मविद्या की आलोचना राजनीति की आलोचना में परिवर्तित हो जाती है। इसे समझने की जगह रामविलास जी इसके जरिए मुक्तिबोध के व्यक्तित्व को जांचने और उसका मजाक उड़ाने में अपनी बुद्धि और श्रम खर्च करते हैं।
आप पायेंगे कि मुक्तिबोध क्रमशः आजाद भारत की सत्ता-समाज संरचना के प्रतिनिधि लक्षणों को पहचानते और उसके बुनियादी अंतरविरोध व जिस रूप में वह अपने को अभिव्यक्त कर रहा था या अभिव्यक्त कर रहा है, उन स्थितियों के खिलाफ हर संभव तरीके से युद्ध की घोषणा तक पहुंचते हैं, उन स्थितियों के खिलाफ जिसमें मनुष्य लांक्षित, गुलाम, निरुद्ध, तिरष्कृत घृणित जीव जैसा बना दिया गया है।
अंधेरे में – मनुष्य जीवन का पुनः अपने आप में लौटने, उसके अपने सार रूप में उसकी वापसी, उसका संभव पुनः एकीकरण, वास्तविक संसार में परम अभिव्यक्ति की खोज दरअसल, उस नये मनुष्य, जो एक नये भारत की खोज से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है, की खोज में बदल जाती है। जहां वह अपनी समस्त अंतरनिहित शक्तियों और संभावनाओं का पूर्ण विकास और उसकी अभिव्यक्ति पा सके या कर सके। और कि यह कल्पना दिवा=स्वप्न या निरा स्वप्न या यूटोपिया नहीं, अनिवार और आत्मसंभवा है। क्या यहां आप आत्मसंभवा का अर्थ मुक्तिबोध संभवा कर सकते हैं? नहीं। लेकिन करनेवाले आलोचक तो यह करने तक से न चूके न हिचके।

 

 

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